Sunday, October 1, 2017

गांधी के गांव में एक दिन

अंबरीश कुमार सेवाग्राम (वर्धा), अक्टूबर। महात्मा गांधी की कुटिया के आगे खड़े हुए तो आजादी की लड़ाई का दौर याद आ गया। जिसके बारे में हमने सुना था या पढ़ा था। इस आश्रम को महात्मा गांधी ने नया केन्द्र तब बनाया जब वे १९३४ की मुंबई कांग्रेस में अपना प्रस्ताव नामंजूर हो जने की वजह से नाराज हुए। महात्मा गांधी ने तब कांग्रेस पार्टी के संविधान में वैधानिक और शांतिपूर्ण शब्द की जगह सत्य और अहिंसा रखने का प्रस्ताव किया था। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। जिसके बाद नाराज गांधी ने वर्धा के इस आश्रम में आकर रहना शुरू किया। इसी आश्रम में एक कुटिया के भीतर लकड़ी का बड़ा बक्सा रखा है जिसमें सांप रखे जते थे। पता चला कि अहिंसा के चलते गांधी जी की हिदायत थी कि सांप भी मारे नहीं जएंगे, उन्हें पकड़कर इस बक्से में रखा जएगा और बाद में जंगल में छोड़ दिया जएगा। गांधी का अहिंसा का यह दर्शन आतंकवाद के नए दौर में फिर प्रासंगिक नजर आ रहा है। हालांकि १९३४ की मुंबई कांग्रेस में कांग्रेस ने गांधी के प्रति पूर्ण आस्था का प्रस्ताव भी पास किया था। गांधी कांग्रेस से नाराज हुए पर कांग्रेस के दिग्गज नेता उनकी शरण में ही रहे। आतंकवाद के इस दौर में बापू की अहिंसा फिर एक बड़ा राजनैतिक हथियार साबित हो सकती है। इतिहासकार प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने कहा,‘जिस अहिंसा के लिए महात्मा गांधी ने कांग्रेस से नाराज हो वर्धा के मदनवाड़ी आश्रम को अपना नया केन्द्र बनाया, उसने समूचे देश की राजनीति बदल दी। यह बात अलग है कि कांग्रेस पार्टी ने आज तक अपने संविधान में गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रस्ताव को शामिल नहीं किया। आज कोई सोच भी नहीं सकता कि राज्य अहिंसक हो सकता है पर यदि इसे एक बार फिर से अपनाया जए तो आतंकवाद का मुकाबला किया ज सकता है।’ सेवाग्राम के आश्रम में हम वहां खड़े थे जहां कभी महात्मा गांधी सूर्य स्नान किया करते थे। दाहिने हाथ गांधी की कुटिया थी। कुटिया के भीतर गांधी की बैठक जिसमें जमीन पर चटाई बिछी थी। बगल में लकड़ी की वह चौकी थी जिस पर वह सोते थे। यह कुटिया गांधी की सादगी भरी अलग जीवन शली को दर्शाती थी। उनका छोटा पर साफ-सुथरा बाथरूम जिसमें अखबार, पत्र व पत्रिकाएं रखने की भी जगह थी। वे समय का पूरा सदुपयोग करते हुए जरूरी पत्रों तक को वहां पढ़ा करते थे। कुटिया से बाहर निकलने पर सामने घने छायादार वृक्ष नजर आते हैं जो गांधी जी के उस दौर की याद दिलाते हैं। सुबह के दस बजे भी सेवाग्राम परिसर में सन्नाटा पसरा नजर आता है। नागपुर से करीब घंटे भर बाद हम आश्रम पहुंचे तो पता चला कि आजदी के आंदोलन की अलख जगाने वाले महात्मा गांधी के आश्रम में न तो महाराष्ट्र से कोई नेता सुध लेने आता है और न राष्ट्र से। नागपुर के सामाजिक कार्यकर्ता बाबा डाबरे ने कहा,‘यहां यदा-कदा ही कोई बड़ा नेता आता है। आमतौर पर नागपुर आने वाले या फिर नागपुर से गुजरने वाले पर्यटक तक इधर नहीं आते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि राज्य सरकार ने इसे कोई तवज्जो तक नहीं नहीं दी है। नई पीढ़ी को तो ऐसी जगहों को दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया जना चाहिए। यह हमारे इतिहास का स्वर्णिम क्षेत्र रहा है।’ चेन्नई में हमने द्रमुक के संस्थापक अन्नादुरै का स्मारक देखा है जहां हमेशा भीड़ लगी रहती है और उनके समर्थक महिला पुरूष समाधि स्थल के आसपास दंडवत नजर आते हैं। दक्षिण के दलित आंदोलन के महानायक के प्रति लोगों की आस्था कोई भी मरीना समुद्र तट पर जकर देख सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के इस आश्रम में आज बहुत कम लोग नजर आते हैं। गांधी ने यहां १२ साल गुजरे। यहां से जब वे नोवाखाली के सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए निकले तो फिर लौट कर नहीं आए। इससे पहले इसी आश्रम में पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मुहम्मद अली जिन्ना तक उनसे विचार विमर्श के लिए आते-जते रहे। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म का वह दृश्य याद आता है जिसमें नेहरू और जिन्ना महत्वपूर्ण विषय को लेकर गांधी से चर्चा करना चाहते हैं पर गांधी सहज भाव से बकरी को पो खिलाते नजर आते हैं। महात्मा गांधी की उस जीवन शली को इस आश्रम में आकर कोई भी महसूस कर सकता है। सेवाग्राम के बारे में यह भी कहा जाता है गाँधी वर्धा के इस गावं में ३० अप्रैल १९३६ की सुबह करीब 5 बजे पहुचे थे। साथ थी बा। उन्होंने गावं वालो से बसने की चर्चा की और इजाजत मांगी .पहले इस गावं का नाम सेगावं था जहा एक पगडण्डी आती थी .पोस्ट ऑफिस नही था और साथ ही एक दूसरे गावं का नाम सेगावं था .इस वजह से गांधी जी ने इसका नाम सेवाग्राम रखाबाद में १९४० से यह सेवाग्राम के नाम से जाने लगा.जब गांधी यहाँ आए तो वे ६७ साल के थे .तब यह इलाका साँप और बिचू के चलते बदनाम भी था. सेवाग्राम के इस आश्रम में मिले सीता राम राठौर ने कहा,‘आए दिन बम फट रहे हैं और देश का नौजवान बंदूक उठाकर हिंसा के रास्ते पर चल रहा है। ऐसे में फिर उस संत की याद आती है जिसने अहिंसा का रास्ता पूरी दुनिया को दिखाया। आज के समय में महात्मा गांधी ज्यादा प्रासंगिक हैं जिनके मूल्यों को लेकर समाज में नई पहल की ज सकती है।’ महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के साठ साल पूरे हो चुके हैं और देश आतंकवाद की नई चुनौती ङोल रहा है। ऐसे में वर्धा का यह आश्रम अंधेरे में एक चिराग की तरह नजर आता है।02 October 2008

