Tuesday, December 12, 2017

जहाज का विकास

अंबरीश कुमार अमदाबाद में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सी प्लेन की यात्रा चर्चा में है .इसे विकास का भी मानक बताया जा रहा है .हालांकि देश में यह सेवा कई वर्ष पहले अंडमान में शुरू हो चुकी है और बहुत लोकप्रिय भी है .इसलिए इसे देश में पहली बार शुरू किया गया यह कहना ठीक नहीं है .पूर्वोत्तर भारत और समुद्री द्वीप में भी छोटे जहाज और हेलीकाप्टर की सेवा जारी है .एक दिलचस्प तथ्य यह भी बताया जा रहा है कि जिस दस सीट और सिंगल इंजन वाले कोडियाक 100 सी प्लेन में मोदी आज अमदाबाद में चढ़े वह इससे पहले पाकिस्तान के कराची में था .चुनाव की इस बहस में यह तथ्य भी अद्भुत है . इस बहस से याद आया कि मैंने नब्बे के दशक में पहली बार समुद्री जहाज से यात्रा की की .गया सवारी और कार्गो जहाज से तो लौटा लक्जरी क्रूज वाले जहाज से .कावरेत्ती से अगाती फिर बंगरम द्वीप जाना था .साधन था हेलीकाप्टर जिसका भाड़ा था अस्सी रुपए सवारी .होवर क्राफ्ट भी थे पर गहरे समुद्र में तेज रफ़्तार की वजह से बेटे को उल्टी जैसा महसूस होता था और हेलीकाप्टर पर चढ़ने की इच्छा भी इसलिए उसी से गए .यह वहां के निवासियों के लिए आम साधन जैसा था जिसके लिए सरकार सब्सिडी भी देती . कावरेती से बंगरम द्वीप जाने वाले सैलानी भी इन हेलीकाप्टर या फिर छोटे जहाज का इस्तेमाल करते .आम लोग भी द्वीप के बीच की यात्रा इन हेलीकाप्टर से करते .यह कोई विलासिता का मामला भी नहीं था बल्कि जरुरत थी लोगों की .क्योंकि दो द्वीप को जोड़ने का दो ही रास्ता था .समुद्र का या हवा का .इसलिए छोटे जहाज और हेलीकाप्टर का इस्तेमाल आम बात थी . करीब ढाई दशक पहले उधर आम जनता के लिए यह सेवा थी .पूर्वोत्तर में भी कई जगह है .पर यह विकास का कोई मानक बन जाए यह कैसे संभव है .इन द्वीप से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों के हालात सभी को पता है .अपना यूपी बहुत पिछड़ा माना जाता है .वर्ष बारह में यानी पांच साल पहले अमदाबाद जिस दिन पहुंचा था उसी दिन राज्य की पहली लो फ्लोर बस का उद्घाटन हो रहा था .मोदी ही कर रहे थे . अपने यहां लखनऊ में इंदिरा नगर से हजरत गंज तक मै ऐसी कई बसों में बैठ चुका था .गुजरात की बसे ठीक चेन्नई जैसी नजर आ रही थी बहुत पुराने ढंग की खिडकियों वाली .वही लाल रंग वाली बसे .द्वारका से दीव की यात्रा की तो सड़क इतनी खराब थी की पीठ दर्द होने लगी . आवागमन के साधन की बात हो तो मेट्रो तो कोलकोता में पहले आई फिर दिल्ली मुंबई और अब लखनऊ में भी बैठ सकते हैं .विकास को खाली बस ट्रेन पानी वाले जहाज से न नापे .किसान किस हाल में है नौजवान किस हाल में है .शिक्षा स्वास्थ्य का क्या हाल है .इन सब मानक पर भी बात होनी चाहिए .दलित पिछड़े अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं इसे मानक माना जाना चाहिए .बेटियां कितनी सुरक्षित हैं इसे मानक माना जाना चाहिए .सी प्लेन पर सभी नहीं चढ़ने वाले और जिन्हें चढ़ना है वे शानदार जहाज पर कहीं भी चढ़ लेंगे . पहली फोटो -अंडमान का सी प्लेन दूसरी नब्बे के दशक से सवारी ढोते लक्ष्यद्वीप के हेलीकाप्टर

