Friday, June 9, 2017

वे भी लड़ाई के लिए तैयार है !

वे भी लड़ाई के लिए तैयार है ! अंबरीश कुमार इमरजेंसी में जेल जाने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक कुलदीप नैयर कल प्रेस क्लब में पत्रकारों की भीड़ देख कर उत्साहित थे .जिस तरह मीडिया का बड़ा तबका राजा का बाजा बना हुआ है उसे देखते हुए किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि प्रेस क्लब में इतनी बड़ी संख्या में पत्रकार जुटेंगे .कुलदीप नैयर के साथ एक्सप्रेस के दूसरे संपादक अरुण शौरी ,एक्सप्रेस के एक और पूर्व संपादक एचके दुआ ,एस निहाल सिंह केव्साथ
और मशहूर विधिवेत्ता फली एस नरीमन की मौजूदगी के राजनैतिक संकेत साफ़ है .इंडिया टुडे समूह के मालिक अरुण पूरी का लिखित संदेश पढ़ा गया जो अभिव्यक्ति की आजादी पर होने वाले हमले के विरोध में था .इन दिग्गज पत्रकारों ने इस उम्र में साथ आकर नौजवान पत्रकारों को तो झकझोर ही दिया है .सरकार की मनमानी के खिलाफ बहुत से हाथ खड़े हो चुके हैं .हाल के दो दशक में इस तरह की एकजुटता तो मुझे नहीं दिखी . बिहार प्रेस बिल के समय जरुर दिखी थी जब एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका से लेकर खुशवंत सिंह और स्टेट्समैन तक के मालिक बोट क्लब पर प्रेस की आजादी वाले प्ले कार्ड लिए खड़े थे .एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय पर जिस समय छापा पड़ा उसके ठीक पहले उनके चैनल की एक एंकर ने भाजपा के एक प्रवक्ता को बहस से बाहर कर दिया था .ऐसे में सभी का ध्यान इसी पर गया भी .प्रणय राय पर कितना कर्ज है कितने मामले है और सत्ता पक्ष से कैसा रिश्ता है यह सब मीडिया से जुड़े लोग ठीक से जानते हैं .जो नहीं जानते थे उन्हें राष्ट्रवादी पत्रकारों ने कैरेवान पत्रिका का पुराना लिंक देकर जागरूक भी करने का सार्थक प्रयास किया .जो भी अख़बार पत्रिका या चैनल चलाता है उसे बैंक का कर्ज लेना पड़ता है और उसकी वसूली ,भारी ब्याज आदि के विवाद से लगातार जूझना पड़ता है .इंडियन एक्सप्रेस में यह सब मैंने गोयनका जी के समय से देखा है .तब तो न्यूज प्रिंट के कोटा का भी खेल होता था और सरकार चाहती तो किसी भी मामले में आसानी से फंसा सकती .पर एनडीटीवी के मामले में ऐसा कुछ नहीं था जो था वह खबरों को लेकर ज्यादा था .हालांकि इंडियन एक्सप्रेस और टेलीग्राफ की चोट और तीखी होती पर शायद इन अखबारों से ज्यादा लोगों तक पहुंच रखने और सत्ता विरोधी विचार पहुंचाने की वजह से यह चैनल हमेशा भाजपा नेताओं के निशाने पर रहा .यह बात अलग है कि ज्यादातर चुनाव में इसे विपक्ष को ही हराया पर धारणा यही बनी कि यह सत्ता के खिलाफ है क्योंकि इसके कुछ कार्यक्रम खबरों की चीड़ फाड़ ठीक से करते रहे है .बहरहाल ताजा विवाद भाजपा के एक बडबोले प्रवक्ता था जिसे बहस से बाहर करने के बाद ही प्रणय राय के घर सीबीआई का छापा पड़ा .इससे पहले डीएवीपी के नियमों में बदलाव लाकर बड़ी संख्या में लघु और मझोले अखबारों का सरकारी विज्ञापन बंद किया जा चुका था .कुछ अख़बार सिर्फ फ़ाइल कापी निकालते होंगे पर सभी तो ऐसा नहीं करते थे .मीडिया को लेकर केंद्र सरकार की नीति साफ़ हो चुकी है .खुद प्रधानमंत्री मोदी कभी बड़ी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते न ही बाहर के दौरे पर उस तरह पत्रकारों को साथ ले जाते हैं जैसे अन्य प्रधानमंत्री ले जाते थे .एकाध प्रायोजित इंटरव्यू जरुर अपवाद है .हालांकि मीडिया का बड़ा तबका वैसे ही उनका समर्थन करता है .पर अगर कोई सत्ता विरोधी खबर या विश्लेष्ण करे तो वह उनके निशाने पर आ जाता है .राज्य सभा टीवी में जो हाल में हुआ वह सामने था .कई अखबारों को यह साफ़ कह दिया गया है कि कुछ पत्रकारों के लेख नहीं लिए जाएं .खासकर संपादकीय पृष्ठ पर .ऐसे हालात पहले कभी नहीं थे . कांग्रेस ने इमरजंसी में यह सब किया और नतीजा भी भुगतना पड़ा .ऐसे में मौजदा सरकार जिसे सिर्फ सकारात्मक खबरे और लेख पसंद है उसके खिलाफ लिखने और बोलने की कीमत चुकानी पड़ेगी .एंकर निधि राजदान के सहस की कीमत सीबीआई का छापा है .यह हथकंडा पुराना है पर बार बार यही इस्तेमाल होता है .आगे भी होगा .इसलिए प्रेस क्लब आफ इंडिया परिसर में पत्रकारों के इस जमावड़े को गंभीरता से लेना चाहिए .कुलदीप नैयर ने बताया भी कि इमरजंसी में तो तो सिर्फ तिहत्तर पत्रकार ही समर्थन में खड़े हुए पर आज तो बड़ी संख्या में पत्रकार आए .इसका संकेत सरकार को भी समझना चाहिए .अब पुलिस या सीबीआई से मीडिया को धमका ले यह आसान नहीं है .कल जो एकजुटता दिल्ली के प्रेस क्लब में दिखी उसका संदेश देश के कोने कोने में जा चुका है .देश के बहुसंख्यक पत्रकार भी लड़ाई के लिए तैयार है .