Wednesday, September 27, 2017

बार नवापारा जंगल का डाक बंगला

अंबरीश कुमार बारह नवंबर की सुबह रायपुर के सर्किट हाउस में नाश्ता कर ही रहा था कि अनिल चौबे आ गये. सर्किट हाउस की कैटरिंग इंडियन काफी हाउस संभालता है इसलिये खानपान पर दक्षिण भारतीय असर ज्यादा रहता है. इडली डोसा का भारी नाश्ता किया क्योंकि दिन भर जंगल में रहना था. बारनवापारा वन्य जीव अभ्यारण्य के बीच जंगलात विभाग के उस डाक बंगले की फोटो लेनी थी जो करीब डेढ़ सौ साल पुराना है. उसी वजह से यह यात्रा कर रहा था. उसके बाद उदंती वन्य जीव अभ्यारण्य के तौरंगा डाक बंगले की तरफ जाना था. दरअसल उन डाक बंगलों पर एक काफी टेबल बुक का मन बना है जो सौ साल से ज्यादा पुराने हैं और जहां मैं रुक चुका हूं. पुराने सहयोगी पत्रकार राजकुमार सोनी से पहले ही कहा था कि इन दोनों जगहों पर जाना है इसलिए वे न सिर्फ साथ चलेंगे बल्कि इन जगहों पर ठहरने की व्यवस्था भी करा कर रखेंगे. यह इसलिए क्योंकि बरसात के बाद वन्य जीव अभ्यारण्य नवंबर के पहले हफ्ते में ही खुलते हैं और सैलानियों की भीड़ भी होती है. अगर पहले से बुकिंग न हो तो रात में रुकने में दिक्कत हो सकती है. हालांकि रायपुर में बारह तारीख को ही दिन में मुख्यमंत्री रमन सिंह से मुलाकात का समय तय था पर देर रात ही अनिल चौबे ने उसे आगे बढ़ा देने के लिए कह दिया था. खैर नोटबंदी के बाद का यह तीसरा दिन था और रायपुर एयरपोर्ट पर खुद अल्लू चौबे गाड़ी लेकर आ गये थे इसलिए दिक्कत नहीं हुई. दो हजार के कुछ नोट थे जिन्हें बचा कर रखे हुए था. काफी हाउस का बिल भी स्वाइप मशीन से चुकता किया. अब जंगल में तो यह सब चलने वाला नहीं था. सोनी को घर से लेकर महासमुंद की तरफ बढे तो सड़क बदली हुई नजर आयी. नवंबर के दूसरे हफ्ते में हलकी ठंड तो थी पर चढ़ते सूरज के साथ ठंड कम होती जा रही थी. शहर से निकलते ही मुझे लखौली में सिंचाई विभाग का वह डाक बंगला ध्यान आया जिसमें हर रविवार अपनी मंडली जुटती थी. ग्यारह की शाम रायपुर प्रेस क्लब ने खुद ही मेरी यात्रा संस्मरण पर आधारित पुस्तक घाट घाट का पानी का विमोचन कार्यक्रम रखा था. इस कार्यक्रम में राजकुमार सोनी ने भी इस डाक बंगले में उन दावतों का जिक्र किया जो मैं रायपुर में जनसत्ता का छतीसगढ़ संस्करण निकालने के बाद दिया करता था. उस मंडली में अपने बंगाली साथी प्रदीप मैत्र जो उन दिनों हिंदुस्तान टाइम्स के ब्यूरो चीफ हुआ करते थे वे तो रहते ही साथ ही ओडिशा के रहने वाले पीटीआई के प्रकाश होता भी जरुर होते. इनके अलावा कई और मित्र भी. छतीसगढ़ में ताल तालाब बहुत हैं और रोहू काफी होती है इसलिए हम सब भी इसके मुरीद थे. पर अल्लू चौबे ने बताया कि वह निकल चुका है. तभी फल बेचती एक महिला दिखी तो गाड़ी रुकवा ली. ताजे अमरुद और सेब ले लिए. दोनों एक ही भाव थे सौ रूपये किलो. दोपहर में कुछ न मिले तो इससे काम चल जायेगा यह सोच कर ले लिया था. गाड़ी से बाहर निकले तो हल्की ठंड का अहसास हुआ. यह नयी बनी चार लेन की सड़क मुंबई कोलकाता राजमार्ग संख्या छह थी जो ओडिशा के संबलपुर भुवनेश्वर होते हुए कोलकाता की तरफ जाती है. रायपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर पिथौरा से हमें मुड़ना था. सड़क के दोनों और नये लगे पेड़ अब जंगल जैसे लगने लगे थे. पिछली बार जब इस वन्य जीव अभ्यारण्य में आया था तो बहुत कम पेड़ थे. जाहिर है कि ये बाद में लगाये गये थे. दूर तक जाते ये जंगल अच्छे लगते हैं. पिथौरा आया तो मुख्य सड़क से बारनवापारा अभ्यारण्य के लिये मुड़े ही थे कि गायों का झुंड सामने आ गया. कुछ देर बाद ही आगे बढ़ पाये. इस बीच सोनी से पूछा कि बारनवापारा के डाक बंगले में रुकने के लिए बुकिंग करा ली है तो बात कर उन्हें सूचित कर दें कि हम लोग घंटे भर में पहुंच जायेंगे. इसके आगे मोबाइल मिलना मुश्किल होगा. सोनी ने जंगलात विभाग के किसी अफसर से बात कर बताया कि वहां सूचना जा चुकी है. करीब आधे घंटे बाद हम बारनवापारा अभ्यारण्य के तेंदुआ द्वार तक पहुंच चुके थे. यहां से प्रवेश का परमिट मिलता. गेट पर पता चला कि उनके पास कोई संदेश भीतर के अतिथि गृह से नहीं आया है इसलिये परमिट नहीं मिलेगा. दूसरे यहां मोबाइल काम नहीं करता इसलिये रायपुर से किसी संपर्क भी नहीं हो सकता. गेट पर बैठे गार्ड को बताया गया कि हम लोगों की बुकिंग है पर वह सुनने को तैयार ही नहीं. खैर कुछ देर की जद्दोजहद के बाद प्रवेश मिला तो वहां नकद देना था और कोई स्वाइप मशीन भी नहीं. मेरे पास कुछ छुट्टा था इसलिए दिक्कत नहीं आयी. भीतर प्रवेश करते ही दोनों तरफ घने जंगल और बीच से सीधी गुजरती कच्ची सड़क थी. साल,सागौन, सरई, साजा, महुआ से लेकर हर्र बहेड़ा तक. यह घना जंगल था. हर कुछ दूरी पर बार अभ्यारण्य की दूरी दिखाते साइन बोर्ड लगे थे जिसपर हिरन, सांभर,चीतल से लेकर बाघ तक की फोटो लगी हुई थी. कुछ देर बाद ही हम बारनवापारा पर्यटक ग्राम के चीतल रेस्तरां पहुंच चुके थे. यह जंगल के बीच सैलानियों के ठहरने के लिए जंगलात विभाग का रिसार्ट था जिसे कुछ साल पहले ही बनाया गया था. इसमें काफी पर्यटक रुक सकते हैं और रेस्तरां में खाने का अच्छा इंतजाम है. कुछ देर में ही जंगलात विभाग के स्थानीय प्रभारी संजू निहलानी आ गये और उन्होंने बताया कि हम लोगों के रुकने की व्यवस्था का संदेश मिल चुका था पर संचार व्यवस्था गड़बड़ा जाने की वजह से गेट पर जानकारी नहीं दी जा सकी थी जिसके लिये खेद भी जताया. यह रिसार्ट निहलानी के दिमाग की ही उपज थी जिसे शुरू हुये तीन साल हुआ है . इस साल यह करीब चौहत्तर लाख रुपये की कमाई करने जा रहा है. इस परियोजना पर राज्य सरकार ने करीब पांच करोड़ खर्च किये थे