Monday, April 28, 2014

गुजरात के विकास की कीमत चूका रही है दम तोडती पश्चिम की गंगा

गुजरात के विकास की कीमत चूका रही है दम तोडती पश्चिम की गंगा दमन से अंबरीश कुमार पश्चिम कि गंगा यानी गुजरात के विकास की कीमत चुकाते हुए दम तोड़ रही है ।यह मुद्दा इस बार के लोकसभा चुनाव में दमन गंगा के किनारे जब उठ रहा था तब वाराणसी में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पूरब की गंगा को साफ़ करने का वादा नहीं इरादा बता रहे थे।पर इस इरादे पर मुंबई से करीब पौने दो सौ किलोमीटर दूर दमन के मछुआरों ज्यादा यकीन नहीं हो रहा था जिनकी जीविका गुजरात के विकास की भेट चढ़टी जा रही है ।गुजरात का वापी शहर देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल है जिसका औद्योगिक कचरा दमन गंगा के पानी को जहरीला बना चूका है ।अब मामला सिर्फ इस नदी तक ही नहीं बचा है बल्कि उसके आगे बढ़ गया है ।दमन के जम्पोर समुद्र तट के किनारे का पानी काई बार गहरा काला नजर आता है ।वजह दमन गंगा करीब बारह किलोमीटर दूर वापी के उद्योगों से सारा जहरीला कचरा इस समुद्र तट पर पहुंचा रही है ।कई बार तो इस नदी को देख कर लगता है कि यह इन उद्योगों का कचरा बहाने का निजी नाला हो ।इसके चलते समुद्र तट के पच्चीस किलोमीटर दूर तक के समुद्री जीव जंतु और मछलियाँ ख़त्म हो गई है । मामला सिर्फ मछलियों के ख़त्म होने का नहीं है बल्कि भू जल के तेजी से प्रदूषित होने का भी है । गुजरात के उद्योगों का असर कई अंचल और नदियों पर पड़ रहा है ।इसे लेकर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चेतावनी भी दे चूका है ।बोर्ड की कुछ महीने पहले जारी सालाना रपट में फिर दमन गंगा के प्रदूषण को लेकर चिंता जताई जा चुकी है ।इस सब के बावजूद कोई असर किसी पर भी पड़ता नजर नहीं आ रहा है ।कांग्रेस के नेताओं ने लोकसभा चुनाव में इसे मुद्दा भी बनाया तो मछुवारे भी यह सवाल उठाते है ।मोती दमन में रहने वाले प्रकाश तंदेल अब समुद्र में दूर तक शिकार करने जाते है क्योंकि आसपास मछली नही मिलती ।तंदेल ने कहा -साहब वे अपनी इस गंगा को गन्दा होने से बचा नहीं पाए और बड़ी गंगा को साफ़ करने की बात कर रहे है ।यह सवाल ज्यादातर मछुवारे उठाते है तो दमन के आम लोग भी ।क्योंकि दमन गंगा का पानी जहरीला होने की वजह से सभी को प्रभावित कर रही ।अब दमन के मध्यवर्गीय परिवारों में मिनरल वाटर के बड़े बड़े कैन इस्तेमाल हो रहे है ।भूजल भी इतना ख़राब हो रहा है कि लोग फ़िल्टर पानी की बजाए बाहर से मिनरल वाटर कैन मांगना ज्यादा बेहतर मानते है । केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वर्ष 2007 से 2009 तक अध्ययन कर जारी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि देश के 88 औद्योगिक क्षेत्र्रों में से 75 फीसद भारी प्रदूषण युक्त हैं। भारी प्रदूषण वाले प्रमुख दस क्षेत्रों में गुजरात का वापी शहर दूसरे नंबर पर था जबकि अंकलेश्वर पहले नंबर पर ।गुजरात के अन्य प्रदूषित शहरों को तो छोड़ ही दे सिर्फ वापी ही आसपास का माहौल बूरी तरह प्रदूषित कर चूका है और उसका सबसे ज्यादा असर दमन गंगा पर पड़ा है ।पर प्रदूषण दूर होने की बजाय और बढ़ा जिसकी पुष्टि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2013 में जारी रपट में की गई । इस रपट में दमन गंगा के प्रदूषण को विभिन्न मनको के जरिए दर्शाया गया है । इन मानकों में प्रमुख है जैव रासायनिक आक्सीजन मांग जिसे ' बीओडी ' कहते है किसी भी नदी में प्रदूषित खंड वह क्षेत्र है जहां पानी की गुणवत्ता का वांछित स्तर बीओडी के अनुकूल नहीं होता। जिन जलाशयों का बीओडी 6 मिलीग्राम1 से ज्यादा होता है उन्हें प्रदूषित जलाशय कहा जाता है। नदी के किसी भी हिस्से में पानी की उच्च गुणवत्ता संबंधी मांग को उसका निर्धारित सर्वश्रेष्ठ उपयोग समझा जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जो मानक तय किए है उसमे श्रेणी ए के तहत जल की गुणवत्ता बताती है कि बिना किसी शोधन के वह पेयजल स्रोत है जिसमें कीटाणुशोधन के बाद, घुल्य ऑक्सीजन छह मिलीग्राम1, बीओडी 2 मिलीग्राम1, या कुल कॉलिफॉर्म 50एमपीएन100 एमएल होना चाहिए।श्रेणी बी का पानी केवल नहाने योग्य होता है। इस पानी में घुल्य ऑक्सीजन पांच मिलीग्राम1 या उससे अधिक होना चाहिए और बीओडी -3एमजी1 होना चाहिए। कॉलीफार्म 500 एमपीएन100(वांछनीय) होना चाहिए लेकिन यदि यह 2500एमपीएन 100 एमएल हो तो यह अधिकतम मान्य सीमा है।श्रेणी सी का पानी पारंपरिक शोधन और कीटाणुशोधन के बाद पेयजल स्रोत है। घुल्य ऑक्सीजन 4 मिलीग्राम1 या उससे अधिक होना चाहिए तथा बीओडी 3 मिलीग्राम1 या उससे कम होना चाहिए तथा कॉलीफार्म 5000एमपीएन100 एमएल होना चाहिए। श्रेणी डी और ई का पानीद्ग वन्यजीवों के लिए तथा सिंचाई के लिए होता है। घुल्य ऑक्सीजन 4 मिली ग्राम1 उससे अधिक होना चाहिए तथा 1.2एमजी1 पर मुक्त अमोनिया जंगली जीवों के प्रजनन एवं मात्स्यिकी के लिए अच्छा माना जाता है। पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जब दमन गंगा नदी के पानी की जाँच की तो पता चला कि अधिकतम बीओडी स्तर 15.1 मिलीग्राम है । यह जाँच 24 अप्रैल 2011 को नानी दमन में हुई तो बाद में फिर दस फरवरी 2012 को दोबारा पानी का सैम्पल लिया गया तो बीओडी का स्तर 37 मिलीग्राम मिला । यह खतरनाक स्तर है और यह भी दर्शाता कि दमन गंगा में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है । पानी की गुणवत्ता के अन्य मानक का हवाला भी इस रपट में दिया गया है पर बीओडी से काफी कुछ साफ़ हो जाता है ।सीधे शब्दों में यह पानी न पीने लायक है और न ही दुसरे इस्तेमाल के लायक बचा है । इससे साफ़ है कि गुजरात के विकास की कीमत अब जल जंगल और जमीन को चुकाना पड़ रहा है ।दमन पुर्तगाली संस्कृति को संजोए हुए खूबसूरत सैरगाह है जो गोवा और दीव का हिस्सा भी है ।कभी यह मछुवारों की बस्ती हुआ करता था और आसपास के ज्यादातर गाँव के लोग नदी और समुद्र की मछली पर निर्भर थे ।पर पिछले तीन दशक में मछुवारों का व्यवसाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है और मछली का कारोबार भी करीब बीस फीसद घट गया है ।मछली का व्यवसाय घटा तो शराब का धंधा बढ़ गया ।वजह समुद्र में प्रदूषण के चलते मछुवारों को अब शिकार के लिए दूर तक जाना पड़ता है और इस वजह से लागत भी बढ़ जाती है ।दूसरी तरफ मछलियाँ भी कम मिलती है । बढती आबादी के साथ ही मछली पकड़ने वालों की संख्या भी बढ़ी है । दमन के समुद्र तट के पास आज भी दमन गंगा में अलग अलग रंग के झंडे वाली नावें दिखती है जो तडके शिकार के लिए निकलती है ।पर अब इन नावों में बहुत सी नावें कड़ी नजर आएँगी क्योकि इनपर जाने वाले मछुवारे दुसरे धंधे में लग गए है ।नानी दमन में जहाँ पर दमन गंगा और अरब सागर का पानी मिलता है वहाँ पर कुछ मछुवारों से बात हुई तो उनका कहना था कि अब इस धंधे में परिवार चलाना मुश्किल होता जा रहा है ।जितना डीजल और बाकी चीजों पर खर्च होता है वह ही नहीं निकल पाता।नदी का पानी बहुत ख़राब हो चूका है और फैक्ट्री का कचरा समुद्र में डाला जा रहा है तो मच्छी कैसे मिलेगा ।किसी को परवाह ही नहीं है ।मछुवारों की इस बात से विकास की असली तस्वीर भी सामने आ जाती है और नेताओं के वादे और इरादे भी ।वापी की आबोहवा तो ख़राब हो ही चुकी है अब इसका असर दमन पर भी दिखने लगा है ।जो सैलानी दमन आता है वह समुद्र का प्रदूषित पानी देखने के बाद दोबारा नहीं आना चाहता ।कई बार तो समुद्र के किनारे ही मरी हुई मछलियाँ उतराती नजर आती है जिसके चलते आसपास के रिसार्ट के लोग भी परेशान हो जाते है क्योंकि यह दृश्य किसी भी पर्यटक को रास नहीं आता है ।यहाँ बड़ी संख्या गुजरात से आने वाले पर्यटकों की होती है जो ड्यूटी फ्री शराब और समुद्र तट का आनंद उठाने आते है ।दिसंबर के अंत में ज्यादा भीड़ होती है पर दमन गंगा नदी और समुद्र देख कर वे भी सहम जाते है । इसीलिए दमन में यह राजनैतिक मुद्दा भी बना । नानी दमण माछीवाड की कोठापाठ शेरी में जब एक उम्मीदवार केतन पटेल की पत्नी टि्वंकल पटेल मछुवारों की बस्ती में माछीमार महिलाओं से मिली तो यही मुद्दा उठा । कोठापाठ शेरी में दमन जिले के दूसरे क्षेत्रों की तरह पीने के पानी की सबसे बडी समस्या है इसके अलावा दमणगंगा नदी से समुद्र तट पर फैले प्रदूषण से भी कोठापाठ शेरी की महिलाएं परेशान है। इन महिलाओं ने नदी को साफ़ करने की गुहार लगाईं क्योंकि यह नदी उनका परिवार भी पालती रही है ।इससे दमन गंगा की त्रासदी को समझा जा सकता है ।दमन के लोग गुजरात से यह उम्मीद लगाए बैठे है कि वे अपनी इस गंगा को पहले साफ़ करेंगे जो विकास की कीमत दे चुकी है ।साभार -नवभारत टाइम्स

चुनाव में दमण का समुद्र तट बचाने की गुहार लगा रहे है माछीमार किसान

लोकसभा चुनाव में पर्यावरण भी मुद्दा बन गया दमण से अंबरीश कुमार दमण ।पश्चिमी भारत के इस समुद्र तट पर आज शाम चुनाव का शोर ख़त्म हो चूका है । अब वोट पड़ने का इन्तजार है जो नदी और समुद्र को बचने के नाम पर माँगा जा रहा है ।यह जगह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के विकास का नारा यहाँ के लोगों के लिए त्रासदी बन गया है । गुजरात के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर वापी के जहरीले कचरे की वजह से अरब सागर का एक हिस्सा बुरी तरह प्रदूषित हो चूका है ।दोनों मुख्य नदियाँ भी प्रदूषित हो चुकी है ।जिसके चलते यहाँ का मछुवार समाज लगातार आक्रोशित रहा है और आज शाम तक की चुनावी सभाओं में यह मुद्दा उठा ।कांग्रेस प्रत्याशी केतन पटेल ने आज कहा कि दमण-दीव का विकास पांच वर्ष से बाधित हो चुका है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पडोसी धर्म निभाने की बात पिछले चुनाव में की थी परंतु पडोसी धर्म निभाने की बात तो दूर रही उन्होंने हमारे माछीमार भाईयों को प्रदूषण भेंट में दिया है। दमण गंगा एवं कोलक नदी के प्रदूषण से अनेक बीमारियां फैल रही है।इससे अगर निजात नहीं पाया गया तो मछुवारों का इस इलाके में अस्तित्व ही ख़त्म हो जाएगा ।यह मुद्दा दमण में गरमा चूका है ।यहाँ से कांग्रेस के उम्मीदवार केतन पटेल है तो भाजपा के उम्मीदवार लालू पटेल।यह एक ऐसा चुनाव क्षेत्र है जहाँ पर्यावरण मुद्दा बन गया है क्योकि नदी और समुद्र का पानी जहरीला होता जा रहा है ।रविवार को कांग्रेस के उम्मीदवार केतन पटेल का जुलूस यहाँ मशाल चौक से तीनबत्ती, चार रास्ता, झांपाबार, बस डिपो, खारीवाड, झरीमरी माता, सुप्रीम अपार्टमेंट से कॉलेज रोड होते हुए मशाल चौक पहुंचा तो हजारों समर्थक इकठ्ठा हो चुके थे । इस मौके पर कांग्रेस नेता विशाल टंडेल ने कहा कि मैं कांग्रेस का वफादार सैनिक था और हूँ आज कांग्रेस के उम्मीदवार केतन पटेल को मजबूत सहयोग देने के लिए उतारते है तो समाज के अस्तित्व का प्रश्न हल होगा। क्योंकि पांच वर्ष में दमण-दीव के सांसद ने कुछ किया नहीं और उनके पक्ष के ही लोग आज उनको छोडकर जा रहे है। ऐसी परिस्थिति में ऐसे लोग आपका प्रतिनिधित्व किस तरह से कर सकते है। गुजरात की लहर की बात करने वालों को जबाव देते हुए विशाल टंडेल ने कहा कि हमारे माछीमार समुद्री किसान है। रोज-रोज नई लहर देखते है ये किसी एक लहर पर रूक जाएँ तो ये भूल होगी। माछीमार किसान गुजरात के जहरीले कचरे से बर्बाद हो रहा है ।हमारी नदी और समुद्र को वे जहरीला बना रहे है । गौरतलब है कि दमण की जीवन रेखा दमण गंगा नदी गुजरात के वापी शहर में लगे उद्योगों के कचरे की वजह से जहरीली हो चुकी है ।इस वजह से यहाँ का मछुवारा समाज जो अपने को माछीमार समुद्री किसान कहता है वह आंदोलनरत है ।कांग्रेस इनके साथ है और उसके उम्मीदवार के लिए माछीवाड के सभी बडे समूह एक साथ आ गए है ।कांग्रेस नेताओं ने नानी दमण जेटी स्थित माछीमारों के हॉल से माछीमारों संग बैठक कर चुनाव प्रचार शुरू किया था । माछी समाज का यहाँ नारा है पडोसी धर्म निभाने वालों ने दमण के माछी समाज को प्रदूषण भेंट किया । ऐसी ही एक बैठक जो समुद्र नारायण मंदिर के पास हुई उसमे कांग्रेस नेता विशाल टंडेल ने कहा कि आज समाज की कोई समस्या हो तो उसकी मांग करने की जिम्मेदारी सांसद की होती है, प्रतिनिधि सक्षम होना चाहिए परंतु कमजोर प्रतिनिधि को देखकर दिल्ली के अधिकारी अपने ऊपर राज करते है। आज प्रशासन की दादागिरी इस तरह बढ गई है कि एक शराब की एक बोतल भी ले जाने पर केस करने की धमकी दी जा रही है। ऐसे प्रशासन को सबक सिखाने की जरूरत है। माछी समाज जिसको चाहती उसे चढती है और चाहे तो उसे उतार सकती है मैं भी माछी समाज का हूं जिसका मुझे गर्व है। यह माछी समाज ही वापी के उद्योगों के जहरीले कचरे का ज्यादा शिकार हुआ है ।नानी दमन के एक मछुवारा परिवार की आशा ने कहा - कचरे के चलते नदी में मछलियाँ ख़त्म हो गई है और समुद्र का बड़ा हिस्सा ख़राब हो गया है ।पहले तो आसपास से मछली मिल जाती थी पर अब बहुत दूर जाना पड़ता है ।इसलिए हम सब कांग्रेस का साथ दे रहे है ।भाजपा के नेता ने तो कोई काम ही नहीं किया ।आप पीने का पानी भी दमण में नहीं मिलता है । दरअसल दमण की अर्थव्यवस्था पहले मूल रूप से मछली के व्यवसाय पर ही निर्भर थी ।पर अब मछुवारों का पलायन तेजी से हुआ है और वे अन्य धंधों कि और चले गए है ।इसकी मुख्य वजह नदी और समुद्र का प्रदूषण है ।इसका असर अब पर्यटन उद्योग पर भी पड़ने लगा है ।ऐसे में चुनाव में अगर पर्यावरण एक मुद्दा बन गया है तो यह शुभ संकेत है लोकतंत्र के लिए ।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Wednesday, April 23, 2014