Wednesday, November 1, 2017

जंगल में एचएमटी का भात और चटनी

अंबरीश कुमार भोरमदेव जंगल से होते हुए चिल्फी घाटी पार कर कान्हा गेट पर पहुंच चुके थे .हल्की बरसात से जंगल भीगा भीगा था .हरा भरा और खाली पड़ा रास्ता अच्छा लग रहा था .बीच बीच में अल्लू चौबे कोई फल या मिठाई के लिए बैग तलाशते तो ध्यान भटक जाता था .वे शुगर कम न हो इस वजह से कुछ देर बाद हल्का नाश्ता या फल आदि ले ले लेते .कवर्धा से चले तो डाक बंगले के रसोइये को निर्देश दे दिया था कि सिर्फ सरसों वाली रोहू और भात बना कर रखे ,आते समय देर हो सकती है क्योंकि जंगल का रास्ता अगर शाम को बंद हो गया तो फिर लंबा रूट लेना पड़ेगा .और रात में हुआ भी वही .खैर हम आगे बढे .दोपहर में हमें भोजन के समय चिल्फी में जंगलात विभाग के डाक बंगले में पहुंच जाना था .कार्यक्रम के आयोजकों ने बता रखा था कि भोजन के बाद बैठना है 'आपसदारियां ' कार्यक्रम में और उसके बाद एक बैगा आदिवासी गांव में जाना है .पर जंगल में घूमने का अपना जो पूर्व अनुभव रहा है उसे देखते हुए सुबह ही लंच पैक करा लिया गया था ताकि कोई दिक्कत न आए .जिन लोगों को शुगर की दिक्कत हो वे इसे समझ सकते है .समय पर खाना न मिलने से बहुत दिक्कत हो जाती है .रास्ते में भोरमदेव मंदिर में कुछ देर रुके फिर चिल्फी घाटी की तरफ चल पड़े .यह घाटी छतीसगढ़ का कश्मीर कहलाती है हालांकि ऐसा कुछ नजर नहीं आया .पर जंगल अभी भी अपने बचपन में है .कुछ समय पहले ही इसे भोरमदेव अभ्यारण्य में बदला गया है .इसलिए जंगल कम बगीचा सा ज्यादा नजर आता है .साल सागौन के पेड़ है पर बहुत बड़े नहीं हुए है .जंगलात विभाग वालों ने बताया कि जानवर है पर बाघ की मौजूदगी कम नजर आती है .कभी कभार कान्हा की तरफ से कोई भटकता हुआ बाघ इस तरफ आ जाए तो बात अलग है .फिर भी यह अभ्यारण्य का रास्ता सुबह छह बजे खुलता है और शाम छह बजे बंद कर दिया जाता है .रात में किसी को भी भीतर जाने की इजाजत नहीं है . जंगल पार करते करते दिन के दो बज चुके थे और हम कान्हा के चिल्फी गेट पर पहुंच चुके थे .कुछ तकनीकी दिक्कत आई क्योंकि वायरलेस से जंगलात विभाग के किसी अफसर से संपर्क नहीं हो पा रहा था .मोबाइल में कोई सिग्नल भी नहीं था .कान्हा का कोर क्षेत्र यही से शुरू हो रहा था .कुछ देर जंगल में घूमे .चौबे बोले ,भूख लग रही है .दाल भात खाने की इच्छा है .जो खाना पैक था उसमे सब्जी पराठा ही था जिसे खाने की कोई इच्छा नहीं थी .तय हुआ बैठक स्थल पर चल कर भोजन किया जाए .जंगल से बाहर निकले और मंडला की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ गए .जंगलात विभाग का डाक बंगला कुछ आगे थे .पर खाने का इंतजाम बगल में .गेट पर पहुंचे तो देखा लोग पंगत में बैठकर खाना खा रहे हैं .हल लोग बरामदे में रखे तखत के पास बैठे तो नजर जनसत्ता मुंबई के पुराने सहयोगी दीपक पांचपोर पर पड़ी .वे बड़ी गर्मजोशी से मिले और खाना परोस रही आदिवासी महिला को पत्तल लगाने को कहा .पत्तल में भात दाल आलू की सब्जी और हरी चटनी दी गई .भात बहुत स्वादिष्ट लगा तो पूछा .पता चला यह एचएमटी नाम के धान से बना है .चटनी तो अद्भुत थी .अल्लू चौबे बार बार मांग रहे थे .जी भर कर दाल भात खाने के बाद उठे तो बैठक शुरू हो चुकी थी .

Sunday, October 29, 2017

एक शाम सूपखार के डाक बंगला में

अंबरीश कुमार यह सूपखार का डाक बंगला है .अब तक देश में सौ से ज्यादा डाक बंगले में रुक चुका हूं पर ऐसा डाक बंगला कभी नहीं देखा .पीले फूलों के किनारे जंगल के उबड़ खाबड़ रास्ते से होते हुए जब इस डाक बंगला में पहुंचे तो फूस की छत वाले पिरामिड आकार में बनी इस संरचना को देखते ही रह गए .यह अद्भुत है .यह सौ साल से भी ज्यादा पुराना डाक बंगला है .कई विशिष्ट अतिथि इसमें ठहर चुके है जिसमे प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी शामिल हैं .मुझे इसके बारे में पत्रकार और साहित्यकार सतीश जायसवाल ने बताया था .देश के डाक बंगलों के बारे में लिख रहा हूं इसलिए जब कवर्धा के जंगल में ' आपसदारियां ' कार्यक्रम बना तभी इसमें आने का कार्यक्रम बना लिया .कवर्धा से भोरमदेव अभ्यारण्य के सम्मोहक रास्ते से होते हुए यहां पहुंचा .यह घने जंगल के बीच है .यह गर्मियों में भी ठंढा रहता है .इसमें कोई पंखा नहीं बल्कि छत से दरी बांधकर हवा देने की व्यवस्था है .यह व्यवस्था कभी जेलों में जेलर के कमरे में होती थी .मैंने इसे सबसे पहली बार जेलर ताऊ जी के घर नैनी जेल के घर में देखा था .सत्तर के दशक में .दो कैदी दिन में इस तरह का पंखा चलाते थे .आज वह फिर याद आया .वैसे देश के बहुत से डाक बंगलों में पहले रुक चुका हूं जिसमे न बिजली न फोन और न पानी का नल था .चकराता के डाक बंगला से लेकर छतीसगढ़ के देवभोग स्थित तौरंगा का डाक बंगला इसमें शामिल है .पर ऐसा विशाल परिसर ,ऐसा भव्य फूस का डाक बंगला पहली बार देखा .जंगल में ठहरना हो तो इस डाक बंगला में जरुर ठहरना चाहिए .ठंड का ही असर होगा जो चीड प्रजाति का दरख्त भी यहां है तो शाल किसी पहरेदार की तरह खड़े हैं .सामने के परिसर में इसका एक अपना और बहुत खूबसूरत जंगल है .ठीक उसी तरह जैसे मालदीव और लक्ष्यद्वीप के बीच रिसार्ट में समुद्र के किनारे हर काटेज का अपना निजी समुद्र होता है .शाम और सुबह के समय धुंध में यह डाक बंगला बहुत रहस्मय लगता है .लंबे बरामदे में बैठे या आराम कुर्सी लेकर सामने के जंगल में बैठ जाएं ,इसे देखते ही रह जाएंगे .