जिसकी भरपाई इस साल ही हो जाने की उम्मीद है. यहां रौशनी की व्यवस्था सौर उर्जा से की गयी है इसलिए बिजली आने जाने की कोई समस्या नहीं है. काटेज काफी भव्य बनाये गये हैं और उनके चारों तरफ सजावटी पेड़ पौधे और फूल भी लगाये गये हैं. शाम होते ही पक्षियों और जानवरों की आवाज सुनाई पड़ने लगती हैं. पर्यटक ग्राम से हम खाना खाकर निकले तो फारेस्ट विभाग के डाक बंगले में पहुंच गये. इस डाक बंगले का दो साल पहले कायाकल्प किया गया है जिसके बाद यह अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हो चुका है. इस डाक बंगले में करीब सौ साल पहले के उन अंग्रेज अफसरों का फोटो भी लगाया गया है जो मध्य प्रदेश के इस अंचल में तैनात थे. उनका ब्यौरा भी दिया गया है. इस डाक बंगले में करीब डेढ़ दशक पहले रुका था. दीपावली के ठीक बाद की बात है. चारों तरफ साल के सूखे पत्तों से घिरे इस डाक बंगले में डेक्कन हेरल्ड के साथी अमिताभ के और अपने परिवार के साथ देर शाम पहुंचा था क्योंकि जंगल के बीच से गुजरने वाली कच्ची सड़क बहुत ख़राब थी. तब आसपास कोई घर भी नहीं था. इस डाक बंगले में पहुंच कर बैठे ही थे कि एक बुजुर्ग खानसामा चाय लेकर हाजिर हो गया. उसने रात के खाने के बारे में पूछा तो उसे बता दिया गया. तीन बच्चे और चार वयस्क थे जिनमें ज्यादातर शुद्ध शाकाहारी. मुझे और अमिताभ को छोड़कर. तब यह डाक बंगला किसी पुरानी रहस्य रोमांच वाली फिल्म के सेट जैसा लग रहा था. डाक बंगला का वास्तुशिल्प भी देश भर में एक जैसा ही होता है. सामने बरामदा. भीतर जाते ही भोजन कक्ष जिसमें बैठने के लिए बड़े सोफे भी होते हैं और फायर प्लेस यह बताता है कि जाड़ों में इस जंगल में बिना आग तापे रहना मुश्किल होता है. इसी भोजन कक्ष से दो सूट अगल बगल जुड़े रहते हैं. रसोई करीब पचास फुट पीछे की तरफ होती है. सभी डाक बंगलों का वास्तुशिल्प ऐसा ही होता है चाहे उतराखंड का चकराता हो या फिर मध्य प्रदेश का बैतूल. उस दौर में इस डाक बंगले में लालटेन की रौशनी में बैठना पड़ा. पुराने ढंग का फर्नीचर और पलंग था. खिड़की के एक दो शीशे टूटे हुए थे जिनपर दफ्ती लगा कर रखा गया था. चौकीदार ने बता दिया था कि सावधानी बरतनी चाहिये क्योंकि जंगली जानवर के साथ सांप भी निकल आते हैं. कुछ समय पहले बरसात भी हो चुकी थी इसलिए सावधानी जरुरी थी. घने जंगल के बीच इस पुराने डाक बंगले में जानवरों की आवाज सुनाई पड़ रही थी. कुछ देर बाद हम सभी समय काटने के लिए पीछे बने रसोई घर में चले गये जहां खाना तैयार हो रहा था. लकड़ी से जलने वाले चार चूल्हों पर खाना बन रहा था. इस बीच एक आदिवासी महुआ की पहली धार वाली मदिरा ले आया जिसकी मांग अमिताभ ने की थी. उनका दावा था यह किसी भी स्काच से बेहतर होती है और आदिवासी इसी का नियमित सेवन करते हैं. मैं उस बुजुर्ग खानसामा दशरथ से बात करने लगा जो खड़े मसाले भून रहा था. भूनने के बाद उसे सिलबट्टे पर पीसना था. वह बताने लगा कि इस डाक बंगले से उसका संबंध साठ साल से ज्यादा का है. उसके पिता भी यहीं पर खानसामा थे. उस दौर में इस डाक बंगले की कई कहानियां सुनाई जाती थीं. अंग्रेजो के दौर में यह अफसरों का पसंदीदा शिकारगाह हुआ करता था. वे अफसर तीन चार दिन तक रहते और शिकार होता. तीतर बटेर ,जंगली मुर्गे ,हिरन से लेकर जंगली सूअर तक बनता. आजादी के बाद भी कई सालों तक शिकार होता रहा. यहां आना मुश्किल होता था इसलिए बहुत कम अफसर आते थे. अपने साजो सामान के साथ. इस जंगल में बहुत से पक्षी हैं. जंगली मुर्गा, पटकी, रगार, काला बगुला, किलकिला, ब्राह्मणी चील, लालमुनिया, हरेबा, गिद्ध, सिल्ही, अंधा बगुला, तीतर, बटेर, कठफोड़वा, किंगफिशर आदि. पर ज्यादातर जंगली मुर्गा ही इनके हत्थे चढ़ता. खैर अब न शिकारी रहे न शिकार की परम्परा. पर विकल्प में आसपास खासकर बफर जोन के गांवों से देसी मुर्गे आ जाते है. कान्हा वन्य जीव अभ्यारण्य में भी देसी मुर्गों का ज्यादा प्रचलन है और हर होटल या रिसार्ट में आसानी से उपलब्ध हो जाता है. अल्लू चौबे ने यहां भी उसका इंतजाम कर रखा था. पर रात में खाना खाने निकले तो एक बड़ा बिच्छू अनिल चौबे के पैर के नीचे आ गया. चप्पल पहने थे इसलिए बच गये. पर दहशत ऐसी की रसोई तक जाकर लौट आये. खाना कमरे पर ही देने को कह दिया. इससे पहले तीसरे पहर जंगल में निकले तो जिप्सी से इतने हिचकोले लगे कि बैठना मुश्किल हो गया. यह जंगल भी जंगल जैसा है. हर चार कदम पर जिप्सी के आसपास बड़ी मकड़ी का कोई न कोई जाला आ जाता. सूरज उतर रहा था. कही धूप कही छाया थी. जंगल के सामने के एक हिस्से में तालाब पर सूरज की रौशनी चमक रही थी. तालाब के एक तरफ घोस्ट ट्री यानी भुतहा पेड़ था. इस पेड़ की सुनहरी शाखायें पत्तियां गिरने के बाद भुतही नजर आती हैं, ऐसा साथ चल रहे फारेस्ट गार्ड ने बताया. सामने एक गोल पत्थर पर बैठी किंगफिशर की फोटो लेने के लिए कैमरा निकाला तो दोनों साथी फोटो खिंचने की मुद्रा में आ चुके थे. यह जंगल जानवरों से भरा हुआ है. इस तालाब पर शाम होते होते कई जानवर पानी पीने आते हैं. पर उस दिन कुछ परिंदों के अलावा कोई नजर नहीं आया. ये उनका सौभाग्य भले हो अपना तो दुर्भाग्य था. पर जंगल ने निराश नहीं किया. हिरन, चीतल और सांभर तो आसानी से दिखे पर रोमांचक रहा जंगली भालू और बायसन यानी जंगली भैंसा का दर्शन. जंगल से लौटते समय दो जंगली भालू दिखे जो दीमक खाने में इतने मशगूल थे कि सिर ऊपर ही नहीं कर रहे थे. जिप्सी को ज्यादा पास ले जाना ठीक नहीं था. फारेस्ट गार्ड ने चेतावनी दी कि इनके खाने में विघ्न डाला तो ये हमला कर सकते हैं. तबतक जंगल धुंध में डूबने लगा था. हम डाक बंगले में लौटे तो वह धुंध से घिरा हुआ था.