बनारस में मोदी का चुनाव अब एकतरफा नहीं रहा

अंबरीश कुमार वाराणसी ।काशी के लहराबीर से आज देश को नया राजनैतिक सन्देश गया है । यहाँ से भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी अबतक एकतरफ़ा चुनाव लड़ रहे थे । और उनका चुनाव तो मीडिया समेत सभी लड़ रहे है ।पर आज पहली बार लगा कि यह चुनाव एकतरफा नहीं होने जा रहा है ।आज दोपहर की तपतपाती गर्मी में लहराबीर से कचहरी तक उमड़ा जन सैलाब मोदी के लिए चुनौती भी है ।कड़ी धूप में अरविंद केजरीवाल सड़क पर थे और लोगों को बता रहे थे कि कल ' वह ' आसमान से आएगा और आसमान से ही काशी को देखेगा ।मोदी का कार्यक्रम भी कई जगह हेलीकाप्टर से जाने का बनाया गया है ।यह उस आरोप की पुष्टि भी करता है जिसमे भाजपा पर इस चुनाव में पांच हजार रुपए खर्च करने की बात कही गई है ।मोदी के लिए जहाज और हेलीकाप्टर का एक अलग बेडा भी है जो रोज उन्हें देश भर का भ्रमण कराकर रात तक घर पहुंचा देता है ।इस तरह के चुनाव में पांच सौ रुपए लेकर सड़क से कचहरी तक परचा दाखिल करने गए केजरीवाल ने एक चुनौती तो पेश कर ही दी है ।इसे बहुत हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए ।लहुराबीर से अंधरापुल पहुँचने में करीब डेढ़ घंटे का समय लग गया ।आप के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे ।कचहरी में विरोध हुआ जो स्वभाविक था ।भाजपा हर स्तर पर विरोध की तैयारी में है ।पर आज के जन सैलाब के बाद विरोध के सुर भी कमजोर हुए है । इस मौके पर केजरीवाल ने चुनाव में पैसे के सवाल को उठाया और कहा -कोई कह रहा था कि मोदी विज्ञापन में 5000 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं।राहुल गांधी भी ढेर सारा धन खर्च कर रहे हैं। पर मैं एक फकीर हूं। मेरे पास पैसे नहीं हैं।मैं आपके पैसे से प्रचार करूंगा।आप फैसला करें कि आप क्या चाहते हैं।'केजरीवाल ने फिर वही तरीका अपनाया है जिसके सहारे शीला दीक्षित को हराया था यानी ' पैसा और भ्रष्टाचार ।' एक तरफ पैसे की लूट दूसरी तरफ गरीबी और महंगाई से परेशान जनता ।भाजपा जिस अंदाज में इस चुनाव में पैसा खर्च कर रही है वह किसी भी दल ने ढंग से मुद्दा नहीं बनाया है ।अरविंद केजरीवाल अब अडानी अंबानी और मोदी के संबंध आम जनता के बीच रख रहे है ।बनारस भाजपा का गढ़ रहा है और इसकी दुर्गति के लिए भाजपा ही ज्यादा जिम्मेदार है ।हिंदुत्व के नाम पर इस दुर्गति को ढका छिपाया जाता रहा है ।पर अब यह भी सवाल है ।मोदी को बनारस में एक ' हिंदू ' नेता की तरह ही देखा जा रहा है और संघ परिवार से सारे संगठन इस काम को बहुत ही सुनियोजित तरीके से कर रहे है ।पर इस हिंदुत्व पर विकास का मुलम्मा भी चढ़ा दिया गया है ।समझदार लोग जिन्हें हिंदुत्व से परेशानी हो वे विकास के एजंडा पर मोदी के साथ आएं। गुजरात हिंदुत्व के विकास का भी माडल है यह समझना चाहिए ।पर पूर्वांचल में विकास कोई मुद्दा होता तो बनारस से भाजपा बाहर हो चुकी होती और योगी बार बार गोरखपुर के संसद में प्रतिनिधि नहीं होते ।इसलिए मोदी के विकास के मुगालते में कोई नहीं है।भाजपा शुद्ध रूप से हिंदुत्व के नाम पर चुनाव लड़ रही है और आगे का एजंडा भी वही होगा ।पूर्वांचल में योगी ने जिस हिंदुत्व की नर्सरी तैयार की है वह कभी भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकती है ।रही सही कसर तोगड़िया ने पूरी कर इस विकास की अवधारणा को ढंग से बता दिया है । पर इस चुनौती का जवाब कांग्रेस ,सपा और बसपा को जिस गंभीरता से देनी चाहिए थी वह नहीं दी गई ।सभी ने अपने अपने उम्मीदवार उतार दिए ।बनारस में लोगों का आरोप है कि कांग्रेस ने जिन अजय राय को उतारा है वे पिछली बार भाजपा के मुरली मनोहर जोशी के मददगार बने थे ।तब भी हिन्दू बनाम मुसलमान हुआ था ।इसलिए परम्परागत राजनैतिक दलों के मुकाबले अरविंद केजरीवाल भारी पड़ सकते है ।दिल्ली में शीला हारी थी अब मोदी की बारी है जैसा नारा चल रहा है । हालाँकि अभी तक यह सभी मान रहे थे कि मोदी भारी बहुमत से चुनाव जीतेंगे ।आज से मुकाबले की बात शुरू हुई है ।यहाँ के एक कारोबारी केके अग्रवाल ने कहा -आज तो यह साफ़ ही हो गया कि मोदी को विरोध का भी सामना करना पड़ेगा । वैसे भी हिंदुत्व के नाम पर अगर सभी एकजुट नहीं हुए और जातीय समीकरण बिगड़ा तो मोदी के लिए चुनौती भी खड़ी हो सकती है । लोग सड़क पर उतरें है तो बूथ तक भी जाएंगे ।नौजवानों का एक बड़ा तबका अरविंद केजरीवाल के साथ था पर वह दिल्ली की घटनाओं से नाराज हुआ ।ऐसे लोगों को अगर वे साथ लेने में कामयाब हुए तो चुनाव रोचक होगा । गौरतलब है कि देश भर से बड़ी संख्या में सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता बनारस पहुँच चुके है और पहुँचने का सिलसिला जारी है ।ये भी स्वतंत्र तरीके से लोगों के बीच जा रहे है ।तमाम समूह अलग अलग तरह से मजहबी गोलबंदी और कारपोरेट घरानों की आगे की राजनीति को लेकर लोगों को आगाह भी करेंगे ।कुछ दिन और इन्तजार करना चाहिए ।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Monday, April 21, 2014

सामाजिक कार्यकर्ताओं की देश से अपील

सामाजिक कार्यकर्ताओं की देश से अपील वाराणसी 2014 के आम चुनाव में एक विशेष उपस्थिति दर्ज कर रहा है। भाजपा के घोषित प्रधान मंत्री के दावेदार, नरेंद्र मोदी, यहाँ से चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल उनके मुकाबले मैदान में उतरने की घोषणा कर चुके हैं। यह चुनाव वाराणसी से देश के नाम सन्देश का रूप लेता जा रहा है। इस परिस्थिति में वाराणसी के सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन-आंदोलनों से जुड़े लोगों ने आपस में सघन चर्चा के दौर शुरू किये हैं। जगह-जगह अनेक संगठनों, संस्थाओं और अभियानों के कार्यकर्ता आपस में चर्चाएं कर रहे हैं कि समाज की दृष्टि से सामान्य लोगों की अपेक्षाओं में खरा उतरने वाला, वह कौनसा सन्देश है जो इस मौके पर वाराणसी से देश और दुनिया के सामने जाना चाहिए। यह बात होती रही है कि ऐसे मौके पर जन-आंदोलनों की स्वतंत्र दृष्टि को सामने लाना ज़रूरी है। इन्हीं चर्चाओं में व्यक्त विचारों को समाहित करते हुए यह निवेदन तैयार किया गया है। इस पर सहमत संगठनों के नाम निवेदन के अंत में दिए हुए हैं। वाराणसी, राजनीति और सत्ता का केंद्र न होकर, इस भू-भाग की ज्ञान की परम्पराओं, दर्शन की ऊंचाइयों और भाईचारे की गंगा-जमुनी तहजीब का स्थान है। इसलिए वाराणसी के सामाजिक कार्यकर्ता इस स्थान की महत्ता के अनुरूप देश और दुनिया के सामने इस विशेष अवसर पर यह कहना चाहते हैं कि बड़ा सोचें, मनुष्य और समाज की मुक्ति के विचारों और सन्दर्भों को अपने जीवन के मार्गदर्शन के लिए चुनें। समाज और संस्कृति की हर गति पर राजनीतिक सत्ता का ज़ोर बनाने की प्रवृत्ति का पुरज़ोर विरोध करें और एक सत्य व न्याय पर आधारित समाज की स्थापना के लिए प्रयत्नशील हों। वाराणसी की परम्परा और यहाँ के समाज ने हमेशा ही सांप्रदायिक आधार पर समाज के विभाजन को अस्वीकार किया है। हम इस मौके पर एक बार फिर यह अपील करते हैं कि समाज में विभाजन और ध्रुवीकरण के विचारों और नीतियों को नकारें। धर्म , जाति , लिंग , शिक्षा , वर्ग , अमीर-गरीब, शहर-गांव जैसे आधारों पर मनुष्य और मनुष्य के बीच तथा विविध समाजों के बीच ऊँच-नीच व नफ़रत का खुलकर विरोध करें। जीवन दर्शन के महत्त्व को समझें , मानवीय मूल्यों और सर्व धर्म समभाव के दर्शन को स्थापित करें, जिनके अभाव में आक्रामक व फिरकापरस्त तानाशाही एवं फासीवादी प्रवृत्तियों को ही बल मिलता है। 'विकास' के नाम पर देश के लोगों के साथ धोख़ा बंद हो। किसी से भी पूछा जाये कि खुशहाल कौन है , तो जवाब मिलता है - वह जिसके घर में कम से कम एक तनख्वाह आती है। सरकारी कर्मचारी के वेतन के बराबर का मुआवज़ा तो दूर, वैश्वीकरण के इस दौर में किसानों, कारीगरों, आदिवासियों और पटरी के दुकानदारों के ज्ञान की लूट अपने चरम पर है। इनके श्रम और उत्पादन को कम से कम दाम दिया जाता है और ज़मीन व अन्य संसाधनों से बेदखली की मार भी बढ़ती ही चली जा रही है। ये सब अपनी जीविका और समाज अपने ज्ञान के बल पर चलाते हैं। इनके ज्ञान को लोकविद्या कहते हैं जिसके संवर्धन पर सरकार एक पैसा खर्च नहीं करती, उलटे उसे ज्ञान ही नहीं मानती। इस देश के हुक्मरान गांधी को पूरी तरह भूल गए हैं , इसमें तो अब कोई संदेह ही नहीं हो सकता। लोकविद्या समाज के कार्यों का न्यायसंगत प्रतिफल यही है कि इनकी आय पक्की और नियमित हो तथा यह सरकारी कर्मचारी के वेतन के बराबर हो। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर इन समाजों और पढ़े-लिखे लोगों के बीच आय का अंतर अपूर्व आपराधिक पैमाना अख्तियार कर लेगा। यही समय होगा जब असंगठित क्षेत्र और सरकारी कर्मचारियों की आय में समानता की बात पूरे ज़ोर से उठाई जाये और इसके लिए एक संगठित प्रभावी आंदोलन खड़ा किया जाये। देश के संसाधनों पर निगमों , पूंजीपतियों, अफसरों , ठेकेदारों और राजनेताओं का जैसे पूरा कब्ज़ा हो गया है और देश कारपोरेट साम्राज्यवाद की गुलामी में जकड़ता चला जा रहा है। पूरी की पूरी राजनीति इस कब्जे और गुलामी को पुख्ता करने और उसे विस्तार देने में लगी हुई है। जनता की सीधी और सरल आवाज़ यही है कि राष्ट्रीय संसाधनों पर देश के हर नागरिक का बराबर का अधिकार है और सरकार की यह मौलिक ज़िम्मेदारी बनती है कि इन संसाधनों का बराबर का बंटवारा हो। बिजली, पानी, वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य ये प्रमुख राष्ट्रीय संसाधन हैं, इनमें सबका बराबर का हिस्सा लगना चाहिए। ग्राम सभा और मोहल्ला सभा को सक्रिय और प्रभावी करने की जो बहस शुरू हुई है उसे अपने तार्किक मुकाम तक जाना चाहिए। जन-आंदोलनों की जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय नियंत्रण की मांग का भी तार्किक विस्तार होना चाहिए। स्थानीय लोग केवल यह नहीं बताएँगे कि उनका क्या है और उन्हें क्या चाहिए, बल्कि वे सामूहिक तौर पर यह बताएँगे कि यह देश कैसा होना चाहिए। इसकी शुरुआत सभी स्थानीय व्यवस्थाओं पर स्थानीय समाजों के नियंत्रण से होती है। इन स्थानीय व्यवस्थाओं में पंचायत, प्रशासन , बाजार , प्राकृतिक व राष्ट्रीय संसाधन तथा आपसी झगड़ों का निपटारा सभी कुछ शामिल है। इससे सभी व्यवस्थाओं पर साइंस और टेक्नोलॉजी की ठेकेदारी से मुक्ति मिलेगी और नयी हवाओं के लिए अपने खिड़की और दरवाज़े खुले रखे जा सकेंगे , देश और जनता के आगे बढ़ने की देशज अवधारणाओं को बल मिलेगा। यह साबित हो चुका है कि बड़े उद्योगों के विकास और विस्तार से सारी जनता को औद्योगिक व्यवस्था में समाहित नहीं किया जा सकता। उसी तरह आधुनिक शिक्षा की व्यवस्थाओं द्वारा पूरा समाज शिक्षित नहीं किया जा सकता। इस देश में ज्ञान की विविध परम्परायें रही हैं और आज भी जीवंत हैं। ज्ञान की इस विविधता के आधार पर शिक्षा के सार, स्वरुप और संगठन पर नए चिंतन और नयी नीति के निर्माण की आवश्यकता है। किसानों, कारीगरों, आदिवासियों, और महिलाओं का समाज में जानकारों के रूप में सम्मान हो और उन्हें अपने काम का वाज़िब दाम मिले , इसके लिए शिक्षा की समझ और वास्तविकता में देशज आधार पर एक क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है। गांव-गांव और हर बस्ती में एक मीडिया स्कूल होना चाहिए। जिस तरह आज़ादी के बाद हर गांव में अक्षर ज्ञान की शिक्षा की व्यवस्था बनायी गयी, उसी तरह नयी बन रही दुनिया में गांवों और गरीब वर्गों के नौजवान नयी क्षमताओं से लैस हो सकें इसके लिए मीडिया स्कूलों की ज़रुरत है। ये स्कूल उनकी कला , भाषा और सृजन की क्षमताओं के पनपने और नया रुझान बनाने के स्थान होंगे। यहाँ गांव और बस्ती के युवा यह सीखेंगे कि उनकी अपनी बात क्या है, उसे कैसे कहना है, कहाँ कहना है आदि। सम्प्रेषण, प्रस्तुतीकरण और संचार व संपर्क की विधाएं सीखेंगे। जन-आंदोलन परिवर्तन के कारक घटकों का अनिवार्य हिस्सा होते हैं। जन-आंदोलनों की अनुपस्थिति में न्याय के पक्ष में नीतियां नहीं बन पाती हैं और न जनपक्ष के फैसले ही हो पाते हैं। इन जन-आंदोलनों की धरती इस देश के गांव ही रहे हैं, इनमें किसान, आदिवासी, कारीगर, महिलाएं और नौजवान भाग लेते रहे हैं। अब इनमें पटरी के दुकानदार भी शामिल हो गए हैं। ये सब अपने संसाधन बचाने, जीविका बचाने अथवा अपने काम और उत्पादन के दाम हासिल करने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। इनके संघर्षों और संगठनों से ही जन-आंदोलन बनते रहे हैं। यह लोकविद्या समाज है और इनके ज्ञान, विचार और भाषा के आधार पर गांवों के पुनर्निर्माण के जरिये ही इस देश का सत्य और न्याय के आधार पर पुनर्निर्माण संभव है। निवेदनकर्ता सर्वोदय आंदोलन अमरनाथ भाई ( 9389995502 ), अविनाश चन्द्र लोकविद्या जन आंदोलन सुनील सहस्रबुद्धे ( 9839275124 ) , दिलीप कुमार 'दिली' साझा संस्कृति मंच वल्लभाचार्य पाण्डेय ( 9415256848 ) विद्या आश्रम डा. चित्रा सहस्रबुद्धे लोकचेतना समिति डा. नीति भाई ( 9450181545 ) कारीगर नजरिया प्रेमलता सिंह, एहसान अली , मो. अलीम विश्व ज्योति जनसंचार समिति फादर आनंद मानवाधिकार जन निगरानी समिति डा. लेनिन रघुवंशी समाजवादी जन परिषद अफ़लातून, डा. नीता चौबे लोकसमिति , वाराणसी नन्दलाल मास्टर गांधियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्टडीज़ डॉ. मुनीज़ा खान , डा. दीपक मालिक फेरी-पटरी-ठेला व्यवसायी समिति राजेंद्र सिंह, प्रमोद निगम , आफताब , नूर मोहम्मद , चिंतामणि भारतीय किसान यूनियन लक्ष्मण प्रसाद सूचना का अधिकार अभियान धनञ्जय त्रिपाठी , हर्षित शुक्ला, फ़िरोज़ भाई आशा ट्रस्ट प्रदीप सिंह , दीनदयाल विजन जागृति राही ऑल इण्डिया पीपुल्स सालिडेरिटी ऑर्गनाइज़ेशन डा. आनंद प्रकाश तिवारी ग्राम्या बिन्दु सिंह, सुरेन्द्र महिला स्वरोज़गार समिति रेखा चौहान एशियन ब्रिज मो. मूसा आज़मी अस्मिता राम प्रताप, सुरजीत शिक्षा का अधिकार अभियान अजय पटेल, राजकुमार राष्ट्रीय समाज सेवा मनीष सामाजिक कार्यकर्ता डा. पारमिता, डा. रमन, विनोद , विक्रम वाराणसी, 15 अप्रैल, 2014