Saturday, October 28, 2017

जंगल में शिल्प का सौंदर्य

अंबरीश कुमार जंगल में भटकते भटकते शाम हो चुकी थी .पहाड़ पर पैदल चलने की वजह से थकावट ज्यादा थी .वैसे भी कल सुबह रायपुर से जल्दी निकलना हुआ और जो नाश्ता पैक कराया वह वैसे का वैसा ही रात तक पड़ा रहा .कान्हा जंगल के चिल्फी द्वार के पास पहले खाने का कार्यक्रम बना पर सतीश जायसवाल के साथ बाहर से आए मित्रों के साथ ही दोपहर के भोज में शामिल होने का फैसला हुआ .बाद में बैठना था ,एक दूसरे से परिचय और फिर अपने अनुभव साझा करने थे .इसलिए कान्हा मुक्की जंगल के द्वार से चिल्फी लौट आए . सुबह कवर्धा के डाक बंगले से चले तो अनिल चौबे ने रसोइये को रात के खाने के लिए कह दिया था क्योंकि कब लौटेंगे यह तय नहीं था .सिर्फ रोहू मछली और भात बना कर रखने को कहा गया था .कवर्धा में नदी और ताल की मछलियां काफी मिलती हैं .वैसे तो समूचा छतीसगढ़ ही लबालब ताल तालाब वाला अंचल है .चार मील चले तो कोई न कोई बड़ा ताल मिल ही जाएगा और रोहू तो बंगाल तक जाती है .यही वजह है कि दो दिन से एकल समय रोहू चावल ही रात के खाने में चल रहा था .खैर चले तो पहला पड़ाव भोरमदेव था .यह छतीसगढ़ का कला तीर्थ भी कहलाता है .गोंड आदिवासियों के उपास्य देव माने जाते हैं और उन्ही के नाम पर यह मंदिर बना है .वे महादेव के रूप हैं .छतीसगढ़ के पूर्व मध्य काल यानी राजपूत काल में बने सभी मंदिरों में यह सर्वश्रेष्ठ माना जाता है .जिसका निर्माण लक्ष्मण देव राय ने कराया था .मंदिर की बाहरी दीवार पर नायक नायिकाओं ,अप्सराओं और नर्तक नर्तकियों की प्रतिमाओं के साथ मिथुन मूर्तियां भी है .इसी वजह से इसे छतीसगढ़ का खजुराहों भी कहा जाता है .चारो ओर जंगल से घिरा पहाड़ है तो सामने के ताल में लगा कमल ध्यान खींचता है .दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी में यह अंचल कला संस्कृति के क्षेत्र में कितना समृद्ध था इसका पता भोरमदेव मंदिर की इन प्रतिमाओं को देख कर पता चलता है .मंदिर के दक्षिण में करीब आधा मील दूर एक शिव मंदिर है जिसे मंडवा महल के नाम से जाना जाता है .इसका निर्माण 1349 ईस्वी में फणी नागवंशी शासक रामचंद्र का हैहयवंशी राजकुमारी अंबिका देवी के साथ विवाह के उपलक्ष्य में कराया गया था .पश्चिम की तरफ मुख किए यह मंदिर आयताकार है .इस मंदिर के भी बाहरी भाग में मिथुन मूर्तियां नजर आती है .जंगल के बीच शिल्प के इस सौन्दर्य को देख कोई भी चकित हो सकता है . भोरमदेव का यही अंचल ऐसा है जो अपने छतीसगढ़ प्रवास के दौरान छूट गया था .तब बस्तर की तरफ ज्यादा जाना होता था खबर की वजह से .खैर कुछ देर बाद भोरमदेव से आगे बढे तो फिर जंगल के बीच काफी देर चलना पड़ा .कान्हा गेट पर नेटवर्क भी नहीं मिला न ही वायरलेस से जंगलात विभाग के किसी आला अफसर से बात हो सकी .हम चिल्फी लौटे तो पंगत पर लोग बैठ चुके थे .एचएमटी प्रजाति के धान से तैयार चावल ,अरहर की दाल ,आलू की सब्जी और चटनी परोसी गई .खाने के बाद सतीश जायसवाल और बाहर से आए लेखक ,पत्रकार और फिल्मकार बैठे .अपने अनुभव साझा किए .तय हुआ करीब बारह किलोमीटर दूर पहाड़ पर एक आदिवासी गांव में आदिवासियों के साथ कुछ घंटे बैठा जाएं .उनसे संवाद हो .उनका रहन सहन और खानपान देखा जाए .साथ भोज हो और रात में लौटा जाए .पर अल्लू चौबे पैदल नहीं चल सकते थे इसलिए जिस जगह तक वाहन जंगल में गए वे वही बैठ गए .हम सब आगे बढे .जंगल का रास्ता और बीच में नदी नाला भी .पर आदिवासियों ने जिस उत्साह से करमा नृत्य से अपना स्वागत किया उससे थकान महसूस नहीं हुई .काफी देर गांव के कुछ घरों को देखते रहे .मुझे अंधेरा होने से पहले लौटना था क्योंकि भोरमदेव अभ्यारण्य का द्वार शाम छह बजे के बाद बंद कर दिया जाता है जानवरों की वजह से .दूसरे चौबे को अकेला जंगल में छोड़ कर आया था .लौटा तो वे गाडी में सोते मिले .अभी अंधेरा नहीं हुआ था पर जंगल पार करते करते रौशनी जा चुकी थी .बहुत प्रयास के बावजूद समय पर भोरमदेव गेट पर नहीं पहुंच पाए और लंबे रास्ते से लौटना पड़ा .रात के करीब आठ बजे डाक बंगला में लौटे .