Tuesday, March 28, 2017

पहाड़ भी बदल रहा है

अंबरीश कुमार शाम को स्टेशन की तरफ गए तो कुछ पक्षियों की फोटो ली .तभी धर्मेंद्र के पिता जो सेना से सूबेदार के रूप में रिटायर हुवे वे वृंदावन आर्चिड की ढलान पर मिल गए .चौथे पहर में भी धूप पूरी तरह खिली हुईं थी .सिंधिया के शिकारगाह के पीछे से हिमालय की बर्फ से ढकी चमक रही थी .एक परिंदा अखरोट के पेड़ से उड़ा तो ठीक सामने फूलों से लादे एक दरख्त पर बैठ गया .कैमरा निकाला तभी एक लंगूर तभी खुबानी के पेड़ पर नजर आया .फोटो लेते हुए सूबेदार साहब से बात हुई .आगे बढे तो गेट पार करते ही किच्छा से रोज मछली लेकर आने वाला दिख गया तो हैरानी हुई .क्योंकि भवाली में तो आज शाकाहारी दिवस मनाया जा रहा था .आगे बढे तो पुलिस चौकी के बगल में बकरा और मुर्गा भी दिख गया .पूछा तो पता चला इधर मिल रहा है भवाली में दिक्कत है .दिन में ही भीमताल में ही हिंदू जागरण मंच जैसे किसी संगठन का जुलूस सामने पड़ा तो कुछ देर खड़े रहना पड़ा .उग्र भाव भंगिमा वाले नौजवान हुल्लड़ मचाते हुए नारे लगाते हुए दर्जनों मोयर साईकिल के साथ गुजर गए .पता चला पहाड़ पर लोग उत्तर प्रदेश के पहाड़ी मुख्यमंत्री बनने से बम बम है .हालांकि इससे पहले भी अविभाजित उत्तर प्रदेश के कई मुख्यमंत्री पहाड़ के हुए है .पर आदित्यनाथ योगी की बात कुछ अलग है .वे न सिर्फ उतराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच नया संबंध विकसित कर रहे है बल्कि हिंदुत्व की वह अलख जो उन्होंने पूर्वांचल में जगाई थी अब उसकी उम्मीद उतराखंड में भी दिख रही है .अपने साथ चल रहे एसके सिंह भी योगी से काफी प्रभावित रहे हैं .हालांकि अपने ज्यादातर राजपूत मित्र योगी में देश का नया राजपूत नेतृत्व देख रहे हैं .खैर एसके सिंह ने भवाली में चिकन लेना चाहा पर समूचा भवाली बाजार छान लेने के बावजूद कही उन्हें चिकन नहीं मिला .पता चला आज मंगलवार है और कहीं भी चिकन नहीं मिलेगा .तभी ड्राइवर ने बताया कि हाल में इस तरह की सख्ती बढ़ गई है .पहाड़ के अपने ज्यादातर मित्र सामिष है और वे किसी खास दिन का भी परहेज नहीं रखते है .पर पहली बार पहाड़ में इस तरह की प्रवृति नजर आई .तभी ड्राइवर ने यही भी बताया कि मंगलवार के दिन नाई की भी दूकान जबरन बंद करा दी जाती है .पहाड़ पर इस तरह का सांस्कृतिक बदलाव पहली बार दिखा .बाजार में ही चिंटू पांडे तिलक लगाए मिल गए .वे वर्षों से तिलक लगा कर ही दूकान जाते है .उनकी दूकान मुख्य बाजार से कुछ दूर पर है जहां एक छोटा मोटा पहाड़ी मोहल्ला बस गया है .सामने बिजली विभाग का दफ्तर है .चिंटू पांडे कर्मकांडी हिंदू है और ब्राह्मण होने की वजह से हम सब से अतिरिक्त सम्मान की अपेक्षा रखते है .उनका व्यापारिक हिसाब भी बहुत साफ़ है .जो सामान मुख्य बाजार में बीस रुपये का मिलता है उसमे वे दस फीसद यानी दो से तीन रुपए सीधे बढ़ा देते है जैसे एक पैकेट दही बाईस रुपए का मिलेगा तो तेल में यह इजाफा दस फीसद का कर देते हैं .वे इस फर्क का तार्किक आधार दूरी बताते है .करीब एक किलोमीटर पर वे दस फीसद की सात्विक किस्म की बढ़ोतरी करते है .अगर उनकी दूकान चार पांच किलोमीटर दूर होती तो उपभोक्ता पर कितना बोझ पड़ता अंदाजा लगाया जा सकता है .खैर मूल मुद्दे पर लौटे .सीधे बोले ,अरे ये हो गया यूपी में .अब समय आ गया है कि ये लोग देश छोड़ कर चले जाएं .उनकी मंशा सामने आ चुकी थी .वैसे दबी छुपी मंशा यह बहुत से लोगों की है .भवाली में पिछले एक दशक में बाहर के लोगों ने भी बहुत निवेश किया है .इस निवेश का एक धार्मिक आधार भी देखा जा रहा है .इस अंचल के दलित लोग ही इसे लेकर सवाल उठाते रहें है .इससे सामाजिक समीकरण को समझा जा सकता है .यूपी में भाजपा की जीत से पहाड़ पर लोगों में नई उम्मीद जगी है .हालांकि खानपान के नियंत्रण को ल्रेकर कुछ शंका भी है .धर्म कर्म करते रहें पर खानपान पर किसी तरह का अंकुश क्यों .