Friday, April 18, 2014

तटीय इलाकों में मुद्दा मोदी नहीं कांग्रेस है

तटीय इलाकों में मुद्दा मोदी नहीं कांग्रेस है अंबरीश कुमार में मुद्दा मोदी बल्कि कांग्रेस है ।यह बात ओडिशा के एक हिस्से से गुजरते हुए सीमान्ध्र के तटीय इलाके तक पहुँचने के दौरान लोगों से हुई बातचीत से सामने आई ।तीन सौ किलोमीटर से ज्यादा के इस सफ़र में गरीब तबके के लोगों से ज्यादा मुलाक़ात हुई जिसमे ज्यादातर रोजी रोटी की तलाश में रोज भटकने वाले लोग थे ।यह किरंदुल वाल्टेयर पैसेंजर थी ।यह ट्रेन भी अद्भुत थी । बड़ा ही अलग अनुभव ।छतीसगढ़ के जगदलपुर से चलकर किरंदुल वाल्टेयर पैसेंजर ने जैसे ही आमागुडा स्टेशन पार किया बगल के केबिन में चल रहे बंगाली बच्चों का हंगामा शुरू हो गया।मै खिड़की के पास बैठ कर बाहर के बदलते हुए दृश्य को देख रहा था और बीच बीच में विजय शुक्ल से बातचीत भी । छोटे छोटे स्टेशन आते तो ओड़िसा के आदिवासी अलग अलग डिब्बों में चढ़ते दिखते ।हर तरह का सामान ।कुछ सर पर तो कुछ हाथ के थैलों में । शाक शब्जी से लेकर बर्तन तक ।इस बीच एक महिला सर पर घड़ा रखे आई तो लगा सल्फी बेच रही है पर वह मठठा बेच रही थी अलमुनियम के एक गिलास से नाप कर ।साथ ही तरबूज खीरा ,अंगूर और चीकू भी डब्बे में मिल जा रहा था । दोपहर हो गई थी और बाहर की हवा गर्म हो चुकी थी ।हालाँकि खिड़की के पास बैठने पर ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी ।कैमरा साथ था और कई बार ऐसे दृश्य आ जा रहे थे कि भीतर से ही फोटो खींच लेता था ।बाहर खेतों की मिटटी का रंग बदलने लगा था और ट्रेन पहाड़ पर चढ़ने लगी थी ।जंगल के बीच सुरंग भी बार बार आ रही थी ।एक लम्बी सुरंग के बाद हवा में ठंढक महसूस हुई तो देखा किसी नदी से गुजर रहे है और बगल में लाल मिटटी के हरे भरे खेत ।कुछ जगह खेत में काम करती महिलाएं भी दिखी ।डिब्बे में उधम मचा रहे बच्चों की आवाज अब बंद हो चुकी थी ।गलियारे में निकले तो देखा सब थक कर सो चुके है ।साथ चल रहे इलेक्ट लाइन के प्रबंध निदेशक विजय शुक्ल जो लगातार नवरात्र के उपवास पर थे वे चाय पीना चाहते थे पर किसी भी स्टेशन पर उतर कर चाय लेना संभव नहीं था ।ट्रेन मुश्किल से एक मिनट रूकती और अपना डिब्बा प्लेटफार्म से काफी दूर लगता था । कूपे में कोई व्यवस्था भी नहीं थी कि केतली का प्लग लग सके ।पर पता चला दरवाजे के पास स्विच बोर्ड लगा है ।हमने बैग से टी बैग ,मिल्क पाउच के दो सैसे, सुगर क्यूब और केतली निकाली ।ढाई कप पानी डाल कर बाहर उसका प्लग साकेट में लगा दिया तो करीब चार मिनट में पानी खौल चूका था ।कूपे में लौटकर दो कप चाय तैयार की ।विजय शुक्ल को इससे उर्जा मिली वे थक गए थे क्योकि सुबह नाश्ते में भी फल ही लिया था और दोपहर में भी फल ही लेना था ।मेरे लिए होटल से पराठे और दही पैक करा दिया गया था इसलिए कोई समस्या नहीं थी । अपने डिब्बे से जुड़े दुसरे डिब्बे में गया तो कुछ नौजवान मिले ओडिशा के ।कोरापुट तक जा रहे थे ।बातचीत में माओवादी आ गए तो वे वे बोले ,आम लोगों को ये माओवादी कोई नुकसान नहीं पहुंचाते है ।ये तो गड़बड़ करने वालों को दंडित करते है ।ओडिशा का यह हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ है ।इस अंचल को माओवादी छतीसगढ़ से सीमान्ध्र तक एक कारीडोर के रूप में इस्तेमाल करते है ।आज से नहीं काफी काफी पहले से । इस लिहाज से यह ट्रेन भी कम मददगार नहीं है । इसमें आदिवासी अपने हिसाब से चलते है और अपनी संस्कृति के साथ चलते है ।खाना पीना भी इसमें होता है ।इसी वजह से शहरी समाज के लोग जब इस ट्रेन से चलते है तो बाद में वे शिकायत भी करते है ।मुख्य आरोप महिलाओं पर शराब बेचने का लगाते है ।हालाँकि यह सब अपवाद नजर आया ।सल्फी इनके जीवन का अंग है जो एक जगह घड़े से बेचती हुई एक महिला के पास नजर आया ।यह उसका रोजगार है ।ठीक उसी तरह जैसे तरबूज और खीरा बेचने वाली महिला दिन भर में सौ रुपया कम लेती है उसी तरह सल्फी बेचने वाली महिला भी करीब इतना पैसा कम लेती है जिससे दाल चावल और सब्जी आदि खरीदी जाती है । ये सब महंगाई से परेशान थे ।कुछ ने बताया कि दो चार दिन का राशन ही घर में रहता है और आगे के लिए दिन भर खटना पड़ता है ।सरकार महंगाई पर रोक नही लगा पा रही है ।हालाँकि राहुल गाँधी को ये आदिवासी एक भला और ईमानदार नौजवान मानते थे और इंदिरा गाँधी के उतराधिकारी के रूप में भी देखते है ।पर ओडिशा में बीजू जनता दल का असर ज्यादा दिखा ।नया स्टेशन आया तो लोग भी बदले और फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ ।मोदी की इस अंचल में कोई पहचान नहीं है ।गरीब और आदिवासियों के बीच तो बहुत कम लोग यह बता पाए कि मोदी है कौन ।हम जैसे हिंदी पट्टी वालों के लिए यह अलग अनुभव रहा । कोरापुट और अरकू स्टेशन गुजरने के बाद शाम ढल चुकी थी और मिटटी का रंग और आबोहवा भी बदल गई ।पहाड़ों के बीच ठंढ का अहसास हुआ और अब हम आंध्र प्रदेश के तटीय इलाके के पास आ चुके थे ।भाषा भी बदल गई और मुद्दे भी ।सवारियों का सामाजिक स्तर भी बदल गया था ।मध्य वर्ग के लोग भी इस गाड़ी में चढ़ रहे थे जिन्हें विशाखापत्तनम जाना था ।अब राजनीति में चंद्रबाबू नायडू , वाईएसआर और कांग्रेस थी ।मोदी को यहाँ भाजपा के नेता के रूप में पहचाना जा रहा था पर मुख्य तीन दलों से भाजपा पीछे थी ।यहाँ मुद्दा तेलंगाना का था जिससे लोग नाराज थे ।आम लोगों का मानना था कि उनकी आंध्र वाली पहचान ख़त्म कर दी गई और विकसित हैदराबाद दुसरे हिस्से को दे दिया गया ।एक शिक्षिका एन लक्ष्मी ने कहा -इससे समूची नई पीढ़ी प्रभावित होगी ।शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के लिए सीमान्ध्र के लोगों को अब भटकना पड़ेगा ।बच्चो को अच्छे शिक्षा संस्थानों में जगह नहीं मिल पाएगी ।हैदराबाद से भी कारपोरेट क्षेत्र का पलायन होगा जिससे तेजी से विकसित हो रहे इस राज्य का बंटवारा हो जाने से दोनों हिस्सों का नुकसान होगा ।विशाखापत्तनम अविभाजित आंध्र प्रदेश का सबसे चमकता हुआ महानगर है और इसे आप देख भी सकते है ।अन्य तटीय शहरों के मुकाबले तटीय क्षेत्र में यह शहर काफी साफ सुथरा और प्रदूषण से मुक्त नजर आता है।यहाँ उत्तर और दक्षिण की संस्कृति का संगम भी होता है ।पिछली बार आए थे तो रिशिकोंडा के हरिथा प्लाजा बीच रिसार्ट पर रुके थे ।फिर एक शाम यही रिसार्ट के आफशोर बार में ।तब लखनऊ के पत्रकार सागर थे इसबार विजय जो शुद्ध शाकाहारी ।पर यह जगह ऐसी है जहाँ से जल्दी उठने का मन नहीं होता ।पहाड़ से कई सौ मीटर नीचे चंद्राकर समुद्र तट और ठंढी हवा में लहराते नारियल के पेड़ । तटीय इलाकों में मछली लोगों का पसंदीदा व्यंजन है ।हमें शहर के बीच जगदम्बा सेंटर के विनीथा पैराडाइज में भेजा गया ।मछली और चावल का आंचलिक स्वाद लेना था ।और स्वाद न भूलने वाला था ।बहुत ही सस्ता भी ।खाना खाकर लौटे तो देर रात हो चुकी थी और सुबह वापसी थी ।पर जल्दी नींद खुली तो सामने के समुद्र तट पर फिर आ जमे और कुछ फोटो लेने के बाद जाने के लिए निकले । एअरपोर्ट के रस्ते में स्थानीय ड्राइवर बताने लगा कि कांग्रेस जा रही है और चंद्रबाबू नायडू आ रहे है ।भाजपा यहाँ उनकी बी टीम है और इस इलाके में बड़े नेता नायडू है मोदी नहीं ।यह होती है क्षेत्रीय राजनीति जिसे राष्ट्रीय दल के लोग समझ नहीं पाते है । (समाप्त) जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Thursday, April 17, 2014

