Saturday, December 31, 2011

जश्न में डूबा देश के अंतिम छोर का समुंद्र तट




अम्बरीश कुमार
कोवलम (तिरुअनंतपुरम ) । देश के इस अंतिम छोर पर साल के अंतिम दिन नए साल का जश्न बरसात थमते ही शुरू हो गया है । कोवलम के समुंद्री तट देश विदेश में काफी लोकप्रिय है और यहाँ के ज्यादातर होटल और रिसार्ट दो महीने पहले ही इस दिन के लिए बुक हो जाते है । यही वजह है कि शुक्रवार से ही सैलानियों का आना जो शुरू हुआ वह देर शाम तक नही थमा । दक्षिण के समुंद्री तटों पर तूफ़ान का जो असर पड़ा उससे कोवलम के समुंद्र तट भी प्रभावित हुए है । समुंद्र अशांत नजर आया तो सैलानी उससे भी ज्यादा अशांत । इनमे विदेशी सैलानियों खासकर युवतियों को गहरे समुंद्र में जाने से रोकने के लिए तट पर तैनात सुरक्षा कर्मचारियों को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। आज तडके भारी बरसात और तेज हवाओं के चलते सैलानी जो होटल और रिसार्ट में बंध गए थे आसमान खुलते ही समुंद्र तटों पर जम गए । लाइट हाउस समुंद्र तट पर पिछले कुछ समय में बाजार का असर ऐसा पड़ा है कि रेस्तरां और होटल समुंद्र तटों का बुरी तरह अतिक्रमण कर चुके है । कई जगह तो समुंद्र होटल ,रिसार्ट और रेस्तरां की दूरी पच्चीस तीस मीटर ही बच गई है जो किसी भी बड़े तूफ़ान में कहर बन सकती है ।
इस समुंद्र तट पर विभिन्न रिसार्ट और होटल प्रबंधन ने नए साल के जश्न के लिए विशेष प्रबंध किए है । कही सफ़ेद तो काली रेत पर सैलानियों को धूप और बरसात से बचाने के लिए जो छतरी लगाई गई है उसके नीचे आराम करने के लिए जो लंबी बेंचनुमा कुर्सियां है वहा पर हर तरह के पेय रिसार्ट वाले उपलब्ध करा देते है जिसपर दोपहर में ज्यादातर विदेशी सैलानी जमे हुए थे । जबकि देश के अन्य हिस्सों से आए सैलानी रेत पर या लहरों से खेलने का मजा ले रहे थे । शाम होते ही सारे रेस्तरां रंगबिरंगी रोशनी में नहा गए तो तट पर विशेष रूप से लगाए गए बड़े बड़े बल्ब से सारा इलाका जगमगा गया । तट पर कई जगह नीली वर्दी में सुरक्षा कर्मचारी लाल झंडी और सीटी के जरिए सैलानियों पर नजर रख रहे थे ताकि कोई हद पर करने की कोशिश न करे और नए साल का जश्न उसके लिए भारी न पड़ जाए । इनमे ज्यादा जोखम उन लोगों से था जो मदिरा के नशे में लहरों के बीच थे ।
आज रात के लिए पांच सितारा रिसार्ट से लेकर स्पा तक में सैलानियों के जश्न का अलग अलग तरह का इंतजाम है । इनमे विवंता ताज से लेकर कई बीच रिसार्ट पर संगीत , डांस और धमाल का इंतजाम किया गया है । दो हजार रुपए से लेकर दस हजार रुपए तक के अलग अलग पैकेज के इश्तहार समूचे समुंद्र तट पर नजर आते है जिसमे तीन पैग से लेकर छह पैग और रात का खाना या स्नैक्स आदि शामिल है । जोड़ों के लिए विशेष रियायत दी गई है ।

Friday, December 23, 2011

कांग्रेस के आरक्षण के दांव को लेकर पशोपेश में है मुसलमान

अंबरीश कुमार
लखनऊ , दिसंबर । पिछडो के कोटे में अल्पसंख्यकों के लिए साढ़े चार फीसद आरक्षण को लेकर उत्तर प्रदेश के मुसलमान फिलहाल पशोपेश में है । कांग्रेस ने विधान सभा चुनाव से पहले जो यह दांव चला है उसके चंगुल में अगर पिछड़े या दलित नेता फंसे तो नुकसान उन्ही का होगा और फायदा कांग्रेस ले जाएगी । यही वजह है कि इस मुद्दे पर मायावती से लेकर मुलायम सिंह तक फूंक फूंक कर कदम रख रहे है । कांग्रेस के इस खेल में कई पेंच भी है पर मुसलमान इस वजह से इसका स्वागत कर रहे है कि कुछ मिलना तो शुरू होगा । दरअसल पिछड़ों के २७ फीसद कोटा में साढ़े चार फीसद का कोटा अल्पसंख्यक समुदाय के लिए है जिसमे ईसाई ,सिख ,बौद्ध और मुसलमान सभी शामिल है । इसलिए इससे सिर्फ मुसलमानों को फायदा होगा यह कहना ठीक नहीं है । उत्तर प्रदेश में इसका फायदा ,ईसाई ,सिख और बौद्ध भी लेंगे। प्रदेश में बौद्ध धर्म अपनाने वालों की संख्या में इजाफा भी हुआ है । मुस्लिम नेताओं की यह भी आशंका है कि आरक्षण को लेकर अगर कुर्मी और यादव बिरादरी के लोगों ने बौद्ध धर्म अपना लिया तो इसका ज्यादा फायदा वे ही ले जाएंगे । पिछड़ों में आरक्षण का ज्यादा फायदा इनदोनो मजबूत बिरादरी को ज्यादा मिलता है ।
पिछड़ों के कोटा में अल्पसंख्यकों के नए कोटा का फायदा मुसलमानों की करीब दर्जन भर जातियों को मिल सकता है जिनमे अंसारी ,कुरेशी ,इदरीशी आदि शामिल है । मुस्लिम रीजेर्वेशन मूवमेंट के संयोजक जफरयाब जिलानी ने जनसत्ता से कहा -पिछड़ों के आरक्षण में अल्पसंख्यकों को साढ़े चार फीसद के कोटा से यकीनन मुसलमानों की नाराजगी कांग्रेस के प्रति कम होगी पर इसका कितना राजनैतिक फायदा कांग्रेस उठा पायेगी यह नहीं खा जा सकता । यह आरक्षण सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि अल्पसंख्यको के लिए है जिसमे सिख ,ईसाई ,बौद्ध और मसलमान सभी आते है । हम लोगों ने मुसलमानों के लिए नौ फीसद आरक्षण की मांग की थी । रंगनाथ और सच्चर कमेटी ने जो सिफारिशे की थी उनके आधार पर हम आरक्षण की मांग कर रहे है । इसलिए केंद्र के इस कदम से यह मांग पुरी नहीं हुई है यह जरुर ध्यान रखना चाहिए । हमें यह भी आशंका है कि पिछड़ों की कुछ मजबूत जातियां जो अब तक ज्यादा लाभ लेती रही वे आगे भी लाभ उठा सकती है। इसके लिए बौद्ध बनने का भी विकल्प उनके पास है ।
आल इंडिया मुस्लिम फोरम के नेता नेहालुद्दीन अहमद तो इसे कांग्रेस की सियासी चाल मानते है ताकि मुसलमानों का वोट हासिल किया जा सके । पर इसका ज्यादा असर इसलिए भी नहीं पड़ना है क्योकि पिछड़े मुसलमानों की संख्या बहुत कम है । जबकि समाजवादी पार्टी पहले से सच्चर कमेटी की सिफारिशों के तहत आबादी के हिसाब से मुसलमानों के आरक्षण की मांग करती रही है इसलिए आज भी इसे वे नाकाफी मानती है । पर पिछड़ों में इस तरह हिस्सा बांटने का वे विरोध भी नहीं कर रही है । एक मुस्लिम नेता ने कहा -इस मामले में अगर किसी भी दलित या पिछड़े नेता न कोटे के भीतर कोटे का विरोध किया तो आगामी चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ेगा और कांग्रेस चाहती भी यही है । jansatta

Wednesday, December 21, 2011

कड़ाके की ठंड में टीम अन्ना कैसे भरेगी उत्तर प्रदेश की जेलों को

अंबरीश कुमार
लखनऊ ,दिसंबर । समूचे उत्तर प्रदेश में कड़ाके की ठंड पड़ रही है और पारा अलग अलग शहरों में दो से छह सात डिग्री तक जा चूका है जिसमे और गिरावट की आशंका है । ऐसे में अन्ना हजारे का जेल भरो आंदोलन छेड़ने का तुक किसी को समझ नहीं आ रहा । इस समय प्रदेश के राजनैतिक दल अलाव और रैन बसेरों की मांग कर रहे है ताकि ठंड से लोगों की मौत का सिलसिला थम सके । कई जिलों में ठंड की वजह से बच्चों के स्कूल बंद किए जा चुके है और कालेजों की छुट्टी होने जा रही है। अन्ना के आन्दोलन में मध्य वर्ग की बड़ी भूमिका रही है जिसमे नर्सरी से लेकर स्कूलों के बच्चे भी शामिल रहे है जो गालों पर मै भी अन्ना लिखवा कर धरना स्थल पर अपन परिवार वालों के साथ मौजूद रहते थे । पर अब हालात बदल गए है । जेल भरो आंदोलन एक ठेठ राजनैतिक कार्यक्रम है जो मोमबती जुलूस से अलग होता है । लखनऊ विश्विद्यालय की छात्रा रेनू जोशी ने कहा -खुद तो अन्ना मुंबई जैसे गर्म इलाके में चले गए है और उत्तर भारत में वे जेल भरो आंदोलन करना चाहते है यह तो राजनैतिक अपरिपक्वता का प्रतीक है। कई बार एलान के बाद भी अन्ना एक बार उत्तर प्रदेश नहीं आए पर इतना तो जानते होंगे की आजकल यहाँ ठंड से लोग मर रहे है ऐसे में इस आंदोलन को वे चैनल पर चलाए यहाँ के लोगों को तो बख्स दें ।
अन्ना आन्दोलन के महत्वपूर्ण नेता मुन्ना लाल शुक्ल ने जनसत्ता से कहा -हमने जेल भरो आंदोलन के लिए पचास स्कूलों को पत्र लिखा है पर अभी तक किसी ने जवाब नहीं दिया है।मौसम तो सही में खराब है ,स्कूलों में छुट्टी भी कर दी गई है ऐसे में दिक्कत तो आ रही है । भाजपा के नेता अमित पुरी ने कहा -राजनैतिक कार्यक्रमों के लिहाज से जेल भरो आंदोलन के लिए यह समय उचित नहीं है ,पर अन्ना का तो समूचा आंदोलन प्रतीकों का आंदोलन है ऐसे में इसे भी प्रतीकात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए । दरअसल अभी तक अन्ना के आंदोलन सामान्य ढंग के थे जिसमे लोग काला कपडा पहन कर नुक्कड़ नाटक करते या शाम को मोमबत्ती जला देते । इसकी इजाजत भी मध्य वर्ग के परिवार वाले दे देते थे । पर जेल जाने की बात सुनते ही लोग भड़क जाते है । एक इंजीनियर के पुत्र जो जोर शोर से इन आंदोलनों में शामिल हुए थे उनको घर वालों ने कहा -देखो अब जेल जाने ,पुलिस के चक्कर में पड़ने वाला काम नहीं होगा । बहुत मुश्किल से पढ़ा रहे है अन्दर हो गए तो सरकारी नौकरी भ नहीं मिलेगी फिर एनजीओ ही चलाओगे ।
राजनैतिक टीकाकार वीएन भट्ट ने कहा -पता नहीं अन्ना हजारे के सलाहकार कौन है जो इस तरह की अव्यवहारिक सलाह दे देते है वह भी ऎसी ठंड में जब मुख्यधारा के राजनैतिक दल इस तरह के कार्यक्रम करने से बचते है। ऐसे में जेल भरो आन्दोलन फ्लाप हुआ तो उनके आंदोलन की हवा भी नकल जाएगी । इस बीच वाराणसी से राम धीरज ने कहा -जेल जाने वालों की सूची हम बना रहे है ।ठंड का असर तो खैर पड़ेगा ही पर कार्यक्रम तो होना ही है । दूसरी तरफ
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा है कि उत्तर प्रदेश कोहरे और भीषण ठंड की चपेट में है। हाड़ कंपकंपाती ठंड से बचाव के लिए सरकार को कुछ करने के बजाय केन्द्र को इसे प्राकृतिक आपदा घोषित कराने की चिन्ता है। मुख्यमंत्री चिट्ठीपत्री में माहिर है। उन्होने ठंड के लिए भी राहत पैकेज मांग लिया है। खुद उनकी सरकार ने अलाव और रैनबसेरों के लिए मात्र छह करोड़ रूपए जारी किए हैं। गरीब और दलित इस ठंड के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं लेकिन अपने को दलित की बेटी बतानेवाली मुख्यमंत्री को इनकी फिक्र नही सताती है। गरीब और दलित खुले आसमान के नीचे ठंड से मर रहे है। सरकार ने न अलाव की व्यवस्था की है, नहीं कंबल बांटे हैं और नहीं रैन बसेरे बनाए है।

Tuesday, December 20, 2011

अब मायावती को मुसलमान याद आए


अंबरीश कुमार
लखनऊ ,१९ दिसंबर । मुसलमानों का सवाल उठाकर मायावती अब नए संकट में फस गई है । विपक्षी दलों ने आज मायावती से सवाल किया कि बाबरी ध्वंस करने वाली ताकतों के साथ सरकार बनाते समय बनाते समय उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की याद आई थी या नही । भाजपा के साथ तीन बार सरकार बनाने के बाद मायावती गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अक्तूबर २००२ में चुनाव प्रचार के लिए गई थी जिसे लेकर वे विवादों में घिर गई थी । इसे लेकर वाम दलों ने भी मायावती को आड़े हाथों लिया तो गैर भाजपा अन्य दलों ने भी सवाल उठाया था । अब जब मुसलमानों को लेकर उत्तर प्रदेश में चुनावी लड़ाई तेज हो रही है तो ऐसे में मायावती का मुसलमानों का हमदर्द बनाने का दावा धर्म निरपेक्ष दलों के गले नहीं उतर रहा है । यही वजह है कि उनको लेकर फिर सवाल खड़ा हो गया है । भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा -आज हर पार्टी मुसलमानों की हमदर्द बन रही है जो पूरी तरह सियासी खील है वास्तवकिता तो यह है कि सपा ,बसपा से लेकर कांग्रेस तक ने मुसलमानों को एक वोट बैंक के रूप में ही देखा है । उनके भले के लिए ,उनकी सामाजिक आर्थिक तरक्की के लिए इन दलों ने कोई कदम नहीं उठाया ।
कांग्रेस प्रवक्ता वीरेंदर मदान ने कहा - मायावती को जब जब मौका मिला उन्होंने कट्टर मजहबी ताकतों से हाथ मिलाया और सरकार बनाई । अब वे मुसलमानों की हमदर्द बन रही है । वे नरेंद्र मोदी का प्रचार भी करेंगी और मुसलमानों का हमदर्द भी बनेंगी यह कैसे संभव है । समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अहमद हसन ने कहा - चुनाव करीब आते ही मुख्य मंत्री जी को मुसलमानों की याद आई और बाबरी मस्जिद की शहादत में कांगेस और भजपा की साजिश भी याद आयी लेकिन बाबरी मस्जिद को दिन दहाडे शहीद करने वाली भाजपा के साथ मिलकर हुकूमत बनाते समय उनको मुसलमानों की याद क्यों नहीं आई ।
उन्होंने आगे कहा -बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया को उस दिन मुसलमानों की याद क्यों नहीं आयी जब मुसलमानों पर नरसंहार कराने वाले गुजरात के मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव में उनके लिये वह वोट मांगने स्वयं गुजरात गई थी ।इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने पार्लियामेंट में भाजपा द्वारा पोटा बिल को पास कराने में भाजपा की हिमायत क्यों की थी और उस समय भाजपा का साथ क्यों दिया था, जब कि पोटा के कारण आज भी हजारों मुसलमान जेलों में बद हैं । मायावती ने बाबरी मस्जिद के शहादत के अपराधी श्री लाल कृष्ण अडवानी का स्वागत अम्बेडकर पार्क में करके मुसलमानों के घाव पर नमक छिडकने का काम किया है । मायावती को मुसलमानों को ख्याल उस समय क्यों नहीं आया जब सिमी की गतिविधियां उत्तर प्रदेश में न होने के बावजूद उन पद केन्द्र की भाजपा सरकार और कांग्रेस सरकारों को समर्थन देकर उन पर प्रतिबंध जारी रखा । जब कि माननीय मुलायम सिंह जी ने सिमी पर प्रतिबंध हटा दिया था ।jansatta