Friday, September 22, 2017

बेटियों से युद्ध नहीं संवाद करे सरकार

अंबरीश कुमार जेएनयू गया तो दिल्ली विश्विद्यालय भी नहीं बचा .अब यूपी के छात्रों से टकराव ठीक नहीं .आज तो मोदी आरती के लिए निकले तो रूट बदलना पड़ा .क्योंकि रास्ते में ये बेटियां खड़ी थी .बता रहे है कि नवरात्र में इन बेटियों पर लाठी चली है . बनारस हिंदू विश्विद्यालय की एक फोटो आई है .छात्राओं के आंदोलन से निपटने के लिए पुलिस के साथ सुरक्षा बल का वह दस्ता लगाया गया है जो दंगो से निपटता है .ये छात्राएं भी तो वही बेटियां हैं जिनके बचाने का नारा सरकार के शीर्ष पर बैठे नेता दे रहे हैं .बनारस तो देश के सबसे बड़े चौकीदार का राजनैतिक घर है .अब चौकीदार के घर में भी बेटियां सुरक्षित नहीं रहेंगी तो कहां रहेंगी .कल एक बेटी के साथ छेड़खानी हुई और एक बडबोले और बौड़म कुलपति के चलते छात्राओं को ही छात्रावास में कैद कर दिया गया .छात्राओं ने विरोध शुरू किया तो दबाने के लिए दंगा निपटाने वाले जवानो को आगे कर दिया गया .आप सोच कर देखे कि आपकी बहन बेटी घर से दूर छात्रावास में रह रही हो और कोई लंपट उसके साथ छेड़खानी करे तो किससे कार्रवाई की अपेक्षा रखेंगे . साफ़ है विश्विद्यालय प्रशासन से .और जब प्रशासन ही इन बेटियों की आवाज दबाने में जुट जाए तो कौन खड़ा होगा .प्रदेश की यह सरकार जब सत्ता आई थी तो एक एंटी रोमियो स्क्वायड बना कर पुलिस वालों को एक साथ जा रहे लड़की और लड़के को प्रताड़ित करने का हथियार दे दिया गया था .भाई बहन तक थाने में बैठाए गए तो पति पत्नी तक को नहीं छोड़ा .जब एकाध अफसर नेता के परिजन भी फंसे तो यह कवायद बंद हो गई .किसी भी जिले में चले जाएं अगर किसी लड़की महिला से छेड़खानी या बलात्कार का कोई मामला आएगा तो पहला प्रयास यह होगा कि लड़की वाले को थाने से ही बिना शिकायत लिखे भगा दिया जाए .और बलात्कारी बड़े घर का हुआ तो पैसे लेकर मामला रफा दफा कर दिया जाए .यह पुलिसिया चरित्र है .यह कोई योगी सरकार में नहीं बना सभी सरकार में रहा .पर यह तो संस्कार वाली सरकार है ,कुछ तो नई पहल करे कि लड़की सुरक्षित रहे .और जब कोई घटना घटे तो जल्द से जल्द और प्रभावी कार्यवाई हो .क्या यह बेहतर नहीं होता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कम से कम अपने निर्वाचन क्षेत्र में हुई इस घटना की जानकारी लेकर खुद कोई पहल करते .इससे उनका कद ही बढ़ता .विश्विद्यालय से लेकर जिला प्रशासन तक तो जिस लीपापोती में लगा हुआ है उससे लोगों का आक्रोश बढ़ रहा है . यह सिर्फ बनारस हिंदू विश्विद्यालय का मामला नहीं है .लखनऊ विश्विद्यालय से लेकर इलाहाबाद विश्विद्यालय तक में छात्राओं को किस तरह दबाया जा रहा है .लखनऊ विश्विद्यालय में छात्रा पूजा शुक्ल को जेल भेज दिया गया .और बडबोला प्राक्टर इस बहाने दूसरों को धमकाने में जुट गया .इलाहाबाद में ऋचा सिंह को किस तरह प्रताड़ित किया गया यह सभी ने देखा है .क्या इस सबसे यह छात्राएं दब जाएंगी .यह संभव नहीं है .हम लोग आंदोलन में रहे है ,देखा है .छात्रों को दबाकर कोई प्रशासन जीत नहीं पाता .लाठी गोली के बाद जेल भी छात्र जाते रहे और लड़ते रहे .इसलिए सरकार इन बेटियों से युद्ध न करे ,संवाद करे .एक परिसर में माहौल ख़राब हुआ तो दूसरा भी नहीं बचेगा .जेएनयू गया तो दिल्ली विश्विद्यालय भी नहीं बचा .अब यूपी के छात्रों से टकराव ठीक नहीं .आज तो मोदी आरती के लिए निकले तो रूट बदलना पड़ा .क्योंकि रास्ते में ये बेटियां खड़ी थी .बता रहे है कि नवरात्र में इन बेटियों पर लाठी चली है .