भाजपा की बढ़त को लहर में बदलता मीडिया

भाजपा की बढ़त को लहर में बदलता मीडिया अंबरीश कुमार लखनऊ ।उत्तर प्रदेश में भाजपा की बढ़त को मीडिया लहर में तब्दील कर रहा है । इसका मनोवैज्ञानिक असर पड़ने लगा है और भगवा ब्रिगेड बम बम है । मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में उसी तरह गोलबंद हो रहा है जैसे मंदिर आन्दोलन के समय हुआ था ।तथ्य से हटकर भावनाओं में बहकर खबरे लिखी गई और गढ़ी गई । फिर वही हो रहा है ।तब भावना थी और राम लला थे ।अब अथाह पैसा है ,नरेन्द्र भाई मोदी है और समूचा कारपोरेट घराना है । इसका असर दिख रहा है । खबरे गढ़ी जा रही है सर्वे तैयार किए जा रहे है। और तो और नेताओं के इंटरव्यू भी प्रायोजित हो गए है ।इसमें चैनल सबसे आगे है ।वे जो भगवा परिवार को समर्पित है वे भी और वे भी जो वामपंथी मुखौटा लगाए हुए है ।प्रमुख राष्ट्रीय अख़बार कम से कम इतनी बेशर्मी से किसी पार्टी का पक्ष फिलहाल नहीं ले रहे है ।पर अख़बारों में भी एक वर्ग शालीनता के साथ हवा बनाने की कवायद कर रहा है ।यह हवा क्या है और कहा कहा पर बह रही है इसकी पड़ताल भी होनी चाहिए ।यह तय है कि भाजपा बढ़ रही है पर कितनी बढ़ रही है यह सवाल है । पश्चिम में दंगों की वजह से मजहबी गोलबंदी का असर पड़ना तय था और वह हुआ भी ।भाजपा को इसका फायदा पहले दौर में तीन सीट और दुसरे दौर में भी ज्यादा से ज्यादा तीन चार सीट का हो सकता है ।पर इसके भाजपा का अश्वमेध का घोडा रुक जाएगा ।इस दौर में एटा इटावा ,मैनपुरी और कन्नौज है ।इस अंचल का एक हिस्सा मुलायम परिवार का गढ़ है । इसके साथ ही जातियों की गोलबंदी शुरू हो जाती है ।अहीर किसको वोट देगा और दलित किसको देगा यह किसी को समझाना नहीं पड़ता । भाकपा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा -यह किस तरफ से पचास और तिरपन सीटें भाजपा को मिल रही है ।पश्चिम छोड़ दे तो उन्नाव कानपूर सीतापुर मोहनलालगंज ये हार रहे है ।बाराबंकी से बहराइच तक ये हार रहे है ।फैजाबाद में लल्लू सिंह तीसरे नंबर पर है ।पूर्वांचल में आजमगढ़ से लेकर देवरिया सलेमपुर और गाजीपुर में भाजपा हारती नजर आ रही है । लखनऊ में राजनाथ कड़े मुकाबले में फंसे है तो पचास सीट मीडिया कहा से दिला रहा है ।हो सकता है अशोक मिश्र अपने वैचारिक आग्रह के चलते भाजपा को कम करके आंक रहे हो पर भाजपा के नेताओं का आकलन भी फिलहाल इतना नहीं है । चुनाव से पहले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का आकलन करीब पच्चीस सीट का था जिसमे वे अब पांच सीट और जोड़ रहे है क्योंकि माहौल बन गया है । यह माहौल मीडिया मोदी और कारपोरेट घरानों ने बनाया है । पैसा जमकर बह रहा है ।देश का भावी प्रधानमंत्री जो डिजाइनर कपडे एकबार पहनता है उसकी कीमत का आंकलन फैब इंडिया जाकर किया जाना चाहिए ।कभी भी मोदी एक जैसा कपडा दोबारा नहीं पहनते ।एक जैसी जैकेट दोबारा नहीं पहनते ।वे सौ दिन से प्रचार कर रहे है कितना पैसा कपडे पर खर्च हुआ होगा समझ सकते है ।यह एक बानगी है ।बाकि जहाज हेलीकाप्टर मंच सज्जा सब अलग है ।पचास से ज्यादा नौजवानों का चलता फिरता वार रूम अलग है ।अख़बार और चैनल में ' अबकी बार मोदी सरकार ' का बजट भी अलग है ।आजादी के बाद यह अबतक का सबसे महंगा चुनाव है ।आधुनिक तकनीक का इस चुनाव में जमकर इस्तेमाल हो रहा है ।प्रचार और पैसे में मोदी ने सभी को पछाड़ दिया है । मायावती और मुलायम पीछे है ।मायावती का कहा लोगों तक नहीं पहुँचता है ।हाल ही में मायावती ने एक जनसभा में कहा -ये मोदी अपने को पिछड़ा कहता है पर आजतक इसने अपनी जात नहीं बताई ।कल तक यह कहता था कि मै किसके लिए कुछ भी करूँगा मेरे न तो आगे कोई और न पीछे ।अब इसने अपना नामांकन करते समय बताया कि इसकी औरत भी है । पर मायावती के इस तरह के भाषण मीडिया में उतनी जगह नहीं पाते जितना बच्चो की जनरल नालेज चौपट करने वाली मोदी की टिपण्णी को मीडिया में जगह मिलती है ।नालंदा तक्षशिला से लेकर अंडमान में भगत सिंह वाली टिपण्णी उदाहरण है ।मोदी तो भूगोल से ले कर इतिहास तक नए सिरे से समझा रहे है ।पर मीडिया नतमस्तक है । कारपोरेट क्षेत्र से जमकर पैसा आ रहा है । खबरे भी काफी सकारात्मक बन रही है ।बातचीत भी करता है तो तालियाँ बजाने वालों का इंतजाम भी ।अब न तो किसी को मार्कंडेय काटजू याद आ रहे है और न ही प्रेस कौंसिल । सारा युद्ध फेसबुक पर लड़ा जा रहा है ।किसी ने मीडिया की अंधेरगर्दी को लेकर एक अर्जी भी प्रेस कौंसिल को देना उचित नहीं समझा ।ऐसे में मीडिया अगर भाजपा की बढ़त को लहर में बदलने की कवायद करे तो उसे रोकेगा भी कौन ।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

जीते तो मोदी पर भारी पड़ेंगे राजनाथ

जीते तो मोदी पर भारी पड़ेंगे राजनाथ उतर प्रदेश से तय होगा किसकी हवा चली और कितनी चली अंबरीश कुमार लखनऊ । मोदी इस चुनाव के साथ ही राजनैतिक प्रबंधन के गुरु बन रहे है पर अभी भी आगे का उनका रास्ता बहुत साफ़ नहीं है । लखनऊ और कानपूर से ब्राह्मण और ठाकुर नेता जो संकेत दे और दिलवा रहे है उससे चुनाव नतीजों के बाद का संकेत समझा जा सकता है । पहले मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि यह ' लहर ' मोदी की नहीं भाजपा की है । इस टिपण्णी का अर्थ चुनाव नतीजों के बाद ही ठीक से समझ में आएगा। इसके बाद राजनीति में बड़ी सफाई से सबको ठिकाने लगाने वाले भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद नकवी ने कहा -प्रधानमंत्री के लिए राजनाथ सिंह को आगे करना चाहिए मोदी से तो डर लगता है । साथ यह भी जोड़ दिया कि राजनाथ तो सामाजिक समरसता में वाजपेयी की परम्परा वाले है । भाषा में कुछ बदलाव भले हो पर भावना साफ़ है । कल्बे जव्वाद नकवी सियासत के गलियारे से गुजरते रहते है और जो भी सत्ता में हो उससे बेहतर संबंध रखते है । उत्तर प्रदेश की राजनीति में उलेमा का काफी महत्व रहा है और मायावती से मुलायम तक के घर की चौखट पर इन्हें महत्वपूर्ण मौकों पर देखा जाता रहा है । मायावती के घर तो ये जूते बाहर उतार कर जाते है । ऐसे में कल्बे जव्वाद की टिपण्णी आगे की राजनीति का संकेत दे रही है । अगर एनडीए को बहुमत के आसपास कि संख्या मिल गई तो प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर नए सिरे से बहस हो सकती है । ऐसे में राजनाथ सिंह कई वजहों से भारी पड़ सकते है । वे उतर प्रदेश से है और उत्तर प्रदेश में भाजपा अगर तीस सीट से ज्यादा पाती है तो इसका श्रेय कोई अकेले मोदी को नहीं लेने देगा । और अगर भाजपा के कुछ दिग्गज नेता मसलन उमा भारती ,कलराज मिश्र और मुरली मनोहर जोशी आदि में कोई हारा तो मोदी की हवा की हवा निकल जाएगी और फिर जीते हुए नेता भीं दावेदार होंगे । राजनाथ सिंह अटल विहारी वाजपेयी के निर्वाचन क्षेत्र से यूँ ही नहीं चुनाव लड़ रहे है । वे उनके राजनैतिक उतराधिकारी बनना चाहते है जो मोदी को कोई नहीं मानने वाला है । वे कई दलों से बेहतर संबंध बनाए हुए है जिसमे मायावती और मुलायम भी शामिल है । इस मामले में मोदी राजनाथ सिंह के मुकाबले कमजोर है । राजनाथ सिंह देश में चंद्रशेखर के बाद अपने को राजपूत नेता के रूप में पेश कर चुके है और राजपूत नेताओं का एक बड़ा खेमा भी उनके साथ आ सकता है । इस लिहाज से मोदी जिनकी जाति को लेकर फिलहाल जानकर लोगों में मतभेत है वे किसी भी जातीय समीकरण में फिट नहीं हो पा रहे है । ऐसे में पार्टी के भीतर जातीय गोलबंदी की राजनीति भी राजनाथ के पक्ष में है । मुस्लिम समाज ने अगर प्रधानमंत्री के पद पर उनकी दावेदारी का सवाल चुनाव से पहले उठाया है तो नतीजों के बाद इसे वे पुरी ताकत से उठाएंगे यह साफ़ है । यह सभी को पता है कि लखनऊ का चुनाव मोदी नहीं राजनाथ सिंह का चुनाव है और जिस तरह सुल्तानपुर में वरुण गाँधी के अप्रत्यक्ष निर्देश के चलते मंच से मोदी का कोई नारा नहीं लगता वैसे ही राजनाथ यहाँ खुद के नाम पर चुनाव लड़ रहे है । यदि मोदी का ज्यादा नाम लिया तो वह शिया वोट चला जाएगा जो वाजपेयी के चलते भाजपा को मिलता रहा है । इसलिए लखनऊ में मोदी की न कोई लहर बना रहा है और न ही स्वत बन पा रही है । उत्तर प्रदेश में पहले दुसरे दौर के बाद कि स्थिति में फर्क आया है । ऐसे में मुस्लिम बिरादरी के जरिए राजनाथ सिंह की नई छवि गढ़ी जा रही है । हालाँकि संघ परिवार को यह सब रास नहीं आ रहा है जो इस चुनाव में पूरी ताकत से लगा हुआ है । यह नाराजगी सामने ना आए पर ज्यादा कुरेदने पर सब बाहर आ जाता है । सारा खेल उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिलने वाली सीटों की संख्या पर निर्भर है । तीस पैंतीस का आंकड़ा इसलिए क्योंकि यह मोदी की हवा का प्रतीक नहीं बन पाएगा । जब सर्वे एजंसियों ने पचास का आंकड़ा दे दिया है तो मोदी से लोगों की अपेक्षा भी यही है । इस प्रदर्शन में अगर मोदी नाकाम हुए तो प्रधानमंत्री पद दावेदार भी बदल जाएंगे । और फिर राजनाथ सिंह ज्यादा मजबूत दावेदार होंगे । जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Monday, April 14, 2014

पहाड़ पर चुनावों की गर्मी

पहाड़ पर चुनावों की गर्मी दार्जिलिंग से रीता तिवारी पहाड़ियों की रानी के नाम से मशहूर दार्जिलिंग के बेहद खुशगवार और शीतल मौसम में इस पर्वतीय संसदीय सीट के लिए होने वाले चुनाव के चलते माहौल में राजनीतिक गर्मी चरम पर पहुंच है. तृणमूल कांग्रेस ने भारतीय फुटबाल टीम के पूर्व कप्तान बाइचुंग भूटिया को मैदान में उतारा है जबकि भारतीय जनता पार्टी ने पिछली गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से एस.एस.आहलुवालिया को अपना उम्मीदवार बनाया है. अलग गोरखालैंड राज्य की मांग में आंदोलन करने वाले संगठनों का समर्थन ही यहां किसी उम्मीदवार की जीत की गारंटी माना जाता है. सुभाष घीसिंग के जमाने में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) और अब गोरखा मोर्चा. लेकिन भूटिया ने अबकी यहां मुकाबला रोचक बना दिया है. इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर है. यही वजह है कि उन्होंने इस सप्ताह लगातार दो दिन भूटिया के समर्थन में इलाके में चुनावी रैलियां की हैं. बरसों से अलग गोरखालैंड राज्य ही इलाके में प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है. आम पर्वतीय शहरों की तरह यहां भी सुबह देर से शुरू होती है और शामें जल्दी ढल जाती हैं. इसलिए तमाम उम्मीदवार भी इसी के अनुरूप रणनीति बना कर चुनाव प्रचार के लिए निकल रहे हैंय भाजपा को मोर्चा के समर्थन ने हमेशा फारवर्ड पोजीशन पर खेल कर गोल दागने वाले भूटिया को बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है. मोर्चा ने उन पर बाहरी होने का ठप्पा लगा दिया है. उनका घर पड़ोसी सिकिक्म में है. लेकिन भूटिया इससे विचलित नहीं हैं. अपने समर्थकों के साथ सुबह-सुबह प्रचार के लिए निकले भूटिया कहते हैं, ‘मैं भी पहाड़ का हूं. सिक्किम और दार्जिलिंग की पहाड़ियों में कोई अंतर नहीं है.‘ भूटिया कहते हैं कि फुटबाल के मैदान में तो कई बार गोल दाग चुका हूं. अब राजनीति के मैदान में भी वही करिश्मा दोहराने की उम्मीद है. उनका सवाल है कि अगर मैं बाहरी हूं तो आहलुवालिया कहां के हैं ? अपनी सभाओं में वे पिछली बार यहां से जीते भाजपा के जसवंत सिंह का उदाहरण देते हैं, जो पांच वर्षों में महज तीन बार दार्जिलिंग आए थे. भूटिया की दलील है कि बरसों से बाहरी लोगों के सांसद बनने की वजह से ही इलाके का कोई विकास नहीं हो सका है. वे कहते हैं कि दार्जिलिंग की पहाड़ियों को विकास की जरूरत है, गोरखालैंड की नहीं. भूटिया और तृणमूल का सबसे बड़ा मुद्दा भी यही है. भूटिया कहते हैं कि वे राजनीतिज्ञ नहीं हैं. पहाड़ी होने के नाते पहाड़ियों के विकास की चिंता ही उनको राजनीति में खींच लाई है. दूसरी ओर, भाजपा के आहलुवालिया ने शुरूआती दौर में तो गोरखालैंड का समर्थन करने की बात कह कर पार्टी के नेताओं को मुश्किल में डाल दिया था. इसलिए अब वे संभल कर बात करते हैं. अपने प्रचार के दौरान वे कहते हैं कि मैं जीतने के बाद इलाके के लोगों की समस्याओं और मांगों को पूरा करने का प्रयास करूंगा. अब वे भूल कर भी गोरखालैंड का नाम नहीं लेते. इलाके के लोगों का दिल जितने के लिए उन्होंने तेनजिंग नोर्गे को भारत रत्न देने का सवाल भी उठाया है. वे कहते हैं, ‘भाजपा सरकार सत्ता में आने पर इस पर विचार करेगी.‘ आहलुवालिया अपनी जीत के लिए पूरी तरह मोर्चा के समर्थन पर ही निर्भर हैं. दार्जिलिंग में पिछली बार 12.15 लाख वोटर थे। तब भाजपा नेता जसवंत सिंह लगभग ढाई लाख वोटों के अंतर से जीते थे. तब भी मोर्चा ने भाजपा का समर्थन किया था. वाममोर्चा उम्मीदवार जीवेश सरकार 2.44 लाख वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे थे और 1.87 लाख वोट पाने वाले तृणमूल उम्मीदवार तीसरे पर. माकपा और कांग्रेस के उम्मीदवार अबकी भी मैदान में हैं. कांग्रेस तो हाशिए पर है, लेकिन माकपा उम्मीदवार समन पाठक मोर्चा के कुछ वोट जरूर काटेंगे. लाख टके का सवाल यह है कि क्या भूटिया चुनाव मैदान में भी गोल दागने में कामयाब होंगे? वे भले इसमें कामयाब नहीं हो, आहुलवालिया की राह तो उन्होंने कुछ मुश्किल जरूर बना दी है। इलाके के लोग और यहां रोजाना भारी तादाद में पहुंचने वाले सैलानी भी इस दिलचस्प लड़ाई का मजा ले रहे हैं.