Sunday, March 19, 2017

शुरुआत तो ठीक ही हुई है महाराज !

शुरुआत तो ठीक ही हुई है महाराज ! अंबरीश कुमार लखनऊ । सबका साथ और सबका विकास होगा ।यह टिपण्णी आज उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री की थी ।पूर्वांचल में हिंदुत्व की नर्सरी चलाने वाले आदित्यनाथ योगी अब मुख्यमंत्री हैं देश के सबसे बड़े सूबे के । आज ही शपथ ली और मंत्रिमंडल की बैठक के बाद मीडिया से भी मिले । साफ़ किया कि हर तबके का विकास होगा । यह योगी का नया चेहरा है । वे योगी जो हिंदुत्व का कट्टर चेहरा माने जाते रहें है । जिन्हें लेकर तरह तरह की आशंका भी समाज के एक तबके में है । तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक तबका है जिसे बहुत उम्मीद भी है ।पर योगी ने मुख्यमंत्री के रूप में अपना पहला संदेश बहुत ही संतुलित और संयमित दिया है । मंदिर निर्माण को लेकर कोई बात नहीं की । खेत, खेती और किसान को प्राथमिकता पर रखा तो साथ ही लचर कानून व्यवस्था को भी । विपक्ष पर भी कोई ज्यादा हमला न कर आगे की योजना पर फोकस किया । योगी की पहली प्रेस कांफ्रेंस से उम्मीद जगती है । वैसे भी वे युवा और उर्जावान नेता हैं । जो उन्हें करीब से जानते हैं उन्हें पता है कि वे सुबह तीन बजे उठकर दिन की शुरुआत करते हैं और रात बारह बजे तक जनता के बीच रहते है । गोरखपुर में एक बार मुझे भी रात साढ़े ग्यारह बजे इंटरव्यू का समय मिला था तभी यह जानकारी हुई । रात में भी वे फ़रियाद सुनते हैं । दिन में वे मंदिर परिसर में जनता से मिलते हैं तो अस्पताल में जाकर मरीजों का भी हालचाल लेते हैं । मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी जिम्मेदारी और बढ़ चुकी है । अब वे गोरखनाथ मंदिर परिसर के महाराज ही नहीं हैं बल्कि समूचे प्रदेश के ' महाराज ' बन चुके है । अब उनपर सिर्फ एक धर्म एक तबके की ही नहीं हर धर्म और हर तबके की सुरक्षा की जिम्मेदारी आ चुकी है । इसलिए अब उन्हें अपने परम्परागत एजंडा की जगह समूचे प्रदेश का एजंडा तय करना है । इसका संकेत उन्होंने आज दे भी दिया है । वे जिस गोरखपुर से आते हैं वह पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के जाने के बाद जो पिछड़ा तो कभी आगे नहीं बढ़ पाया । जापानी बुखार से हर साल हजारों बच्चे मरते है । टूटी फूटी सड़क .गंदगी का अंबार और दम तोडती नदियां । यह हाल समूचे पूर्वांचल का है । बनारस से बलिया तक । वीर बहादुर सिंह को लोग आज भी याद करते हैं तो सिर्फ उनके काम की वजह से । अब प्रदेश की बागडोर फिर पूर्वांचल के हाथ है तो सबकी नजर भी योगी पर टिक गई है । इंतजार करना चाहिए ,उम्मीद भी रखनी चाहिए बदलाव की । फिलहाल शुरुआत तो ठीक ही हुई है महाराज ।

Saturday, March 11, 2017

उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज !

उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज ! अंबरीश कुमार लखनऊ. उत्तर प्रदेश में रामराज आ गया है. पूरी ताकत के साथ लोगों ने इसके लिए वोट दिया है. हो सकता है यह किसी प्रतिक्रिया में हो पर यह हिंदू लहर है. इस लहर में अखिलेश का विकास का एजेंडा भी बह गया तो मायावती जैसी आयरन लेडी के कुशल प्रशासन की धमक भी ध्वस्त हो गयी. ऐसी लहर होगी यह कोई नहीं समझ पाया था. हम भी इस लहर को नहीं देख पाये. पर यह लहर मोदी की रणनीति से बनी जिसकी तैयारी उन्होंने काफी पहले शुरू कर दी थी. पहले सोशल इंजीनियरिंग की फिर प्रदेश के समूचे हिंदू मन को प्रभावित कर मजहबी गोलबंदी कर दी. वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश में जो मोदी की लहर चली उसमे हिंदुत्व के चूल्हे पर चढ़ी रोटी को तवे पर एक तरफ से पलट दिया गया था, इस बार वह रोटी दूसरी तरफ से भी पलट दी गयी है. मोदी ने चुनाव प्रचार में झूठ बोला हो या सच, लोगों ने उनपर भरोसा किया. अखिलेश, राहुल और मायावती पर भरोसा नहीं किया, यह सच है. ये नेता अब आत्ममंथन करें कि आखिर ऐसा क्यों हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश को लेकर हर तरह की रणनीति बनायी और उसमे वे कामयाब भी हुए. पहले पिछड़ों को जोड़ा. एक-एक करके प्रदेश अध्यक्ष बदला. पार्टी के संगठन में गैर यादव पिछड़ी जातियों को जोड़ने का काम किया तो उन्हें उम्मीदवार भी बनाया. ऐसे राजनैतिक दलों से तालमेल किया जो अति पिछड़ी जातियों में जनाधार रखते हैं. भारतीय समाज पार्टी हो या अपना दल. वे तिनका तिनका जोड़ रहे थे, काफी समय से. भाजपा किसी वार रूम के भरोसे नहीं थी. उसके साथ वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्त्ता, पत्रकार और बुद्धिजीवी जमात थी. और अंत में वे उस मजहबी गोलबंदी में भी कामयाब हुए जो उनका अंतिम अस्त्र था. पर यह सब एक के बाद एक रणनीति के साथ हुआ. अमित शाह और मोदी ने एक-एक जिले और एक एक बूथ के समीकरण को समझा .परस्पर विरोधी धारा वाले नेताओं को साथ खड़ा कर दिया .यह सब उनकी जीत की वजह बने. पर समाजवादी तो तिनका-तिनका बिखेर रहे थे. सत्ता,पैसा और आर्थिक लूट को लेकर सरकार लगातार घिरी तो अंत में सैफई का परिवारवाद भी विपक्ष के निशाने पर रहा. इस सबके बावजूद समाजवादी विचार धारा से जुड़े बहुत से नेता ,कार्यकर्त्ता और बुद्धजीवी जो मदद भी करना चाहते थे उनसे भी कोई संवाद करने को तैयार नहीं नजर आया. कुछ समाजवादी धारा के कार्यकर्त्ता जो चुनाव में प्रचार में भी जुटे उन्हें भी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. फिर भी अन्य राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता अपने स्तर पर काम करते रहे. यही राजनैतिक अहंकार उन्हें ले डूबा. कांग्रेस तो इसमें और आगे थी. इसी अहंकार का नतीजा था कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को किसी ने प्रचार में बुलाने तक की जहमत तक किसी ने नहीं उठाई . इस बारे में केसी त्यागी ने जब खुद फोन किया तो कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ने फोन तक नहीं उठाया. समाजवादी पार्टी ने एक बार भी प्रयास नहीं किया कि इन दिग्गज नेताओं की मदद ली जाये. सोशल इंजीनियरिंग का यह हाल था जो अति पिछड़ा बहुल इलाका था वहां अगड़ा उम्मीदवार दे दिया. कई ऐसे उम्मीदवारों का टिकट पारिवारिक विवाद में कट गया जो जीत सकते थे . कौमी एकता दल के साथ तालमेल सिर्फ मुख्तार अंसारी के नाम पर ख़ारिज कर देना बड़ी रणनीतिक भूल थी. अखिलेश यादव सिर्फ मुस्लिम -यादव समीकरण के भरोसे विकास के एजेंडा पर चुनाव लड़ रहे थे वह भी अराजनैतिक किस्म के वार रूम के जरिये. जबकि चुनाव में अन्य जातियों की भी बड़ी भूमिका होती है. दूसरी जातियों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक के थाने में सिर्फ अहीर थानेदार नियुक्त होता है. यह स्थिति कई बड़े पदों पर भी होती है. हालांकि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की जातीय छवि को तोड़ने का प्रयास भी किया पर वे भी इस धारणा को तोड़ नहीं पाये. अखिलेश यादव से कभी यह आभास नहीं मिला कि वे दलितों और अति पिछड़ी जातियों के लोगों को भी सत्ता में हिस्सेदारी देंगे. यह क्यों नहीं हो सकता था. आम लोगों से संवाद तो उन्होंने पहले ही बंद कर दिया था. सिर्फ सड़क बिजली और पानी के जरिये ही चुनाव नहीं जीता जा सकता है यह उन्हें सोचना चाहिये. मायावती तो अपना परंपरागत वोट बैंक भी नहीं सहेज सकी यह और दुर्भाग्यपूर्ण है. हालांकि पहले चरण से यह हवा मीडिया के जरिए फैलाई गयी कि बसपा सत्ता में आ रही है. सिर्फ इसलिए ताकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सके और वह हुआ भी. समाजवादी पार्टी इस अफवाह तक का मुकाबला नहीं कर सकी और बहुत सी जगहों पर मुस्लिम वोट ठीक से बंटा भी. साफ़ है राजनैतिक रणनीति में मोदी और शाह की जोड़ी भारी पड़ी.