Sunday, October 1, 2017

गांधी के गांव में एक दिन

अंबरीश कुमार सेवाग्राम (वर्धा), अक्टूबर। महात्मा गांधी की कुटिया के आगे खड़े हुए तो आजादी की लड़ाई का दौर याद आ गया। जिसके बारे में हमने सुना था या पढ़ा था। इस आश्रम को महात्मा गांधी ने नया केन्द्र तब बनाया जब वे १९३४ की मुंबई कांग्रेस में अपना प्रस्ताव नामंजूर हो जने की वजह से नाराज हुए। महात्मा गांधी ने तब कांग्रेस पार्टी के संविधान में वैधानिक और शांतिपूर्ण शब्द की जगह सत्य और अहिंसा रखने का प्रस्ताव किया था। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। जिसके बाद नाराज गांधी ने वर्धा के इस आश्रम में आकर रहना शुरू किया। इसी आश्रम में एक कुटिया के भीतर लकड़ी का बड़ा बक्सा रखा है जिसमें सांप रखे जते थे। पता चला कि अहिंसा के चलते गांधी जी की हिदायत थी कि सांप भी मारे नहीं जएंगे, उन्हें पकड़कर इस बक्से में रखा जएगा और बाद में जंगल में छोड़ दिया जएगा। गांधी का अहिंसा का यह दर्शन आतंकवाद के नए दौर में फिर प्रासंगिक नजर आ रहा है। हालांकि १९३४ की मुंबई कांग्रेस में कांग्रेस ने गांधी के प्रति पूर्ण आस्था का प्रस्ताव भी पास किया था। गांधी कांग्रेस से नाराज हुए पर कांग्रेस के दिग्गज नेता उनकी शरण में ही रहे। आतंकवाद के इस दौर में बापू की अहिंसा फिर एक बड़ा राजनैतिक हथियार साबित हो सकती है। इतिहासकार प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने कहा,‘जिस अहिंसा के लिए महात्मा गांधी ने कांग्रेस से नाराज हो वर्धा के मदनवाड़ी आश्रम को अपना नया केन्द्र बनाया, उसने समूचे देश की राजनीति बदल दी। यह बात अलग है कि कांग्रेस पार्टी ने आज तक अपने संविधान में गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रस्ताव को शामिल नहीं किया। आज कोई सोच भी नहीं सकता कि राज्य अहिंसक हो सकता है पर यदि इसे एक बार फिर से अपनाया जए तो आतंकवाद का मुकाबला किया ज सकता है।’ सेवाग्राम के आश्रम में हम वहां खड़े थे जहां कभी महात्मा गांधी सूर्य स्नान किया करते थे। दाहिने हाथ गांधी की कुटिया थी। कुटिया के भीतर गांधी की बैठक जिसमें जमीन पर चटाई बिछी थी। बगल में लकड़ी की वह चौकी थी जिस पर वह सोते थे। यह कुटिया गांधी की सादगी भरी अलग जीवन शली को दर्शाती थी। उनका छोटा पर साफ-सुथरा बाथरूम जिसमें अखबार, पत्र व पत्रिकाएं रखने की भी जगह थी। वे समय का पूरा सदुपयोग करते हुए जरूरी पत्रों तक को वहां पढ़ा करते थे। कुटिया से बाहर निकलने पर सामने घने छायादार वृक्ष नजर आते हैं जो गांधी जी के उस दौर की याद दिलाते हैं। सुबह के दस बजे भी सेवाग्राम परिसर में सन्नाटा पसरा नजर आता है। नागपुर से करीब घंटे भर बाद हम आश्रम पहुंचे तो पता चला कि आजदी के आंदोलन की अलख जगाने वाले महात्मा गांधी के आश्रम में न तो महाराष्ट्र से कोई नेता सुध लेने आता है और न राष्ट्र से। नागपुर के सामाजिक कार्यकर्ता बाबा डाबरे ने कहा,‘यहां यदा-कदा ही कोई बड़ा नेता आता है। आमतौर पर नागपुर आने वाले या फिर नागपुर से गुजरने वाले पर्यटक तक इधर नहीं आते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि राज्य सरकार ने इसे कोई तवज्जो तक नहीं नहीं दी है। नई पीढ़ी को तो ऐसी जगहों को दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया जना चाहिए। यह हमारे इतिहास का स्वर्णिम क्षेत्र रहा है।’ चेन्नई में हमने द्रमुक के संस्थापक अन्नादुरै का स्मारक देखा है जहां हमेशा भीड़ लगी रहती है और उनके समर्थक महिला पुरूष समाधि स्थल के आसपास दंडवत नजर आते हैं। दक्षिण के दलित आंदोलन के महानायक के प्रति लोगों की आस्था कोई भी मरीना समुद्र तट पर जकर देख सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के इस आश्रम में आज बहुत कम लोग नजर आते हैं। गांधी ने यहां १२ साल गुजरे। यहां से जब वे नोवाखाली के सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए निकले तो फिर लौट कर नहीं आए। इससे पहले इसी आश्रम में पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मुहम्मद अली जिन्ना तक उनसे विचार विमर्श के लिए आते-जते रहे। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म का वह दृश्य याद आता है जिसमें नेहरू और जिन्ना महत्वपूर्ण विषय को लेकर गांधी से चर्चा करना चाहते हैं पर गांधी सहज भाव से बकरी को पो खिलाते नजर आते हैं। महात्मा गांधी की उस जीवन शली को इस आश्रम में आकर कोई भी महसूस कर सकता है। सेवाग्राम के बारे में यह भी कहा जाता है गाँधी वर्धा के इस गावं में ३० अप्रैल १९३६ की सुबह करीब 5 बजे पहुचे थे। साथ थी बा। उन्होंने गावं वालो से बसने की चर्चा की और इजाजत मांगी .पहले इस गावं का नाम सेगावं था जहा एक पगडण्डी आती थी .पोस्ट ऑफिस नही था और साथ ही एक दूसरे गावं का नाम सेगावं था .इस वजह से गांधी जी ने इसका नाम सेवाग्राम रखाबाद में १९४० से यह सेवाग्राम के नाम से जाने लगा.जब गांधी यहाँ आए तो वे ६७ साल के थे .तब यह इलाका साँप और बिचू के चलते बदनाम भी था. सेवाग्राम के इस आश्रम में मिले सीता राम राठौर ने कहा,‘आए दिन बम फट रहे हैं और देश का नौजवान बंदूक उठाकर हिंसा के रास्ते पर चल रहा है। ऐसे में फिर उस संत की याद आती है जिसने अहिंसा का रास्ता पूरी दुनिया को दिखाया। आज के समय में महात्मा गांधी ज्यादा प्रासंगिक हैं जिनके मूल्यों को लेकर समाज में नई पहल की ज सकती है।’ महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के साठ साल पूरे हो चुके हैं और देश आतंकवाद की नई चुनौती ङोल रहा है। ऐसे में वर्धा का यह आश्रम अंधेरे में एक चिराग की तरह नजर आता है।02 October 2008