समुद्र तट पर कुछ दिन

समुद्र तट पर कुछ दिन अंबरीश कुमार सूर्योदय देखने की वजह से सुबह पांच बजे ही नींद खुल गई थी ।खिड़की से पर्दा हटाया तो बाहर अँधेरा छंटता नजर आया । समुद्र तट सामने ही था इसलिए एक कप काफी पीने के बाद बाहर निकलने का कार्यक्रम बना । यह महाबलीपुरम में तमिलनाडु पर्यटन विभाग का रिसार्ट था जंहा कई बार रुकना हुआ है ।चेन्नई से करीब पचास किलोमीटर दूर यह जगह काफी खुबसूरत है । मुख्य सड़क और शहर से दूर होने की वजह से शांत भी है ।पांडिचेरी जाने से पहले महाबलीपुरम में रुकने का कार्यक्रम बना था । करीब तेइस साल बाद उसी काटेज के आगे बैठा था जहां पहली बार रुका था । बहुत कुछ याद आने लगा ।महाबलीपुरम में तमिलनाडु पर्यटन के इस रिसार्ट में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है ।वैसा ही जंगलों में घूमते हुए जाने का अहसास इस बार भी हुआ जो पहली बार हुआ था ।सागर की लहरे जब पैर को भीगा कर लौटी तो मुठ्ठी भर रेत बटोर ली । कुछ सीपियाँ भी आ गई जिन्हें घर ले आया हूँ ।इस समुद्र ने तब इतना डरा दिया था कि कोई उम्मीद भी नहीं बची थी । वर्ष १९९० में दक्षिण में विवाह के फ़ौरन बाद दक्षिण में करीब पखवाड़े भर घूमने का कार्यक्रम बना था और सीधे चेन्नई (जो तब मद्रास था ) पहुंचे थे । यह आमंत्रण दक्षिण के गाँधीवादी कार्यकर्ता और जयप्रकाश नारायण के सहयोगी शोभाकांत जी ने दिया था । सीधे उनके आवास गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट पहुंचे । देर से पहुंचे थे और बरसात थम नहीं रही थी ।जाना था महाबलीपुरम पर शोभाकांत जी ने इस बरसात में जाने की इजाजत नहीं दी ,कहा सुबह गाड़ी से भिजवा देंगे ।बताया कि बहुत बड़ा तूफ़ान आ रहा है इसलिए कार्यक्रम रद्द करे और यही रुके । तूफान कि भविष्यवाणी यह थी कि मद्रास शहर का बड़ा इलाका डूब सकता है । पर साथ में यह भी जानकारी दी कि इस तरह की भविष्यवाणी हर साल होती है पर मद्रास तो बच जाता है नेल्लोर में लोग तबाह हो जाते है । सुबह भी मौसम वैसा ही था इसलिए दोपहर बाद जाने का कार्यक्रम बना और रिसार्ट के प्रबंधक को शाम तक पहुँचने की सूचना दे दी गई । समुन्द्र के किनारे किनारे जाने वाला महाबलीपुरम का रास्ता बरसात में देखते बनता था ।नारियल के घने जंगल हवा में लहराते नजर आ रहे थे ।तब तटीय इलाकों पर अतिक्रमण नहीं हुआ था इसलिए लगातार समुंद्र दिख रहा था और उंची लहरे भी । तमिलनाडु पर्यटन विभाग के रिसार्ट तक पहुँचते पहुंचे मौसम और खराब हो चुका था ।कैशुरिना के जंगलों के बीच से एक घुमावदार रास्ता रिसेप्शन के सामने खत्म हो जाता था जहाँ एक तरफ रेस्तरां था तो सामने श्रंखला में बने काटेज । मैनेजर हैरान था क्योकि अकेले हम ही ऐसे सैलानी थे जो आज पहुंचे थे बाकि सभी ने अपने कार्यक्रम तूफ़ान के चलते निरस्त कर दिए थे बहुत से कर्मचारी भी चले गए थे । मैनेजर ने हिदायत दी की अपने काटेज से बाहर बिलकुल ना जाए और समुन्द्र की और तो किसी कीमत पर नहीं । खाने का आर्डर अभी दे दे जो काटेज में सर्व कर दिया जाएगा । नाश्ता तो तब मिलेगा जब सुबह तक बच पाएंगे क्योकि तूफ़ान आधी रात के बाद महाबलीपुरम के तट तक पहुंचेगा । इस बात ने और डरा दिया ।तबतक कार भी जा चुकी थी और कोई चारा नहीं था ।खैर नीचे के काटेज में पहुंचे तो बेडरूम के सामने की दीवार कांच की थी और उसपर लगा पर्दा हटाते ही लगा मानो लहरें कमरे के भीतर तक आ जाएँगी । लगातार बरसात से ठंड बढ़ चुकी थी और पंखा चलाने की भी जरुरत नहीं थी ।अँधेरा हो चुका था और कुछ मोमबती दी गई थी इस खौफनाक रात का मुकाबला करने के लिए जहां सामने सी आती उंची उंची लहरे डरा रही थी ।समुन्द्र के पास बहुत बार रुका हूँ पर इतनी उंची लहरे कभी नहीं । सामने पल्लव साम्राज्य के दौर का मशहूर तट मंदिर लहरों औए बरसात में बहुत रहस्मय सा नजर आ रहा था ।नारियल के पेड़ों के झुण्ड तक लहरा रहे थे और सामने कैशुरिना के जिन दो पेड़ों पर आराम करने वाला झूला पडा था वह हवा के झोंके से ऊपर नीचे हो रहा था ।चारो ओर से आ रही तूफानी हवा की आवाज और कमरे के बाहर तक आतीं लहरे । खाना खाते खाते रात के दस बज चुके थे और बैरे के मुताबिक करीब साढ़े बारह बजे तक तूफ़ान के इस तट पर आने की आशंका थी ।मन अशांत था और तब मोबाइल भी नहीं होते थे और फोन लाइन भी शाम को खराब हो गई थी । खैर कब नींद आई पता नहीं चला ,उठा तो कमरे में रौशनी थी हालाँकि सूरज नहीं निकला था ।चाय के लिए बैरे को बुलाया तो पता चला तूफ़ान लेट हो गया है अब दस बारह घंटे बाद आएगा ।बहुत समय था और कई विकल्प भी । तूफ़ान का डर ख़त्म हो चूका था और बरसात थमते ही तट पर आ गए पर लहरों से दूर ही थे । अचानक एक बड़ी लहर आई तो ध्यान टूटा ।सामने सूरज समुद्र से आधा बाहर आ चूका था ।समुद्र तट पर रिसार्ट में रुके कुछ जोड़े भी अब बाहर आ चुके थे ।दाहिने की ओर 'शोर टेंपल ' के आसपास सैलानियों की भीड़ बढ़ने लगी थी ।नए साल की वजह से सैलानी ज्यादा थे ।रिसार्ट के समुद्र तट पर सुनामी के कहर का निशान जगह जगह दिख रहा था ।महाबलीपुरम जब पहली बार पहुंचा था तो यह छोटे से गांव की तरह नजर आया । एक पहाडी और उसके आसपास प्राचीन मंदिरों का शिल्प देखने वाला है । शिल्पकारों ने पहाड को तराश कर उन्हें न सिर्फ मंदिरों में बदला बल्कि तरह तरह कि आकृतियों में बादल डाला है । महाभारत की कई कहानियां यहाँ शिल्प में बदली जा चुकी है । पल्लव साम्राज्य की यह ऐतिहासिक धरोहर एक नही कई बार देखने वाली है । महाबलीपुरम बाजार से करीब आधा किलोमीटर दूर पर वह प्राचीन मंदिर है जिसके बाहरी हिस्से पर लगातार समुन्द्र की लहरे टकराती रहती थी और कई जोड़े वह बैठकर फोटो खिंचाते नजर आते थे । अब यह मंदिर परिसर घेरकर एक पार्क में तब्दील किया जा चुका था और मंदिर के बाहरी हिस्से के आगे पत्थर डालकर उसे सुरक्षित किया जा चुका था । जो पहले गाँव जैसा था वह अब एक कस्बे में बदल चुका था और दक्षिण भारतीय रेस्तरां के साथ बड़ी संख्या में चाइनीज और इंटरकांटिनेंटल रेस्तरां नजर आ रहे थे । विदेशी सैलानी तो पहले जैसे ही थे पर देसी सैलानियों कि संख्या काफी ज्यादा थी । महाबलीपुरम से निकले तो समुद्र के किनारे किनारे ही पांडिचेरी की तरफ बढ़ गए। पांडिचेरी जो अब पुद्दुचेरी कहलाता है ,उसका रास्ता महाबलीपुरम से ही होता हुआ जाता है ।दक्षिण के इस अंचल में कई खुबसूरत समुद्र तट है जो सैलानियों को पसंद आ सकते है और ऐसे समुद्र तट पर रुकना बहुत महंगा भी नहीं है ।महाबलीपुरम ,पांडिचेरी ,रामेश्वरम ,कन्याकुमारी से चलकर तिरुअनंतपुरम के समुद्र तट उदाहरण है । यदि दिसंबर जनवरी के पीक सीजन को छोड़ दे तो अमूमन डेढ़ दो हजार रुपए में रिसार्ट में जगह मिल जाती है । तमिलनाडु और केरल में पर्यटन विभाग के रिसार्ट मध्य वर्ग की जरूरतों के हिसाब से ही बनाए गए है । पांडिचेरी में तो अगर कुछ पहले योजना बनाकर जाएँ तो बहुत ही कम खर्च होता है क्योंकि अरविंदो आश्रम के गेस्ट हाउस में ठाह्रने और भोजन आदि का खर्च बहुत कम है । पांडिचेरी में अरविंदो आश्रम का पार्क गेस्ट हाउस समुद्र तट पर है। अरविंदो आश्रम के सभी अतिथि गृह में यह ज्यादा भरा रहता है सिर्फ समुद्र के किनारे होने की वजह से। पर यह आश्रम ही है कोई होटल नहीं। हर कमरे में माँ मीरा की बड़ी फोटो लगी रहती है। यहाँ से समुद्र का नजारा भी अद्भुत नजर आता है। मैं दूसरी मंजिल के उनतीस नम्बर कमरे में रुका हुआ हूँ और बच्चे पहली मंजिल के कमरा नंबर 44 में। अपना कमरा काफी बड़ा और आरामदेह है जबकि नीचे के कमरे छोटे हैं और वहाँ से समुद्र का वह दृश्य नहीं दिखता जो यहाँ से नजर आता है। चेन्नई से एक दिन पहले शाम यानी दो जनवरी को इस गेस्ट हाउस में पहुँचे थे। पहले ट्रेन फिर बहुत दिनों बाद बस से सफ़र करते हुये। सभी साथ थे। पर चेन्नई से ही तबियत ढीली थी। मैरीना बीच और महाबलीपुरम के समुद्र तट पर भी ठण्ड ही महसूस हुयी तो दवा लेनी पड़ी। यह सब सुबह-सुबह हलके कपड़े में समुद्र तट पर कई घण्टे गुजरने की वजह से हुआ। चेन्नई में इतनी ठण्ड सुबह हो जायेगी यह अंदाजा नहीं था। हालाँकि गोपालपुरम के लायड गेस्ट हाउस में ए.सी. लगातार चलता रहा क्योंकि इस तरह के कमरे में कोई खिड़की नहीं होती है। खैर ज्यादा हैरानी पुद्दुचेरी में रजाई गद्दा बिकता देख कर हुयी। हर कोई गर्म कपड़े पहने नजर आया साथ ही टोपी भी। दक्षिण में इतनी ठण्ड पहली बार लोगों ने महसूस की। हर साल की तरह इस बार भी नए साल पर बाहर था और समुद्र तट पर आराम करने के लिये आया था क्योंकि पिछले छह महीने से व्यस्तता काफी बढ़ गयी थी और लगातार दौरे हो रहे थे। लिखना भी कम हो गया था। इसलिये हफ्ता भर समुद्र तट पर रहना चाहता था। पर बुखार ने अपना कार्यक्रम काफी हद तक चौपट कर दिया। इस बार पांडिचेरी में चेट्टीनाड व्यंजनों का स्वाद लेना चाहता था और इसके लिये एक मित्र ने व्यवस्था भी कर दी थी। पर यह सम्भव नहीं हो पाया। सबके जाने के बाद एक कप कॉफी के साथ मै बालकनी में बैठ गया और समुद्र की तेज होती लहरों को देखने लगा। सामने नारियल के पेड़ों की कतार लहराती नजर आ रही थी। एक छोटा बच्चा समुद्र के किनारे काले पत्थरों पर अपनी माँ के साथ उछल-कूद करने में व्यस्त था। दाहिने तरफ की बीच रोड पर सैलानियों कि संख्या बढ़ती जा रही थी। फिर बैठे-बैठे ऊब जाने पर बाहर निकल आया। इस फ्रेंच रेस्तरां के आसपास चौपाटी जैसा नजारा था और ठेले से तली हुयी मछली की गंध चारों ओर फैली हुयी थी। तटीय शहरों में समुद्र तट पर सभी जगह यह नजारा दिखता है। साथ ही मदिरा की दुकानें भी। चेन्नई में तो इस तादात में मदिरा की दुकानें नहीं दिखती पर पुद्दुचेरी में हर चार कदम पर मधुशाला नजर आ जाती है और मदिरा की सेल भी लगी नजर आयी। विदेशी ब्रांड की कीमत यहाँ काफी कम है क्योंकि टैक्स में काफी छूट है। उसका असर समुद्र तट भी दिख जाता है पर कोई हुल्लड़ मचाता नजर नहीं आयेगा। खा ने-पीने के मामले में फ्रांसीसी संस्कृति का असर पुद्दुचेरी में साफ झलकता है। कई बार तो लगता है कि फ़्रांस के ही किसी शहर में घूम रहे हो। वास्तुशिल्प से लेकर बाजार की दुकानों और रेस्तरां होटल के नाम भी फ्रांसीसी हैं। ठीक उसी तरह जैसे गोवा पर पुर्तगाल का असर नजर आता है। पर यह शहर कुछ अलग जरूर है जहाँ भारी भरकम लक्जरी गाड़ियों की जगह साइकिल ज्यादा नजर आती है। शाम को तो बीच रोड पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद कर दी जाती है इसलिये सैलानी बेफिक्र होकर सड़क पर कई किलोमीटर तक घूम लेते हैं। बहुत से सैलानी समुद्र तट के किनारे पड़े पत्थरों पर बैठे नजर आते हैं। नए साल का यह दूसरा दिन है इसलिये नवविवाहित जोड़ों की संख्या भी ज्यादा है जिसमें उत्तर भारत वाले भी शामिल हैं। अन्य तटीय शहरों के मुकाबले काफी साफ़ सुथरा और किफायती शहर है। यहाँ पर खाना और रहना दोनों ही सस्ता है। अगर अरविंदो आश्रम के सबसे आलीशान पार्क गेस्ट हाउस में रुके तो छह सौ में सबसे बड़ा सूट जैसी जगह मिल जाती है जिसमें तीन-चार लोग आ सकते हैं। एक व्यक्ति का एक दिन का खाना नाश्ता आदि भी आश्रम के केंद्रीय भोजनालय में पचास रुपए में हो जाता है। पर यह सब आश्रम जैसा ही है। कोई रूम सर्विस नहीं है। खाने के लिये भी रेस्तरां में ही जाना पड़ेगा। मैं यात्रा में चाय काफी के लिये बिजली की छोटी केतली और उसका सामान साथ लेकर साथ चलता हूँ इसलिये सुबह चार बजे उठने पर कोई दिक्कत नहीं होती। वर्ना सुबह पार्क गेस्ट हाउस के रेस्तरां खुलने का समय ही सात बजे है। आश्रम का शायद यही अकेला रेस्तरां है जहाँ अंडा मिल जाता है वर्ना बाकी जगह शुद्ध शाकाहारी नाश्ता और खाना। सुबह सैलानी नाश्ता करने के बाद समुद्र तट पर पहुँच जाते है और देर तक बैठे रहते हैं।कादम्बनी में प्रकाशित लेख से

Tuesday, April 8, 2014

तमिलनाडु-गठबंधन का फायदा भाजपा को ?