Wednesday, September 6, 2017

सोशल मीडिया के ये अघोरी !

अंबरीश कुमार सोशल मीडिया में तरह तरह के तत्व पहले से हैं .कुछ पेड हैं तो कुछ अनपेड है .कुछ वेतनभोगी हैं तो कुछ शौकिया भिड़ते है .इन्हें अंग्रेजी में लोग ट्रोल कहते हैं पर अपनी भाषा में ये लंपट किस्म के कार्यकर्त्ता हैं .छवि निर्माण के साथ सामने वाले की छवि ध्वस्त करने के लिए इनका इस्तेमाल राष्ट्रवादी के मौजूदा नेतृत्व ने शुरू किया था .पहले इस प्रकार की कवायद राजनैतिक विरोधियों को निपटाने के लिए नहीं होती थी .पर बहुत कम .भाजपा तो पुरानी पार्टी है .हम जैसे पत्रकार तीन दशक से इसे कवर करते रहे हैं .बहुत से मित्र भी इस पार्टी में हैं .पर वे तो ऐसे नहीं थे .पार्टी ही बदल रही है .याद आता है नारा ,भाजपा के तीन धरोहर -अटल ,आडवाणी और मुरली मनोहर .अब न ये नारा रहा न ये नेता धरोहर रहे .ये सब शीर्ष नेता निपटा दिए गए हैं .जब कोई नेतृत्व अपनी ही विरासत को निपटा दे तो उसके लिए क्या समाज ,क्या मीडिया और क्या लेखक होंगे .जो विरोध करे उसका चरित्र हनन करो और खत्म करो .यह नई राजनीति है .दीन दयाल उपाध्याय के विचार वाली उस पार्टी की जिसके नेता अटल बिहारी वाजपेयी का सम्मान समूचा विपक्ष करता था .उनका एक जरुरी आपरेशन होना था तो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जुगत जुगाड़ से इन्हें विदेश भिजवाया ताकि वे स्वस्थ हो सके .यह राजनैतिक शिष्टाचार का दौर हम लोगों ने देखा है . और अब देखिए इसी धारा के बेलगाम अघोरी एक पत्रकार की हत्या के बाद उसके चरित्र का पोस्ट मार्टम कर रहे है .तरह तरह के मूर्खतापूर्ण कुतर्क और सवाल ये उठा रहे है .प्रेस क्लब में एक बैठक हुई जिसमे राजनातिक दल के लोग भी आ गए .वे भी इस समाज के हैं .हत्या पर विरोध जताना चाहते थे आए .सभी जगह यह होता है .और सिर्फ एक पार्टी का चश्मा लगाने वाली जमात बोल रही है इसे राजनीति से दूर रखों .राजनीति अभी भी इतनी ख़राब नहीं हुई है जितने सोशल मीडिया के चंद अघोरी समाज को खराब क्र रहे हैं .इनकी भाषा देखिए ,इनकी गालियां देखिए इनकी पोस्ट देखिए .क्या इसे ये अपने भाई बहन ,पुत्र पुत्री के साथ शेयर कर सकते हैं .एकाध मेरी सूची में भी है पर सब अराजनैतिक फ्रीलांस किस्म के लोग .संघ के ,भाजपा के कई मित्र हैं पर इस तरह की बेहूदी टिपण्णी वे नहीं करते जैसे कुछ कर रहे हैं .मैंने अपने एक संघी साथी से पूछा तो बोले ,ये कुछ आईटी सेल के अप्रशिक्षित .अराजनैतिक लोग है .इनका पार्टी की विचारधारा से कुछ नहीं लेना .पर इनका किया धिया सब पार्टी के ही खाते में जा रहा है .जब आप किसी की हत्या पर जश्न मनाने लगे तो ,किसी की हत्या के बाद उसपर सवाल उठाने लगे तो आपकी सोच साफ़ हो जाती है .सत्ता पक्ष के साथ खड़े हो ,उनकी चापलूसी भी करे ठीक है वह आपकी नौकरी का हिस्सा है .पर समाज के प्रति भी आपकी कुछ जिम्मेदारी है .समाज को बनाया जाता है बिगाड़ा नहीं जाता .क्या यह समाज सिर्फ गाय ,गो मूत्र और गोबर की रक्षा से ही आगे बढेगा .आज देश की सर्वोच्च अदालत को तथाकथित गो रक्षकों की गुंडागर्दी पर कार्यवाई के लिए अगर निर्देश देना पड़ा है तो चेत जाइए .अगला नंबर सोशल मीडिया के अघोरियों का भी होगा .बेहतर हो इन्हें आप पहचान ले .