Wednesday, September 27, 2017

बार नवापारा जंगल का डाक बंगला

अंबरीश कुमार बारह नवंबर की सुबह रायपुर के सर्किट हाउस में नाश्ता कर ही रहा था कि अनिल चौबे आ गये. सर्किट हाउस की कैटरिंग इंडियन काफी हाउस संभालता है इसलिये खानपान पर दक्षिण भारतीय असर ज्यादा रहता है. इडली डोसा का भारी नाश्ता किया क्योंकि दिन भर जंगल में रहना था. बारनवापारा वन्य जीव अभ्यारण्य के बीच जंगलात विभाग के उस डाक बंगले की फोटो लेनी थी जो करीब डेढ़ सौ साल पुराना है. उसी वजह से यह यात्रा कर रहा था. उसके बाद उदंती वन्य जीव अभ्यारण्य के तौरंगा डाक बंगले की तरफ जाना था. दरअसल उन डाक बंगलों पर एक काफी टेबल बुक का मन बना है जो सौ साल से ज्यादा पुराने हैं और जहां मैं रुक चुका हूं. पुराने सहयोगी पत्रकार राजकुमार सोनी से पहले ही कहा था कि इन दोनों जगहों पर जाना है इसलिए वे न सिर्फ साथ चलेंगे बल्कि इन जगहों पर ठहरने की व्यवस्था भी करा कर रखेंगे. यह इसलिए क्योंकि बरसात के बाद वन्य जीव अभ्यारण्य नवंबर के पहले हफ्ते में ही खुलते हैं और सैलानियों की भीड़ भी होती है. अगर पहले से बुकिंग न हो तो रात में रुकने में दिक्कत हो सकती है. हालांकि रायपुर में बारह तारीख को ही दिन में मुख्यमंत्री रमन सिंह से मुलाकात का समय तय था पर देर रात ही अनिल चौबे ने उसे आगे बढ़ा देने के लिए कह दिया था. खैर नोटबंदी के बाद का यह तीसरा दिन था और रायपुर एयरपोर्ट पर खुद अल्लू चौबे गाड़ी लेकर आ गये थे इसलिए दिक्कत नहीं हुई. दो हजार के कुछ नोट थे जिन्हें बचा कर रखे हुए था. काफी हाउस का बिल भी स्वाइप मशीन से चुकता किया. अब जंगल में तो यह सब चलने वाला नहीं था. सोनी को घर से लेकर महासमुंद की तरफ बढे तो सड़क बदली हुई नजर आयी. नवंबर के दूसरे हफ्ते में हलकी ठंड तो थी पर चढ़ते सूरज के साथ ठंड कम होती जा रही थी. शहर से निकलते ही मुझे लखौली में सिंचाई विभाग का वह डाक बंगला ध्यान आया जिसमें हर रविवार अपनी मंडली जुटती थी. ग्यारह की शाम रायपुर प्रेस क्लब ने खुद ही मेरी यात्रा संस्मरण पर आधारित पुस्तक घाट घाट का पानी का विमोचन कार्यक्रम रखा था. इस कार्यक्रम में राजकुमार सोनी ने भी इस डाक बंगले में उन दावतों का जिक्र किया जो मैं रायपुर में जनसत्ता का छतीसगढ़ संस्करण निकालने के बाद दिया करता था. उस मंडली में अपने बंगाली साथी प्रदीप मैत्र जो उन दिनों हिंदुस्तान टाइम्स के ब्यूरो चीफ हुआ करते थे वे तो रहते ही साथ ही ओडिशा के रहने वाले पीटीआई के प्रकाश होता भी जरुर होते. इनके अलावा कई और मित्र भी. छतीसगढ़ में ताल तालाब बहुत हैं और रोहू काफी होती है इसलिए हम सब भी इसके मुरीद थे. पर अल्लू चौबे ने बताया कि वह निकल चुका है. तभी फल बेचती एक महिला दिखी तो गाड़ी रुकवा ली. ताजे अमरुद और सेब ले लिए. दोनों एक ही भाव थे सौ रूपये किलो. दोपहर में कुछ न मिले तो इससे काम चल जायेगा यह सोच कर ले लिया था. गाड़ी से बाहर निकले तो हल्की ठंड का अहसास हुआ. यह नयी बनी चार लेन की सड़क मुंबई कोलकाता राजमार्ग संख्या छह थी जो ओडिशा के संबलपुर भुवनेश्वर होते हुए कोलकाता की तरफ जाती है. रायपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर पिथौरा से हमें मुड़ना था. सड़क के दोनों और नये लगे पेड़ अब जंगल जैसे लगने लगे थे. पिछली बार जब इस वन्य जीव अभ्यारण्य में आया था तो बहुत कम पेड़ थे. जाहिर है कि ये बाद में लगाये गये थे. दूर तक जाते ये जंगल अच्छे लगते हैं. पिथौरा आया तो मुख्य सड़क से बारनवापारा अभ्यारण्य के लिये मुड़े ही थे कि गायों का झुंड सामने आ गया. कुछ देर बाद ही आगे बढ़ पाये. इस बीच सोनी से पूछा कि बारनवापारा के डाक बंगले में रुकने के लिए बुकिंग करा ली है तो बात कर उन्हें सूचित कर दें कि हम लोग घंटे भर