तमिलनाडु-गठबंधन का फायदा भाजपा को ? चेन्नई से प्रदीप कुमार चेन्नई।आगामी लोकसभा चुनावों के लिए राज्य में भारतीय जनता पार्टी नीत गठबंधन के बनने के साथ ही इसका सबसे अधिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को ही मिलने के कयास लगाए जा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्रीय सहयोगी डीएमडीके, पीएमके और एमडीएमके से पूरे वोट ट्रांसफर होकर भाजपा को मिलेंगे। जहां तक पार्टी और उसके सहयोगी दलों की लोकसभा सीट जीतने की क्षमता का सवाल है बहुदलीय संघर्ष में यह परिवर्तित होगा और स्थानीय तथ्यों तथा उम्मीदवार व दल पर निर्भर करेगा। राज्य में पिछले चुनावों का रिकार्ड भी इस बात का संकेत देता है कि भारतीय जनता पार्टी के सहयोगियों को मोदी लहर के कारण मात्र कुछ वोट मिलने की आशा है। लेकिन यदि जमीनी स्तर पर एकता सुनिश्चित होती है तो पीएमके और डीएमडीके जैसे क्षेत्रीय दल अपने अपने संबंधित वोट बैंक को परस्पर एक दूसरे से दिला सकेंगे। क्या है भाजपा का पिछला रिकार्ड भारतीय जनता पार्टी के चुनाव रिकार्ड की जहां तक बात है, पिछले दो चुनाव 2009 के संसदीय चुनाव और 2011के विधानसभा चुनाव दोनों ही पार्टी ने अपने बलबूते लड़ा। 2009 में पार्टी को 21 (कुल 39 संसदीय क्षेत्र) संसदीय क्षेत्रों में उ मीदवार नहीं मिल रहा था जो चुनाव लड़े। 2011 के विधानसभा चुनाव में 204 सीटों पर पार्टी ने चुनाव लड़ा। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मात्र 2.55 प्रतिशत मत मिले। पिछले संसदीय चुनावों में पार्टी के उ मीदवारों को 10,000 से भी कम वोट मिले। यह मत 18 उ मीदवारों में से उन चार को मिला जिन्होंने चुनाव लड़े। केवल दो संसदीय क्षेत्र कन्याकुमारी और रामनाथपुरम ऐसे रहे जहां के पार्टी उ मीदवारों को 50,000 से अधिक वोट मिला। गठबंधन में डीएमडीके की स्थिति इसके विपरीत अभिनेता विजयकांत के नेतृत्व वाली डीएमडीके को पुदुचेरी समेत तमिलनाडु के 40 लोकसभा में 2009 के दौरान 10.08 प्रतिशत मत मिले थे। पार्टी के उ मीदवारों का प्रदर्शन अच्छा रहा। 26 उ मीदवारों को 50,000 से एक लाख वोट मिले केवल चार क्षेत्रों में 50,000 से कम वोट मिले। 9 उम्मीदवारों को एक लाख से अधिक वोट मिले। हालांकि डीएमडीके प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाने में असफल रहा और पार्टी विधायक अलग हो गए। बावजूद इसके पार्टी के वोट बैंक खिसकने के कोई साक्ष्य नहीं है। उत्तरी क्षेत्रों में पीएमके का प्रभाव वर्तमान संदर्भ में पीएमके के वोट बैंक का आधार स्पष्ट नहीं है। पार्टी 1998 से किसी एक गठबंधन का हिस्सा नहीं रही है। अलग अलग गठबंधनों के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही। बहरहाल पार्टी का वन्नियर प्रभुत्व वाले राज्य के उत्तरी व उत्तरी पश्चिम संसदीय क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है। ऐसे में गठबंधन के सहयोगी को बेहतर लाभ मिल सकता है। इसके अतिरिक्त पिछले साल पार्टी ने गैर दलित जातियों के एक मंच पर लाने की बात की थी जिसका उद्देश्य वोट बैंक को नया रूप देना था। 12 संसदीय क्षेत्रों पर केएमडीके का प्रभाव इसी तरह कोन्गुनाडू मक्कल देसिय कच्ची (केएमडीके) ने पश्चिमी क्षेत्र में कोन्गु गाउन्डर समुदाय का अच्छा खासा मत प्राप्त किया था। 2009 में कोन्गुनाडू मक्कल कच्ची ने 12 संसदीय क्षेत्रों में प्रत्याशी खड़े किए और तीन स्थानों पर पार्टी उ मीदवारों को एक लाख से अधिक मत प्राप्त हुए। दो क्षेत्र ऐसे थे जहां 50,000 से अधिक मत पार्टी प्रत्याशियों को प्राप्त हुए। यह पार्टी अब तीन भागों में बंट चुकी है लेकिन समुदाय का वोट गठबंधन को मिल सकता है। कड़े मुकाबले में एमडीएमके महत्वपूर्ण जहां तक एमडीएमके का सवाल है इसके समर्थक राज्य भर में हैं और जब कांटे के मुकाबले की स्थिति होगी तो इसके समर्थकों का कुछ हजार मतों का योगदान महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव का बहिष्कार किया था । यह 1998 से किसी न किसी गठबंधन के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ रही है, ऐसे पार्टी का वास्तविक वोट प्रतिशत निकालना मुश्किल है।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

चंबल के डाकू भी करने लगे है मोदी की जय जयकार !

चंबल के डाकू भी करने लगे है मोदी की जय जयकार ! बीहड़ में भी मोदी लहर दिनेश शाक्य भिंड। इस समय पूरे देश मे मोदी लहर का प्रभाव व्यापक स्तर पर दिख रहा है इसी लहर से प्रभावित हुए बिना चंबल घाटी मे कभी आंतक मचाये रहे डाकू भी नही रह सके है। मलखान सिंह,मोहर सिंह समेत दर्जनो डाकुओ के मददगार चंबल मे नरेंद्र मोदी की जय जयकार करने मे लग करके अपने मोदी प्रेम को उजाकर कर रहे है। उधर महिला डकैत सीमा परिहार दिल्ली मे भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी के पक्ष मे वोट मांग रही है। टीवी शो बिग बॉस मे आ चुकी सीमा ने सोनिया बिहार और करावलनगर मे नार्थ ईस्ट लोकसभा सीट के भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी के समर्थन मे प्रचार कर रही है। सीमा परिहार चंबल के खूंखार दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर के गैंग मे होते हुए लालाराम के गैंग मे रह चुकी है। सीमा परिहार की डाकू जिंदगी पर वुन्डेड नाम की फिल्म का भी निर्माण हो चुका है। खुद सीमा परिहार शिवसेना,समाजवादी पार्टी मे रह चुकी है लेकिन राजनैतिक ताकत नही मिल पाने के बाद सीमा ने अपना कैरियर भोजपुरी फिल्म मे काम करके करना शुरू कर दिया है। कई दशको तक चंबल घाटी को अपने आतंक से थर्राने वाले खूंखार डाकू भी अब मोदी लहर मे मोदी की जय जयकार करने मे लग गये है। आंतक के पर्याय रहे खूंखार डाकुओ मे भी जग गया है भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रति प्रेम भाव। एक समय हत्या,लूट,डाकेजनी और अपहरणो की वारदातो से चंबल को थर्राने वाले मलखान सिंह ने चंबल की भिंड और ग्वालियर संसदीय सीट के लिए भाजपा प्रत्याशी डा.भागीरथ सिंह और नरेंद्र सिंह तोमर के लिए खुल करके प्रचार शुरू कर दिया है। मलखान सिंह और मोहर सिंह के मोदी लहर मे बहने के कारण डाकुओ के कुछ पुराने साथी बेहद खफा भी है। आचार्य विनोबा भावे के आवाहन मे 1960 मे समर्पण करने वाले करीब 90 साल लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का का कहना है कि डाकुओ ने एक जमाने मे आंतक मचा कर लोगो की मुसीबत बढाई है आज वे समर्पण के बाद राजनेताओ की मदद करते है तो उनको आंतकी छवि के तौर पर ही देखा जायेगा इससे किसी को भी लाभ नही मिलेगा। मलखान सिंह मध्यप्रदेश के भिंड जिले के उमरी इलाके के विलाव गांव के रहने वाले है। करीब 15 साल मलखान सिंह ने चंबल के बीहडो मे काटे है। न्याय की तलाश मे भटके मलखान सिंह ने हाथो मे बंदूक थामी और चंबल के बीहड का रास्ता अपनाया। मलखान सिंह खुल के डाकू बनने की वेदना बयान करते हुए कहते है कि उनको डाकू बनानी वाली काग्रेंस है काग्रेंस ने हमेशा घोखा दिया है इस समय पूरे देश मे नरेंद्र मोदी की लहर दिख रही है देश मे सही दिशा सुशासन और विकास सिर्फ भाजपा ही दे सकती है। 17 जून 1982 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के समक्ष सर्मपण करने वाले मलखान सिंह का कहना है कि आम आदमी और गरीबो को समय पर उचित न्याय मिल जाए,तो कोई भी समाज व परिवार को छोड करके बीहड का रास्ता नही पकडेगा। उनका कहना है कि शिवराज सरकार की यह सबसे बडी उपलब्धि है कि आज चंबल घाटी पूरी तरह से दस्यु विहीन बन गई है। अस्सी के दशक में आतंक का पर्याय रहे मलखान अब नरेन्द्र मोदी को पीएम बनाने के लिए लोगों से गुजारिश कर रहे हैं। सरेंडर करने के बाद एक आम नागरिक का जीवन बिता रहे मलखान अब बीजेपी के साथ हैं। वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ एक मंच पर बैठते हैं। साथ ही भिंड और ग्वालियर से बीजेपी प्रत्याशियों के लिए वोट मांगते हैं। मध्य प्रदेश की भिंड लोकसभा सीट में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। 1962 के बाद हुए 13 लोकसभा चुनावों में यहां से कांग्रेस सिर्फ तीन बार ही जीती है। साथ ही 1989 के बाद से कांग्रेस का यहां खाता तक नहीं खुला। हालांकि बीजेपी के इस बार के प्रत्याशी भगीरथ प्रसाद 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ से प्रत्याशी थे। लेकिन वे बीजेपी के अशोक अर्गल से हार गए। मोदी लहर मे डाकुओ के प्रचार से प्रभावित हो कर सामान्य प्रशासन राज्यमंत्री लाल सिंह आर्य का कहना है कि कांग्रेस स कुशासन से परेशान होकर मखखान सिंह और मोहर सिंह जैसे लोगो ने बीहड का रास्ता अपनाया था लेकिन आज भाजपा की नीतियो से प्रभावित होकर नरेंद्र मोदी के पक्ष मे प्रचार करने से जाहिर है कि भाजपाई प्रत्याशियो को लाभ मिलेगा। इसके ठीक विपरीत काग्रेंस की भिंड ईकाई के उपाध्यक्ष डा.राधेश्याम शर्मा का कहना है कि चंबल मे कभी आंतक मचाये रहे डाकुओ के प्रभाव का इस्तेमाल भाजपा अपने प्रत्याशियो को जिताने के लिए कर भले ही रही हो लेकिन हकीकत मे भाजपा को डाकुओ के सर्मथन और सहयोग का कोई लाभ नही मिलेगा क्यो कि डाकुओ की आंतकी छवि का असर हमेशा बरकरार रहता है। जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

जनता भाजपा-कांग्रेस से छुटकारा चाहती है जनता - अखिलेश यादव

जनता भाजपा-कांग्रेस से छुटकारा चाहती है जनता - अखिलेश यादव धामपुर बिजनौर, 8 अप्रैल। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र को झूठ का पुलिन्दा बताया है। उन्होंने कहा कि भाजपा के घोषणा पत्र में जो बातें कही गयी हैं उनसे देश का कोई भला नहीं होगा। भाजपा को पूंजीपतियों की पार्टी बताते हुए उन्होंने कहा कि उसके घोषणा पत्र में गरीबों, मजदूरों, किसानों के लिए कुछ भी नहीं है। कांग्रेस ने भी जनता के साथ खूब धोखाधड़ी की है। उन्होंने कहा कि देश की जनता कांग्रेस और भाजपा से तंग आ चुकी है और अब इनसे छुटाकारा पना चाहती है। लोकसभा चुनाव के बाद देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी। जिसमें समाजवादी पार्टी की अहम भूमिका होगी। नगीना लोकसभा क्षेत्र से सपा उम्मीदवार यशवीर सिंह धोबी के समर्थन में आयोजित चुनावी जनसभा को संबोधित करते मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि यह लोकसभा चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को बहुमत नहीं मिलेगा। देश के ज्यादातर राज्यों में तीसरे दलों को सफलता मिलने जा रही है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उड़ीसा, पंजाब में तीसरे दलों को सफलता मिलेगी। चुनाव के बाद देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनना तय है। तीसरे मोर्चे में शामिल दलों में जो सबसे ज्यादा सीटें जीतेगा उसका नेता प्रधानमंत्री बनेगा। समाजवादी पार्टी ने अगर यूपी में सबसे ज्यादा सीटें जीत लीं तो नेताजी मुलायम सिंह यादव देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी बातें बहुत बड़ी-बड़ी करती है लेकिन सच्चाई यह है कि उसके पास देश के विकास और लोगों के कल्याण के लिए न तो कोई योजना है और नही कोई कार्यक्रम है। भाजपा देश का माहौल बिगाड़ कर चुनाव जीतना चाहती है। अमित शाह का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि भाजपा के एक नेता ने अभी हाल ही में इसी जिले में भड़काऊ भाषण देकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। चुनाव आयोग ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है। भाजपा को समझ में आ चुका है कि चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता उसे नकारने जा रही है, इसीलिए उसने विकास की बातें छोड़कर साम्प्रदायिकता की राजनीति करनी शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भाजपा के मंसूबों को पूरा नहीं होने देगी। अखिलेश यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सबसे ज्यादा 80 सीटें हैं। इसीलिए हर पार्टी यूपी पर फोकस कर रही है। सभी पार्टियों की कोशिश है कि वे यूपी में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा की सीटें जीतें। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि कोई कुछ भी कर ले, यहां किसी को सफलता नहीं मिलेगी। उत्तर प्रदेश में सपा के पक्ष में लहर है। सपा सरकार ने पिछले दो वर्षों में सूबे के विकास के लिए बहुत काम किए हैं। सपा सरकार के कामकाज से जनता खुश है। लैपटॉप वितरण योजना, कन्या विद्य़ाधन योजना, समाजवादी स्वास्थ्य सेवा योजना, लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ को रोकने के लिए शुरी की गई वुमेन पॉवर हेल्पलाइन से लोगों को लाभ पहुंचा है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के लिए जारी घोषणा पत्र में सपा ने देश में संपूर्ण शिक्षा और सभी रोगों के मुफ्त इलाज का वादा किया है। सपा की कथनी और करनी में फर्क नहीं है। हमने जो कहा वो करके दिखाया। 2016 तक राज्य के सभी गांवों को 18 घंटे और शहरों को 22 से 24 घंटे तक बिजली मिलने लगेगी। गन्ना किसानों का बकाया भुगतान उन्हें जल्द से जल्द कर दिया जाएगा। कांग्रेस के गलत फैसले की वजह से देश के चीनी उद्योग पर संकट आया। देश में पर्याप्त मात्रा में चीनीहोने के बावजूद केंद्र सरकार ने विदेशों से चीनी का आयात किया। इसका नतीजा यह हुआ कि हमारे यहां की चीनी मिलों से चीनी की खरीददारी नहीं हुई। चीनी मिलों में चीनी का स्टॉक पड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यीए सरकार की गलत आर्थिक नीतियों की वजह से देश में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है। उन्होंने कहा कि सपा 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भाजपा पैसे और मीडिया के दम पर चुनाव लड़ रही है। शायद उसे नहीं पता कि चुनाव जनता के बीच लड़ा जाता है। भाजपा गुजरात मॉडल और कांग्रेस भारत निर्माण का प्रचार कर रही है। लेकिन इनसे देश का कोई भला नहीं होगा। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपने भाषणों के जरिए लोगों को झूठे सपने दिखा रहे हैं। झूठे सपने कभी पूरे नहीं होते हैं। सपा ही ऐसी पार्टी है जो गरीबों के आंसू पोछकर उनके चेहरे पर मुस्कान लाने का काम कर रही है। सपा सरकार ने एक लाख 72 हजार शिक्षा मित्रों को नौकरी दी है। सपा किसी के साथ कोई भेदभाव किए बिना सभी को साथ लेकर चलती है। हम समाज में मौजूद गैर बराबरी को खत्म करके विकास की राह में पिछड़े हुए लोगों को आगे लाना चाहते हैं। हमारी नीति और नीयत दोनों साफ हैं।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

मणिपुर-पुरुषों के गढ़ में बर्चस्व के लिए महिलाओं की जंग

मणिपुर-पुरुषों के गढ़ में बर्चस्व के लिए महिलाओं की जंग रीता तिवारी, इम्फाल पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में महिलाओं की सामाजिक हैसियत और अधिकार देश के दूसरे राज्यों की मुकाबले बेहतर हैं. देश में अपनी तरह का पहला और अनूठा महिला बाजार एम्मा मार्केट राजधानी इम्फाल में ही है. यहां तमाम दुकानें महिलाएं चलाती हैं. लेकिन इसके बावजूद जब राजनीति में महिलाओं को समान अधिकार देने की बात आती है तो राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय तक तमाम दल कन्नी काट लेते हैं. अबकी राज्य के दो लोकसभा सीटों के लिए मैदान में उतरी दो महिलाएं पुरुषों का गढ़ रही राजनीति में सेंध लगाने का प्रयास कर रही हैं. इंदिरा ओनियम भीतरी मणिपुर संसदीय सीट पर निर्दलीय के तौर पर मैदान में हैं तो तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार किम गांग्टे बाहरी मणिपुर सीट पर पुरुषों को चुनौती दे रही हैं. इन दोनों सीटों के लिए मतदान क्रमशः 17 और नौ अप्रैल को होगा. यह दोनों जानती हैं कि उनकी लड़ाई आसान नहीं है. लेकिन इसके बावजूद वे जोरदार तरीके से राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं. दोनों सीटों पर उनका मुकाबला 16 पुरुष उम्मीदवारों से है. बेहतर सामाजिक हैसियत के बावजूद राज्य में राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं का बर्चस्व कभी नहीं रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरी 15 में से 12 महिला उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. ओनियम कहती हैं, मणिपुर में सामाजिक और आर्थिक मामलों में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम रही है. लेकिन वे भी शोषण की शिकार है. दोनों का कहना है कि उनके चुनाव मैदान में उतरने का मकसद महिलाओं को आर्थिक और राजनीतिक तौर पर मजबूत करना है. ओनियम पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर मुख्यमंत्री ओ ईबोबी सिंह के खिलाफ मैदान में उतरी थी. इस बार जब पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो वे निर्दर्लीय के तौर पर मैदान में कूद पड़ीं. गांग्टे कहती हैं कि राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं. लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इसे गंभीरता से नहीं लिया है. वर्ष 1998 में सीपीआई के टिकट पर संसद के लिए चुनी जानी वाली गांग्टे मणिपुर की पहली महिला सांसद रही हैं. वे कहती हैं कि जब आंदोलन की बात आती है तो महिलाओं को आगे कर दिया जाता है. लेकिन उसके बाद दूसरे मामलों में उनको कोई तवज्जो नहीं दी जाती. यह दोनों राज्य की महिलाओं का समर्थन पाने की उम्मीद कर रही हैं. दोनों महिलाओं ने राज्य के पिछड़ेपन, विकास, रोजगार और महिलाओं की स्थिति में सुधार को अपना मुख्य मुद्दा बनाया है. इसके अलावा दोनों अपने अभियान के दौरान सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को रद्द करने की भी मांग उठा रही हैं. उनका कहना है कि इस अधिनियम के सहारे सेना के जवान युवकों पर अत्याचार कर रहे हैं. नतीजतन युवक उग्रवादी संगठनों में शामिल हो रहे हैं. उग्रवाद पर अंकुश लगाने के लिए इस कानून को रद्द करना जरूरी है. राज्य के चुनावी इतिहास को ध्यान में रखते हुए इन दोनों महिलाओं की जीत की उम्मीद तो कम ही है. लेकिन दोनों ने अपने हौसले से पुरुषों के बर्चस्व वाले इस राज्य में एक पहचान तो बना ही ली है.जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