Monday, March 6, 2017

लुट जाओगे सरकार बनारस की गली में ...

अंबरीश कुमार छह मार्च यानी सोमवार की शाम चार बजे से ही वाराणसी के बाबतपुर हवाई अड्डे पर नेताओं की भीड़ लगने लगी थी .सब लौट रहे थे .उत्तर प्रदेश के चुनाव का प्रचार थम चुका है .थके हुए नेता ,कुछ अभिनेता और पत्रकार आदि भी .सवाल यही था इस चुनाव में हासिल क्या होगा . अपना साफ़ मानना है कि नतीजा चाहे जो हो इस चुनाव का हासिल राहुल और अखिलेश की राजनीतिक जोड़ी हैं .इस चुनाव में ये लालू और नीतीश की तरह एक जोड़ी के रूप में उभरे .प्रदेश के करीब आधा दर्जन बड़े शहरों में राहुल और अखिलेश ने साझा रैली की .मोदी पर अपने अंदाज में निशाना साधा और अंततः मोदी इस जोड़ी के जाल में फंस ही गए .जिसके चलते मोदी इस चुनाव में अपनी विशिष्ट शैली से बाहर चले गए .जिसके चलते कभी गधा चुनाव के एजंडा में आया तो कभी अनानास को नारियल समझने और समझाने की गल्ती वे कर बैठे .वे मेट्रो का टिकट किस खिड़की पर मिलेगा यह पूछने लगे जब लखनऊ में मेट्रो का ट्रायल रन शुरू हो चुका था .यह कुछ ज्यादा ही लग रहा था .ठीक है वे गुजरात में मेट्रो न शुरू कर पाए पर देश के किसी भी हिस्से में अगर मेट्रो की शुरुआत हो रही हो तो प्रधानमंत्री को उसकी खिल्ली उडाना शोभा नहीं देता .यह बात आम लोग कर रहे हैं .बैंक गया था तो प्रभात कुमार से बनारस पर बात हुई कोई सज्जन जो पैसा निकलवाने आए थे बीच में कूद पड़े ,बोले -प्रधानमंत्री को तीन दिन तक बनारस में डेरा डालना और भाषा का स्तर गिराना शोभा नहीं देता .यह एक मध्य वर्गीय पढ़े लिखे जमात की आम राय है .उनकी नहीं जो अगड़ी जातियों के दिमागी ताले में बंद हो .प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने चुनावी भाषण में कर्बला और कब्रिस्तान का हवाला देकर अपने विकास के एजंडा का मजाक बना दिया .रही सही कसर बनारस की गली गली छानकर पूरी कर दी . दूसरी तरह अखिलेश यादव ने चुनाव के शुरू से लेकर अंत तक अपने चुटीले अंदाज को नहीं छोड़ा ,मुस्कुराना नहीं छोड़ा .तब भी नहीं छोड़ा था जब मुलायम सिंह ,अमर सिंह और शिवपाल उनके खिलाफ विद्रोह में जुटे थे .तब भी लोग कहते थे मुलायम के बिना अखिलेश कुछ नहीं है .पर देश के सबसे बड़े सूबे का चुनाव समाजवादी पार्टी ने सिर्फ अखिलेश यादव के कंधे पर रख कर लड़ा .तीन चरण बाद डिंपल यादव निकली और वे भी लोकप्रिय हुई अपने अंदाज से .अब सीटें चाहे जितनी आएं समाजवादी पार्टी को नया नेता मिल चुका है जो दो दशक से ज्यादा की पारी खेलने की तैयारी में है .ख़ास बात यह है कि अखिलेश का रुख लचीला है ,जोड़तोड़ वाला दिमाग नहीं है .इसी वजह से कांग्रेस से तालमेल भी हुआ . यह ठीक है कि अभी उनका राजनैतिक अनुभव मुलायम जैसा नहीं है न ही उनके साथ जनेश्वर मिश्र ,बृजभूषण तिवारी ,कपिल देव सिंह .मोहन सिंह जिजसे खांटी समाजवादियों की कोई टीम है .उनके टीम में नए लोग है .पर वे लोग है जिन्होंने संघर्ष के दौर में छोड़ा नहीं था और पुलिस की बर्बरता के शिकार भी हुए .बहुत से फैसले अखिलेश ने दबाव में लिए और खुद भी कई गलत फैसले किए .पर यह राजनैतिक प्रक्रिया में हमेशा से होता आया है .कई को दबाव में साथ लिया तो कई को अपनी नासमझी में भी .ये ही गायत्री प्रजापति हैं जिनके चक्कर में पिता और चाचा दोनों से झगड़ा हुआ और अंततः टिकट भी देना पड़ा .तब जितने लोग मुलायम के पक्ष में खड़े थे सब गायत्री को भी पवित्र बनाए हुए थे .गायत्री पर खनन के भारी खेल का आरोप है ठीक उसी तरह जैसे बाबू सिंह कुशवाहा पर था .बाकी दो साल उनके साथ रहने वाली महिला के मामले में राज्यपाल राम नाइक ने जितनी दिलचस्पी दिखाई वह भी समझ में आ रही थी .रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी के मामले में अपनी केंद्रीय मंत्री को कैसे बचाया जाता है ,यह सब इनसे सीखना चाहिए .खैर ऐसे तत्वों से अखिलेश को दूर रहना चाहिए और इसका संकेत वे दे चुके है .उन्होंने जिनको जिनको पार्टी से बाहर किया सब को भाजपा और बसपा ने शरण दी .माफिया सरगना की दूसरी पीढ़ी को भाजपा ने भी खाद पानी दिया है तो बसपा तो उन्हें मजलूमों का मसीहा ही मानती है .सपा में अभी भी दागी है पर बाकी दलों के मुकाबले कम ,जिन्हें बाहर करना बेहतर है . पर असली मुद्दा राजनैतिक है .अखिलेश यादव ने अपने दम पर यह चुनाव लड़ा उस पार्टी का जिसपर मुलायम सिंह जैसे कद्दावर नेता का साया दो महीने पहले तक रहा .साथ ही राहुल गांधी से उनकी राजनैतिक केमेस्ट्री बनती नजर आई .कांग्रेस प्रदेश में बहुत ही बुरी स्थिति में रही है .ऐसे में अगर इस गठबंधन को वोट का फायदा होता है तो यह जोड़ी लोकसभा चुनाव तक आराम से चलेगी .दूसरे यह लोकसभा चुनाव को लेकर देश में एक व्यापक गठबंधन की दिशा में भी पहल कर सकती है .समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में नीतीश कुमार को जोड़ने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की .अगर ऐसा करते तो उसका राजनैतिक संदेश दूर तक जाता .फिर भी अखिलेश और राहुल गांधी ने समूची भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को जिस तरह बचाव की मुद्रा में लाने पर मजबूर किया वह ऐतिहासिक है .वे बनारस की गलियों में जिस तरह निकले और जैसी सफाई थी वह भी लोग याद रखेंगे .रोड शो को नादान कलेक्टर ने बताया कि वे दर्शन करने जा रहे थे .क्या कोई व्यक्ति दो क्विंटल फूल रास्ते भर उछालता हुआ बाबा विश्वनाथ के दर्शन करे जाता है काशी में .पर उससे भी क्या होगा .नजीर बनारसी ने जो लिखा है उसपर भी एक नजर डाल लें तो सब समझ में आ जाएगा . ऎसा भी है बाजार बनारस की गली में ,बिक जाए खरीदार बनारस की गली में ,सड़कों पे दिखाओगे अगर अपनी रईसी,लुट जाओगे सरकार बनारस की गली में .