में पहुंच जायेंगे. इसके आगे मोबाइल मिलना मुश्किल होगा. सोनी ने जंगलात विभाग के किसी अफसर से बात कर बताया कि वहां सूचना जा चुकी है. करीब आधे घंटे बाद हम बारनवापारा अभ्यारण्य के तेंदुआ द्वार तक पहुंच चुके थे. यहां से प्रवेश का परमिट मिलता. गेट पर पता चला कि उनके पास कोई संदेश भीतर के अतिथि गृह से नहीं आया है इसलिये परमिट नहीं मिलेगा. दूसरे यहां मोबाइल काम नहीं करता इसलिये रायपुर से किसी संपर्क भी नहीं हो सकता. गेट पर बैठे गार्ड को बताया गया कि हम लोगों की बुकिंग है पर वह सुनने को तैयार ही नहीं. खैर कुछ देर की जद्दोजहद के बाद प्रवेश मिला तो वहां नकद देना था और कोई स्वाइप मशीन भी नहीं. मेरे पास कुछ छुट्टा था इसलिए दिक्कत नहीं आयी. भीतर प्रवेश करते ही दोनों तरफ घने जंगल और बीच से सीधी गुजरती कच्ची सड़क थी. साल,सागौन, सरई, साजा, महुआ से लेकर हर्र बहेड़ा तक. यह घना जंगल था. हर कुछ दूरी पर बार अभ्यारण्य की दूरी दिखाते साइन बोर्ड लगे थे जिसपर हिरन, सांभर,चीतल से लेकर बाघ तक की फोटो लगी हुई थी. कुछ देर बाद ही हम बारनवापारा पर्यटक ग्राम के चीतल रेस्तरां पहुंच चुके थे. यह जंगल के बीच सैलानियों के ठहरने के लिए जंगलात विभाग का रिसार्ट था जिसे कुछ साल पहले ही बनाया गया था. इसमें काफी पर्यटक रुक सकते हैं और रेस्तरां में खाने का अच्छा इंतजाम है. कुछ देर में ही जंगलात विभाग के स्थानीय प्रभारी संजू निहलानी आ गये और उन्होंने बताया कि हम लोगों के रुकने की व्यवस्था का संदेश मिल चुका था पर संचार व्यवस्था गड़बड़ा जाने की वजह से गेट पर जानकारी नहीं दी जा सकी थी जिसके लिये खेद भी जताया. यह रिसार्ट निहलानी के दिमाग की ही उपज थी जिसे शुरू हुये तीन साल हुआ है . इस साल यह करीब चौहत्तर लाख रुपये की कमाई करने जा रहा है. इस परियोजना पर राज्य सरकार ने करीब पांच करोड़ खर्च किये थे जिसकी भरपाई इस साल ही हो जाने की उम्मीद है. यहां रौशनी की व्यवस्था सौर उर्जा से की गयी है इसलिए बिजली आने जाने की कोई समस्या नहीं है. काटेज काफी भव्य बनाये गये हैं और उनके चारों तरफ सजावटी पेड़ पौधे और फूल भी लगाये गये हैं. शाम होते ही पक्षियों और जानवरों की आवाज सुनाई पड़ने लगती हैं. पर्यटक ग्राम से हम खाना खाकर निकले तो फारेस्ट विभाग के डाक बंगले में पहुंच गये. इस डाक बंगले का दो साल पहले कायाकल्प किया गया है जिसके बाद यह अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हो चुका है. इस डाक बंगले में करीब सौ साल पहले के उन अंग्रेज अफसरों का फोटो भी लगाया गया है जो मध्य प्रदेश के इस अंचल में तैनात थे. उनका ब्यौरा भी दिया गया है. इस डाक बंगले में करीब डेढ़ दशक पहले रुका था. दीपावली के ठीक बाद की बात है. चारों तरफ साल के सूखे पत्तों से घिरे इस डाक बंगले में डेक्कन हेरल्ड के साथी अमिताभ के और अपने परिवार के साथ देर शाम पहुंचा था क्योंकि जंगल के बीच से गुजरने वाली कच्ची सड़क बहुत ख़राब थी. तब आसपास कोई घर भी नहीं था. इस डाक बंगले में पहुंच कर बैठे ही थे कि एक बुजुर्ग खानसामा चाय लेकर हाजिर हो गया. उसने रात के खाने के बारे में पूछा तो उसे बता दिया गया. तीन बच्चे और चार वयस्क थे जिनमें ज्यादातर शुद्ध शाकाहारी. मुझे और अमिताभ को छोड़कर. तब यह डाक बंगला किसी पुरानी रहस्य रोमांच वाली फिल्म के सेट जैसा लग रहा था. डाक बंगला का वास्तुशिल्प भी देश भर में एक जैसा ही होता है. सामने बरामदा. भीतर जाते ही भोजन कक्ष जिसमें बैठने के लिए बड़े सोफे भी होते हैं और फायर प्लेस यह बताता है कि जाड़ों में इस जंगल में बिना आग तापे रहना मुश्किल होता है. इसी भोजन कक्ष से दो सूट अगल बगल जुड़े रहते हैं. रसोई करीब पचास फुट पीछे की तरफ होती है. सभी डाक बंगलों का वास्तुशिल्प ऐसा