Tuesday, August 8, 2017

मोर्चे पर डटा है ' भारत छोडो ' आंदोलन का सिपाही


अंबरीश कुमार मुंबई .भारत छोडो आंदोलन का एक सिपाही आज भी मोर्चे पर डटा हुआ है । ये हैं दिग्गज समाजवादी जीजी पारीख जो वर्ष 1942 में भारत छोडो आंदोलन में भाग लेंने की वजह से दस महीने तक वर्ली की अस्थाई जेल में रहे । वे इस समय 93 वर्ष के हैं और समाजवादी आंदोलन का दिया जलाए हुए है ।वे न कभी चुनाव लड़े और न कोई शासकीय पद लिया । दिग्गज समाजवादी जीजी पारीख से पनवेल के युसूफ मेहर अली सेंटर में जो बातचीत हुई थी उसके अंश- सवाल -आप किसी प्रेरणा से भारत छोडो आंदोलन से जुड़े ?- यह उस समय का देश का माहौल था । लोग आजादी की बात करते थे ।जेल जाने की बात करते थे ।इस सबका असर मेरे ऊपर भी पड़ा ।गांधी और कांग्रेस की हवा बह रही थी जिसका असर मेरे घर पर भी पड़ा ।शुरुआत कहा से हुई ?एआईसीसी का मुंबई में भारत छोडो आंदोलन का जो सेशन हुआ उसमे एक वालंटियर के रूप में मै भी शामिल हुआ था ।अन्य नेताओं के साथ महात्मा गाँधी मंच पर थे ।उनके भाषण से प्रभावित हुआ और फिर इस आंदोलन का हिस्सा बन गया । समाजवादियों की कई बार एकजुटता की कोशिश हुई ,कई बार बिखराव हुआ ।आप इसे कैसे देखते है ?-मै सोशलिस्ट पार्टी में हमेशा विभाजन के खिलाफ रहा ।इस मामले में डा राम मनोहर लोहिया से भी सहमत नहीं था ।हमें जोड़ना चाहिए तोडना नहीं । महाराष्ट्र में लम्बे समय से है यहां की राजनीति में शिवसेना के उदय को किस तरह देखते है ? मै खुद गुजरात से हूँ पर पचास साठ के दशक में मुंबई के कल कारखानों में जिस तरह मराठी लोगों की उपेक्षा हुई उसी से यह सब शुरू हुआ ।जो पहल समाजवादियों को करनी चाहिए थी उसे बाल ठाकरे ने किया और वे कामयाब भी हुए ।नौकरी में जब स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी नहीं होगी तो यह सब होगा । इस युसूफ मेहर अली सेंटर में अस्पताल है ,स्कूल है लड़कियों का छात्रावास है और बड़ी संख्या में स्टाफ है ,इसका खर्च कैसे निकलता है ?-इन सब जनहित के कामो में काफी पैसा लगता है कुछ हमारे अपने संसाधनों से मिलता है तो ज्यादा हिस्सा जनता से मांगता हूँ ।हर साल करीब दो करोड़ का खर्च आता है जो मांग कर इकठ्ठा करता हूँ । समाजवादियों की नई पहल से क्या उम्मीद है ? जिस तरह लोगों ने यहां आकर अपनी बात रखी और समाजवादी आंदोलन के लिए समय देने का संकल्प लिया है उससे अभी भी बहुत उम्मीद है ।हमने कई बदलाव देखे है और फिर बदलाव होगा । (डा. जीजी पारिख को कई तरह से लोग जानते हैं, सन 42 के भारत छोडो आंदोलन में दस महीने तक जेल में रहने वाले जीजी समाजवादी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गांधीवादी और पेशेवर चिकित्सक के रूप में जाने जाते है । उन्हें सबसे ज्यादा युसुफ मेहरअली सेंटर के संस्थापक के तौर पर जाना जाता है, जिसकी स्थापना उन्होंने 52 साल पहले महाराष्ट्र में रायगढ़ जिले के तारा गांव में की थी, जहां हिंदी, उर्दू तथा मराठी भाषा में चार स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। जिनमें ढाई हजार से भी ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। यहां ग्रामीणों के लिए निशुल्क अस्पताल चलाया जाता है। खादी ग्रामाद्योग भी स्थापित हैं। सेंटर की 11 राज्यों में शाखाएं संचालित की जा रही हैं। उन्होंने अपना अधिकतर समय रचनात्मक कार्यों मंे तथा प्राकृतिक आपदा से पीडि़त लोगों के पुनर्वास में लगाया है। लातूर, कश्मीर हो या गुजरात के कच्छ का भुकंप, दक्षिण भारत में सूनामी आई हो या उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा, जीजी के नेतृत्व में युसुफ मेहरअली सेंटर द्वारा बढ़चढ़ कर पुनर्वास का कार्य किया गया। गुजरात में सौराष्ट्र के सुरेंद्रनगर (बधवान कैंप) में गुणवंत राय पारिख का जन्म 30 दिसंबर 1924 को हुआ था। पिता स्व. श्री गणपत लाल पारिख जयपुर स्टेट के डाक्टर थे, जो बाद में राजस्थान चिकित्सा सेवाओं के डायरेक्टर बने। जीजी की माता का नाम श्रीमति विजया पारिख था, जिनके छह बच्चों में से एक जीजी थे। जीजी की सुरेंद्रनगर के विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई हुई। स्कूल के दिनों में ही वे छात्र आंदोलन से जुड़ गए तथा 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने हिस्सेदारी की, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार कर 10 महीने वर्ली की अस्थाई जेल में रखा गया तथा एक महीने थाणे की जिला जेल में रहे। जीजी के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव महात्मा गांधी, अच्युत पटवर्धन, युसुफ मेहरअली, जयप्रकाश नारायण तथा ब्रिटेन के समाजवादियों का पड़ा। 1946 में वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए तथा श्रमिक आंदोलन और सहकारिता आंदोलन से जुड़ गए। वे छात्र कांग्रेस की मुंबई शाखा के अध्यक्ष हुए। 1949 में उनका विवाह सुश्री मंगला से हुआ, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थी। उन्होंने मृणाल गोरे, प्रमिला दंडवते के साथ मिलकर समाजवादी महिला आंदोलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। जीजी सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे। वे अशोक मेहता, नाना साहेब गोरे, मधु दंडवते के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में सक्रिय रहे। 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू किए जाने के बाद 23 अक्टूबर को सोशलिस्ट पार्टी की मंुबई शाखा के अध्यक्ष होने के नाते उन्हें जाॅर्ज फर्नाडिज के साथ बड़ौदा डायनामाईट कांड में गिरफ्तार किया गया। जिसके परिणामस्वरूप वे 20 महीने पुणे की यरवादा जेल में रहे। बाद में उनका तबादला दिल्ली की तिहाड़ जेल में किया किया गया। चुनाव की घोषणा के बाद जीजी रिहा हुए। श्रीमति मंगला पारिख जी प्रमिला दंडवते के साथ 18 महीने यरवदा तथा धुले जेल में रहीं। उनकी बेटी सोनल ने 19 वर्ष की आयु में आपात काल के खिलाफ सत्याग्रह किया, जिसके चलते उन्हें चार सप्ताह मंबई की आर्थर रोड़ जेल में रखा गया। 1940 में ही राजनीति मंे प्रवेश करने साथ ही जीजी ने तय कर लिया था कि वे ना तो कभी चुनाव लड़ेंगे, न ही कोई शासकीय पद लेंगे। इस कारण उन्होंने जीवनभर तमाम बार पार्टी टिकट का प्रस्ताव मिलने के बावजूद कभी चुनाव नहीं लड़ा, न ही कोई शासकीय पद लिया। )