Tuesday, February 28, 2017

कालीकट का समुद्र तट

अंबरीश कुमार अभी अभी अख़बार में सोनल मान सिंह का एक लेख पढ़ा तो उनसे हुई पुरानी मुलाक़ात याद आ गई .कालीकट भी याद आया और उमेश सिंह चौहान साहब भी .यही वह शहर है जहां पुर्तगाल से आकर वास्को डी गामा उतरा था .देश में पुर्तगालियों का प्रवेश द्वार .फोटो में वह समुद्र तट भी है तो वास्को का स्मारक भी . नब्बे के दशक की बात है .कालीकट महोत्सव देखने के लिए चेन्नई से कालीकट पहुंचे थे ट्रेन से .सुबह के पांच बजे थे .विश्विद्यालय के पुराने साथी और कालीकट के कलेक्टर चौहान साहब स्टेशन आए थे .नई जगह थी इसलिए उनके आने से सुविधा हो गई .बताया कि वे घंटे भर भर पहले आए थे फिल्म अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि को लेने .वे ही आयोजक थे इसलिए दौड़ धूप भी कर रहे थे .शहर के बीच का होटल था नाम संभवतः मालाबार पैलेस था .लाबी में प्रवेश करते ही पानी के पुराने जहाज का बड़ा सा माडल रखा हुआ था .आकाश के लिए यह अजूबा सा था इसलिए वहां से हटा तो विशाल एक्युरियम में शार्क मछली देखने लगा .हम लोग ऊपर की दूसरी मंजिल पर रुके हुए थे .बगल में नौशाद ,नृत्यांगना सोनल मानसिंह और मीनाक्षी शेषाद्रि भी .नौशाद से यही शाम को मुलाकात हुई .लखनऊ से लेकर मुंबई के किस्से सुनाने लगे .अच्छा लगा उनसे मिल कर .फिल्म ,साहित्य और संगीत नृत्य के क्षेत्र में अपनी कोई खास जानकारी नहीं रही है .आम दर्शक की तरह ऐसे मशहूर लोगों से मिलकर अच्छा लगता है . रात को बताया गया कि डिनर सोनल मान सिंह के साथ नीचे रेस्तरां में है .हम कुछ मिनट पहले पहुंच गए थे .कुछ देर में सोनल मानसिंह भी आई .परिचय पहले ही हो चुका था .उन्होंने सरसों में बनी मछली और चावल मंगाया .बताया कि कई घंटे की मेहनत के बाद उनका प्रिय भोजन यही होता है .सविता उनसे नृत्य की शुरुआत के बारे में देर तक बात करती रही .कई घंटे तक रियाज करना फिर कार्यक्रम .यह कार्यक्रम समुद्र तट पर था जिसकी रिपोर्ट भी जनसत्ता मे दी थी हालांकि नृत्य संगीत के कार्यक्रम के बारे में पहले कभी लिखा नहीं था .इस दौरे में ही वह समद्र तट देखा जहां पुर्तगाल से आकर वास्को उतरा था .वह अकेले नहीं आया एक संस्कृति के साथ आया जिसने तटीय इलाकों में बहुत कुछ बदल दिया .खानपान ,वास्तुशिल्प से लेकर रीति रिवाज तक . गोवा उदाहरण है .