ही होता है चाहे उतराखंड का चकराता हो या फिर मध्य प्रदेश का बैतूल. उस दौर में इस डाक बंगले में लालटेन की रौशनी में बैठना पड़ा. पुराने ढंग का फर्नीचर और पलंग था. खिड़की के एक दो शीशे टूटे हुए थे जिनपर दफ्ती लगा कर रखा गया था. चौकीदार ने बता दिया था कि सावधानी बरतनी चाहिये क्योंकि जंगली जानवर के साथ सांप भी निकल आते हैं. कुछ समय पहले बरसात भी हो चुकी थी इसलिए सावधानी जरुरी थी. घने जंगल के बीच इस पुराने डाक बंगले में जानवरों की आवाज सुनाई पड़ रही थी. कुछ देर बाद हम सभी समय काटने के लिए पीछे बने रसोई घर में चले गये जहां खाना तैयार हो रहा था. लकड़ी से जलने वाले चार चूल्हों पर खाना बन रहा था. इस बीच एक आदिवासी महुआ की पहली धार वाली मदिरा ले आया जिसकी मांग अमिताभ ने की थी. उनका दावा था यह किसी भी स्काच से बेहतर होती है और आदिवासी इसी का नियमित सेवन करते हैं. मैं उस बुजुर्ग खानसामा दशरथ से बात करने लगा जो खड़े मसाले भून रहा था. भूनने के बाद उसे सिलबट्टे पर पीसना था. वह बताने लगा कि इस डाक बंगले से उसका संबंध साठ साल से ज्यादा का है. उसके पिता भी यहीं पर खानसामा थे. उस दौर में इस डाक बंगले की कई कहानियां सुनाई जाती थीं. अंग्रेजो के दौर में यह अफसरों का पसंदीदा शिकारगाह हुआ करता था. वे अफसर तीन चार दिन तक रहते और शिकार होता. तीतर बटेर ,जंगली मुर्गे ,हिरन से लेकर जंगली सूअर तक बनता. आजादी के बाद भी कई सालों तक शिकार होता रहा. यहां आना मुश्किल होता था इसलिए बहुत कम अफसर आते थे. अपने साजो सामान के साथ. इस जंगल में बहुत से पक्षी हैं. जंगली मुर्गा, पटकी, रगार, काला बगुला, किलकिला, ब्राह्मणी चील, लालमुनिया, हरेबा, गिद्ध, सिल्ही, अंधा बगुला, तीतर, बटेर, कठफोड़वा, किंगफिशर आदि. पर ज्यादातर जंगली मुर्गा ही इनके हत्थे चढ़ता. खैर अब न शिकारी रहे न शिकार की परम्परा. पर विकल्प में आसपास खासकर बफर जोन के गांवों से देसी मुर्गे आ जाते है. कान्हा वन्य जीव अभ्यारण्य में भी देसी मुर्गों का ज्यादा प्रचलन है और हर होटल या रिसार्ट में आसानी से उपलब्ध हो जाता है. अल्लू चौबे ने यहां भी उसका इंतजाम कर रखा था. पर रात में खाना खाने निकले तो एक बड़ा बिच्छू अनिल चौबे के पैर के नीचे आ गया. चप्पल पहने थे इसलिए बच गये. पर दहशत ऐसी की रसोई तक जाकर लौट आये. खाना कमरे पर ही देने को कह दिया. इससे पहले तीसरे पहर जंगल में निकले तो जिप्सी से इतने हिचकोले लगे कि बैठना मुश्किल हो गया. यह जंगल भी जंगल जैसा है. हर चार कदम पर जिप्सी के आसपास बड़ी मकड़ी का कोई न कोई जाला आ जाता. सूरज उतर रहा था. कही धूप कही छाया थी. जंगल के सामने के एक हिस्से में तालाब पर सूरज की रौशनी चमक रही थी. तालाब के एक तरफ घोस्ट ट्री यानी भुतहा पेड़ था. इस पेड़ की सुनहरी शाखायें पत्तियां गिरने के बाद भुतही नजर आती हैं, ऐसा साथ चल रहे फारेस्ट गार्ड ने बताया. सामने एक गोल पत्थर पर बैठी किंगफिशर की फोटो लेने के लिए कैमरा निकाला तो दोनों साथी फोटो खिंचने की मुद्रा में आ चुके थे. यह जंगल जानवरों से भरा हुआ है. इस तालाब पर शाम होते होते कई जानवर पानी पीने आते हैं. पर उस दिन कुछ परिंदों के अलावा कोई नजर नहीं आया. ये उनका सौभाग्य भले हो अपना तो दुर्भाग्य था. पर जंगल ने निराश नहीं किया. हिरन, चीतल और सांभर तो आसानी से दिखे पर रोमांचक रहा जंगली भालू और बायसन यानी जंगली भैंसा का दर्शन. जंगल से लौटते समय दो जंगली भालू दिखे जो दीमक खाने में इतने मशगूल थे कि सिर ऊपर ही नहीं कर रहे थे. जिप्सी को ज्यादा पास ले जाना ठीक नहीं था. फारेस्ट गार्ड ने चेतावनी दी कि इनके खाने में विघ्न डाला तो ये हमला कर सकते हैं. तबतक जंगल धुंध में डूबने लगा था. हम डाक बंगले में लौटे तो वह धुंध से घिरा हुआ था.