Saturday, July 1, 2017

तौरंगा का डाक बंगला

अंबरीश कुमार यह सवा सौ साल से भी ज्यादा पुराना है .सन 2001 में पहली बार यहां गया था .देवभोग की हीरा खदान पर इंडियन एक्सप्रेस में जो स्टोरी की थी उसपर संसद में विवाद हुआ और केंद्रीय मंत्री पटवा भी इस विवाद में फंसे .खैर इस सिलसिले में दोबारा देवभोग जाना हुआ तो एक सहयोगी पत्रकार भी साथ थी .देवभोग क्षेत्र में रुकने की कोई जगह नहीं थी और हीरा खदान क्षेत्र को देख कर गांव वालों से बात कर लौटने में देर हो चुकी थी .देवभोग पुलिस थाने को पहले ही अपने दौरे को लेकर सूचित किया जा चुका था क्योंकि यह नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी था .थाना प्रभारी का फोन बार बार आ रहा था .हम लोग उससे मिले और बताया कि कल फिर दूसरे गांव की तरफ जाना है .स्टोरी काफी संवेदनशील थी इसलिए कोई कोर कसर छोड़ने का सवाल ही नहीं था .तौरंगा के डाक बंगले पर रुकने की व्यवस्था जंगलात विभाग ने कर रखी थी पर थाना प्रभारी परेशान था .उसका कहना था रात में रुकना ठीक नहीं है .जंगली जानवरों का खतरा है तो नक्सली भी हमला कर सकते हैं .पर हमने कहा ,अब तो यहीं रुकना है .तौरंगा का डाक बंगला साल के घने जंगल से घिरा था .जब पहुंचे तो शाम हो चुकी थी .खानसामा साहू इंतजार कर रहा था क्योंकि उसे जंगलात विभाग के वायरलेस से सूचना कर दी गई थी .इस जगह कोई मोबाइल काम नहीं करता है .फोन भी नहीं था न बिजली आ रही थी .जो पानी लेकर आया वह बहुत ठंढा था पता चला बहुत पुराने कुवें का पानी है . तौरंगा का डाक बंगला परिसर भी जंगल जैसा ही था .साल के कई उंचे उंचे दरख्त से घिरे इस डाक बंगला में दो सूट थे और बीच में डाइनिंग हाल जो पीछे की तरफ से भी खुला हुआ था ,पर दरवाजा था .पीछे आम और कटहल के पेड़ के नीचे रसोई घर था जहां से धुवां निकल कर फ़ैल रहा था .एक बार बरसात हो चुकी थी जिसका असर बरक़रार था .हवा की नमी भी महसूस हो रही थी .थोड़ी ही देर में चाय और बिस्कुट वह ले आया .तब उससे बात शुरू हुई .खानसामा ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी को यह डाक बंगला बहुत पसंद आया था .वे यहां रुके थे .दोपहर के समय आए और दूसरे दिन लौटे थे .शाम के समय परिंदों की चहचहाट से डाक बंगला गुलजार था .हम लोग भी काफी देर तक बरामदे के आगे बने बगीचे में बैठे रहे .गुलाब के फूलों की खुशबू फैली हुई थी .यह बगीचा साल के पेड़ों से घिरा हुआ था .अंधेरा होते ही साहू लालटेन लेकर आया और बरामदे में टांग गया .मोबाइल में नेटवर्क नहीं था इसलिए किसी से किसी तरह का संपर्क होने का सवाल ही नहीं था .मैंने लालटेन की रौशनी में उस स्पाइरल डायरी में नोट दिन में गांव वालों से हुई बातचीत को देखना चाह पर कुछ देर बाद उसे बंद करना पड़ा .ड्राइवर के रात में सोने की व्यवस्था करने के बाद करीब आधा घंटा और बाहर बैठे पर ठंढ के चलते कमरे में जाना पड़ा .हवा भी तेज हो चुकी थी .करीब नौ बजे खानसामा ने बताया कि खाना डाइनिंग हाल में लग चुका है . डाक बंगला के खानसामा भी बहुत ही स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हैं .कड़कनाथ का स्वाद भी इन्ही खानसामा से मिला था .कुछ देर हम रसोई घर में भी रहे और खाना बनाने का तौर तरीका भी देखा .जिसपर आदिवासियों का असर बरक़रार था .पहले खड़े मसलों को देर तक भूनना फिर सिलबट्टे पर पीसना .रसोई में महुआ की पहली धार वाली मदिरा भी उपलब्ध थी जो वे अपने लिए रखे हुए थे .एक बार बार नवापारा वन्य जीव अभ्यारण्य में ठहरने पर डेक्कन हेराल्ड के साथी अमिताभ ने इसका स्वाद भी चखाया था .उनका दावा था ये किसी भी स्काच से बेह्त्ज़र होती है .खैर दिन भर की भागदौड से इतना थके हुए थे की खाना खाने बाद जो नींद आई तो सुबह पांच बजे ही उठ पाए .जबकि इतनी जल्दी बहुत कम सोना होता था .बहरहाल तौरंगा का यह डाक बंगला अद्भुत है .अब मुख्य भवन का कायाकल्प हो रहा है .कुछ महीने पहले अल्लू चौबे और राजस्थान पत्रिका के पत्रकार राज कुमार सोनी के साथ यहां फिर कुछ समय गुजारने का मौका मिला .