Sunday, February 12, 2017

कोई काम न हो तो उपन्यास लिखे

उज्जवल भट्टाचार्य उपन्यास लिखने के लिये सबसे ज़रूरी बात यह है कि आपके पास कोई क़ायदे का काम-धाम न हो, और आप ऐसी बेकार बातों के लिये अपना वक़्त ज़ाया कर सकें. लेकिन इतना काफ़ी नहीं है. उपन्यास लिखने का फ़ैसला करने के तुरंत बाद एक नाम ढूंढ़ना पड़ता है. आप कोई नाम चुन सकते हैं, मसलन हेमा मालिनी. प्रकाशक अपनी ग़लतफ़हमी के चलते उसे छाप देगा, पाठक कुछ और सोचकर उसे ख़रीद लेगा, और सबसे बड़ी बात कि गूगल में खोजने वाले बिना चाहे आपके उपन्यास की ओर भटक जायेंगे, और जो लोग गूगल में एंट्री के आधार पर किताब खरीदने का फ़ैसला करते हैं – मसलन पुस्तकालयों के अधिकारी – उनके बीच आपके अच्छे अवसर होंगे. या कुछ इस किस्म का नाम हो सकता है - भरी टोकरी के नीचे. आप संस्कृत नाम भी रख सकते हैं - उदाहरण के लिये अंतर्यापन या भीष्मायमान. इसके बाद आपको विषय ढूंढ़ना पड़ेगा. विषय तीन तरीक़े से ढूंढ़े जा सकते हैं : आप शुरू में अपना विषय तय कर सकते हैं. मिसाल के तौर पर आप तय कर सकते हैं कि आप सापेक्ष मौलिकतावाद पर एक उपन्यास लिखना चाहते हैं. या फिर लिखते-लिखते आप का विषय बन सकता है. मसलन उपन्यास तैयार हो जाने के बाद आप पा सकते हैं कि यह जादुई भौतिकतावाद का विमर्श हो चुका है. तीसरा तरीका यह है कि न तो शुरू में और न ही आखिर में कोई विषय हो, भले ही आपका उपन्यास तैयार हो जाय. हर हालत में आपके दो तरह के मित्र होने चाहिये. कुछ ऐसे, जो आपके उपन्यास को एक सशक्त हस्ताक्षर, वर्तमान दौर की एक उल्लेखनीय घटना या क्लासिकीय आयाम का नव उन्मेषवाद कहें, और दो-तीन ऐसे जो कड़ी भाषा में सिर्फ़ उपन्यास की निंदा ही न करें, बल्कि आपको व्यक्तिगत रूप से भारी-भरकम गाली-गलौजों से नवाज़ें. दूसरी किस्म के मित्र ज़्यादा ज़रूरी हैं, उनके बिना कोई उपन्यास सफल नहीं हो सकता. परंपरागत पाठकों और ऋषि-मुनि हो चुके आलोचकों की ख़ातिर उपन्यास में कुछ विवादास्पद मुद्दे भी होने चाहिये. ज़ाहिर है कि आपके उपन्यास के एक बड़े हिस्से में दर्शन शास्त्र के लेक्चर होंगे, पर उनसे यह उम्मीद मत रखिये कि वे आपके उपन्यास को विवादास्पद होने में मदद करेंगे. पाठक हो या आलोचक, कोई भी उन्हें नहीं पढ़ेगा. प्रकाशक सिर्फ़ इतना पूछेगा कि कितनी पर्सेंट फिलासफी है. अगर वह 35 पर्सेंट से ज़्यादा हो, तो सीधे-सीधे कह देगा : दो-तीन पर्सेंट घटा दीजिये, उसकी जगह बेडरुम वाले सीन को लंबा कर दीजिये. उपन्यास की सफलता के लिये ज़रूरी है कि उसमें एक-तिहाई चटखारी बातें हो, एक-तिहाई समझ में न आने वाली बातें हों, और शेष एक-तिहाई उन शब्दों से भर दिये जायं, जो लिखते समय दिमाग में आते हों. अगर कोई शब्द न आये, तो उसकी जगह कोई दूसरा शब्द लिख दीजिये. अगर वह पाठक की समझ में न आवे तो यह