Sunday, December 18, 2011

अब हमलावर नही ,बचाव की मुद्रा में मायावती

अंबरीश कुमार
लखनऊ , दिसंबर । बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने पिछले विधान सभा चुनाव में नारा दिया था ,चढ गुंडों की छाती पर -मुहर लगाओ हाथी पर लेकिन आगामी विधान सभा चुनाव के लिए आज मायावती ने नया नारा दिया ,चढ़ विपक्ष की छाती पर -मुहर लगेगी हाथी पर । मायावती की अन्य रैली की तरह इस रैली में भी भारी भीड़ थी और मुस्लिम ,क्षत्रिय और वैश्य समाज के साथ अन्य बिरादरी के लोग भी जुटे । पर इस एकजुटता का प्रदर्शन करने के लिए यह सम्मलेन हुआ उसका जिक्र कम हुआ और कांग्रेस पर हमला ज्यादा हुआ । यह मायावती के राजनैतिक एजंडा और उनकी आशंका को भी दर्शाता है । वे मुलायम सिंह से ज्यादा राहुल गांधी से असुरक्षित महसूस कर रही है या राजनैतिक रणनीति के चलते ऐसा कर रही है यह साफ़ नही है। यह उत्तर प्रदेश का सियासी मिजाज जानने वाले अच्छी तरह जानते है कि चुनावी लड़ाई में फिलहाल मायावती मुलायम सिंह से पिछड़ रही है और अब सत्ता में आने के लिए सिर्फ गठबंधन का एक कमजोर रास्ता ही विकल्प नजर आता है । पर उसके लिए भी संख्या महत्वपूर्ण है । इसी संख्या के लिए वे कांग्रेस को किसी भी तरह मुकाबले में लाने की पुरजोर कोशिश कर रही है ताकि मुस्लिम वोटों का किसी तरह बंटवारा हो जाए ताकि आगे बढ़ती समाजवादी पार्टी का जनाधार प्रभावित हो ।
पिछले विधान सभा चुनाव से लेकर अब तक हर राजनैतिक दल का सामाजिक राजनैतिक समीकरण बदल चुका है । आगामी विधान सभा चुनाव के मद्देनजर सबसे ज्यादा राजनैतिक नुकसान बसपा का नजर आ रहा है जो इस बार भ्रष्टाचर से लेकर उसी कानून व्यवस्था को लेकर घिरी हुई नजर आ रही जिसके नारे पर वे पिछली बार छप्पड़ फाड़ बहुमत से जीत कर आई थी । पर तब से अबतक बहुत कुछ बदल चुका है । मायावती सरकार के मंत्रियों का बहुमत भ्रष्टाचार के घेरे में है तो कई नेता विधायक और सांसद हत्या और बलात्कार के मामले में फंस चुके है । ऐसे में वह मध्य वर्ग जो उन्हें जिता कर लाया था वह बिदक चुका है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस हमला तेज करती जा रही है। राहुल गांधी का यह वाक्य -लखनऊ में एक हाथी बैठा है जो पैसा खाता है ,न सिर्फ मशहूर राजनैतिक जुमला बन रहा है बल्कि अब मायावती को भी आहत कर रहा है । यही वजह है आज मायावती ने कहा -कांग्रेस का दिमाग ख़राब हो गया है जो उन्हें हाथी भी पैसा खाता दिखता है । दरअसल यह जुमला भी भ्रष्टाचार का मुहावरा बन रहा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश की नई पीढी ने न तो बाबरी ध्वंस का समय देखा है ,न राम जन्म भूमि आन्दोलन और न ही वे बोफोर्स से बने राजनैतिक माहौल के बारे में जानते है । ऐसे में कांग्रेस के इतिहास को लेकर बहुत ज्यादा असर पड़ता नहीं दिख रहा है । दूसरी तरफ सभी दलों को अपने परंपरागत जनाधार और संघर्ष की क्षमता के आधार पर ही वोट मिलना है । ऐसे में घूम फिरकर लड़ाई फिर सपा बसपा के बीच नजर आती है जिसमे कांग्रेस लोकदल गठबंधन के बाद बढ़ रही है पर उसक भी एक सीमा है । इसलिए मायावती हमला भले कांग्रेस पर करे पर ज्यादा आशंकित वे समाजवादी पार्टी से है जिसका समूचे प्र्रदेश में बूथ स्तर का मजबूत ढांचा है । पर उत्तर प्रदेश में चार साल से लड़ रही समाजवादी पार्टी पर मायावती ज्यादा हमला न कर कांग्रेस को निशाने पर रखती है। रहुल गाँधी के हाल के दौरे और पहले के दौरे के बाद मायावती ने जैसी प्रतिक्रया की है उससे तो यही लगता है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और बसपा ही लड़ रही है । अपवाद के रूप में भाजपा के आरोप भी मायावती की जबान पर आते है पर उसमे चेतावनी कम नसीहत ज्यादा होती है । आज भी मायावती ने भाजपा को अपना बचा खुचा जनाधार बरक़रार रखने की सलाह दी बजे इसके कि वह उनके परिजनों पर आरोप लगाए । आखिर भाजपा का जनाधार चुनाव बाद किसके काम आता है यह जाहिर है ।

Thursday, December 15, 2011

अदम गोंडवी की हालत गंभीर

कौशल किशोर
जनकवि रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोण्डवी की हालत अब भी चिंताजनक बनी हुई है। अपनी गजलों व शायरी से आम जन में नई स्फूर्ति व चेतना भर देने वाले अदम लखनऊ के संजय गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान ;पी जी आईद्ध के गेस्ट्रोलॉजी विभाग, पांचवा तल, जी ब्लॉक, बेड न0 3 में भर्ती हैं और अपने जीवन के लिए मौत से पंजे लड़ा रहे हैं। उनकी चेतना जब भी वापस आती है, वे अपने भतीजे दिलीप कुमार सिंह को सख्त हिदायत देते हैं कि मेरे इलाज के लिए सहयोग के लिए अपनी तरफ से न कहो। जैसे कहना चाहते हैं कि सारी जिन्दगी संघर्ष किया है, अपनी बीमारी से भी लड़ेगे। उसे भी परास्त करेंगे। वे आंख खेलते हैं और चारो तरफ अपने साथियों को पाते हैं। उनके चेहरे पर नई चमक सी आ जाती है। एक साथी उन्हें सुनाते है ‘काजू भुनी प्लेट में ह्निस्की ग्लास में/उतरा है रामराज विधायक निवास में’ और अदम अपना सारा दर्द पी जाते हैं और उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान फैल जाती है।
अदम गोण्डवी का लीवर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। किडनी भी ठीक से काम नहीं कर रहा है। पेट फूला हुआ है। मुँह से पानी का घूँट भी ले पाना उनके लिए संभव नहीं है। खून में होमोग्लोबीन का स्तर भी नीचे आ गया है। सोमवार की रात तीन बोतल खून चढ़ाया गया। संभव है आगे और खून चढ़ाना पड़े। मंगलवार को अदम गोण्डवी का इन्डोस्कोपी हुआ तथा कई जाँचें की गई। इनकी रिपोर्ट आने के बाद आगे के इलाज की दिशा तय होगी। पी जी आई के डाक्टरों का कहना है कि अदम गोण्डवी के इलाज में करीब तीन लाख रुपये के आसपास खर्च आयेगा।
‘जनसंदेश टाइम्स’ में उनकी बीमारी की खबर तथा सहयोग की अपील का अच्छा असर देखने में आया है। आज सुबह से ही लेखकों, संस्कृतिकर्मियों का पी जी आई आना शुरू हो गया। कई संगठन और व्यक्ति भी सहयोग के लिए सामने आये। जो किसी कारणवश नहीं पहुँच पाये, वे भी लगातार हालचाल पूछते रहे। पहुँचने वालों में वीरेन्द्र यादव, प्रो0 रमेश दीक्षित, राकेश, भगवान स्वरूप कटियार, आर0 के0 सिन्हा, श्याम अंकुरम, आदियोग, संजीव सिन्हा, पी सी तिवारी, रामकिशोर आदि प्रमुख थे।
अदम गोण्डवी के इलाज के लिए सहयोग जुटाने के मकसद से कई संगठन सक्रिय हो गये हैं। जसम, प्रलेस, जलेस, कलम, आवाज, ज्ञान विज्ञान समिति आदि संगठनों की ओर से राज्यपाल व मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा गया तथा उनसे माँग की गई कि अदम गोण्डवी के इलाज का सारा खर्च प्रदेश सरकार उठाये। ऐसा ही ज्ञापन उŸार प्रदेश हिन्दी संस्थान और भाषा संस्थान को भी भेजा गया है। लेखक संगठनों का कहना है कि अदम गोण्डवी ने सारी जिन्दगी जनता की कविताएँ लिखीं, जन संघर्षों को वाणी दी। ये हमारे समाज और प्रदेश की धरोहर है। इनका जीवन बचाना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। वह आगे आये। रचना व साहित्य के लिए बनी सरकारी संस्थाओं का भी यही दायित्व है।
ज्ञात हो कि कल सोमवार 12 दिसम्बर को अदम गोण्डवी को गोण्डा से लखनऊ के पी जी आई में लाया गया था। उनकी हालत काफी गंभीर थी। वे नीम बेहोशी की हालत में थे। कई घंटे वे बिना भर्ती व इलाज के पड़ रहे। इससे उनकी हालत और भी खराब होती गई। बाद में पी जी आई के इमरजेन्सी में भर्ती हुए। सबसे बड़ी दिक्कत पैसे की थी। परिवार के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। सबसे पहले मुुलायम सिंह यादव का सहयोग सामने आया। उन्होंने पचास हजार का सहयोग दिया। ए डी एम, मनकापुर ने दस हजार का सहयोग दिया। गोण्डा में जिस प्राइवेट नर्सिंग होम में उनका इलाज चला, वहाँ के डाक्टर राजेश कुमार पाण्डेय ने दस हजार का सहयोग दिया।
कल से चले इलाज से इतना फर्क आया है कि कल जहाँ वे नीम बेहोशी में थे, आज वे लोगों को पहचान रहे हैं तथा थोड़ी.बहुत बातचीत भी कर रहे हैं। लेकिन अदम गोण्डवी का यह इलाज लम्बा चलेगा। इसमें अच्छे खासे धन की जरूरत होगी। इसके लिए सभी को जुटना होगा। उस समाज को तो जरूर ही आगे आना होगा जिसके लिए अदम गोण्डवी ने सारी जिन्दगी संघर्ष किया। कहते हैं बूँद बूद से घड़ा भरता है। लोगों का छोटा सहयोग भी इस मौके पर बड़ा मायने रखता है। वे सहयोग के लिए आगे आ सकते हैं। इस सहयोग से हम अपने कवि का जीवन बचा सकते हैं। सहयोग के लिए सम्पर्क है: दिलीप कुमार सिंह 09958253708 तथा सीधे अदम गोण्डवी के एकाउण्ट में भी धन जमा किया जा सकता है। एकाउण्ट नम्बर हैः अदम गोण्डवी 31095622283 (स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, परसपुर

Monday, December 12, 2011

मीडिया को सबक सिखाते सिखाते छतीसगढ़ में भाजपा को निपटा देंगे रमन सिंह


अंबरीश कुमार
छत्तीसगढ़ से मित्र लोगो ने बताया कि फेसबुक पर अभिव्यक्ति की आजादी की हिमायत करने वाली भाजपा की इस राज्य की सरकार मीडिया की ठीक से खबर ली रही है .इस राज्य में दो पत्रकारों की हत्या हो चुकी है और विज्ञापनों की राजनीति से प्रिंट मीडिया को लगातार दबाया जा रहा है .एक चैनल और एक अखबार पर रमन सिंह के बिगडैल अफसरों की मेहरबानी बहती जा रही है .ऐसे ही बिगडैल अफसरों ने अजित जोगी को सत्ता से बेदखल कर राज्य की राजनीति के कूड़ेदान पर फेक दिया था .वे जोगी जो मीडिया के सबसे करीबी रहे .मुझे याद है मै जब इंडियन एक्सप्रेस की नै जिम्मेदारी निभाने के लिए छत्तीसगढ़ पहली बार पहुंचा तो सर्किट हाउस में अजित जोगी के एक सहयोगी ने पूछा था -कोई भी दिक्कत हो तो बता दीजिएगा .खैर बाद में जोगी मुख्यमंत्री बने और उनसे करीबी संबंध भी बना .कई बार उनका सुबह सुबह फोन आ जाता था इंडियन एक्सप्रेस देखने के बाद और बधाई देते थे .दिल्ली से आए चार पांच मित्रों को वे दावत पर भी बुलाते थे .पर जबख्बरों में सरकार की आलोचना शुरू हुई तो उनकी नजरे भी बदल गई .जनसत्ता उसी दौर में मैंने लांच किया तो 'सबकी खबर दे ,सबकी खबर ले नारे , के मुताबिक कवरेज भी शुरू हुई और सरकार आए दिन विधान सभा में घिरने लगी .इसपर कुछ अफसरों ने जोगी के कान भरे और फिर खुल कर टकराव हुआ .जनसत्ता के दफ्तर पर हमला हुआ और फिर लम्बा आन्दोलन चला .उस दौर में अपन के साथ अनिल पुसदकर ,राजकुमार सोनी ,संजीत त्रिपाठी ,अनुभूति ,भारती यादव जैसे कई पत्रकार इस लड़ाई में साथ थे .बस्तर में वीरेंदर मिश्र ने मोर्चा संभल रखा था .पर हमारे फ्रेंचायाजी पार्टनर विजय बुधिया अखबार के इन तेवरों से घबडा गए और मुझे वापस भेजने का दबाव दल था .पर तबतक सारा कम हो चुका था .मुझे याद है एक दिन प्रदेश के कद्दावर नेता विद्याचरण शुक्ल (वही इमरजेंसी फेम वाले ) ने मुझसे कहा -अंबरीश जी यह अभियान कब तक चलता रहेगा ,तो मेरा जवाब था जब तक मै यहाँ रहूँगा .
जो पहल अभिव्यक्ति की आजादी के संघर्ष के लिए छत्तीसगढ़ के पत्रकारों ने की उसी ने भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया था यह बात छत्तीसगढ़ में आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी इस सरकार के मंत्री और बिगडैल अफसर लगता है भूल गए है .
अब लोगो को फिर जोगी याद आ रहे है क्योकि वे ही इस सरकार से सीधा लोहा ले सकते है .ऐसा अपने छत्तीसगढ़ के कई सहयोगियों का मानना है .लगता है छत्तीसगढ़ में फिर इतिहास दोहराया जा रहा है .मीडिया को निपटाते निपटाते रमन सिंह भी भाजपा को निपटा देंगे यह बात नितिन गडकरी को तो समझ में आ जानी चाहिए .मीडिया ने दो मुख्यमंत्रियों रमन सिंह और नितीश कुमार की जो छवि बनाई है वह विज्ञापन के पैसे से बनी है और विज्ञापन के पैसे से जब इंडिया साइनिंग नहीं चला तो रमन सिंह की भोली भाली छवि जिसपर खनन क्षेत्र का दाग लग रहा है वहह कब त़क चलेगी . जनसंपर्क विभाग के थके हुए अफसरों से कोई राजनैतिक लड़ाई न जोगी लड़ पाए थे और न रमन लड़ पाएंगे .हैरानी यह जरुर है की मीडिया के मठाधीश इस पर खामोश क्यों है .

Sunday, December 11, 2011

आदिवासी महिलाओं पर फर्जी मुकदमे


अंबरीश कुमार
लखनऊ , दिसंबर । कैमूर क्षेत्र की महिलाएं पंद्रह हजार से ज्यादा फर्जी मुक़दमे झेल रही है । इनमे ज्यादातर मुक़दमे मिर्जापुर ,चंदौली और सोनभद्र जिले की दलित व आदिवासी महिलाओं पर है । अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के मौके पर सैकड़ों महिलाओं ने प्रदर्शन कर प्रदेश सरकार और प्रशासन को चेतावनी दी है कि अगर एक महीने के भीतर इन महिलाओं और उनके परिजनों के खिलाफ मुक़दमे वापस नही हुए तो जनवरी के अतिम हफ्ते में महिलाओं का जेल भरो आंदोलन शुरू होगा । गौरतलब है कि महिलाओं के उत्पीडन को लेकर कैमूर क्षेत्र में राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच आंदोलनरत है । इस अंचल में आदिवासी और दलित महिलाओं को जंगलात विभाग के लोग छोटे छोटे मामलों में फंसा कर उनका उत्पीडन करते है । महिलाओं के आंदोलन के बाद पिछले साल मायावती सरकार ने इस तरह के सात हजार मुकदमों को वापस लेने का एलान किया था पर यह एलान भी राजनैतिक घोषणा की तरह कागजों में ही फंस कर रह गया । रस्म अदायगी के लिए लोक अदालत भी बैठी पर सौ डेढ़ सौ महिलाओं से जुर्म कबूल कराने बाद जुर्माना ठोका और छोड़ दिया। इन महिलाओं का अपराध था जंगल में बकरी चराने से लेकर सूखी लकडियां बटोरना । जिन महिलाओं पर जंगलात विभाग ने गंभीर धाराएँ लगा दी थी वे इस अदालत के दायरे से बाहर थी ।
अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर सोनभद्र में उत्तर प्रदेश, झाड़खंड़ व बिहार के कैमूर क्षेत्र के हज़ारों आदिवासी दलित महिलाओं ने प्रदर्शन कर अपना सवाल उठाया साथ ही दंतेवाड़ा की आदिवासी अध्यापिका सोनी सोरी की गिरफतारी का कड़ा विरोध कर आंदोलन करने की चेतावनी दी।
महिलांए अपने गले में 5/26 रद्द करों, 5/26 मे हमें गिरफ्तार करों की तख्तियां लगा रखी थी।महिलाओं का कहना था कि वन विभाग ने उत्पीड़न की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। अब करो या मरों की स्थिति पैदा हो गई हैं। जमानत दार नहीं मिल रहे। बच्चे भूखे मर रहे हैं। ऐसे में अब हमारे आगे सिर्फ एक ही रास्ता बचा है, हम या तो सामूहिक रूप से आत्म हत्या कर ले या हथियार उठाकर माओवादी बन जाएँ । इस मौके पर शांता, रोमा, धनपति, राजकुमारी, धनमनिया, फूलबसिया, सोकालो, हुलसी, शंखा, गीता, शोभा और , मुन्नी ने महिलाओं के उत्पीडन का सवाल उठाया । इन महिलाओं ने कहा कि यह सभ्य समाज के लिए एक कलंक की बात है कि आज भी पुलिस अभिरक्षा में महिलाओं की किसी भी प्रकार से सुरक्षा मौजूद नहीं है । मानवाधिकार के सभी नियमों का खुले आम उल्लघंन कर छतीसगढ़ पुलिस ने संविधान में दिए गए तमाम प्रावधानों का मज़ाक उड़ाया है। जिसपर देश की शीर्ष न्याययिक व्यवस्था खामोश खड़े तमाशा देख रही है। गौरतलब है कि सोनी सूरी ने अपनी गिरफतारी के वक्त ही हाई कोर्ट दिल्ली के मुख्य न्यायाधीश का पत्र द्वारा यह आशंका जताई थी कि अगर उन्हें छतीसगढ़ ले जाया गया तो उनके साथ कुछ भी हो सकता है इसलिए उन्होंने अपने केस की सुनवाई की मांग किसी अन्य राज्य में की थी। लेकिन उनकी लिखे इस पत्र को दिल्ली हाई कोर्ट ने नज़रअंदाज किया और छतीसगढ़ पुलिस ने उन्हें रिमांड पर लेकर पूछताछ का बहाना कर उनके साथ वो अमानवीय कृत्य किए जिसे यह समाज शर्मसार हो गया है। लेकिन अभी तक देश की इस व्यवस्था में आदिवासी महिला की सुरक्षा की कहीं कोई पहल दिखती नज़र नहीं आ रही। यह आदिवासी समाज का तो अपमान है ही साथ ही महिलाओं का तो घोर अपमान है जिसे अपने आप को लोकतंत्र कहने वाला यह भारत महान जैसा देश किस तरह मूक दर्शक बने देख रहा है। जिस देश की राष्ट्रपति एक महिला हो, देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष महिला हो और चार प्रमुख राज्यों की मुख्यमंत्री महिला हो वहां भला इस अमानवीय कृत्य के खिलाफ कोई भी कार्यवाही नहीं हो रही, ऐसे अफसरों को फांसी की सज़ा दी जानी चाहिए।
उरांव जनजाति की हुलसी देवी ने कहा कि जब शरद पवार पर पड़े एक थप्पड़ से सारी पार्टिया एक सुर में खड़ी हो गई तो सोनी सूरी जैसे मामलों में क्यों एक साथ खड़े हो कर इसका विरोध नहीं करती ये पार्टिया । इसलिए महिलाओं के प्रति हो रहे इस अमानवीय कृत्य से अब वो दिन दूर नहीं जब महिलाए सड़क पर इन नेताओं से हिसाब किताब चुकाएगी और थप्पड़ तो क्या लात घूसों की भी नौबत आ सकती है। साथ ही अंर्तराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर ही कैमूर क्षेत्र की महिलाओं ने वनविभाग के पंद्रह हजार से भी उपर फर्जी मुकदमों को रदद करने की चेतावनी दी और रदद न करने की सूरत में जेल भरो आंदोलन की धमकी दी। बाद में सोनभद्र के कलेक्टर विजय विश्वास पन्त के साथ बातचीत में तय हुआ कि कलेक्टर शासन स्तर पर इन फर्जी मुकदमों को वापिस करने के लिए पत्र लिखेगें।

Thursday, December 8, 2011

खाए पिए भाजपा बिल चुकाए बसपा !