Friday, September 22, 2017

बेटियों से युद्ध नहीं संवाद करे सरकार

अंबरीश कुमार जेएनयू गया तो दिल्ली विश्विद्यालय भी नहीं बचा .अब यूपी के छात्रों से टकराव ठीक नहीं .आज तो मोदी आरती के लिए निकले तो रूट बदलना पड़ा .क्योंकि रास्ते में ये बेटियां खड़ी थी .बता रहे है कि नवरात्र में इन बेटियों पर लाठी चली है . बनारस हिंदू विश्विद्यालय की एक फोटो आई है .छात्राओं के आंदोलन से निपटने के लिए पुलिस के साथ सुरक्षा बल का वह दस्ता लगाया गया है जो दंगो से निपटता है .ये छात्राएं भी तो वही बेटियां हैं जिनके बचाने का नारा सरकार के शीर्ष पर बैठे नेता दे रहे हैं .बनारस तो देश के सबसे बड़े चौकीदार का राजनैतिक घर है .अब चौकीदार के घर में भी बेटियां सुरक्षित नहीं रहेंगी तो कहां रहेंगी .कल एक बेटी के साथ छेड़खानी हुई और एक बडबोले और बौड़म कुलपति के चलते छात्राओं को ही छात्रावास में कैद कर दिया गया .छात्राओं ने विरोध शुरू किया तो दबाने के लिए दंगा निपटाने वाले जवानो को आगे कर दिया गया .आप सोच कर देखे कि आपकी बहन बेटी घर से दूर छात्रावास में रह रही हो और कोई लंपट उसके साथ छेड़खानी करे तो किससे कार्रवाई की अपेक्षा रखेंगे . साफ़ है विश्विद्यालय प्रशासन से .और जब प्रशासन ही इन बेटियों की आवाज दबाने में जुट जाए तो कौन खड़ा होगा .प्रदेश की यह सरकार जब सत्ता आई थी तो एक एंटी रोमियो स्क्वायड बना कर पुलिस वालों को एक साथ जा रहे लड़की और लड़के को प्रताड़ित करने का हथियार दे दिया गया था .भाई बहन तक थाने में बैठाए गए तो पति पत्नी तक को नहीं छोड़ा .जब एकाध अफसर नेता के परिजन भी फंसे तो यह कवायद बंद हो गई .किसी भी जिले में चले जाएं अगर किसी लड़की महिला से छेड़खानी या बलात्कार का कोई मामला आएगा तो पहला प्रयास यह होगा कि लड़की वाले को थाने से ही बिना शिकायत लिखे भगा दिया जाए .और बलात्कारी बड़े घर का हुआ तो पैसे लेकर मामला रफा दफा कर दिया जाए .यह पुलिसिया चरित्र है .यह कोई योगी सरकार में नहीं बना सभी सरकार में रहा .पर यह तो संस्कार वाली सरकार है ,कुछ तो नई पहल करे कि लड़की सुरक्षित रहे .और जब कोई घटना घटे तो जल्द से जल्द और प्रभावी कार्यवाई हो .क्या यह बेहतर नहीं होता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कम से कम अपने निर्वाचन क्षेत्र में हुई इस घटना की जानकारी लेकर खुद कोई पहल करते .इससे उनका कद ही बढ़ता .विश्विद्यालय से लेकर जिला प्रशासन तक तो जिस लीपापोती में लगा हुआ है उससे लोगों का आक्रोश बढ़ रहा है . यह सिर्फ बनारस हिंदू विश्विद्यालय का मामला नहीं है .लखनऊ विश्विद्यालय से लेकर इलाहाबाद विश्विद्यालय तक में छात्राओं को किस तरह दबाया जा रहा है .लखनऊ विश्विद्यालय में छात्रा पूजा शुक्ल को जेल भेज दिया गया .और बडबोला प्राक्टर इस बहाने दूसरों को धमकाने में जुट गया .इलाहाबाद में ऋचा सिंह को किस तरह प्रताड़ित किया गया यह सभी ने देखा है .क्या इस सबसे यह छात्राएं दब जाएंगी .यह संभव नहीं है .हम लोग आंदोलन में रहे है ,देखा है .छात्रों को दबाकर कोई प्रशासन जीत नहीं पाता .लाठी गोली के बाद जेल भी छात्र जाते रहे और लड़ते रहे .इसलिए सरकार इन बेटियों से युद्ध न करे ,संवाद करे .एक परिसर में माहौल ख़राब हुआ तो दूसरा भी नहीं बचेगा .जेएनयू गया तो दिल्ली विश्विद्यालय भी नहीं बचा .अब यूपी के छात्रों से टकराव ठीक नहीं .आज तो मोदी आरती के लिए निकले तो रूट बदलना पड़ा .क्योंकि रास्ते में ये बेटियां खड़ी थी .बता रहे है कि नवरात्र में इन बेटियों पर लाठी चली है .