आपकी ख़ुशकिस्मती है, वह इसे एक सारगर्भित रचना मानेगा. समय का मैनेजमेंट उपन्यास लेखन के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात है. आप लिखेंगे, प्रकाशक फ़ैसला लेने के लिये थोड़ा समय लेगा, छापने व मार्केटिंग की व्यवस्था के लिये थोड़ा समय चाहिये, इस दौरान प्रकाशक आपसे कुछ व्यक्तिगत योगदान की भी उम्मीद रखेगा – मसलन अगर आप जालसाज़ी के मुकदमे में दो-चार महीनों के लिये जेल घूम आते हैं, तो उपन्यास का दूसरा संस्करण 6 महीनों के अंदर ही निकल सकता है. अगर कुछ न हो तो एक गंदा सा डाइवोर्स भी मददगार हो सकता है, आये दिन अखबारों में जिसकी चर्चा हो. इन सबके बाद आपका उपन्यास बिल्कुल ऐसे समय में छपकर बाहर आना चाहिये, जब सात-आठ दिनों के अंदर पुस्तक मेला शुरू होने वाला हो. किताब छपने से पहले आलोचकों को समय पर उसकी ख़बर भी देनी पड़ती है, ताकि बाज़ार में आने के एक दिन बाद से ही वे इस उपन्यास के बारे में अपनी गहन वैचारिक टिप्पणियां दे सकें. इस समय सारिणी का ख़्याल न रख पाने के कारण दोस्तोयेव्स्की या वैन गॉग जैसे लेखक ज़िंदगीभर ग़रीब रह गये. वैन गॉग बेचारे की तो कोई भी किताब आजतक नहीं छप पाई. उपन्यास का आकार लगभग तीन से चार सौ पृष्ठों तक का होना चाहिये. इससे कम हो सकता है, लेकिन उस हालत में यह ख़तरा मौजूद रहता है कि प्रकाशक का संपादक उसे पढ़ने की हिम्मत कर ले और आपका उपन्यास छपने से रह जाय. अगर उपन्यास चार सौ पृष्ठों से अधिक का हो, तो छपाई में कागज़ ज़्यादा बरबाद होगा, प्रकाशक का नुकसान हो जाएगा. इसलिये काफ़ी संभावना है कि वह इसे छापने से इंकार कर दे. किसी भी हालत में प्रकाशन से पहले उसके अंश किसी पत्रिका को छापने के लिये न दें. इससे आपके भावी उपन्यास की छवि ख़राब हो सकती है. उपन्यास छपने से पहले आपको इन बातों का ध्यान रखना पड़ेगा : - दो-तीन टीवी जर्नलिस्टों को बीच-बीच में दारू पिलाते रहिये, ताकि वक्त पर वे अपने पर्दे पर आपके उपन्यास की चर्चा करें. अगर वे उसे विवादास्पद घोषित कर सकें, फिर तो आपको चर्चित, यानी महान लेखक बनने से कोई नहीं रोक सकता. उस हालत में मुहल्ले के कुछ लड़कों को बहलाकर अपने घर के सामने प्रदर्शन और तोड़फोड़ करवा दीजिये. - फ़िल्म जगत के एक-आध परिचित को फ़ांसकर यह अफ़वाह फैला दीजिये के आपके उपन्यास पर एक फ़िल्म बनाई जाने वाली है. खुद प्रकाशक से यह बात मत कहिये, बल्कि किसी से कहलवा दीजिये. अगर प्रकाशक आपसे पूछे, तो कहिये कि अभी इस पर बात करना ठीक नहीं होगा. - उपन्यास के प्रकाशन से 6 माह पहले से ही सार्वजनिक रूप से दोस्तों के साथ दारू पीना बंद कर दीजिये, ताकि यह अफ़वाह फैल जाय कि आप इन दिनों रचनाकर्म में व्यस्त हैं और आपका उपन्यास आने वाला है. बस समझ लीजिये कि आपका उपन्यास सफल हो गया. अब सिर्फ़ लिख डालने की देर है.