अंबरीश कुमार
लखनऊ , दिसंबर ।एक दूसरे हमला करने वाली भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के राजनैतिक संबंधों का का नया अध्याय सामने आने से राजनैतिक हलकों में हैरानी जताई जा रही है । भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आए पार्टी की दिग्गज नेताओं का लाखों का बिल मायावती सरकार के हवाले है । इन लोगों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ,रमन सिंह ,शिवराज सिंह चौहान , यदुरप्पा ,पोखरियाल समेत सात राज्यों के मुख्यमंत्री होटल ताज में रुके थे । पार्टी ने साफ़ किया था कि इनका बिल पार्टी देगी । कार्यकारिणी की बैठक से पहले पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने मायावती सरकार को प्रोटोकोल और राजनैतिक शिष्टाचार की नसीहत देते हुए तब एलान किया था कि सभी नेताओं के ठहरने और खाने पीने का बिल पार्टी देगी । अब जब होटल प्रबंधन ने इन बिलों के भुगतान का प्रयास शुरू किया तो सारा मामला सामने आया । इन बिलों में एक नए राज्य के मुख्यमंत्री के कमरे का जो बिल था उसमे मदिरा का भी लंबा चौड़ा बिल था । कुल दो दिन में इन मुख्यमंत्री के कमरे से करीब अस्सी हजार की मदिरा की भी खपत हो गई । । अब शाही कह रहे है कि यह जिम्मेदारी टंडन की थी वे ही बता सकते है । उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव सामने है और चुनाव बाद के समीकरण में बसपा की निगाह भाजपा की तरफ उठना स्वभाविक है क्योकि दोनों दल उत्तर प्रदेश में साझा सरकार चला चुके है । सरकार और भाजपा को भेजे गए बिल की वह प्रतिलिपि जनसत्ता के पास है जिसमे चार जून से पांच जून तक विवांता ताज में ये सभी मुख्यमंत्री रुके थे ।
इसी साल जून में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आए दिग्गज नेता यहां के दो तीन पांच सितारा होटल में रुके थे ।जिसमे लाल कृष्ण आडवानी जहां पिकेडली में थे वही कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री ताज में ठहरे ।बड़े नेताओं के रुकने का इंतजाम स्थानीय सांसद लालजी टंडन और उनके पुत्र गोपाल टंडन के जिम्मे था ।ये वही टंडन है जो मायावती के मुंह बोले भाई माने जाते है और मायावती उन्हें राखी भी बांध चुकी है । जाहिर है पुराने संबंधों ने के चलते नए समीकरण बने ।खास बात यह है कि अनुसूचित जाति जन जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया को राजकीय अतिथिगृह में कोई कक्ष ना देने वाली सरकार भाजपा नेताओं का लाखों का बिल का भुगतान अगर कर देती है तो यह एक राजनैतिक सन्देश भी माना जाएगा । समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा -यह भाजपा के दोहरे चरित्र का रोचक उदाहरण है । पार्टी अपने राजनैतिक कार्यक्रम का पैसा भी बसपा सरकार से मांग रही है । उधर कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा -भाजपा और बसपा का संबध अब जग जाहिर है । खाए पीए भाजपा नेता और बिल भरे बसपा सरकार ।
इस पूरे मामले में टंडन पार्टी नेताओं के निशाने पर है जो सत्ता से अपनी नजदीकियों के लिए पहले भी चर्चा में रहे है । मुलायम सिंह के राज में कानपुर में हुए लाठीचार्ज के विरोध में जब वे प्रदर्शन करते हुए मुख्यमंत्री निवास पहुंचे तो रसगुल्ला खाकर बाहर निकले जबकि कानपुर का घायल विधायक सलील बिश्नोई स्तेचार पर था ।
चुनाव के इस माहौल में भाजपा इस समय बसपा को पानी पी पीकर गाली दे रही है ऐसे में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आए नेताओं का बिल सरकार से लेना लोगों के गले नहीं उतर रहा है । खासकर जब पहले ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने यह साफ कर दिया हो कि सभी बिल पार्टी देगी । जो लोग ताज में रुके थे उनमे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ,छत्तीसगढ़ के रमन सिंह ,मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान ,बिहार से सुशील मोदी आदि शामिल थे । उत्तर प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ नौकरशाह ने नाम न देने की शर्त पर जनसत्ता से कहा - ताज होटल में रुके भाजपा के राज वाले मुख्यमंत्रियों के बिल के भुगतान के लिए भाजपा के एक नेता ने सरकार से अनुरोध किया था । दूसरी तरफ इस विवाद से परेशान भाजपा अब इन बिलों का भुगतान करने का मन बना रही है । jansatta

Tuesday, December 6, 2011

अभिव्यकि की आजादी के नए खलीफा और सीमा आजाद

अंबरीश कुमार
लखनऊ ,दिसंबर । अभिव्यक्ति की आजादी का नारा देने वाले नए खलीफाओं को सीमा आजाद याद है । वे अपने लिखे और पढ़े की वजह से जेल में है और कोई न्यू या ओल्ड मीडिया उनकी आजादी पर बहस नहीं करता । कोई उस महिला के पुलिसिया उत्पीडन और आजादी की चर्चा नही करता ।फेसबुक पर अराजक किस्म की टिप्पणियों और किसी की धार्मिक व निजी भावनाओं को आहत करने वाले फोटो का सवाल जब कपिल सिब्बल ने उठाया तो फ़ौरन एक शब्द उछाल दिया गया 'सेंसरशिप ' ।सिब्बल सफाई देते रहे और मीडिया इस शब्द को लेकर अन्ना आन्दोलन की तरह गजब की हेडिंग दिखने लागा ,मसलन 'देश की आवाज दबाने की कोशिश ,फेसबुक आंदोलन से डर गई सरकार आदि ।किसी महिला के नग्न फोटो ,शरीर के स्थान विशेष को लेकर की गई टिप्पणी और किसी के धार्मिक स्थल पर खास किस्म के जानवर की फोटो अगर अभिव्यक्ति की आजादी है तो इस नई आजदी की लड़ाई के नए योद्धाओं को यह मुबारक हो ।
सार्वजनिक शौचालय में भी कई लोग कला और विचारों की अभिव्यक्ति करते रहे है और करते रहेंगे । जिन्हें यह लड़ाई लड़नी हो वे लड़े और बहस करे ।पर यह जरुर याद दिलाना चाहेंगे कि राजनैतिक साहित्य की कुछ पुस्तकों को रखने के लिए पत्रकार सीमा आजाद जेल में है और अभिव्यक्ति की आजादी का कोई बड़ा पुरोधा उनकी लड़ाई लड़ने कभी सामने नहीं आया । चाहे वे टीवी चैनल पर आज बहस करने वाले हो या विश्व में सबसे ज्यादा अख़बार बेचने का दावा करने वाले हों । सीमा आजाद एक खास विचारधारा पर अपने लिखे और पढ़े की वजह से जेल में है वे न तो गाली गलौज कर रही थी न किसी की फोटो बिगाड़कर खिल्ली उड़ने का काम कर रही थी,जो आज फेसबुक पर धड़ल्ले से चल रहा है और भाई लोग इसे न्यू मीडिया की ताकत मान रहे है।मैंने एक सज्जन को देखा जो इलाहाबाद में छात्रों पर लाठी चार्ज के लिए भी कांग्रेस सरकार को जिम्मेदार बता रहे थे क्योकि मायावती का नाम लेते ही पास के थाने का दरोगा उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ बता सकता था । रीता बहुगुणा जोशी ने ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल मायावती के लिए किया और जेल भेज दी गई । इसलिए हर किस्म की अभिव्यक्ति की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती यह जरुर समझना होगा ।

Friday, December 2, 2011

सुपुत्र बनाम सुपात्र पर संघ का फरमान !

अंबरीश कुमार
लखनऊ ,संबर । भारतीय जनता पार्टी में सुपुत्र बनाम सुपात्र की बहस पर संघ का फरमान आ गया है । यह बहस भाजपा के करीब तीन दर्जन नेताओं के पुत्र पुत्रियों की विधान सभा चुनाव में टिकट की दावेदारी के बाद शुरू हुई थी । राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने भाजपा नेताओं को दो टूक कह दिया है कि कांग्रेस को माँ बेटे की पार्टी बताने से पहले इन नेताओं को अपने गिरेबान में भी झांकना चाहिए और परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देना चाहिए । पर जब भाजपा नेताओं ने तर्क
दिया कि क्या अपने बेटे बेटियों को सपा बसपा में भेज दें चुनाव लड़ने के लिए तब संघ परिवार ने बीच का रास्ता निकलते हुए इन नेताओं से कहा - मजबूत नेताओं को चाहिए कि वे पार्टी की कमजोर सीटों पर अपने पुत्र पुत्रियों को मैदान में उतारे और पार्टी को मजबूत करें ।
गोरतलब है कि उत्तर प्रदेश के भाजपा नेताओं में में अपनी दूसरी पीढी को आगे लाने की होड़ लगी हुई है। इन नेताओं में राष्ट्रीय स्टार के नेताओ मसलन राजनाथ सिंह ,लालजी टंडन से लेकर मंडल और जिले स्तर के नेता भी शामिल हो गए है। इस मामले पार्टी में विवाद बढ़ने और कार्यकर्ताओं की नारजगी के बाद संघ परिवार के शीर्ष नेताओं ने भी मंथन किया । हाल ही में संघ परिवार की बैठक में यह मुद्दा उठा । इस बैठक में संघ की तरफ से मधुभाई कुलकर्णी ,सुरेश सोनी ,शिवनारायण कृपाशंकर आदि थे तो भाजपा नेता कलराज मिश्र से लेकर सूर्यप्रताप शाही आदि शामिल हुए । इनके अलावा संघ परिवार के अनुषांगिक संगठन जैसे विद्यार्थी परिषद,बजरंग दल,वनवासी आश्रम आदि के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे । बैठक में यह मुद्दा उठा और संघ के नेताओं ने पार्टी में बढ़ते परिवारवाद पर चिंता भी जताई।यह भी नसीहत दी कि इस तरह आप कैसे गाँधी परिवार के वंशवाद से लेकर मुलायम सिंह के वंशवाद पर हमला कर पाएंगे ।इसलिए इस प्रवृति पर अंकुश लगना चाहिए। इसपर अह भी बताया गया कि जो पुत्र पुत्रिया पार्टी के काम में जुटे हुए है उन्हें क्या सपा बसपा से चुनाव लड़ना होगा। भाजपा सूत्रों के मुताबिक इस मुद्दे पर अंततः रास्ता यह निकला कि प्रदेश की वे वे सीटें जो कमजोर है वहां इन लोगों को मैदान में उतरना चाहिए ताकि सुप्त्र लोगों कू मजबूत सीट पर भी मौका मिल सके । यहभी कहा गया कि जब कोई वरिष्ठ नेता का पुत्र मैदान में उतरेगा तो उस नेता को भी काफी समय देना होगा और इससे पार्टी मजबूत भी होगी । हालांकि इसपर कुछ नेता नाखुश जरुर है । भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक से इसबारे में पछने पर उनका जवाब था -विधान सभा का टिकट संसदीय बोर्ड तय करेगा ,इसके आगे की मुझे फिलहाल कोई जानकारी नही है।
पर यह मामला पार्टी के लिए आसान नहीं है । विधान सभा चुनाव की तयारी में जुटे एक नेता ने कहा -जब राष्ट्रीय स्तर के नेता अपने पुत्र के टिकट को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर पार्टी उम्मीदवार को हराने में जुट जाए तो आप क्या उम्मीद करते है वे संघ के नेताओं की सुनेंगे । भाजपा को इस बार सबसे ज्यादा नुकसान पार्टी के बाहर नही पार्टी के भीतर के लोगों से है । अगर सुपात्र का टिकट कटा तो सुपुत्रों के खिलाफ भी माहौल बनेगा ।

jansatta

Thursday, December 1, 2011

याद आये प्रभाष जोशी



अम्बरीश कुमार
प्रभाष जोशी जनसत्ता के संपादक ही नहीं बल्कि सेनापति भी थे । ऐसे सेनापति जिसने भारतीय पत्रकारिता में निहंग पत्रकारों की ऐसी सेना बनाई जिसने कभी किसी से हार नहीं मानी