Friday, June 9, 2017

वे भी लड़ाई के लिए तैयार है !

वे भी लड़ाई के लिए तैयार है ! अंबरीश कुमार इमरजेंसी में जेल जाने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक कुलदीप नैयर कल प्रेस क्लब में पत्रकारों की भीड़ देख कर उत्साहित थे .जिस तरह मीडिया का बड़ा तबका राजा का बाजा बना हुआ है उसे देखते हुए किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि प्रेस क्लब में इतनी बड़ी संख्या में पत्रकार जुटेंगे .कुलदीप नैयर के साथ एक्सप्रेस के दूसरे संपादक अरुण शौरी ,एक्सप्रेस के एक और पूर्व संपादक एचके दुआ ,एस निहाल सिंह केव्साथ
और मशहूर विधिवेत्ता फली एस नरीमन की मौजूदगी के राजनैतिक संकेत साफ़ है .इंडिया टुडे समूह के मालिक अरुण पूरी का लिखित संदेश पढ़ा गया जो अभिव्यक्ति की आजादी पर होने वाले हमले के विरोध में था .इन दिग्गज पत्रकारों ने इस उम्र में साथ आकर नौजवान पत्रकारों को तो झकझोर ही दिया है .सरकार की मनमानी के खिलाफ बहुत से हाथ खड़े हो चुके हैं .हाल के दो दशक में इस तरह की एकजुटता तो मुझे नहीं दिखी . बिहार प्रेस बिल के समय जरुर दिखी थी जब एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका से लेकर खुशवंत सिंह और स्टेट्समैन तक के मालिक बोट क्लब पर प्रेस की आजादी वाले प्ले कार्ड लिए खड़े थे .एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय पर जिस समय छापा पड़ा उसके ठीक पहले उनके चैनल की एक एंकर ने भाजपा के एक प्रवक्ता को बहस से बाहर कर दिया था .ऐसे में सभी का ध्यान इसी पर गया भी .प्रणय राय पर कितना कर्ज है कितने मामले है और सत्ता पक्ष से कैसा रिश्ता है यह सब मीडिया से जुड़े लोग ठीक से जानते हैं .जो नहीं जानते थे उन्हें राष्ट्रवादी पत्रकारों ने कैरेवान पत्रिका का पुराना लिंक देकर जागरूक भी करने का सार्थक प्रयास किया .जो भी अख़बार पत्रिका या चैनल चलाता है उसे बैंक का कर्ज लेना पड़ता है और उसकी वसूली ,भारी ब्याज आदि के विवाद से लगातार जूझना पड़ता है .इंडियन एक्सप्रेस में यह सब मैंने गोयनका जी के समय से देखा है .तब तो न्यूज प्रिंट के कोटा का भी खेल होता था और सरकार चाहती तो किसी भी मामले में आसानी से फंसा सकती .पर एनडीटीवी के मामले में ऐसा कुछ नहीं था जो था वह खबरों को लेकर ज्यादा था .हालांकि इंडियन एक्सप्रेस और टेलीग्राफ की चोट और तीखी होती पर शायद इन अखबारों से ज्यादा लोगों तक पहुंच रखने और सत्ता विरोधी विचार पहुंचाने की वजह से यह चैनल हमेशा भाजपा नेताओं के निशाने पर रहा .यह बात अलग है कि ज्यादातर चुनाव में इसे विपक्ष को ही हराया पर धारणा यही बनी कि यह सत्ता के खिलाफ है क्योंकि इसके कुछ कार्यक्रम खबरों की चीड़ फाड़ ठीक से करते रहे है .बहरहाल ताजा विवाद भाजपा के एक बडबोले प्रवक्ता था जिसे बहस से बाहर करने के बाद ही प्रणय राय के घर सीबीआई का छापा पड़ा .इससे पहले डीएवीपी के नियमों में बदलाव लाकर बड़ी संख्या में लघु और मझोले अखबारों का सरकारी विज्ञापन बंद किया जा चुका था .कुछ अख़बार सिर्फ फ़ाइल कापी निकालते होंगे पर सभी तो ऐसा नहीं करते थे .मीडिया को लेकर केंद्र सरकार की नीति साफ़ हो चुकी है .खुद प्रधानमंत्री मोदी कभी बड़ी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते न ही बाहर के दौरे पर उस तरह पत्रकारों को साथ ले जाते हैं जैसे अन्य प्रधानमंत्री ले जाते थे .एकाध प्रायोजित इंटरव्यू जरुर अपवाद है .हालांकि मीडिया का बड़ा तबका वैसे ही उनका समर्थन करता है .पर अगर कोई सत्ता विरोधी खबर या विश्लेष्ण करे तो वह उनके निशाने पर आ जाता है .राज्य सभा टीवी में जो हाल में हुआ वह सामने था .कई अखबारों को यह साफ़ कह दिया गया है कि कुछ पत्रकारों के लेख नहीं लिए जाएं .खासकर संपादकीय पृष्ठ पर .ऐसे हालात पहले कभी नहीं थे . कांग्रेस ने इमरजंसी में यह सब किया और नतीजा भी भुगतना पड़ा .ऐसे में मौजदा सरकार जिसे सिर्फ सकारात्मक खबरे और लेख पसंद है उसके खिलाफ लिखने और बोलने की कीमत चुकानी पड़ेगी .एंकर निधि राजदान के सहस की कीमत सीबीआई का छापा है .यह हथकंडा पुराना है पर बार बार यही इस्तेमाल होता है .आगे भी होगा .इसलिए प्रेस क्लब आफ इंडिया परिसर में पत्रकारों के इस जमावड़े को गंभीरता से लेना चाहिए .कुलदीप नैयर ने बताया भी कि इमरजंसी में तो तो सिर्फ तिहत्तर पत्रकार ही समर्थन में खड़े हुए पर आज तो बड़ी संख्या में पत्रकार आए .इसका संकेत सरकार को भी समझना चाहिए .अब पुलिस या सीबीआई से मीडिया को धमका ले यह आसान नहीं है .कल जो एकजुटता दिल्ली के प्रेस क्लब में दिखी उसका संदेश देश के कोने कोने में जा चुका है .देश के बहुसंख्यक पत्रकार भी लड़ाई के लिए तैयार है .