प्रभाष जोशी ने अपने जीवन की पूर्व संध्या अखबार के सहयोगियों के साथ गुजारी थी । इसे कैसा संयोग कहेंगे की दुनिया छोड़ने से ठीक एक दिन पहले लखनऊ में उन्होंने हाथ आसमान की तरफ उठाते हुए कहा -मेरा तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार ही घर बनेगा ।इंडियन एक्सप्रेस से उनका सम्बन्ध कैसा था इसी से पता चल जाता है । प्रभाष जोशी चार नवम्बर की शाम लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों के बीच थे । यह उनकी अंतिम बैठक बन गई ।एक्सप्रेस के इस दफ्तर में वे पहली बार आए और यह अंतिम बार में बदल गया । सीतापुर में प्रभाष जोशी की याद में प्रभाष पीठ और अन्य संगठनों की तरफ से दस दिन बाद कार्यक्रम होने जा रहा है । जिसमे पेड़ न्यूज़ से लेकर जहाँ विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होगी वही फोटो और पोस्टर प्रदर्शनी लगाईं जा रही है । प्रभाष जोशी के चुनोंदा लेखों की पुस्तिका भी बांटी जाएगी । कार्यक्रम में आलोक तोमर मुख्या वक्ता होंगे । कार्यक्रम के आयोजकों से बात होते ही एक साल पहले प्रभाष जोशी के साथ हुई बैठक याद आ गई । प्रभाष जी बैठे तो कई मुद्दों पर चर्चा हुई । रामनाथ गोयनका से ले कर उनके पेड़ न्यूज़ अभियान तक । कुछ समय पहले ही छतीसगढ़ में नवभारत के संपादक बब्बन प्रसाद मिश्र की एक पुस्तक प्रभाष जी को भेजी थी जिसमे छत्तीसगढ़ में पेड़ न्यूज़ और नेताओं से पैसे के लेनदेन का ब्यौरा था । प्रभाष जी ने कहा -उसे पढ़ा और बब्बन जी से बात भी करूँगा । पेड़ न्यूज़ के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान में सभी को जोड़ा जाना चाहिए । यह बहुत ही खतरनाक प्रवृति है । इंडियन एक्सप्रेस के नए पत्रकारों को उन्होंने जनसत्ता के शुरुवाती दौर के बारे में भी बताया । एक रोचक उदाहरण भी उन्होंने उस दौर का दिया । जो राजनीति , राजनेता ,अखबार मालिक और संपादक के संबंधों पर रोशनी डालता है । बात उस दौर की है जब राष्ट्रीय राजनीति पर देवीलाल का उदय हुआ था । ख़बरों के चलते हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवीलाल का जनसत्ता के पत्रकार राकेश कोहरवाल से नजदीकी संबंध गया था था । एक विवाद को लेकर प्रभाष जोशी ने राकेश कोहरवाल का तबादला चंडीगढ़ कर दिया । जिसके बाद आए दिन देवीलाल का फोन आता कि राकेश कोहरवाल को वापस दिल्ली बुला लिया जाए। प्रभाष जोशी ने तब कहा - देखेंगे । पर जब ज्यादा फोन आने लगा तो उन्होंने अपने पीए राम बाबू से कोई बहाना बनाकर कन्नी काटना शुरू किया क्योकि देवीलाल से उनका भी काफी मिलना जुलना होता था । बाद में प्रभाष जी ने एक पत्र देवीलाल को लिखा जिसमे कहा गया था - आदरणीय चौधरी साहब , आप हरियाणा की सरकार चलाए । जनसत्ता को हमें ही चलाने दें । और यह पत्र डाक से देवीलाल को भेज दिया गया ।
इस बीच नेशनल फ्रंट की एक बैठक बंगलूर में हुई तो राकेश कोहरवाल ने देवीलाल के साथ वहा जाने की इजाजत प्रभाष जोशी से मांगी । प्रभाष जोशी ने उन्हें मना कर दिया और कहा दिल्ली से कवर कराया जाएगा। दिल्ली से प्रदीप सिंह भेजे गए । बावजूद इसके राकेश कोहरवाल छुट्टी लेकर देवीलाल के साथ हेलीकाप्टर से रुकते रुकाते बंगलूर गए । प्रदीप सिंह ने लौटकर दफ्तर में बताया कि वहा तो राकेश कोहरवाल भी गए थे । इसके बाद राकेश कोहरवाल का फिर तबादला कर दिया गया । देवीलाल को जब पता चला तो उन्होंने रामनाथ गोयनका से प्रभाष जोशी की शिकायत की । तब प्रभाष जोशी ने रामनाथ गोयनका से कहा था - किसी रिपोर्टर का दौरा संपादक तय करेगा या कोई मुख्यमंत्री । बाद में प्रभाष जोशी ने राकेश कोहरवाल से कहा था - जनसत्ता को पत्रकार की जरुरत है किसी मुख्यमंत्री के पीआरओ की नही । बाद में कोहरवाल ने जनसत्ता छोड़ दिया ।
प्रभाष जी ने उस दिन कई पुरानी घटनाओ का जिक्र किया । करीब दो घंटे से ज्यादा प्रभाष जोशी एक्सप्रेस समूह के तीनो अखबारों इंडियन एक्सप्रेस , जनसत्ता और फाईनेंशियल एक्सप्रेस के पत्रकारों के साथ रहे । चार नवम्बर को जब वे लखनऊ में एक कर्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे ,मुझे कार्यक्रम में न देख उन्होंने मेरे सहयोगी तारा पाटकर से कहा -अम्बरीश कुमार कहा है ।यह पता चलने पर की तबियत ठीक नहीं है उन्होंने पाटकर से कहा दफ्तर जाकर मेरी बात कराओ।मेरे दफ्तर पहुचने पर उनका फोन आया .प्रभाष जी ने पूछा -क्या बात है ,मेरा जवाब था -तबियत ठीक नहीं है .एलर्जी की वजह से साँस फूल रही है । प्रभाष जी का जवाब था -पंडित मै खुद वहां आ रहा हूँ और वही से एअरपोर्ट चला जाऊंगा ।कुछ देर में प्रभाष जी दफ्तर आ गये .दफ्तर पहली मंजिल पर है फिर भी वे आए ।करीब दो घंटा वे साथ रहे और रामनाथ गोयनका ,आपातकाल और इंदिरा गाँधी आदि के बारे में बात कर पुरानी याद ताजा कर रहे थे। तभी इंडियन एक्सप्रेस के लखनऊ संसकरण के संपादक वीरेंदर कुमार भी आ गए जो उनके करीब ३५ साल पराने सहयोगी रहे है।प्रभाष जी तब चंडीगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे .एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट ,संजय सिंह ,दीपा आदि भी मौजूद थी ।
तभी प्रभाष जी ने कहा .वाराणसी से यहाँ आ रहा हूँ कल मणिपुर जाना है, पर यार दिल्ली में पहले डाक्टर से पूरा चेकउप कराना है।दरअसल वाराणसी में कार्यक्रम से पहले मुझे चक्कर आ गया था । प्रभाष जोशी की यह बात हम लोगो ने सामान्य ढंग से ली।लखनऊ के इंडियन एक्सप्रेस दफ्तर से चलते समय जब एक्सप्रेस के सहयोगियों से मैंने उनका परिचय कराया तभी मौलश्री की तरफ मुखातिब हो प्रभाष जोशी ने कहा था -मेरा घर तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार में ही है ।शायद उन्हें कुछ आभास हो गया था । छह नवम्बर को तडके ढाई बजे दिल्ली से अरुण त्रिपाठी का फोन आया -प्रभाष जी नहीं रहे । लगा चक्कर आ जाएगा और गिर पडूंगा । प्रभाष जोशी ने हम जैसे दर्जनों पत्रकारों को गढ़ा ।
प्रभाष जोशी जनसत्ता के संपादक ही नहीं बल्कि सेनापति भी थे । ऐसे सेनापति जिसने भारतीय पत्रकारिता में निहंग पत्रकारों की ऐसी सेना बनाई जिसने कभी किसी से हार नहीं मानी । यह सेना बाद में बिखर भी गई पर जो जंहा भी गया पत्रकारिता के मैदान में युद्ध लड़ता ही रहा । जनसत्ता सिर्फ अखबार ही नहीं प्रभाष जोशी का अखाड़ा भी था । जनसत्ता ऐसा प्रयोग था जिसने हिंदी पत्रकारिता को शिखर पर पंहुचा दिया । हाल ही में दिल्ली के पत्रकार देवसागर सिंह का फोन आया ,अमर उजाला के प्रबंधक एपी सिंह का हवाला देकर बताया कि वे जापान की समाचार एजंसी से जुड़े है और लिब्रहान को लेकर कुछ जानकारी चाहिए । साथ ही यह भी बताया की वे पहले इंडियन एक्सप्रेस में रहे है और उनकी देश में खासकर हिंदी पट्टी में पहचान जनसत्ता ने बनाई है । मैंने उन्हें बताया कि उनको हम अच्छी तरह जानते है । वे और खुले और बताने लगे कि इंडियन एक्सप्रेस में रहने के बावजूद बिहार और उत्तर प्रदेश में उन्हें लोग जनसत्ता का पत्रकार मानते थे क्योकि तब जनसत्ता हिंदी पट्टी में अंग्रेजी पत्रकारिता को भी पीछे छोड़ चुका था और प्रभाष जी इंडियन एक्सप्रेस की खबरे जनसत्ता में भी देते थे । यह उदाहरण है पत्रकारिता में जनसत्ता के उदय और उसके असर का । इस पर भी बात होगी पर पहले अस्सी के दशक में हिंदी पत्रकारिता की दशा पर नज़र डाल ली जाए ।
तब हिंदी पत्रकार को समाज में न सिर्फ हेय दृष्टि से देखा जाता बल्कि उसकी छवि सुदामा जैसी दिखाई जाती जो याचक मुद्रा में नज़र आता । अगर कोई अखबार में नौकरी करता तो उसके जानने वाले यह जरुर पूछते कि कुछ पैसा मिलता है या समाज सेवा करते हो। कई बार तो कोई ढंग की नौकरी की सलाह भी देते ।जबकि अंग्रेजी अखबार वालो से ऐसे सवाल नहीं होते ।सरकारी दफ्तर से लेकर प्रेस कांफ्रेंस तक में हिंदी वाला पत्रकार धकियाया जाता था । कुछ भी लिख दे कोई पूछने वाला न था । ऐसे ही दौर में रविवार शुरू हुआ जिसने लोगो का ध्यान खीचा ।राजनैतिक हलकों में रविवार का असर पड़ने लगा था । तभी इंडियन एक्सप्रेस समूह जो रामनाथ गोयनका के चलते अपनी अलग पहचान बनाए हुए था उसने प्रभाष जोशी के नेतृत्व में जनसत्ता शुरू किया ।कैसे शुरू हुआ ,क्या क्या कवायद हुई इसपर लिखा भी गया है पर जनसत्ता जिस तूफानी अंदाज में आया उसने सभी जमे जमाए अखबारों और संपादकों को हिला कर रख दिया । सबकी खबर ले ,सबको खबर दे के नारे ने हिंदी अखबारों की दबी कुचली भाषा बदली ,तेवर बदला और पहली बार हिंदी का पत्रकार तनकर खड़ा हुआ
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Wednesday, November 30, 2011

पिछड़ों ,अति पिछड़ों और मुसलमानों का वर्चस्व बढ़ रहा है कांग्रेस में

अंबरीश कुमार
लखनऊ ,। कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग की राह पर है। पार्टी ने विधान सभा चुनाव में इस बार जिन २१३ उम्मीदवारों को टिकट दिया है उनमे पिछड़ों ,अति पिछड़ों और मुस्लिम उम्मीदवारों को खास प्राथमिकता दी है। पहले कांग्रेस में ब्राह्मणों का जो वर्चस्व था अब वह बदल रहा है। यह इसी सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा है। हाशिए पर रहे राम नरेश यादव मध्य प्रदेश को राज्यपाल बनाना हो या सैयद अली नकवी को झारखंड का । केंद्र में उत्तर प्रदेश के छह मंत्रियों में से तीन आरपीएन सिंह ,श्रीप्रकाश जायसवाल और बेनी प्रसाद वर्मा पिछड़ी जातियों के मंत्री है। जबकि पीएल पुनिया को अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने दलितों का एक नया नेतृत्व देने का प्रयास किया है ।
कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में पश्चिम में अजित सिंह से तालमेल हो या पूर्वांचल में कई छोटे छोटे दलों से तालमेल की कोशिश हो सभी के पीछे सोशल इंजीनियरिंग का दबाव है । पार्टी ने अप तक जो २१३ टिकट बांटे है उनमे ५६ टिकट पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों को दिए जा चुके है । दूसरी तरफ २६ मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए गए है । इनके मुकाबले ब्राह्मण उम्मीदवारों की संख्या २५ है। खास बात यह है की दलितों के लिए आरक्षित सीटों के अल्वा सामान्य कोटे से भी कई दलित उम्मीदवार उतारे गए है । कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह ने कहा -पार्टी की नीति सभी लोगों को साथ लेकर चलने की है और यह बात हाल ही में राहुल गाँधी के दौरे में भी दिखी जिसमे पिछड़े अति पिछड़े ,अगड़े ,दलित मुस्लिम सभी शामिल हुए । वंचित तबके को आगे बढ़ने के लिए ही कांग्रेस ने सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों को टिकट दिया है ।
दरअसल कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरण पर पिछले कुछ समय से ध्यान देना शुरू किया है । यही वजह है कि राहुल वाराणसी में रैदास मंदिर जाते है और दलितों के साथ खाना भी खाते है । पिछली बार जब राहुल वाराणसी के दौरे पर थे और दलितों के साथ भोजन कर रहे थे तो पास के एक गांव से आए बुजुर्ग छांगुर लाल ने भावुक होकर कहा था -इंदिरा गांधी का पोता हम लोगों के साथ खाना खाएगा ,यह कभी नहीं सोचा था । यह बानगी है किस तरह दलितों और पिछड़ों व अति पिछड़ों के बीच कांग्रेस जगह बना रही है । ओमप्रकश राजभर के साथ कई अन्य पिछड़े नेताओं से चुनावी तालमेल की बात इसी बुनियाद पर हो रही है । यह कांग्रेस का नया अवतार है जिसे लेकर विरोध भी शुरू हुआ है। राहुल गांधी के पूर्वांचल दौरे में पिछड़ी जातियों को टिकट देने का जिन लोगों ने विरोध किया उनमे कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं के अलावा ब्राह्मण महासभा भी शामिल थी। बेनी प्रसाद वर्मा को लेकर उनके क्षेत्र में जो विरोध है वह उनके निर्वाचन क्षेत्र में समय न देने और लोगों की मांग पूरी न करने की वजह से है इसे किसी पिछड़े नेता का विरोध नहीं मन जा सकता । कुर्मी बिरादरी के वे बड़े नेता है यह ध्यान रखना चाहिए उनके व्यवहार से पिछड़ों के वोट को नहीं जोड़ा जा सकता है।

Monday, November 28, 2011

बसपा के कल्याण सिंह न बन जाए कुशवाहा


अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवम्बर। मायावती ने अंततः पार्टी के प्रमुख नेता बाबूसिंह कुशवाहा को पार्टी से हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया है। राजनैतिक दल अपनी पार्टी से आमतौर पर सिर्फ छह साल के लिए निकालते है । बसपा तो आमतौर पर अपने निर्वाचित सांसदों और विधायकों बहुत कम पार्टी से बाहर निकालती रही है,तकी वे दलबदल कानून का फायदा न उठा ले है ऐसे में कुशवाहा को पार्टी से बाहर करने का फैसला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में कुशवाहा बिरादरी का चार दर्जन से ज्यादा विधान सभा सीटों पर कुशवाहा बिरादरी का असर है जो बसपा को नुकसान भी पहुंचा सकता है।इसके अलावा कुशवाहा पार्टी के आर्थिक मामलों से भी जुड़े रहे है जिसके चलते वे पहले से ही कई नेताओं और अफसरों की किरकिरी भी बने जिसके चलते वे काफी कुछ जानते है । सूत्रों के मुताबिक कई संपत्तियां उनके नाम रही जिसमे कुछ वापस ले ली गई है । बसपा ने यह भी आरोप लगाया कि कुशवाहा सीबीआई जांच से बचने के लिए कांग्रेस से मिल गए है । यह भी माना जा रहा है कि एनआरएचएम यानी स्वास्थ्य विभाग घोटाले को लेकर वे सीबीआई को महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते है जिसकी पेशबंदी में यह कदम उठाया गया है ।
पार्टी ने आज कुशवाहा को निकलने के साथ ही उनके राजनैतिक इतिहास पर भी प्रकाश डाला। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने उन्हें निकाले जाने की जानकारी देने के साथ कहा - कुशवाहा ने कभी सीधे चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई । उन्होंने पार्टी से अनुरोध किया था कि यदि उन्हें एमएलसी बना दिया जाए तो मुझे अपने समाज को जोड़ने में थोड़ी मदद मिल जाएगी । उनके इस अनुरोध पर पार्टी ने उन्हें दो बार एमएलसी बनाया।
मौर्य ने कहा कि इसके अलावा कुशवाहा ने पार्टी हाईकमान से अनुरोध किया था कि यदि उन्हें मंत्री बना दिया जाए तो उनके लिए पूरे प्रदेश में पार्टी से अपने समाज को जोड़ना और ज्यादा आसान हो जाएगा । कुशवाहा के इस अनुरोध को स्वीकृत करते हुए पार्टी ने उन्हें बड़े विभाग का मंत्री बनाया। इसके बाद कुशवाहा ने कुछ समय के बाद पार्टी हाईकमान से यह भी अनुरोध किया कि उन्हें परिवार कल्याण विभाग का मंत्री बना दिया जाए तो उन्हें इस पद के माध्यम से प्रदेश में शोषितों, दलितों व अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों की सेवा करने का अवसर मिलेगा। इस पर उन्हें परिवार कल्याण विभाग का मंत्री भी बनाया गया।
मौर्य ने कहा कि कुशवाहा ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक ढंग से नहीं किया। जिसके कारण कुशवाहा के मंत्री रहते हुए ही इस विभाग में दो सीएमओ की हत्या हुई व एक की जिला कारागार में मृत्यु हुई। उन्होंने कहा कि कुशवाहा के मंत्री रहने के दौरान इस प्रकार के कृत्य होने पर सरकार और पार्टी की छवि खराब होते देख उन्हें बुलाकर उनसे मंत्री पद से त्याग पत्र ले लिया गया व इस विभाग की जिम्मेदारी नसीमुद्दीन सिद्दकी को सौंप दी गई ।
पार्टी चाहे जो आरोप लगाए कुशवाहा बसपा को राजनैतिक नुकसान उसी तरह पहुंचा सकते है जैसे कभी कल्याण सिंह ने भाजपा से बगावत करने के बाद पहुँचाया था ।हालाँकि कद के लिहाज से कल्याण सिंह के सामने बाबूसिंह कुशवाहा कही नहीं ठहरते पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बिरादरी का जो महत्व है उस लिहाज से कुशवाहा समूचे बुंदेलखंड से लेकर मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में कुशवाहा बिरादरी की प्रतिष्ठा का भी सवाल बन सकते है । वे कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके है और उस दौर में बिरादरी का भी काफी ध्यान रखा था ।
बसपा इसी वजह से ज्यादा आक्रामक है । मौर्य ने आगे कहा कि विरोधी पार्टियों व इनके परिवार जनों की मांग को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने परिवार कल्याण विभाग में हुई इन हत्याओं व मृत्यु की जांच सीबीआई को सौंप दी । उन्होंने कहा कि गौरतलब है कि कुशवाहा पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो गए व लगातार पार्टी को छति पहुंचाने का कार्य करने लगे । इसके साथ ही उन्होंने बसपा से जुड़े अपने समाज के लोगों को अपने घर पर बुलाकर उन्हें पार्टी के खिलाफ काम करने के लिए भी काफी उकसाया ।
मौर्य ने कहा कि हाल ही में विधान परिषद के आहूत सत्र में कुशवाहा ने भाग तक भी नहीं लिया। उन्होंने विपक्षी पार्टियों के सदस्यों को सरकार के विरूद्ध हंगामा करने के लिए भी भड़काया।मौर्य ने कहा कि कुशवाहा एनआरएचएम व सीबीआई जांच से अपने को बचाने के लिए कांग्रेस पार्टी के लगातार संपर्क में बने रहे । इसके अलावा कुशवाहा विपक्षी पार्टी के नेताओं से मिलकर सरकार व पार्टी के विरूद्ध षड़यंत्र बराबर रच रहे हैं। jansatta

Sunday, November 27, 2011

ममता की चाल के शिकार हुए किशनजी


विवेक सक्सेना
नई दिल्ली, नवंबर। माओवादी नेता किशनजी की पश्चिम बंगाल में गुरुवार को पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत यह बताती है कि राजनीतिज्ञ सत्ता में आने के लिए किस तरह किसी का भी समर्थन लेकर सत्ता में आने के बाद उसे कैसे ठिकाने लगा देते हैं। ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव में जीत के लिए माओवादियों का समर्थन हासिल किया और मुख्यमंत्री बनते ही किशनजी मुठभेड़ में मारे गए। किशनजी पिछले तीन दशक पुलिस को चकमा देते आ रहे थे।
पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के जंगलों में सुरक्षा बलों के एक संयुक्त अभियान में मारे गए मोल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को वे राज्य के नक्सल प्रभावित इलकों की 40 विधानसभा सीटें जिताने में मदद कर रहे हैं, वही सत्ता में आने के बाद उन्हें निपटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। किशनजी और ममता बनर्जी के प्रगाढ़ रिश्तों को जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे लौटना पड़ेगा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में दूसरे नंबर के नेता माने जाने वाले किशनजी पर सौ लोगों की हत्या करने का आरोप था। उनके इशारे पर ही राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के काफिले को बारूदी सुरंग से निशाना बनाया गया था। इस हमले में वे बाल-बाल बच गए थे। वहीं 15 फरवरी 2010 को सिल्दा में ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के शिविर पर हुए हमले के पीछे भी किशनजी को ही मास्टरमाइंड माना जाता है। इस हमले में 24 जवानों को मौत हो गई थी। वहीं संकरेल के रेलवे स्टेशन मास्टर अतींद्रनाथ दत्ता के अपहरण से लेकर पश्चिम बंगाल में राजधानी एक्सप्रेस पर कब्जा करने और ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में तोड़फोड़ के बाद हुई दुर्घटना की साजिश रचने में भी किशनजी का ही नाम सामने आया था। इस दुर्घटना में 130 से अधिक यात्री मारे गए थे।
ट्रेन अपहरण से लेकर ट्रेन दुर्घटना तक कभी भी ममता बनर्जी ने माओवादियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया। यहां तक की उनके खिलाफ रेलवे ने एफआईआर तक नहीं दर्ज करवाई। ममता बनर्जी जंगलमहल इलाके में माओवादियों के मंच से जनता को संबोधित करती रहीं। उन्होंने केंद्र सरकार से जंगलमहल और नक्सल हिंसा से प्रभावित अन्य इलाकों से अर्ध सैनिक बलों को वापस बुलाने तक की मांग भी कर डाली। ममता ने विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता में आने पर गिरफ्तार माओवादियों को रिहा कर बातचीत शुरू करने का वादा किया था।
उनके इस वादे पर किशनजी ने सद्भावना प्रदर्शित करते हुए चार मार्च 2010 को उन्हें पत्र लिख कर कहा था कि अगर वे सत्ता में आने पर समाज के सबसे निचले तबके के बारे में कुछ करने के लिए तैयार हों तो वे उनकी पार्टी को समर्थन देने को तैयार हैं। उन्होंने अपना वादा भी निभाया। लेकिन सत्ता में आने के बाद ममता ने महसूस किया कि विपक्ष में रहते हुए वादा कर देने और सत्ता में आने के बाद उस पर अमल करने में कितना अंतर होता है। कुछ समय पहले ही सरकार और माओवादियों के बीच हुआ संघर्ष विराम भी टूट गया था।
ममता बनर्जी की सरकार ने उस किशनजी को मुठभेड़ में मार गिराया, जो बड़े गर्व से कहा करते थे कि इस इलाके में उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। उन पर हाथ डालने का सीधा मतलब है इलाके 16 सौ गांवों के लोगों से टकराव मोल लेना। किशनजी ने पुलिस और सरकार को इतना गच्चा दिया कि आदिवासी कहने लगे थे कि वह दैवीय शक्तियों के मालिक हैं। लेकिन सरकार ने उन्हें निपटा दिया। उन्होंने ममता बनर्जी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी।
इलाके में माओवादियों के मंच से जनता को संबोधित करती रहीं। उन्होंने केंद्र सरकार से जंगलमहल और नक्सल हिंसा से प्रभावित अन्य इलाकों से अर्ध सैनिक बलों को वापस बुलाने तक की मांग भी कर डाली। ममता ने विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता में आने पर गिरफ्तार माओवादियों को रिहा कर बातचीत शुरू करने का वादा किया था।
उनके इस वादे पर किशनजी ने सद्भावना प्रदर्शित करते हुए चार मार्च 2010 को उन्हें पत्र लिख कर कहा था कि अगर वे सत्ता में आने पर समाज के सबसे निचले तबके के बारे में कुछ करने के लिए तैयार हों तो वे उनकी पार्टी को समर्थन देने को तैयार हैं। उन्होंने अपना वादा भी निभाया। लेकिन सत्ता में आने के बाद ममता ने महसूस किया कि विपक्ष में रहते हुए वादा कर देने और सत्ता में आने के बाद उस पर अमल करने में कितना अंतर होता है। कुछ समय पहले ही सरकार और माओवादियों के बीच हुआ संघर्ष विराम भी टूट गया था।
ममता बनर्जी की सरकार ने उस किशनजी को मुठभेड़ में मार गिराया, जो बड़े गर्व से कहा करते थे कि इस इलाके में उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। उन पर हाथ डालने का सीधा मतलब है इलाके 16 सौ गांवों के लोगों से टकराव मोल लेना। किशनजी ने पुलिस और सरकार को इतना गच्चा दिया कि आदिवासी कहने लगे थे कि वह दैवीय शक्तियों के मालिक हैं। लेकिन सरकार ने उन्हें निपटा दिया। उन्होंने ममता बनर्जी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी।jansatta

उत्तर प्रदेश में एकजुट हुई वाम ताकते

अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवम्बर । उत्तर प्रदेश के चुनावी परिदृश्य में वाम ताकते इस बार विधान सभा में अपनी मौजूदगी दर्ज करने की कवायद में जुट गई है। पिछले कई साल से वामपंथी दलों का कोई भी प्रतिनिधि न तो विधान सभा पहुंचा और न ही लोकसभा । बीती विधान सभा में माकपा के विधायक रामस्वरूप अंतिम प्रतिनिधि थे वाम ताकतों के जिसके बाद कोई भी नहीं पहुंचा । इस बार उत्तर प्रदेश के चार वामपंथी दलों भाकपा ,माकपा ,फॉरवर्ड ब्लाक और आरएसपीआई ने वाम मोर्चा बनाकर करीब सौ सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला किया है जिसमे दर्जन भर ऎसी सीटें भी है जो वामपंथी आन्दोलन का गढ़ रही है मसलन गाजीपुर ,मऊ ,वाराणसी और बिजनौर आदि की सीटे ,इन सीटों पर साझा अभियान चला कर कुछ को विधान सभा पहुँचाने की तैयारी है । पर वाम दलों के इस मोर्चे से धुर वामपंथी राजनीति करने वाले बाहर है । भाकपा माले को मोर्चे ने न्योता दिया था पर सीटों के तालमेल पर टकराव हुआ और वे इस मोर्चे से बाहर हो गए। मोर्चा नेताओं के मुताबिक हालांकि अभी भी कुछ उम्मीद है अगर वे भाकपा माकपा की परम्परागत सीटें छोड़ दे । दूसरी तरफ वाम मोर्चा जन संघर्ष मोर्चा को एक सियासी दल नहीं मानता इसलिए उनसे कोई संवाद ही नहीं किया गया । धुर वामपंथी ताकतों से यह अलगाव वाम मोर्चे की सियासी ताकत को बाँट जरुर रहा है । हालांकि भाकपा माले के अरुण कुमार ने कहा -भाकपा ने सीटों की घोषणा पहले कर दी है और हमें तो इस बार बातचीत के लिए बुलाया ही नहीं गया । अगर वे बुलाएंगे तो हम जरुर शामिल होंगे ,अभी हमने सीटों की कोई घोषणा नहीं की है ।
कभी मित्रसेन यादव से लेकर रामसजीवन जैसे तेजतर्रार सांसद लोकसभा पहुंचते थे पर पिछड़े और दलितों की गोलबंदी की नई राजनीति ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में वाम ताकतों को हाशिए पर पहुंचा दिया और एक समय तो ऐसा भी आया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का वजूद ख़त्म होते होते बचा । पिछड़ों ,मुसलमानों और दलितों के जनाधार वाली वाली वामपंथी पार्टियों का वोट बैंक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उदय के साथ ही दरकने लगा था क्योकि दोनों ही दलों की राजनीति ने जातीय गोलबंदी को तेज कर दिया था। वाम दलों को ज्यादा नुकसान इन्ही दोनों दलों से हुआ है ,यह बात अलग है कि वाम दलों के राष्ट्रीय नेता कभी मुलायम के साथ होते है तो कभी मायावती के । पर उतर प्रदेश में वाम दलों ने फैसला किया है कि वे किसी भी पूंजीवादी दल से तालमेल नही करेंगे । वाम मोर्चा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा -वाम मोर्चा ने तय किया है कि समाजवादी पार्टी ,बसपा या कांग्रेस किसी से भी चुनावी तालमेल नहीं किया जाएगा ,इनका वर्गीय चरित्र एक जैसा है। जहां तक भाकपा माले का सवाल है इस बार भी वाम नेताओं की अनौपचारिक बैठक का न्योता उन्हें भेजा गया था पर कोई जवाब नही आया। हम अभी भी चाहते ही माले जुड़े।
उत्तर प्रदेश में वाम ताकते मजबूत आन्दोलन के अभाव में भी बिखरी। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने दादरी आंदोलन के समय प्रदेश की सभी वामपंथी पार्टियों को किसान आन्दोलन से जोड़ दिया था पर चुनावी खेल में आन्दोलन से जड़े राजनैतिक दल बिखर गए वर्ना विधान सभा में इनकी उपस्थिति जरुर दर्ज हो जाती । इसके आड़ उत्तर प्रदेश में कोई ऐसा आन्दोलन भी नहीं उभरा जिसमे वाम ताकतों की भूमिका नजर आती जिसकी एक प्रमख वजह नेतृत्व भी मानी जाती है। वाम दलों के पास आज बड़े कद का कोई नेता उत्तर प्रदेश में नहीं है यह भी वास्तविकता है,यही वजह है कि विधान सभा और लोकसभा में उत्तर प्रदेश के किसी असरदार वामपंथी नेता की कमी महसूस होती है । यह भी दुर्भाग्य है कि राष्ट्रीय फलक पर पहचान बनाने वाले विश्विद्यालय की छात्र राजनीति से निकले अखिलेन्द्र प्रताप सिंह से लेकर अतुल कुमार अनजान जैसे कई महत्वपूर्ण वामपंथी नेता संसद नहीं पहुँच पाए जबकि उनसे राजनीति का ककहरा सीखने वाले लोकसभा से लेकर राज्य सभा तक पहनक चुके है । यह वाम राजनीति का दूसरा पहलू है।
इस बार विधान सभा चुनाव में वाम दलों की एकजुटता रंग ला सकती है । उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार के खिलाफ माहौल बन चूका है और समाजवादी पार्टी उसे ज्यादातर जगहों मजबूत चुनौती देती दिख रही है । पर फिलहाल किसी एक पार्टी के पक्ष में कोई लहर जैसी बात नहीं नजर आ रही है ऐसे में अन्य दलों के अलावा छोटे दलों के मजबूत उम्मीदवार भी कई जगहों पर सत्तारूढ़ दल को कड़ी चुनौती देंगे । वाम दलों को अपने परंपरागत में गढ़ में इसका फायदा मिल सकता है । jansatta

Friday, November 25, 2011

विपक्ष की खबर लेने के मूड में मायावती


अंबरीश कुमार
लखनऊ नवंबर । उत्तर प्रदेश में मायावती एक बार फिर अपनी राजनैतिक ताकत दिखाने जा रही है । वे आगामी २७ नवंबर को यहाँ एक बड़ी रैली में विपक्ष खासकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को जवाब देंगी । बड़ी रैलियों का जो रिकार्ड मायावती और कांशीराम का रहा है उसे कोई दल तोड़ नहीं पाया है और इसका मनोवैज्ञानिक असर दलित वोट बैंक पर पड़ता भी है। आगामी २७ नवंबर को लखनऊ में जो रैली होने जा रही है उसमे पुरानी रैलियों का रिकार्ड टूट सकता है । मायावती जिस तरह विपक्ष के निशाने पर आ चुकी है उसे देखते हुए लग रहा है कि वे इस रैली में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर जोरदार ढंग से हल्ला बोलेंगी । समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव काफी समय से उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में क्रांति रथ लेकर चल रहे है और उनकी रैलियों में सबसे ज्यादा भीड़ भी जुट रही है । दूसरी तरफ राहुल गांधी पूर्वांचल के दौरे पर है जिनकी सभाओं में समाजवादी पार्टी जैसी भीड़ तो नहीं आ रही है पर काफी लोग सुनने आ रहे है और राहुल जो बोल रहे है उससे सपा और बसपा बुरी तरह आहत है। आज फिर राहुल गांधी ने सिद्धार्थ नगर में कहा -
लखनऊ में जो हाथी बैठा है वह आप लोगों का पैसा खा जाता है । पिछले तीन दिन से बहुजन समाज पार्टी लगातार सिर्फ राहुल गांधी के भाषणों का जवाब देने में जुटी है। जाहिर है रविवार को मायावती जब विपक्ष की खबर लेंगी तो उनके एजंडा पर राहुल गांधी सबसे ऊपर होंगे । वैसे भी वे कांग्रेस को ज्यादा तवज्जों दे रही है ताकि वह तिकोने मुकाबले में आ जाए ताकि उसका राजनैतिक फायदा बसपा उठा सके । यही वजह है कि ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाकर वे अपनी राजनैतिक ताकत का अहसास करेंगी और फिर विपक्ष की खबर लेंगी ।
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया पर हो रहे हमले पर आज बसपा के प्रदेश अध्यक्ष ने स्वामी प्रसाद मौर्य ने सफाई देते हुए कहा - राहुल गांधी को राजनीति व केन्द्र की सत्ता विरासत में मिली है, इसलिए उन्हें पता नहीं है कि संघर्ष और सतत संघर्ष क्या चीज होती है। गरीब व आम आदमी का दुःख दर्द कितना तकलीफ देह होता है। उन्हें यह मालूम नहीं है कि बसपा का गठन कैसे हुआ और इसके गठन से पहले वर्ष 1977 से लेकर 1984 तक अर्थात बीएसपी की स्थापना से पहले देश में दलित व अन्य पिछड़े वर्गों एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा अन्य समाज के गरीब पीड़ित लोगों के इतिहास व समस्याओं को जानने व समझने के लिये पूरे देश में गांव-गांव, मौहल्ले एवं गली-गली तक मिशनरी लोग पहुंचे । उनकी तकलीफ को जाना है । इस आन्दोलान के संस्थापक मान्यवर कांशीराम व मायावती ने वर्ष 1977 से 1984 तक गांव-गांव जाकर कैडर कैम्प के जरिए छोटी-छोटी जन सभाएं करके इस आन्दोलन को खड़ा किया था । बसपा की इस सफाई और पार्टी के इतिहास में लौटने की कवायद से मायावती की राजनैतिक चिंता को समझा जा सकता है । इसलिए पार्टी अपने इतिहास को याद करने के साथ फिर एक ऐतिहासिक रैली की तैयारी में है ।
बसपा के मंत्री ,सांसद विधायक और राजनैतिक जिम्मेदारी निभाने वाले अफसर सभी इस रैली में भीड़ लाने के लिए जुट गए है । पार्टी ने नेताओं को हर विधान सभा क्षेत्र से हजारों की संख्या में लोगों को जुटाने का निर्देश दिया है । जिसके लिए ट्रैक्टर ट्राली ,बस से लेकर रेल तक का इंतजाम किया गया है। रैली को लेकर समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा -यह सरकार के खर्च पर होने वाली बसपा की रैली है जिसके नाम पर जमकर वसूली हो रही है । इस सबके बावजूद मायावती को कुछ मिलना नहीं है उनका जाना तय हो चूका है । कांग्रेस ने कहा -बहुजन समाज पार्टी की रैली में किए जा रहे करोड़ों रूपये सरकारी धन की फिजूलखर्ची एवं प्रशासनिक तंत्र का जिस प्रकार दुरूपयोग किया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है । इस सरकारी रैली आयोजित कर मुहर्रम के पहले दिन व बैंक की प्रतियोगी परीक्षा के दिन भारी भीड़ एकत्र कर वर्ष 2002 की घटना की यदि पुनरावृत्ति होती है तो उसके लिए पूरी तरह बसपा जिम्मेदार होगी। पार्टी प्रवक्ता द्विजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि रैली के लिए अधिकारियों से चंदे वसूले जा रहे हैं और पूरा का पूरा शासन-प्रशासन रैली की तैयारी में जुटा है तथा प्रदेश की जनता को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। उन्होने कहा कि लगभग बीस हजार निजी एवं रोडवेज की बसों को जबरन रैली के लिए ली गई है । लखनऊ में लाखों की भीड़ इकट्ठा की जा रही है उससे परीक्षार्थियों एवं आम जनता को आवागमन में जो कठिनाई होगी, उसके लिए पूरी तरह से बसपा जिम्मेदार है।

Thursday, November 24, 2011

जमीनी राजनीति का ककहरा सीख गए राहुल


अंबरीश कुमार
बलरामपुर , नवम्बर । पूर्वांचल के दौरे पर निकले उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति का अब राहुल गांधी को भी सामना करना पड़ रहा है। अब वे विपक्ष के काले झंडे भी देख रहे है तो लखनऊ से लेकर बाराबंकी ,बहराइच तक अपनी ही पार्टी के बागी नेताओं का विरोध भी झेलना पड़ रहा है। इस सब के बावजूद राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में गरीबी और विकास को एजंडा बनाने के साथ मायावती और मुलायम को आइना भी दिखा रहे है । आज बलरामपुर में राहुल गांधी के निशाने पर सिर्फ मायावती ही नही मुलायम भी रहे । मुस्लिम बहुल इलाकों में राहुल मायावती के साथ मुलायम सिंह पर भी तेज हमला कर रहे है। राहुल गांधी कांग्रेस को फिर से सत्ता की आस दिलाते नजर आ रहे है। वे अपनी सभाओं के जरिए लोगों को यह भी बता रहे है कि करीब दो दशक के गैर कांग्रेसवाद के दौरान प्रदेश कहा पहुँच गया है । भूख से लेकर भीख का मुहावरा उसी की भदेस अभिव्यक्ति है जिसका दूसरे दल मजाक उड़ा ले पर एक तबके को प्रभावित भी कर रहा है ।
आज बलरामपुर में राहुल गांधी ने कहा -कांग्रेस आदिवासियों का ,पिछड़ों का और दलितों का सवाल उठा रही है।हमने इसी तबके के लिए जब मनरेगा शुरू किया तो मायावती ने लखनऊ में भाषण दिया कि मनरेगा से कुछ नहीं होगा । राहुल गांधी ने साफ़ किया कि मायावती गाँव से गरीबों से कटी हुई है इसीलिए ऐसा कह रही है । राहुल ने आगे कहा -जब तक कोई नेता आपके घर गाँव तक नहीं आएगा ,आपके साथ खाना नहीं खाएगा,हैडपंप का पानी नहीं पीएगा वह गरीबी का दर्द कैसे समझेगा । राहुल गांधी की यह बात लोगों को भीतर तक छू रही है। राहुल गांधी पूर्वांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों से गुजर रहे है और अंचल के सामाजिक समीकरण के हिसाब से उनका भाषण भी बादल जा रहा है। इससे साफ़ है कि वे अब जमीनी राजनीति का ककहरा काफी हद तक सीख गए है । आज भी मुस्लिम बहुल सभा में उन्होंने कहा -मुलायम सिंह ने पिछले लोकसभा चुनाव में राजनैतिक फायदे के लिए कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था आपकी चिंता नही की । बलरामपुर पीस पार्टी के असर वाला इलाका माना जाता है पर कांग्रेस की सभाओं से लग रहा है कि मुस्लिम कोट बैंक में पार्टी फिर सेंध लगा सकती है । इससे पहले बुधवार को नानपारा में जिस तरह मुस्लिम समुदाय उन्हें सुनने के लिए घरों से निकला वह अन्य दलों के लिए चुनौती बन सकता है । बहराइच में तो समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता वकार अहमद ने अपना गढ़ संभाल लिया पर नानपारा में बसपा अपना घर नहीं संभाल पाई,बसपा के विधायक की सारी कोशशों के बावजूद मुस्लिम समुदाय कांग्रेस की सभा में बड़ी संख्या में जुटा । दूकान चलाने वाले नौजवान जमील ने कहा -सपा बसपा और भाजपा सभी तो राज कर चुके है इनको भी एक मौका दिया जाना चाहिए। कम से कम हमारे दरवाजे तक आते तो है । सत्ता विरोधी रुझान कैसा होता है यह आज नानपारा में दिखा भी । बसपा के विधायक वारिस अली ने अपना भव्य मकान बनवा लिया है जिससे वे स्थानीय लोगों के निशाने पर है जो उनके घर को इमामबाडा बताते है और इस चुनाव में उन्हें आराम देने की बात कहते है ।
बुधवार को राहुल ने मुलायम की टिप्पणी का जवाब देते हुए उन्हें कल्याण सिंह की याद दिलाई थी जो आज भी जारी रही । वे कई मुस्लिम बहुल इलाकों गुजर रहे है जिसकी प्रतिक्रिया कुछ जगहों पर दिख गई । राहुल गांधी ने आज अपनी सभाओं में सरकारी लूट को मुद्दा बनाया और कहा -केन्द्रीय योजनाओं के लिए जो पैसा आता है वह इस सरकार के मंत्रियों की जेब में पहुँच जाता है। दरअसल जहां भी बसपा के विधायक मंत्री साढ़े चार साल में जरुरत से ज्यादा संपन्न हो गए है वहां के लोगों को राहुल गांधी की यह बात ठीक से समझ में आ रही है।
राहुल गांधी अब बाबा वाली छवि से ऊपर उठते नजर आ रहे है । यही वजह है कि वे सपा और बसपा दोनों की दुखती रग पर उंगली रख रहे है जो सरकारी लूट से लेकर जातीय और मजहबी विरोधाभास से संबंधित है । इस पिछड़े और मुस्लिम बहुल इलाकों में चुनाव का आधार भी यही सब बनना है । कांग्रेस ने इस बार जो सोशल इंजीनियरिंग कर टिकट दिया है उससे फौरी तौर पर पार्टी के भीतर विरोध नजर आ रहा है पर जातीय समीकरण के लिहाज से वह मजबूत माना जा रहा है। चाहे बाराबंकी में बेनी बाबू के पुत्र राकेश वर्मा का टिकट हो या बहराइच में दिलीप वर्मा का जिनकी पत्नी बसपा की एमएलसी है।कांग्रेस के पुराने नेता इन्हें बाहरी बता कर विरोध कर रहे है पर नेतृत्व इन्हें मजबूत उम्मीदार मान रहा है ।
पूर्वांचल में कांग्रेस इस बार कई तरह के प्रयोग कर रही है जिसकी कमान राहुल गांधी के हाथों में है । इसमे दलित वंचित तबके से लेकर पिछड़ी जातियों के समीकरण पर खास ध्यान दिया जा रहा है। यही बात विरोधियों को चिंतित भी कर रही है । बसपा से बाबूसिंह कुशवाहा की बगावत ठीक उसी तरह है जैसे भाजपा से कल्याण सिंह की थी।ऐसे में कुशवाहा बिरादरी का विरोध बसपा के लिए भारी पड़ सकता है जिसका फायदा गैर बसपा दल उठाना चाहेंगे । इसमे कांग्रेस भी शामिल है । राहुल गांधी एक बार फिर कांग्रेस को गांवों तक ले जाकर दलित ,वंचित और अति पिछड़ी जातियों तक पहुचने का प्रयास कर रहे है। वे यह भी बता रहे है कि दो दशक के गैर कांग्रेसवाद के दौरान उत्तर प्रदेश कहा पहुँच गया है । इसी वजह से बसपा राहुल गांधी की हर सभा पर नजर रखने के साथ फ़ौरन जवाब भी देती है जिसमे सफाई ज्यादा होती है । इसलिए अब राहुल के इन दौरों को विरोधी भी गंभीरता से ले रहे है ।

jansatta

Tuesday, November 22, 2011

रिहंद का जहरीला पानी पीकर दम तोड़ते बच्चे


अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवम्बर ।सोनभद्र में रिहंद बांध का जहरीला पानी आसपास के गांव वालों के लिए फिर कहर बन गया है।पिछले पंद्रह दिन में इस जहरीले पानी को पीकर डेढ़ दर्जन बच्चों की मौत हो चुकी है।आज ही गाडियारा गांव के तीन बच्चों को अस्पताल भेजा गया है। बड़ों को भी जोड़ ले तो मरने वालों की
संख्या २२ हो चुकी है । खास बात यह है कि यह जिला फार्मूला वन की रेस कराने वाली सरकार के चहेते उद्योगपति जेपी का यह मुख्य ठिकाना है जो अरबों रुपए की आवास योजनाओं में पर्यावरण का सब्जबाग भी दिखाता है और उसी के जिले का जहरीला पानी बच्चों की जान ले रहा है तो कोई आवाज नहीं उठ रही । सोनभद्र जिला मुख्यालय राबर्ट्सगंज से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर रिहंद बांध के किनारे के गांवों के लिए यह कोई नई बात नहीं है। गरीबों की सरकार के अमीर नेताओं ने इस जिले के प्राकृतिक संसाधनों को जिस बेदर्दी से लूटा है वह नजीर बन गई है।रिहंद बांध का पानी जहरीला हो चूका है यह बात सरकारी महकमे मसलन स्वास्थ्य विभाग से लेकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसरों को भी पता है । जिन बच्चों की जान गई है उनमे ज्यादातर पानी से होने वाली बिमारियों के शिकार हुए है । पेचिस ,डायरिया ,पेट दर्द जैसी शिकायतों के बाद इन बच्चों को अस्पताल भेजा जाता है पर लौटकर कम ही आ पाते है ।
पिछले साल भी बच्चे और बड़े रिहंद के प्रदूषित पानी पीकर मरे थे और सरकारी तंत्र ने रस्म अदायगी के बाद फिर लोगों को जहरीले पानी पर निर्भर रहने के लिए छोड़ दिया। जन संघर्ष मोर्चा जो इस अंचल के प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ लगातार आवाज उठाता रहा है उसने जिला प्रशासन को आगाह किया है कि जल्द कोई कदम नही उठाए गए तो फिर वे सड़क पर उतरने को मजबूर होंगे।
जन संघर्ष मोर्चा के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिनकर कपूर के नेतृत्त्व में रिहंद बांध के किनारे के गांवों का दौरा कर बीते पंद्रह दिन में मरने वाले २२ लोगों की सूची जनसत्ता को दी । इसमे अठारह बच्चे और चार बड़े शामिल है । प्रदूषित पानी पीने से जिन लोगों की मौत हुई उनके नाम है लल्लू पुत्र नंदलाल बैगा उम्र 2 वर्ष, सोनू पुत्र सोमारू खरवार उम्र 11 वर्ष, रूपनाथ पुत्र रामकिशुन, पनिका उम्र 11 वर्ष, सोनिया पुत्री रामा गोड़ उम्र 5 वर्ष, आशीष पुत्र हंसराज गोड़ उम्र 5 वर्ष, सन्ती पुत्री हंसराज गोड़ उम्र 7 वर्ष, दश्मतिया पत्नी हंसराज गोड़ उम्र 32 वर्ष, सन्तोष पुत्र सोहन गोड़ उम्र 7 वर्ष, मुन्ना पुत्र सोहन गोड़ उम्र 8 वर्ष, आशीष पुत्र संखलाल गोड़ उम्र 5 वर्ष, मन्ना पुत्र रामनाथ उम्र 3 वर्ष, दीपांशु पुत्र रामलाल यादव उम्र 2 वर्ष, विभा पुत्री महेन्द्र यादव उम्र 3 वर्ष, प्रदीप पुत्र शिवमूरत उम्र 4 वर्ष, शुभचंद पुत्र अमरजीत उम्र 6 वर्ष, संजय पुत्र रामलगन यादव उम्र 11 वर्ष, देवन्ती पुत्री भोला सोनी उम्र 1 वर्ष, बाबूनंदन पुत्र बंसतलाल उम्र 7 वर्ष, कैलाश पुत्र चुक्खुल उम्र 60 वर्ष, तिलक पुत्र प्रसाद उम्र 62 वर्ष, श्यामलाल पुत्र बेचन उम्र 65 वर्ष, शांतिपति पत्नी सोहन गोड़ उम्र 32 वर्ष की अब तक मौत हो चुकी है और दो दर्जन से ज्यादा लोग अभी भी बीमार है। जिनमें भी बच्चों की ही संख्या ज्यादा है।
गौरतलब है कि रेणु सागर के नाम से प्रसिद्ध इस रिहंद बांध के समीप स्थित हिण्डालकों, कन्नौरिया कैमिकल्स, ताप विद्युत उत्पादन गृहों में भारी मात्रा में फेके जा रहे कचड़े से इस जलाशय का पानी जहरीला हो चुका है। पिछले साल भी आसपास के गांवों में कई लोगों की मौत हुई थी । इस क्षेत्र के बेलहत्थी, पाटी, कमरीड़ाड, लभरी, गाढ़ा गांव में कई गांव वालों की मौत प्रदूषित पानी पीने से हुई है। जिस पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बकायदा मुकदमा दर्ज कर जिलाधिकारी सोनभद्र व उत्तर प्रदेश शासन को निर्देश भी दिया था। इस बार गांव का दौरा करने जो प्रतिनिधिमंडल गया था उसमे सुरेंद्र पाल जिलाध्यक्ष ठेका मजदूर यूनियन, म्योरपुर ब्लाक प्रभारी साबिर हुसैन, रामायन गोड़, संत कुमार यादव, विरेंद्र कुमार, रमेश सिंह खरवार, इन्द्र देव खरवार आदि शामिल रहें।
दिनकर कपूर ने बताया कि पूर्व में कमरीड़ाड, लभरी और बेलहत्थी गांवों में हुए इसी तरह के मामले में जन संघर्ष मोर्चा के पत्रों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बकायदा केस संख्या 6071/24/69/2011/ओसी और केस संख्या 36392/24/69/09-10 के मुकदमें दर्ज कर जिलाधिकारी और उत्तर प्रदेश सरकार को कार्यवाही करने को कहा था।इसी मसले पर मोर्चा ने हाईकोर्ट इलाहाबाद में जनहित याचिका भी दायर की है। जिसपर निर्णय देते हुए हाईकोर्ट ने जांच भी कराई है। बावजूद इसके कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया । आज भी इन गांवों में में साफ पानी मयस्सर नहीं है। गांव वालों ने बताया कि उन्हे कच्चे कुओं, रिहन्द बांध और सिंचाई कूपों के पानी को पीना पड़ता है। नक्सल जिला के नाम पर करोड़ो रूपए विकास के लिए लेने वाले इस जिले में प्रशासनिक संवेदनहीनता की हालत यह है कि इन क्षेत्रों में बार-बार इस सवाल को उठाने के बाबजूद वाटर फिल्टर प्लांट तक नहीं लगाया गया।
उन्होनें कहा कि इन गांवों की हालत तो इतनी बुरी है कि जिन ग्रामीणों या उनके परिजनों की मौतें हुई है उनके लाखों रूपए मनरेगा में मजदूरी तक बकाया है। मजदूरी न मिलने के कारण आदिवासी ग्रामीण गेठी कंदा जैसी जहरीली जड़ खाने के लिए मजबूर है। नाम उजागर करते हुए बताया कि कैलाश यादव पुत्र चुखुल जिनकी मृत्यु हुई है। सिचांई कूप में और रामा, महेन्द्र व रामलाल जिनके बच्चे मरें है उनकी मजदूरी बकाया है। गांव में पूर्व प्रधान के कराए कामों, वनविभाग की बकाया मजदूरी तक का भुगतान सालों से नहीं हुआ है। इसलिए जन संघर्ष मोर्चा ने इस लापरवाही को करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के विरूद्ध मानवाधिकार आयोग को फिर पत्र लिखा है व रिहन्द बांध के पास बसे गांवों में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर शुद्ध पेयजल देने और प्रशासनिक लापरवाही के कारण मरें लोगों के परिवार जनों को मुआवजा व बकाया मजदूरी के भुगतान के लिए 24 नवम्बर से म्योरपुर ब्लाक में अनिश्चितकालीन धरना देने का फैसला लिया है । जनसत्ता

चीन पाक कला में भी पीछे नहीं

अरुणेंद्र नाथ वर्मा
पंद्रह दिनों की चीन यात्रा में खाने को क्या मिलेगा, यह प्रश्न मेरी पत्नी को सता रहा था। अनेक देशों की यात्रा करते हुए पाश्चात्य शैली के भोजन की वे अभ्यस्त हो गई हैं। फिर लगभग सभी देशों में भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के साथ भारतीय भोजन भी खूब मिलने लगा है। पर चीन के विषय में मन में बहुत से पूर्वग्रह थे। कुत्ता, बिल्ली, बंदर, गिरगिट, सांप, कीड़े मकोड़े- सभी कुछ वहां खाए जाते हैं। सामिष भोजन किया तो क्या इन सबसे बचना संभव हो पाएगा? दूध-दही से चीनियों को प्रेम है नहीं! तो क्या चावल-नूडल और उबली सब्जियों पर ही निर्वाह करना पड़ेगा? यह सोच कर यात्रा के प्रति उनका उत्साह ठंडा पड़ता जा रहा था।
मेरी तरह सेना में कई दशक बिताए होते और भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं- विशेषकर नगालैंड और मिजोरम में रहने का अवसर मिला होता तो शायद वे जानतीं कि कुत्ते, बंदर और सांप भारत के भी कई भागों में खाए जाते हैं। बड़े चूहे (बैंडीकूट और फील्ड रैट) तो बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, संथाल परगना आदि में अनेक जनजातियां शौक से खाती हैं। सेना में कमांडो फोर्स के प्रशिक्षार्थियों को बताया जाता है कि सिर अलग करने के बाद सांप का मांस स्वाद में किसी श्वेतमांस (मछली-चिकेन आदि) के जैसा ही होता है और प्रशिक्षार्थी चाहें तो उसे खाने का अवसर दिया जाता है। चीन में कुत्ते के मांस को सर्दियों का पौष्टिक आहार मानते हैं और सांप को गर्मियों के लिए। सुदूर उत्तर चीन और कोरिया में बंदर का मस्तिष्क स्वादिष्ट समझा जाता है। चिड़िया तो हर प्रकार की ही भक्ष्य है, पर गिद्ध नहीं। कीड़े-मकोड़ों की भी खैरियत नहीं। मछली का मांस कच्चा या अधकच्चा जापान (सूशी बहुत लोकप्रिय है), नीदरलैंड, स्कैंडिनेविया, आइसलैंड या ग्रीनलैंड की तरह चीन में भी खूब खाया जाता है।
इतना कहने के बाद यह स्पष्टीकरण आवश्यक हो जाता है कि पर्यटकों के लिए अखाद्य खाने की मजबूरी नहीं आती। सभी होटलों- रेस्तराओं में चावल, मक्की या गेहूं के नूडल, सोयाबीन की पनीर (टोफू) आदि मुख्य भोजन के रूप में और साथ में अनेक सब्जियां, जैसे टमाटर, गाजर, गोभी, ब्रोकेली, मटर, लौकी, कद्दू, तोरी, बैंगन, मशरूम, नरम भुट्टे और बांस की कोंपल आदि खूब मिलते हैं। फल भरपूर मात्रा में मिल जाएंगे। मांसाहारियों के लिए बकरे का मांस, गोमांस, मुर्गी, बत्तख, मछली, झींगे आदि भी उपलब्ध होता है। वे जानते हैं कि कुत्ता, बंदर, सांप और कीड़े-मकोड़े से विदेशी पर्यटकों को अरुचि, बल्कि जुगुप्सा होती है। यह सब अच्छे होटलों में गलती से भी खाने की नौबत नहीं आती।चीन की पांच हजार साल पुरानी सभ्यता पाक कला में भी पीछे नहीं है। उनके भोजन की आठ मुख्य शैलियां हैं- अनह्युई, कैंटोनीज, फूजियान, हुनान, शानडांग, जियांगसू, सिजुआन (या सिचुआन) और ज्हेजियांग। अल्पसंख्यकों और सीमावर्ती जनजातियों की अपनी भोजन शैलियां हैं, जैसे सिनकियांग और उगयूर प्रदेश जैसे मुसलिम बहुल क्षेत्रों में हलाल मांस का कबाब, सीख कबाब और तिब्बत का याक का मांस आदि। पर वास्तव में पाक कला की चार ही मुख्य शैलियां हैं- कैंटोनीज (गुवांगडांग), शानडांग, जिआंगसू और सिचुआन। कैंटोनीज भोजन में डिमसूम आदि कई व्यंजन छोटी-छोटी मात्रा में (गुजराती थाली जैसी) परोसे जाते हैं तो जिआंगसू में तंदूरी मछली आदि का बाहुल्य है। बीजिंग की बीजिंगडक तो हमारे तंदूरी चिकन टिक्के की तरह विश्वविख्यात है। शंघाई के निकटस्थ क्षेत्र का समुद्री भोजन- झींगे-केकड़े, घोंघे आदि प्रसिद्ध हैं। सिचुआन शैली लहसुन, अदरक, लाल-काली मिर्च, तिल, पिसी मूंगफली और अनेक मसालों, चटखारेदार चटनी आदि के कारण हम भारतीयों की स्वादग्रंथि को आकर्षित करती हैं तो कैंटोनीज पाक शैली कम मिर्च मसाले वाले सादा भोजन करने वाले भारतीयों को भाएगी। लेकिन हम भारतीयों को भारत में जो चीनी भोजन मिलता है, वह स्वाद में चीन के चीनी भोजन से बहुत हट कर है।
सच तो यह है कि नए देश में जाकर वहां के व्यंजनों का स्वाद न लिया तो पर्यटन का पूरा आनंद नहीं। फिर भी भोजन में प्रयोगवाद से घबराने वाले चिंतित न हों। चीन के सभी बड़े शहरों में कई भारतीय रेस्तरां मिल जाएंगे। तुरंता भोजन के शौकीनों के लिए मैकडोनाल्ड, पिज्जा हट, सबवे, केएफसी आदि की कई शाखाएं हर बड़े शहर में मिल जाएंगी। फलों की कमी नहीं है। चाय बिना दूध-शक्कर के पी सकते हैं तो ढेरों तरह की ‘ग्रीन’ और सुगंधित (जैस्मिन आदि) चाय मिल जाएगी और अगर दूध चीनी मिला कर उसे बर्बाद करना ही चाहें तो पाउडर-दूध भी मिल जाएगा। पर भइया, दाल, भात, रोटी ही खाना है और सास-बहू का धारावाहिक देख कर सो जाना है तो पर्यटन के लिए इतनी दूर जाएं ही क्यों!
जनसत्ता

Monday, November 21, 2011

तीन मिनट में बांट दिया चार प्रदेश

अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवंबर। उत्तर प्रदेश विधान सभा में कुल तीन मिनट के भीतर प्रदेश के चार टुकडे करने का प्रस्ताव पास हो गया । विधान सभा का शीतकालीन सत्र कुल डेढ़ घंटे का रहा जिसमे सदन की कार्यवाही कुल सोलह मिनट चली । जिसमे तीन मिनट में प्रदेश का बंटवारा करने का प्रस्ताव बिना किसी बहस के पास किया गया तो बाकी तेरह मिनट में ५४ हजार ७६३ करोड़ का लेखानुदान भी पास हो गया । सत्ता पक्ष ने बुंदेलखंड ,पूर्वांचल ,पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिना किसी मांग के अवध प्रदेश बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया । अविश्वास प्रस्ताव लाने वाला विपक्ष संसदीय लोकतंत्र का यह चमत्कार देख भौचक था। यह देश में अपने ढंग की पहली घटना है जिसमे जिस प्रदेश की कभी मांग तक न उठी हो वह अवध प्रदेश बनाने का प्रस्ताव सदन ने पास किया हो । विपक्ष का आरोप था कि जो सरकार अल्पमत में आ चुकी है वह किस तरह प्रदेश का बंटवारा करने का प्रस्ताव बिना बहस के पास करा सकती है । हत्यारी ,बलात्कारी और लुटेरी सरकार बर्खास्त करों के बैनर लिए विपक्षी सदस्यों के वेल में आ जाने बाद सदन की कार्यवाही पहले सवा घंटे के लिए स्थगित की गई तो बाद मी सोलह मिनट बाद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई । इस कार्रवाई के बाद समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव पचास सपा विधायकों के साथ राज्यपाल से मिले और विधानसभा की कार्रवाई रद्द करने की मांग की।
सोमवार को विधानसभा में सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सपा और भाजपा ने स्‍पीकर को अलग-अलग अविश्‍वास प्रस्‍ताव सौंपा। विपक्षी दल मायावती सरकार की बर्खास्‍तगी की मांग कर रहे थे। नारेबाजी और हंगामे के चलते फौरन कार्यवाही स्थगित कर दी गई। दोपहर 12:20 बजे कार्यवाही शुरू होने पर भी हंगामा जारी रहा। हंगामे के बीच ही सरकार ने उत्तर प्रदेश को बांटने का प्रस्‍ताव पेश कर फ़ौरन पास करा दिया । इससे पहले सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू होते ही मायावती सदन में पहुंचीं और राज्‍य के बंटवारे का प्रस्‍ताव सदन के पटल पर रखा गया। विपक्ष हंगामा करता रहा लेकिन उनकी नहीं सुनी गई । बिना किसी बहस के ही ध्‍वनिमत से यह प्रस्‍ताव पारित कर दिया गया। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने सदन को अनिश्चितकाल तक के लिए स्‍थगित कर दिया। सब कुछ तीन मिनट के भीतर हो गया।
सदन की कार्यवाही समाप्त होते ही सदन के बाहर की राजनीति शुरू हो गई। विधान सभा में तो हंगामा हुआ ही बाहर भी हंगामा और टकराव हुआ ।मुख्यमंत्री मायावती ने कहा -हमने तो अपना काम कर दिया अब आगे की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है । मायावती ने यह भी सफाई दी कि उनकी सरकार अल्पमत में नहीं है । समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने कहा-एक बंटवारे का जख्म अभी भरा नहीं और अब चार हिस्सों में इस प्रदेश को बांटने का प्रस्ताव पास किया गया है । कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रमोद तिवारी ने कहा - भाजपा ने वेल में घुस कर सदन को अव्यवस्थित कर दिया। इससे साफ़ है कि भाजपा और बसपा की मिलीभगत है । नेता विपक्ष शिवपाल यादव ने कहा -आज जो भी हुआ वह शर्मनाक और पूरी तरह आलोकतांत्रिक है। भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -मायावती ने संसदीय लोकतंत्र का मजाक बना दिया है । जो कुछ आज हुआ वह एक डरी और विदा होती हुई सरकार का कारनामा था जो अल्पमत में आ चुकी है ।
दूसरी तरफ मुख्यमंत्री मायावती ने सरकार के अल्पमत में होने की बात का पूरे तौर पर खंडन करते हुए इसे गलत व तथ्यहीन बताया है। उन्होंने कहा कि विधानसभा में उनकी पार्टी का बहुमत ही नहीं उसके पास बहुमत की निर्धारित संख्या से अधिक विधायक हैं। उन्होंने कहा कि यह दुष्प्रचार सभी विरोधी पार्टियों की केवल उनकी सरकार को कमजोर बनाने की बहुत बड़ी मिलीजुली एक सोची समझी साजिश है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में उनकी पार्टी व सरकार के प्रति सभी विरोधी पार्टियों के साथ केंद्र सरकार के चले आ रहे अभी तक के रवैये की सजा प्रदेश की जनता कुछ ही महीनों के अंदर होने वाले विधानसभा आम चुनाव में सभी विरोधियों पार्टियों को जरूर देगी।
उन्होंने कहा कि यह सभी विरोधी पार्टियां उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के जबर्दस्त खिलाफ हैं। ये सभी विरोधी पार्टियां उत्तर प्रदेश व यहां की जनता का संपूर्ण रूप से विकास होते हुए नहीं देखना चाहती। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र की सरकार के काफी सांसद व मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण दिल्ली की जेल में बंद हैं। और काफी के खिलाफ अन्य विभिन्न मामलों को लेकर अदालत व कई एजेन्सियों में अभी भी कार्रवाई चल रही है। इसके अलावा देश में ऐसे अनेक और भी उदाहरण देखने को मिलेंगे। लेकिन फिर भी इन सब के आधार पर कांग्रेस व अन्य सभी विरोधी पार्टियों ने कभी भी आन्ध्र प्रदेश व दिल्ली में केंद्र की सरकार को अल्पमत में होने की बात नहीं कही है। उन्होंने कहा कि लेकिन उत्तर प्रदेश के मामले में काफी गंभीरता से सोचने की बात यह है कि जब यह सब उत्तर प्रदेश में होता है। तब इस आधार पर विरोधी पार्टियां उनकी सरकार को अल्पमत में होने की बातें काफी बढ़ा चढ़कर करती हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह सब उनकी पार्टी व सरकार के खिलाफ विरोधियों की मिली.जुली एक सोची.समझी बहुत बड़ी राजनैतिक साजिश है। इसी के साथ इन सभी विरोधी पार्टियों की आज भी दलित विरोधी मानसिकता होने का रवैया भी साफ नजर आता है। मायावती ने आगे कहा - विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने का सवाल ही नहीं उठता।

Sunday, November 20, 2011

डरे हुए है मंत्री से लेकर बाहुबली सांसद तक !


अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवंबर । उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के मंत्री से लेकर बाहुबली सांसद तक जब अपनी हत्या की आशंका जता रहे हो तो मायावती के सुशासन का अंदाजा लगाया जा सकता है।पहले जौनपुर के सांसद धनंजय सिंह जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है ,उन्होंने प्रदेश के पुलिस मुखिया बृजलाल से अपनी जान का खतरा बताया था ।मायावती सरकार के मंत्री नन्द गोपाल गुप्ता उर्फ़ नंदी पर पिछले साल बम से हमला हो चूका है जिसमे वे गंभीर रूप से घायल हो चुके है ,इस हादसे में इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार की भी जान चली गई थी । इससे पहले स्वास्थ्य विभाग के एक अफसर ने अपनी जान का खतरा बताया था तो आईपीएस अफसर डीडी मिश्र भी इसी तरह की बात कर चुके है । एक वरिष्ठ अफसर की खुदकुशी का मामला भी संदिग्ध बताया गया था । अब बाबूसिंह कुशवाहा ने काबीना मंत्री नसीमुद्दीन से लेकर कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह से अपनी जान का खतरा बताकर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम घोटाले के पीछे की बड़ी ताकतों को और इशारा कर दिया है।सीबीआई भी अपनी जांच का दायरा व्यापक कर रही है ।प्रदेश में अलग अलग घोटालों के चलते अफसरों पर भी दबाव बढ़ रहा है । यह देश के किसी राज्य की पहली सरकार है जिसके ताकतवर नेता अपनी हत्या की आशंका जता रहे है ।
उत्तर प्रदेश में खाद्यान घोटाले के बाद का यह सबसे बड़ा घोटाला है जो २००५ से लगातार चल रहा था। राजनैतिक जानकारों का आकलन है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के नाम पर उत्तर प्रदेश को करीब पंदह हजार करोड़ रुपए मिले जिसमे से करीब चार हजार करोड़ रुपए की बंदरबांट नेता अफसर और ठेकेदारों के बीच हुई है। इसी धन की बन्दरबांट को लेकर प्रदेश के तीन बाद अफसरों की हत्या हुई और भी कई लोग अपनी हत्या की आशंका जता रहे है । क्योकि अगर यह जांच ढंग से आगे बढ़ गई तो कई बड़े भी घेरे में आएंगे ।
भाकपा नेता अशोक मिश्र ने कहा - इस सरकार की खासियत यह है कि पहले वह नेताओं से लेकर बाहुबलियों का इस्तेमाल करती है फिर उन्हें बहार का रास्ता दिखा देती है । कुशवाहा पहले मायावती के सबसे करीबी थे और पार्टी संगठन के लिए जो भी पैसा आता था सब उन्ही के जरिए आगे जाता था जिसे लेकर उनके सहयोगी मंत्री से लकर अफसर तक उनसे नाराज रहते थे । नसीमुद्दीन से कुशवाहा का छत्तीस का आंकड़ा बुंदेलखंड की राजनीति के वर्चस्व को लेकर भी था । यही वजह है आज जब कुशवाहा को बलि का बकरा बनया जा रहा है । इसी तरह बाहुबली बबलू सिंह से रीता बहुगुणा जोशी का घर फुकवाया और फिर उसे भी बाहर का रास्ता दिखा दिया । एक दो नहीं दर्जनों उदाहरण है । ऐसे में कोई भी डर सकता है ।
यह घोटाला दरअसल दो विभागों के बीच का भी था जिसमे परिवार कल्याण विभाग और स्वास्थ्य विभाग शामिल था । पैसा आता था परिवार कल्याण की दो तीन प्रमुख योजनाओं के नाम जिसमे स्वास्थ्य उपकरणों की खरीद ,प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना और जिला अस्पतालों की सुविधाओं का विस्तार पमुख था । परिवार कल्याण विभाग को आने वाला स्वास्थ्य मिशन का यह पैसा सीएमओ के जरिए खर्च होता था जबकि सीएमओ स्वास्थ्य विभाग के अधीन होते थे। बाद में कुशवाहा ने परिवार कल्याण विभाग के अलग सीएमओ बनवा दिय ताकि स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को इससे अलग किया जा सके । सारा विवाद यहाँ से शुरू हुआ और हैरानी की बात यह है कि जिन दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या हुई वे परिवार कल्याण विभाग के थे ।सूत्रों के मुताबिक इन लोगों से योजना का दस फीसद पैसा अग्रिम मांगा जाता था जो काफी बड़ी राशि होती थी। मसलन यदि किसी फसर को किसी योजना में पचास करोड़ दिया जाना है तो उसे पांच करोड़ का इंतजाम करना होता। पैसा न मिलने पर वसूली के दुसरे हथकंडे भी अपनाए जाते । इसी वजह से इस खेल में माफिया का भी दखल हुआ और तीन जाने जा चुकी है। ऐसे में आगे बढ़ती सीबीआई की जांच की आंच को लेकर ताकतवर नेता भी आशंकित हो रहे है । jansatta

मीडिया मालिक और संपादक खामोश हैं

अनिल चमड़िया
भारतीय प्रेस परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने कहा है कि मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए प्रेस परिषद के विस्तार और उसे ताकतवर बनाने की जरूरत है।इसके अलावा उन्होंने मीडिया के व्यवहार और मीडियाकर्मियों के बौद्धिक स्तर को लेकर भी अपनी राय जाहिर की है। इसे लेकर संपादकों की जमात बेहद नाराज है। काटजू ने मीडिया के व्यवहार से जुड़े कुछ तथ्य पेश किए हैं। इन्हीं तथ्यों के आधार पर उन्होंने परिषद को ताकतवर बनाने की मांग की है। मीडिया के मालिक और संपादक उन तथ्यों को लेकर खामोश हैं।
काटजू ने मीडिया के सामाजिक सरोकार से विचलन और उसके सांप्रदायिक चरित्र पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने उदाहरण के रूप में देश भर में अब तक हुए बम विस्फोटों की खबरों को लेकर मीडिया के रुख पर सवाल खड़े किए हैं। ‘देश भर में जहां कहीं बम विस्फोट की घटनाएं होती हैं, फौरन चैनल उनमें इंडियन मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत उल-अंसार जैसे संगठनों का हाथ होने या किसी मुसलिम नाम से इ-मेल या एसएमएस आने की खबरें चलाने लगते हैं। इस तरह चैनल यह जाहिर करने की कोशिश करते रहे हैं कि सभी मुसलमान आतंकवादी या बम फेंकने वाले हैं। इसी तरह मीडिया जानबूझ कर लोगों को धार्मिक आधार पर बांटने का काम करता रहा है। ऐसी कोशिशें राष्ट्रविरोधी हैं।’
इसमें दो राय नहीं कि आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिकता बढ़ाई गई है। देश में सांप्रदायिक दंगों का एक दूसरा रूप तैयार किया गया है। दंगे एक बार होते हैं, मगर उनका असर लंबे समय तक समाज पर रहता है। लेकिन बम विस्फोट की घटनाओं ने तो समाज में रोज-ब-रोज दंगों जैसे हालात पैदा कर दिए। मुसलमानों में जितनी असुरक्षा इस दौर में बढ़ी है वह शायद पचास वर्षों के दंगों में भी नहीं पैदा हुई होगी। इस बीच सरकारी तंत्र का भी एक नया रूप दिखाई दिया। हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकारी तंत्र के सांप्रदायिक चरित्र की तरफ इशारा किया था। उससे पहले उप-राष्ट्रपति हमीद अंसारी ने खुफिया एजेंसियों को किसी के प्रति जवाबदेह बनाने की वकालत की थी।
कई मौकों पर जाहिर हो चुका है कि प्रशासन तंत्र में जातिवादी और सांप्रदायिक पूर्वग्रह हैं। दंगों के दौरान भी उसकी भूमिका साफतौर पर अल्पसंख्यक विरोधी देखी गई है। यही बात मीडिया पर भी लागू होती है। मीडिया की वजह से दंगे भड़कने के पहलू पर कई शोध भी हुए हैं। लेकिन मीडिया ने सांप्रदायिकता को अपने विकास का आधार बनाए रखा है। बम विस्फोटों के बाद मुसलमानों के बीच आतंक फैलाने में मीडिया की भूमिका रही है। मुसलमानों से पहले सिखों की ऐसी ही छवि बनाई गई थी। जबकि खासतौर से मालेगांव की घटनाओं की विश्वसनीय जांच के बाद उसमें हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतों का हाथ पाया गया है। हैदराबाद में जिन्हें मुसलमान होने के कारण पकड़ा गया था उनसे राज्य सरकार ने माफी मांगने की भी पेशकश की।
काटजू ने मीडिया के लिए जिम्मेदार संस्था के अध्यक्ष के तौर पर मुसलमानों के साथ होने वाले अलोकतांत्रिक व्यवहार पर राय जाहिर की है। सांप्रदायिक तनाव को एक हद से ज्यादा बढ़ाने में जब कभी मीडिया की भूमिका दिखाई दी तो परिषद ने जांच समितियां गठित की। मसलन, अक्तूबर-नवंबर, 1990 में समाचार-पत्रों ने खबरों के जरिए सांप्रदायिक वातावरण बनाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया तो प्रेस परिषद ने एक जांच समिति बनाई थी। आरएसएस समर्थकों के नेतृत्व में उन्मादी भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बम विस्फोट की जितनी घटनाएं हुर्इं, उनमें मुसलमानों के हाथ होने की खबरें अंधाधुंध तरीके से प्रस्तुत की जाती रही हैं। अमेरिका में 26/11 के बाद तो जैसे भारत में विस्फोट की घटनाओं में मुसलिम आतंकवादियों को आरोपित करने की भूमंडलीय स्वीकृति-सी मिल गई।
मीडिया और पुलिस की एक सांप्रदायिक पृष्ठभूमि देखने को मिलती है। बम विस्फोटों के प्रचार से जो माहौल बना, उसमें इन दोनों के बीच खुले गठजोड़ का एक तर्क विकसित कर लिया गया। बम विस्फोट की घटनाओं के बाद मीडिया और पुलिस की भाषा में अंतर ही खत्म हो गया। मीडिया पुलिस सूत्रों और अपनी जांच में जो अंतर करती है वह खत्म हो गया। पुलिस की जांच को ही मीडिया ने अपनी जांच मान ली और पुलिस ने मीडिया को अपनी किसी भी तरह कार्रवाई और उस पर सहमति बनाने का माध्यम बना लिया। मीडिया ने किसी भी विस्फोट की अपने स्तर से जांच करने की कोशिश नहीं की। बल्कि आतंकवाद विरोधी दस्ते बम विस्फोट की घटनाओं और उनके आरोपियों को जिस तरह पेश करते रहे उन्हें व्यापक स्वीकृति दिलाने की मुहिम में मीडिया खूब सक्रिय रहा।
किसी विस्फोट के बाद पुलिस और आतंकवाद निरोधक दस्ते ने मुठभेड़ में किसी को मार गिराने के बाद जैसी सुर्खियां मीडिया को दीं, क्या उन्हें याद नहीं किया जाना चाहिए? आखिर क्या दबाव रहा मीडिया पर कि समाज में बढ़ती दूरियों की उसने परवाह करना जरूरी नहीं समझा। एक तथ्य तो यह मिलता है कि ऐसी घटनाओं को आम आपराधिक घटना की तरह मीडिया ने लिया और उन्हें आपराधिक मामलों के रिपोर्टरों के जिम्मे छोड़ दिया। सामाजिक-राजनीतिक रूप से संवेदनशील रिपोर्टरों को नहीं लगाया गया। बम विस्फोटों की रिपोर्टिंग किन परिस्थितियों में की गई, कैसे दबाव महसूस किए गए, इन पहलुओं पर एक समिति से जांच क्यों नहीं कराई जानी चाहिए? मुंबई में ताज होटल पर हमले की रिपोर्टिंग को लेकर काफी बहस हुई। इस पहलू पर भी बातें हुर्इं कि सुरक्षा बलों की जान खतरे में डाल कर रिपोर्टिंग नहीं की जा सकती। लेकिन जिस रिपोर्टिंग से सांप्रदायिक दंगों से ज्यादा भयावह असर दिखाई दे रहे हैं उस पर अध्ययन और बहस की कोई पहल क्यों नहीं होनी चाहिए?
दरअसल, ये सवाल काफी समय से उठते रहे हैं। काटजू ने उन सवालों पर बस अपनी मुहर लगाई है। मगर सवाल है कि क्या अपनी बेबाक राय जाहिर कर देना ही काफी है? मार्कंडेय काटजू को मीडिया के सांप्रदायिक चरित्र से निपटने और सामाजिक सरोकारों से लैश करने के लिए परिषद को और ताकतवर बनाने की जरूरत से पहले अपनी जिम्मेदारियों को फिर से परिभाषित करना चाहिए। दरअसल, मीडिया की ताकत जितनी बढ़ी है, उसमें परिषद के ताकतवर होने के लिए पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं के समर्थन की जरूरत है।
पेड न्यूज को लेकर परिषद ने पहल की थी और उसे चंद मीडिया मालिकों के दबाव में अपना रुख बदलना पड़ा था। प्रेस परिषद का रिश्ता पहले पाठकों-दर्शकों से है, लेकिन वह पाठकों की तरफ कभी मुखातिब नहीं होती है। उसके सारे कामकाज अंग्रेजी में होते हैं। पाठकों-दर्शकों की स्वतंत्रता ही मीडिया की स्वतंत्रता है। मगर मीडिया मालिक और पत्रकार दो अलग-अलग स्वतंत्रताओं पर जोर देते हैं। दूसरी बात कि मार्कंडेय काटजू सरकार को संबोधित करने में घबराए-से दिखते हैं। आखिर उन्होंने मीडिया की जैसी भूमिका की चर्चा की है, सरकार का उसे बढ़ावा देने का रुख रहा है। इसके राजनीतिक कारण भी हैं। सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए एक निगरानी विभाग बनाया है, उसकी क्या उपयोगिता साबित हुई है? जिस तरह से अवैज्ञानिक, अंधविश्वास और धोखाधड़ी को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम और विज्ञापन आते हैं, उनमें से कितनों को धंधे उठा लेने को बाध्य किया गया है? परिषद को एक स्वायत्त संस्था के रूप में सक्रिय दिखना चाहिए, वरना सरकारी भोंपू का विशेषण पाने में देर नहीं लगती!जनसत्ता

Saturday, November 19, 2011

कुशवाहा की बगावत से सांसत में मायावती



अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवंबर । मायावती सरकार और संगठन के सबसे ताकतवर राजनीतिक रहे बाबू सिंह कुशवाहा ने बगावत कर अपनी हत्या की आशंका जताई है।
जिन लोगों से कुशवाहा ने अपनी जान का खतरा बताया है उनमे मंत्री नसीमुद्दीन , कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर शामिल है । मुख्यमंत्री के नाम लिखे इस पत्र की प्रतिलिपि प्रधानमंत्री ,राज्यपाल ,चीफ जस्टिस और सीबीआई निदेशक को भी भेजी गई है। अख़बारों के दफ्तरों को फैक्स से भेजे इस पत्र के सामने आते ही राजनैतिक माहौल गरमा गया । विधान सभा सत्र से दो दिन पहले ही कुशवाहा की बगावत मायावती सरकार की लिए संकट पैदा कर सकती है।फिलहाल बसपा ने कुशवाहा की आशंका को गलत बताते हुए उनसे पल्ला झाड़ लिया है।
मायावती सरकार के ताकतवर मंत्री रहे कुशवाहा का नाम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ( एनआरएचएम ) घोटाला में आने के बाद उनसे इस्तीफा ले लिया गया था । उस समय दो मंत्रीयों अंतु मिश्र और बाबू संघ कुशवाहा का नाम आया था जिसके बाद दोनों से इस्तीफा ले लिया गया । पर अब यह घोटाला मायावती सरकार के गले की हड्डी बनता जा रहा है । अरबों के इस घोटाले में तीन अफसरों की हत्या हो चुकी है इस घोटाले इस घोटाले का दायरा बढ़ता जा रहा है और इसी घोटाले को लेकर दो सीएमओ और एक डिप्टी सीएमओ की हत्या की जांच में सीबीआई के निशाने पर भी कुछ राजनीतिक भी आ चुके है। मायावती अपनी पार्टी के करीब पचास विधायक और मंत्रियों का टिकट काट चुकी है ,ऐसे में कुशवाहा की बगावत बसपा के लिए नई चुनौती बनकर सामने आई है । कुशवाहा ने न सिर्फ ताकतवर मंत्री नसीमुद्दीन का नाम लिया है बल्कि मंत्रिमण्डलीय सचिव शशांक शेखर सिंह और प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर से जान का खतरा भी बताया है। यह तीनो नाम उत्तर प्रदेश में सरकार का पर्याय भी माने जाते है ।
बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने कुशवाहा के लिखे पत्र पर हैरानी जताई । उन्होंने कहा कि कुशवाहा का कथित पत्र अभी मुख्यमंत्री को तो प्राप्त नहीं हुआ है, पर इससे पहले ही मीडिया को यह पात्र मिल गया जिससे साबित हो गया है कि कुशवाहा अपनी पेशबन्दी में लगे हैं।
मौर्य ने कहा कि कुशवाहा काफी दिनों से पार्टी से जुड़े रहे और सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। उन्होंने कहा कि सरकार में मंत्री रहते हुए उन्हें मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, मंत्रिमण्डलीय सचिव शशांक शेखर सिंह तथा प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेह बहादुर से जान का कोई खतरा नहीं था और इन्होंने उनके साथ काफी दिनों तक काम किया। जब वे मंत्रिपरिषद से बाहर हुए तब भी काफी लम्बे समय तक इन्हें कोई खतरा नजर नहीं आया। लेकिन अचानक पिछले कुछ दिनों से श्री कुशवाहा को इन लोगों से जान का खतरा कैसे नजर आने लगा, यह आश्चर्य की बात है।
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि उन्हें मीडिया से जानकारी मिली है किकुशवाहा की जांच लोकायुक्त द्वारा आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में की जा रही है। इसके अलावा उच्च न्यायालय में भी उनके सम्बन्ध में एक जनहित याचिका विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि कुशवाहा जब चारो तरफ से कानून के शिकंजे में घिर गये हैं, तो लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस प्रकार की ड्रामेबाजी पर उतर आये हैं। मौर्य ने कहा कि पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते स्पष्ट तौर पर उनके स्तर से यह साफ किया जाता है कि कुशवाहा अब न तो पार्टी के सक्रिय सदस्य हैं और न ही पार्टी के किसी कार्यक्रम या आयोजन में इनकी कोई भूमिका ही होती है। इसीलिए कुण्ठाग्रस्त होकर वे बेबुनियाद आरोप लगाकर अपने सहकर्मियों एवं शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को बदनाम करने की घिनौनी हरकत कर रहे हैं।प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि कुशवाहा को इस प्रकार की हरकत से बचना चाहिए था। उन्होंने कहा कि श्री कुशवाहा को लोकायुक्त के विचाराधीन अपने आय से अधिक मामले पर तथा उच्च न्यायालय में दाखिल पीआईएल पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सहयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुशवाहा को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जिससे उनसे पार्टी के लोग आक्रोशित हों।jansatta

Friday, November 18, 2011

संघ परिवार का परिवारवाद


अंबरीश कुमार
लखनऊ, नवंबर।कंग्रेस के परिवारवाद को लेकर निशाना साधने वाला अब संघ परिवार अब संगठन के परिवारवाद में उलझ गया है। संगठन के पुराने कार्यकर्त्ता अब भाजपा में परिवार वालों के लिए टिकट मांग रहे है। जबकि इसी हथियार का इस्तेमाल संघ कांग्रेस को घेरने के लिए करता रहा है ।
गुरूवार को ही अयोध्या में विनय कटियार ने कहा था कि काग्रेस मृतक आश्रित कोटे की पार्टी है । इससे पहले उमा भारती ने कसया में परिवारवाद को बड़ा खतरा बताया था तो लालकृष्ण आडवानी ने भी गुरुवार को ही वंशवाद को लोकतंत्र के लिए बड़ा ख़तरा बताया । जबकि वंशवाद का विरोध करने वाली यह पार्टी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पीछे छोड़ रही है । संघ के कार्यकर्त्ता और भाजपा के आधा दर्जन से ज्यादा बड़े नेताओं ने अपनी दूसरी पीढी के लिए टिकट मांगा है । इन नेताओं में पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद राजनाथ सिंह ,पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी ,सांसद लालजी टंडन ,ओमप्रकाश सिंह ,सत्यदेव सिंह ,प्रेमलता कटियार आदि शामिल है । यह तो बड़े नेता है अब इसी तर्ज पर जिलों में भी पुराने नेता अपनी अगली पीढी के लिए टिकट मांग रहे है ।
वंशवाद को लेकर अब राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ यानी आरएसएस भी अपनों के निशाने पर है जो कांग्रेस के वंशवाद पर हमला करता रहा है खासकर नेहरु-गांधी परिवार पर। संघ के प्रचारक इसी वंशवाद से दूर रहने के लिए पहले बिना शादी विवाह भूजा खाकर देश के दूर दराज इलाकों में जीवन गुजार दिया करते थे पर अब हालत बदल गए है। संघ के प्रचारकों ने भी न सिर्फ परिवार बनाना शुरू किया बल्कि परिवार की राजनैतिक प्रगति के लिए पार्टी पर दबाव भी बना रहे है। जितने बाद नेताओं के नाम ऊपर दिए गए है वे सभी अपने को संघ का खांटी प्रचारक मानते रहे है पर अब बेटे बेटी के लिए टिकट भी मांग रहे है । इस मामले में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पिछड़ रही है । उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के जिन प्रमूख नेताओ के परिवारवालों को टिकट मिला है उनमे प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के भाई और सांसद हर्षवर्धन व जगदंबिका पाल के पुत्र शामिल है। पर भाजपा में यह सूची लंबी है ।
आधा दर्जन बड़े नेता अपने पुत्र पुत्री के लिए जहाँ विधान सभा टिकट के लिए पार्टी पर दबाव बना रहे है वही उनकी देखादेखी दूसरी कतार के नेता और जिलों के नेता अपने परिवारवालों के लिए टिकट मांग रहे है । कुछ दिवंगत नेताओं के परिवारवालों ने भी टिकट मांगा है । नेताओं ने अपने परिवार को किस तरह आगे बढाया है इसकी बानगी भी देखने वाली है । लखनऊ के भाजपा विधायक सुरेश तिवारी ने अपने पुत्र को भाजपा युवा मोर्चे का मंत्री बनवा दिया है तो दुसरे विधायक विद्या सागर गुप्त ने अपने पुत्र को लघु उद्योग प्रकोष्ठ का संयोजक बनवा दिया है।दोनों विधायकों के पुत्र टिकट के मजबूत दावेदार है। लालजी टंडन तो अपने पुत्र के लिए पिछली बार बागी तक हो गए थे । ऐसे में विनय कटियार की भाजपा भी पैत्रिक कोटे वाली पार्टी बनती नजर आ रही है। jansatta

Wednesday, November 16, 2011

श्रेय लेंगी मायावती और बदनाम होंगे मुलायम !


अंबरीश कुमार
लखनऊए नवंबर।उतराखंड राज्य की मांग को लेकर ज़ब आंदोलन चल रहा था तो उस समय प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकार थी जिसने आंदोलन को दमनात्मक तरीके से कुचला था। जब यह मामला उठा तो जो जांच के लिए जो टीम गई उसने उत्तर प्रदेश सरकार को क्लीन चिट दी ,इस टीम की एक सदस्य थी उत्तर प्रदेश की मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ।पर आज बुधवार को मुख्यमंत्री मायावती ने कहा -उत्तराखंड राज्य के गठन की मांग को लेकर दिल्ली में धरना.प्रदर्शन करने के लिए जा रहे लोगों पर 1 या 2 अक्टूबर 1994 की रात में रामपुर तिराहे (मुजफरनगर) पर की गई पुलिस फायरिंग में अनेक निर्दोष लोग मारे गए थे। उस समय उत्तर प्रदेश में सपा नेता मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। इसके विपरीत बसपा पहली पार्टी थी। जिसने उत्तराखंड राज्य के गठन के प्रस्ताव का सबसे पहले समर्थन किया था। इसी के साथ मायावती ने उत्तर प्रदेश के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और भाजपा की भी खबर ली है । समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा -मायावती आज भी प्राइमरी शिक्षक के आगे नहीं बढ़ पाई है।वे जिस सरकार में शामिल थी उसी सरकार के समय रामपुर कांड हुआ था और वे भी जांच दल में शामिल थी जिसने क्लीन चिट दी थी। अब वे छोटे राज्य की बात कर रही है । यह बानगी है उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति की जिसने बिना मांगे प्रदेश को बांटने का खेल किया है । समूचे प्रदेश में किसी नए राज्य के लिए न कही धरना हो रहा ,न प्रदर्शन और न अनशन फिर भी तीन राज्यों का नक्शा बना दिया गया तो अवध राज्य मुफ्त में इस पैकेज में आ गया है।
कल मायावती ने राज्य के बंटवारे का प्रस्ताव कैबिनेट से पास कराकर अपनी पीठ खुद थप थपाई तो आज सारी जिम्मेदारी कांग्रेस पर दल कर समाजवादी पार्टी को भी इस खेल में फंसाने का प्रयास किया । मायावती ने बुधवार को जो कहा है उसका लब्बोलुआब यह है कि राज्य के गठन का काम तो केंद्र सरकार का है इसमे राज्य सरकार की कोई भूमिका ही नहीं है चाहे वह विधान सभा में कोई प्रस्ताव लाए या न लाए । मायावती इस मामले में गेंद केंद्र सरकार के पाले में फेंक कर जहाँ कांग्रेस को फंसा रही है वही मुख्य मुकाबले की पार्टी सपा की घेरेबंदी करना चाहती है । ताकि इसका चुनावी लाभ मायावती को मिले और विरोध कर फंसे मुलायम । मायावती ने आज कहा -उप्रदेश को चार नए राज्यों में पुनर्गठित करने के लिए उनकी सरकार को मंत्रिपरिषद व विधानमंडल में कोई प्रस्ताव पारित कराने की संवैधानिक बाध्यता नहीं थी। क्योंकि भारत के संविधान के मुताबिक ऐसा विधेयक लाने का अधिकार पूरी तरह से केंद्र सरकार के पास ही है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र की यूपीए सरकार यदि प्रदेश का विकास चाहती तो वह संवैधानिक प्रक्रिया को अपनाकर केंद्रीय कैबिनेट से इस आशय के विधेयक का मसौदा पारित करवाकर उसे महामहिम राष्ट्रपति को भेजती व विधेयक को संसद में प्रस्तुत किए जाने की संस्तुति भी उनसे प्राप्त करती।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्राविधान नहीं है जिसके तहत राज्य के पुनर्गठन की कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए संबंधित विधान मंडल का प्रस्ताव आवश्यक हो। संविधान के अनुच्छेद.3 में यह व्यवस्था है कि संसद में प्रस्तुत किए जाने से पहले महामहिम राष्ट्रपति की पुनर्गठन विधेयक पर संबंधित राज्य के विधान मंडल की राय निर्धारित समयावधि में प्राप्त कर ली जाएगी। केंद्र के इस दिशा में कोई कार्यवाही न किए जाने पर अफसोस जताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मई 2007 में बसपा की सरकार बनने के फौरन बाद वे प्रधानमंत्री से प्रदेश का पुनर्गठन करने के लिए लगातार लिखित अनुरोध करती रही थीं। केंद्र सरकार ने साढ़े चार वर्ष से भी अधिक अवधि बीत जाने के बावजूद जब कोई कार्यवाही नहीं की गई तो फिर मुख्यमंत्री की पहल पर केंद्र सरकार पर दबाव डालने के लिए प्रदेश सरकार ने पुनर्गठन संबंधी प्रस्ताव को राज्य विधानमंडल में 21 नवम्बर को रखने का फैसला मजबूरीवश लिया। पुनर्गठन संबंधी अपनी सरकार के फैसले पर विपक्षी पार्टियों के रवैये को पूरी तरह गलत व विकास विरोधी बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसे आगामी विधान सभा चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि प्रस्ताव कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। विधान मंडल का प्रस्ताव केंद्र सरकार पर दबाव डालने में मददगार साबित होगा। इसलिए विपक्षी पार्टियों का राज्य सरकार के इस फैसले को आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़कर देखना पूरी तरह गलत है और इस मामले में विपक्षी नेताओं के सभी आरोप बेबुनियाद हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि दिग्विजय सिंह का दिया गया बयान कि कांग्रेस पार्टी पुनर्गठन का स्वागत करती है और उनका यह भी कहा जाना कि वे केंद्र सरकार से अनुरोध करेंगे कि स्टेट री.आर्गनाइजेशन कमीशन बनाए साफ कर देता है कि कांग्रेस की कथनी और करनी में काफी अंतर है और यह पार्टी राज्य के पुनर्गठन को लेकर बहानेबाजी कर रही है। उन्होंने कहा कि सिंह का स्वागत संबंधी बयान पूरी तरह भ्रामक है क्योंकि स्टेट री.आर्गनाइजेशन कमीशन की इस मामले में न तो कोई आवश्यकता है और न ही संविधान के अनुच्छेद 3 और 4 के तहत कोई कानूनी बाध्यता। मायावती ने कहा कि स्टेट री.आर्गनाइजेशन कमीशन की बात करके दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस पार्टी की मानसिकता उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन के विपरीत है और वह तेलंगाना राज्य ही की तरह इस मामले को भी लटकाना चाहती है। कांग्रेस पार्टी किसी भी प्रकार से यह नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड, पूर्वांचल अवध पश्चिम के भागों में किसी भी प्रकार की तरक्की हो।

jansatta