मुलायम गढ इटावा था हयूम का कार्यक्षेत्र

मुलायम गढ इटावा था हयूम का कार्यक्षेत्र दिनेश शाक्य इटावा . आजादी पूर्व यमुना नदी के किनारे बसे इटावा जिले मे आजादी के दीवानो से निपटने के लिए बनाई गई रक्षक सेना की कामयाबी से प्रेरित हो कर देश के सबसे बडे राजनैतिक दल काग्रेंस की स्थापना की गई थी लेकिन आज इटावा मे काग्रेंस के नाम लेवा उगुलियो पर गिने जाने लायक रह है और इटावा की पहचान मुलायम सिंह के नाम से होने लगी है। महाभारत कालीन सभ्यता से जुडे इटावा की पहचान आज भले ही सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के बदौलत हो रही हो लेकिन आजादी पूर्व इटावा को हयूम के नाम से जाना जाता था। हयूम कोई और नही हयूम वही अग्रेंज अफसर है जिनकी रक्षक सेना से प्रेरित हो कर देश के सबसे बडे राजनैतिक दल काग्रेंस की स्थापना की गई। काग्रेंस के विरोध के बलबूते पर देश के शीर्ष राजनीतिज्ञ के तौर स्थापित हो चुके सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव का गढ उनकी ताकत के कारण इतना मजबूत हो चला है कि करीब तीन दशक से काग्रेंस घरातल पर आ गई है। सबसे हैरत की बात यह है कि आज मुलायम के गढ मे जिस कांग्रेस को दुर्दशाग्रस्त होते हुए देखा जा रहा है कि आजादी पूर्व इटावा मे ही काग्रेंस की स्थापना की संरचना स्थानीय रक्षक सेना के तौर पर की गई थी। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के गढ इटावा मे करीब 30 साल पहले काग्रेंस ने अपना परचम फहराया था उसके बाद से लगातार काग्रेंस अपना परचम फहराने की कोशिश कर रही है लेकिन मुलायम के गढ मे काग्रेंस को कामयाबी नही मिल रही है। सबसे हैरत की बात तो यही है कि चुनाव नतीजो के सामने आने के बाद लगातार इटावा और आसपास की सात संसदीय सीटो पर काग्रेंस के जनाधार मे गिरावट देखी जा रही है। एलन ऑक्टेवियन हयूम यानि ए.ओ.हयूम ! एक ऐसा नाम है जिसके बारे मे कहा जाता है कि उसने गुलामी के दौर मे अपने अंदाज मे ना केवल जिंदगी को जिया बल्कि अपनी सूझबूझ से देश को काग्रेस के रूप मे एक ऐसा नाम दिया जो आज देश की तस्वीर और तदवीर बन गया है।एलन ऑक्टेवियन हयूम यानि ए.ओ.हयूम को वैसे तो आम तौर सिर्फ काग्रेस के सस्थापक के तौर पर जाना और पहचाना जाता है लेकिन ए.ओ.हयूम की कई पहचाने रही है जिनके बारे मे ना तो देश का हर नागरिक जानता है और ना ही देश की सबसे बडी पार्टी काग्रेस के नेता और कार्यकर्ता जानते है। इस नाम मे बहुत कुछ छिपा हुआ है जिसे सही से जानने के लिये के देश की गुलामी के दौर मे जाने की जरूरत पडेगी। बात शुरू करते है यमुना और चंबल नदी के किनारे बसे उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले इटावा की। 4 फरवरी 1856 को इटावा के कलक्टर के रूप मे ए.ओ.हयूम की तैनाती अग्रेज सरकार की ओर से की गई। हयूम की एक अग्रेज अफसर के तौर पर कलक्टर के रूप मे पहली तैनाती है। ए.ओ.हयूम इटावा मे अपने कार्यकाल के दौरान 1867 तक तैनात रहे। आते ही हयूम ने अपनी कार्यक्षमता का परिचय देना शुरू कर दिया। 16 जून 1856 को हयूम ने इटावा के लोगो की जनस्वास्थ्य सुविधाओ को मददेनजर रखते हुये मुख्यालय पर एक सरकारी अस्पताल का निर्माण कराया तथा स्थानीय लोगो की मदद से हयूम ने खुद के अंश से 32 स्कूलो को निर्माण कराया जिसमे 5683 बालक बालिका अध्ययनरत रहे। खास बात यह है कि उस वक्त बालिका शिक्षा का जोर ना के बराबर रहा होगा तभी तो सिर्फ 2 ही बालिका अध्ययन के लिये सामने आई। हयूम ने इटावा को एक बडा व्यापारिक केंद्र बनाने का निर्णय लेते हुये अपने ही नाम के उपनाम हयूम से हयूमगंज की स्थापना करके हाट बाजार खुलवाया जो आज बदलते समय मे होमगंज के रूप मे बडा व्यापारिक केंद्र बन गया है। 1857 के गदर के बाद इटावा मे हयूम ने एक शासक के तौर पर जो कठिनाईया आम लोगो को देखी उसको जोडते हुये 27 मार्च 1861 को भारतीयो के पक्ष मे जो रिपोर्ट अग्रेज सरकार को भेजी उससे हूयूम के लिये अग्रेज सरकार ने नाक भौह तान ली और हयूम को तत्काल बीमारी की छुटटी नाम पर ब्रिटेन भेज दिया। एक नंबवर 1861 को हूयूम ने अपनी रिर्पोट को लेकर अग्रेज सरकार ने माफी मागी तो 14 फरवरी 1963 को पुनः इटावा के कलक्टर के रूप मे तैनात कर दी गई। हूयूम को अग्रेज अफसर के रूप मे माना जाता है जिसने अपने समय से पहले बहुत आगे के बारे मे ना केवल सोचा बल्कि उस पर काम भी किया। वैसे तो इटावा का वजूद हयूम के यहा आने से पहले ही हो गया था लेकिन हूयूम ने जो कुछ दिया उसके कोई दूसरी मिसाल देखने को कही भी नही मिलती एक अग्रेज अफसर होने के बावजूद भी हूयूम का यही इटावा प्रेम हूयूम के लिये मुसीबत का कारण बना। हयूम की इतनी लंबी चौडी दास्तान इटावा से जुडी हुई जिसे कितना भी कम करके आंका जाये तो कम नही होगा। हयूम की इस दास्तान को सुनाने के पीछे भी एक वजह यह है कि हयूम ने इटावा मे अपने कार्यकाल के दौरान आज की भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस की स्थापना का खाका खींचा और इटावा से जाने के बाद स्थापना भी की । साल 1858 के मघ्य मे हयूम ने राजभक्त जमीदारों की अध्यक्षता में ठाकुरों की एक स्थानीय रक्षक सेना का गठन किया,जिसका उददेश्य इटावा में शांति स्थापित करना था। अपने उददेश्य के मुताबिक इस सेना को यहां पर शांति स्थापित करने में काफी हद तक सफलता मिली थी। रक्षक सेना की सफलता को देखते हुये 28 दिसंबर 1885 को मुबंई में ब्रिटिश प्रशासक ए.ओ.हयूम ने काग्रेंस की नीवं डाली जो आज देश की एक प्रमुख राजनैतिक पार्टी हैं। इटावा में स्थानीय रक्षक सेना के गठन की भी बडी दिलचस्प कहानी है। 1856 में ए.ओ.हयूम इटावा के कलक्टर बन कर आये। कुछ समय तक यहां पर शांति रही। डलहौजी की व्ययगत संधि के कारण देशी राज्यों में अपने अधिकार हनन को लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरद्ध आक्रोश व्याप्त हो चुका था। चर्बी लगे कारतूसों क कारण 6 मई 1857 में मेरठ से सैनिक विद्रोह भडक था। उत्तर प्रदेश तथा दिल्ली से लगे हुये अन्य क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी ने अत्यधिक संवेदनशील घोषित कर दिये थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीयों की संख्या भी बडी मात्रा में थी। हयूम ने इटावा की सुरक्षा व्यवस्था को घ्यान में रख कर शहर की सडकों पर गश्त तेज कर दी थी। 16 मई 1857 की आधी रात को सात हथियारबंद सिपाही इटावा के सडक पर शहर कोतवाल ने पकडे। ये मेरठ के पठान विद्रोही थे और अपने गांव फतेहपुर लौट रहे थे। कलक्टर हयूम को सूचना दी गई और उन्हें कमांडिंग अफसर कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वी बच गया। विद्रोहियों ने कार्नफील्ड पर गोली चला दी लेकिन वह बच गया.इस पर क्रोधित होकर उसने चार को गोली से उडा दिया परन्तु तीन विद्रोही भाग निकले। इटावा में अपने कलक्टर कार्यकाल के दौरान हयूम ने अपने नाम के अग्रेंजी शब्द के एच.यू.एम.ई.के रूप में चार इमारतों का निर्माण कराया जो आज भी हयूम की दूरदर्शिता की याद दिलाते है। स्कॉटलैंड से चुने जाने वाले एक ब्रिटिश सांसद की संतान एलन ऑक्टेवियन ह्यूम 1857 के गदर के दौरान इटावा के कलेक्टर थे और वहां उनकी क्रूरता की कुछ कहानियां भी प्रचलित हैं। लेकिन बाद में उनकी पहचान एक अडियल घुमंतू पक्षी विज्ञानी और शौकिया कृषि विशेषज्ञ की बनी। पर्यावरणीय संस्था का संचालन करने वाले डा.राजीव चौहान बताते है कि ए.ओ.हयूम को पक्षियो से खासा प्रेम काफी रहा है। इटावा मे अपनी तैनाती के दौरान अपने आवास पर हयूम ने 165 से अधिक चिडियो का संकलन करके रखा था एक आवास की छत ढहने से सभी की मौत हो गई थी। इसके अलावा कलक्टर आवास मे ही बरगद का पेड पर 35 प्रजाति की चिडिया हमेशा बनी रहती थी। साइबेरियन क्रेन को भी हयूम ने सबसे पहले इटावा के उत्तर सीमा पर बसे सोंज बैंडलैंड मे देखे गये सारस क्रेन से भी लोगो को रूबर कराया था। अब बात करते है कि इटावा मे काग्रेंस की बदहाली पर। 31 अक्टूबर 1984 को अपने ही सुरक्षाकर्मियो के हाथो मारी गई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी लहर के बाद मुलायम सिंह यादव के गढ इटावा मे संसदीय चुनाव मे काग्रेंस के चौधरी रधुराज सिंह को 1984 मे विजय मिली थी। इंदिरा लहर का असर यह हुआ कि काग्रेंस के चौधरी रधुराज सिंह को एक लाख 84 हजार चार को चार मत मिले और वे अपने करीबी प्रतिदंदी लोकदल के धनीराम वर्मा से पराजित हो गये। धनीराम वर्मा को इस चुनाव मे 161336 मत मिले इस तरह से चौधरी रधुराज सिंह 23068 मतो से विजये पाये। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यह एक ऐसा चुनाव था जिसमे काग्रेंस को विजय मिली लेकिन उसके बाद काग्रेंस आज तक जीत के लिए तरस रही है। सबसे हैरत की बात यह है कि इस चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव की ताकत लगातार बढती ही चली गई और काग्रेंस को जनाधार धरासाई होता चला गया। अगर इंदिरा लहर की बात करे तो इटावा के आसपास कन्नौज सीट से काग्रेस से शीला दीक्षित,फर्रूखाबाद से खुर्शीद आलम खान,मैनपुरी से बलराम सिंह यादव,जलेसर से कैलाश यादव,फिरोजाबाद से गंगाराम और एटा से लोकदल के महफूज अली को जीत मिली थी। 1984 मे मुलायम सिंह यादव के गढ के आसपास काग्रेंस का ही तिलस्म काबिज था लेकिन एटा मे काग्रेंस के मुशीर खा मुलायम के सिपहसालार लोकदल के महमूद अली से चित हो गये। इंदिरा लहर मे मुलायम गढ मे काबिज हुई काग्रेंस मंडल चमत्कार मे बुरी तरह से ध्वस्त हो गई। 1989 के चुनाव मे मंडल लहर चरम पर हो चुकी थी ऐसे मे इटावा संसदीय चुनाव मे जनता दल से राम सिंह शाक्य 214264 ने कांग्रेस के सत्यनारायण दुबे 171249 को पराजित करने मे कामयाबी पाई। कुछ ऐसा ही कन्नौज की सीट पर हुआ जहा पर काग्रेंस की शीला दीक्षित को जद के छोटे सिंह यादव ने पराजित कर दिया। छोटे सिंह ने 220840 और शीला को 167007 मत मिले। फर्रूखाबाद मे जनता दल के संतोष भारतीय 165452 ने काग्रेंस के सलमान खुर्शीद 157968 को हराया। मैनपुरी मे मुलायम सिंह यादव के गुरू और जनता दल के प्रत्याशी उदयप्रतापसिंह 239660 ने कांग्रेस के कैलाश चंद्र यादव 155369 को पराजित किया। जलेसर मे जनता दल के मुलतान सिंह 221590 ने काग्रेंस के कैलाश यादव 123694 को पराजित किया। फिरोजाबाद से रामजी लाल सुमन 283774 ने काग्रेंस के गंगाराम 110948 को पराजित किया लेकिन मंडल लहर का असर एटा जैसी सीट पर नही दिखा क्यो कि यहा से भाजपा के महादीपक सिंह शाक्य 143442 ने काग्रेंस के सलीम शेरवानी 135969 को हराया यहा पर जनता दल का तीसरे नंबर पर रहा है। 1991 मे राममंदिर लहर के तौर पर सब जानते है इस दौर मे हुए संसदीय चुनाव मे मुलायम सिंह यादव इटावा संसदीय चुनाव मे बसपा के कांशीराम को चुनाव मैदान मे उतरवा करके सहयोग किया परिणाम स्वरूप कांशीराम 141290 की जीत हुई लेकिन मुलायम सिंह यादव के दल जनता पार्टी के प्रत्याशी रामसिंह शाक्य 82624 तीसरे नंबर पर जा पहुंचे लेकिन काग्रेंस के श्री शंकर तिवारी 74149 पर चौथे नंबर पर सिमट गये। कन्नौज मे भी काग्रेंस के प्रत्याशी चंद्र भूषण सिंह को 68480 मत ही मिले लेकिन जनता पार्टी के छोटे सिंह 17594 मत पा कर विजई हुये। मैनपुरी मे काग्रेंस के कैलाश चंद्र यादव को 93159 वोट मिले लेकिन जीत हुई जनता पार्टी के उदयप्रताप सिंह 126463 को मिली। फिरोजाबाद मे काग्रेंस के आजाद कुमार कर्दम 66183 वोट ही पा सके। एटा मे भी काग्रेंस के कैलाश यादव 56939 वोट मिले लेकिन जलेसर सीट से तो काग्रेंस अपना उम्मीदवार ही खडा करने की हिम्मत नही दिखा सकी। काग्रेंस की इज्जत बचाने का काम अगर किसी ने किया तो वो निकले फर्रूखाबाद के सलमान खुर्शीद जिन्होने जीत हासिल की अन्यथा पूरी मुलायम बेल्ट मे काग्रेंस चित ही रही है। 1996 के चुनाव का अगर हम ज्रिक करे तो मुलायम के गढ मे काग्रेंस चारो खाने चित हुई इटावा और आसपास की सातो सीटो पर काग्रेंस बुरी तरह से चित हुई है। इटावा संसदीय चुनाव मे काग्रेंस के नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी आये जो 14743 मत ही पा सके,इसी तरह से कन्नौज से रामअवतार दीक्षित पर काग्रेंस ने जोर अजमाया उन्हे सिर्फ 9957 वोट मिले। मैनपुरी से कैलाश यादव को 14993,फिरोजाबाद से गुलाब सेहरा को 5947,एटा से गिरीश चंद्र मिश्रा को 24940,जलेसर से बलराम सिंह यादव को 72917 वोट मिले अगर इस चुनाव मे कोई सही हालात मे रहा तो वो है फर्रूखाबाद के सलमान खुर्शीद जिनको 97261 लोगो का जनसर्मथन रहा है। 1998 मे तो 1996 से बुरी हालत रही काग्रेंस के प्रत्याशियो की इटावा मे काग्रेंस के सत्यप्रकाश धनगर 10875,कन्नौज से प्रतिमा चतुर्वेदी को 17144,मैनपुरी से शिवनाथ दीक्षित को 6699,जलेसर से अवधेश यादव को 7505,एटा से के.पी.सिंह को 7662,फिरोजाबाद से बच्चू सिंह को मात्र 5642 ही वोट मिले। काग्रेंस के उम्मीदवारो को मिले वोट कही से भी नही लग रहे है कि यह देश की वजूद वाली पार्टी है इस चुनाव मे फर्रूखाबाद के सलमान खर्शीद ने जरूर 180531 वोट पा कर काग्रेंस की इज्जत को बचाया। 1999 मे इटावा से सरिता भदौरिया को चुनाव मैदान मे उतारा गया इनके पति काग्रेंस महासचिव अभयवीर सिंह भदौरिया की हत्या कर दी थी परिणाम स्वरूप चुनाव मैदान मे उतरने पर कुछ सहानुभूति मिली सरिता भदौरिया को 51868 वोट मिले। सभी राजनैतिक दलो ने इस वोट को काग्रेंस का नही सरिता भदौरिया का जनाधार माना। कन्नौज से दिग्विजय सिंह को 27082,मैनपुरी से मुंशीलाल को 15139,जलेसर से जावेद अली को 53717,एटा से राजेंद्र सिंह को 71892 वोट ही मिले फिरोजाबाद से काग्रेंस को कोई उम्मीदवार ही चुनाव मैदान मे उतरने के लिए नही मिला। फर्रूखाबाद से सलमान खुर्शीद ने अपनी बीबी लुईस खुर्शीद को चुनाव मैदान मे उतारा जहा से उनको 155601 वोट मिले। 2004 मे इटावा मे काग्रेंस से राजेंद्र प्रसाद जिनको कोई जानता पहचानता नही था को चुनाव मैदान मे उतारा गया राजेंद्र प्रसाद अपनी ओर कोंग्रेसियो को तमाम मेहनत मशक्कत के बाद 9482 वोट ही पा सके। इसी तरह से कन्नौज से विनय शुक्ला को 10501,मैनपुरी से राजेंद्र जादौन को 9897,एटा से रविन्द्र को 22442,फिरोजाबाद को 28105,जलेसर से शिवराज सिंह को 12735 वोट ही मिले लेकिन पहले की ही तरह फर्रूखाबाद से लुईस खुर्शीद को 177380 वोट मिले। पिछले लोकसभा चुनाव यानि साल 2009 मे इटावा से काग्रेंस को कोई उम्मीदवार नही मिला क्यो कि काग्रेंस हाईकमान ने महानदल से गठबंधन करने के बाद रिटार्यड आयकर अधिकारी शिवराम दोहरे को चुनाव मैदान मे उतारा जिनको किसी भी काग्रेंसी ने सहयोग नही किया परिणाम स्वरूप काग्रेंस रूपी महानदल को मात्र 5824 वोट ही मिल पाये। मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के निर्वाचन क्षेत्र मैनपुरी और कन्नौज से कोई उम्मीदवार नही काग्रेंस को चुनाव मैदान मे उतरने के लिए नही मिला। फिरोजाबाद से राजेंद्र पाल को 6340,एटा से महादीपक शाक्य को 25037 मत मिले है। हासिये पर आ चुकी काग्रेंस की दुर्दशा के कारण जो भी माने जाये लेकिन हकीकत मे यही कहा जा सकता है कि देश स्तरीय राजनैतिक दल की दुर्दशा जरूर चिंता का विषय माना जायेगा। जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयानों भ्रमित हो गया मुस्लिम वोटर

मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयानों भ्रमित हो गया मुस्लिम वोटर काजि़म रज़ा शकील लखनऊ। आम चुनाव से ठीक पहले मुस्लिम धर्मगुरुओं के बयानों से मुस्लिम वोटर भ्रम की स्थिति में आ गया है। भ्रम की स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि धर्मगुरुओं ने चुनावी बिसात पर साफ दिखते भी नहीं सामने आते भी नहीं की तर्ज पर अपना कारनामा अंजाम दे दिया है। किसी भी धर्मगुरू ने साफ तौर पर यह नहीं बताया है कि किस प्रत्याशी को या फिर किस पार्टी को वोट दिया जाए लेकिन यह कहकर शोशा छोड़ दिया है कि न तो बीजेपी को चुनना है न कांग्रेस को चुनना है लेकिन जिसे चुनना है उसे सेक्युलर चुनना है। मुसलमान बेचारा सेक्युलर के नाम पर भ्रम का शिकार हो गया है। मुसलमान भ्रम का शिकार नहीं हुआ होता अगर धर्मगुरू सीधे-सीधे अपनर मंशा स्पष्टï कर देते कि किसे वोट देना है। धर्मगुरू खुद बता देते कि कौन सी पार्टी सेक्युलर है और उसे जितवा कर सेक्युलरिज्म को बचाया जा सकता है। चुनाव सर पर आ गये हैं और मुस्लिम वोटर यही समझ नहीं पा रहा है कि किस पार्टी को सेक्युलर मानकर उसे वोट कर दिया जाए। आम तौर चुनावों में मुस्लिम वोटर कि भूमिका बहुत अहम् होती है और उत्तर प्रदेश विधान सभा के दो चुनावों में तो मुस्लिम वोट कि वजह से ही एक बार बीएसपी और इस बार समाजवादी पार्टी कि सरकार पूर्ण बहुमत से बनी दोनों पार्टियों ने इस बात को मानती भी हैं, लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव को लेकर जारी धर्मगुरुओं कि अपीलों ने मुसलमानों के सामने भ्रम कि स्थिति पैदा कर दी है कि वोट किसको दें। मौलाना अहमद बुखारी पहले ही कांग्रेस के सामर्थन का एलान कर चुके हैं जिसके पीछे दो वजह नजऱ आती है कि बीजेपी की टक्कर कांग्रेस से ही नजऱ आती है और दूसरी कांग्रेस की मुस्लिम मसाएल पर आश्वासन लेकिन आज लखनऊ प्रेस क्लब में हुई प्रेस कॉन्फ्रेन्स ने इस भ्रम को और भी बढ़ा दिया कि इस श्रेणी में अब समाजवादी पार्टी भी आ गयी इस प्रेस कॉन्फ्रेन्स में मौलाना कल्बे जवाद ने कांग्रेस के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए मुसलमनों से अपील कि की कि वह लोकसभा में बीजेपी और कांग्रेस को वोट न दें इस अवसर पर मौजूद मौलाना याहिया बुखारी ने बीजेपी के गुजरात दंगों का जि़क्र किया और कांग्रेस के कई फसाद का जि़क्र कर दोनों को खड़ा कर दिया उन्होंने मुजफ़्फर नगर फसाद पर पूछे गए सवाल के जवाब में मुलायम सिंह यादव और कांग्रेस को ही कसूरवार ठहराया और कहा कि मुजफ़्फरनगर काण्ड मुलायम सिंह की पार्टी की हुकूमत में हुआ और कांग्रेस के राहुल गांधी जब मुजफ़्फरनगर दौरा करने आये तो मुसलमानों ने उनसे पैकेज मांगा लेकिन उन्होंने कुछ नहीं दिया। मुजफ़्फरनगर में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों जि़म्मेदार है आज कि प्रेस कॉन्फ्रेन्स में कांग्रेस, बीजेपी का विरोध, इसके साथ ही मुजफ़्फरनगर में समाजवादी पार्टी कि भूमिका और धर्मगुरुओं की सेकुलर उम्मीदवारों को वोट देने की अपील फिर किसी भी पार्टी के सेकुलर के समर्थन में खुलकर न आने से यही लगता है कि अगर मुसलमान विरोध करेगा और वोट करेगा तो वह भ्रम कि स्थिति में होगा कि सपा, बीजेपी और कांग्रेस के अलावा किस पार्टी के उम्मीदवार को वोट दे वैसे खुलकर नहीं बंद अल्फ़ाज में मौलाना याहिया यह गए कि नए को मौका दें और वह दिल्ली में आम आदमी पार्टी का समर्थन कर चुके हैं तो क्या उनके मुताबिक आप को मुसलमान वोट दे कुल मिलाकर मुसलमानों में भ्रम है कि वोट किसको दे। बीजेपी से टक्कर लेने वाली कांग्रेस या फिर सेकुलर चेहरे वाले एक हलके के सभी को वोट कर तकसीम हो कर बीजेपी को फायदा पहुंचाये। कानपुर के मौलाना रज़ी अहमद के अनुसार हम इस बार किसी कि अपील पर ध्यान न देकर यह चाहते हैं कि वोट उसको दें जो बी जे पी को हरा सके उनका कहना था कि अगर कोई मुस्लिम उम्मीदवार है और वह जीतने की हैसियत में नहीं है तो हम हिन्दू सेकुलर को वोट देना चाहेंगे उन्होंने कहा कि हमारा मकसद मोदी की बी जे पी को हराना है। वहीं एक मौलाना जो कि नाम न छपने कि शर्त रखते हैं उन्होंने कहा कि हम लोगों ने एक मुस्लिम उम्मीदवार कि हिमायत से इंकार कर दिए क्यों कि वह जीतने कि स्थिति में नही हैं बल्कि उनकी हिमायत होती है तो बीजेपी जीत जायेगी। मौलाना तस्नीम मेहदी कहते हैं कि इस व़क्त मुद्दा यह है कि हमें यह देखना है मोदी को रोकने कि ताकत किसमे है और वह किस पार्टी का है ज़रूरी है बी जे पी को रोकने के लिए किसी सेकुलर जीतने वाले उम्मीदवार कि हिमायत कर उसकी जीत यकीनी बनाये उनके अनुसार मुस्लिम हितों कि बात करने वाले सेकुलर उम्मीदवार को वोट देना चाहिए। मुस्लिम सियासी मामलों के जानकार प्रोफेसर रमेश दीक्षित के अनुसार जिस तरह से अपील हो रही है उससे मुल्जि़म वोट बंट जायेगा जिसका सीधा फायेदा बी जे पी को होगा उनहोंने कहा कि मुसलमान अपने धर्मगुरुओं की बात मानता है ऐसे में अगर कोई खुली अपील किसी के समर्थन में होती और सिर्फ विरोध की ही अपील होती है तो वोट बंटने कि ज्य़ादा उम्मीद है उन्होंने कहा कि अगर धर्मगुरु विरोध की अपील करें तो किसी के समर्थन कि भी अपील करें कि वोट दें किसे। और अपील सभी को एक करने कि ज़रुरत है वह कहते हैं कि यह सही है कि मुसलमानों को वोट के नाम ठगा गया है और उसके लिए रणनीति बनायी जाये ।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

एक यात्रा किरंदुल पैसेंजर से

एक यात्रा किरंदुल पैसेंजर से अंबरीश कुमार अरकू जंक्शन(सीमान्ध्र) । केशकाल घाटी से आगे बढ़ने पर जहाँ भी रुकते जंगल से महुआ की गंध महसूस हो रही थी ।महुआ के नए और हल्के लाल पत्तों से सफ़ेद फूल जमीन पर गिर तो रहे थे पर नीचे पड़े सूखे पत्तों पर ही गुलाबी हो रहे थे ।एक आदिवासी टोकरी लिए महुआ बीन रहा था तो फोटो लेने गाड़ी से उतरा ।बाद में डा सुनीलम और रजनीश भी उतर आए और बुजुर्ग आदिवासी से बात करने लगे ।इस बीच मैंने महुआ के एक फूल का स्वाद लिया तो चालीस साल पहले ननिहाल के बगीचे की याद आ गई ।यह स्वाद वही था । मादकता वही थी । पूर्वांचल में तब महुआ और गुड मिलाकर जो मोती पूड़ी बनती थी उसे ठोक्वा कहते थे और वह सफ़र में भरे मिर्च के अचार के साथ खाई जाती थी ।अब इस जंगल में एक फूल का स्वाद लेते गोरखपुर के आगे बडहलगंज क्षेत्र में आने वाला अपने ननिहाल का गाँव मरवट याद आ गया । जो सड़क से करीब दो किलोमीटर दूर था और पगडंडियों से जाना होता था पर बाग़ बगीचे बहुत थे ।बाग़ में आम ,जामुन कटहल ,ईमली और महुआ के पेड़ थे ।अप्रैल में महुआ जब टपकता था तो जेब में भी भर लेते थे ।आज भी केशकाल के आगे जंगल से उठाए महुआ के कुछ फूल कैमरे के बैग में डाल लिए जो लखनऊ तक आए ।इस अंचल में आने का जब कार्यक्रम बना तो समय का ध्यान रखना पड़ा और इस तरह से यात्रा की योजना बनी कि कम से कम समय में ज्यादा काम हो सके । मार्च के अंतिम दिन दोपहर को लखनऊ से चले तो रायपुर शाम को पहुंचे और तय कार्यक्रम के मुताबिक एअरपोर्ट से ही सीधे कटोरातालाब स्थित अजित जोगी के घर । पता चला वे कोंडागांव से चल चुके है और देर रात तक पहुंचेंगे । वहां से मैग्नेटो माल में खुले एक होटल में ठहरने की व्यवस्था की गई थी ।कुछ ही देर में डा सुनीलम का फोन आया कि वे बिलासपुर में सभा करने के बाद रात साढ़े दस बजे तक रायपुर पहुंचेंगे और रात का भोजन भी साथ करेंगे ।जिसके बाद पंडरी के एक होटल में एक और कमरा लिया गया ताकि सुनीलम भी रुक सके ।इस बीच अपने पुराने मित्र और छतीसगढ़ में कांग्रेस के नेता सत्यनारायण शर्मा से फोन पर बात हुई तो उन्होंने घर आने को कहा पर संभव नहीं हुआ ।इसी तरह बृजमोहन अग्रवाल से मिलने का समय भी देर रात का तय हुआ पर जब हम लोग बात करने बैठे तो फिर निकलना संभव नहीं हुआ ।जनसत्ता के सहयोगी संजीत त्रिपाठी भी साथ थे जबकि राजकुमार सोनी राजस्थान में थे ।खैर सुनीलम के आने के बाद खाने पर देर तक चर्चा होती रही और सुबह एलार्म की आवाज पर ही उठे ।साढ़े चार बजे तक तैयार होकर बाहर आ चुके थे क्योकि डा सुनीलम के एक मित्र से रास्ते में कुरूद में मिलना था ।मै डा सुनीलम और विजय शुक्ल एक गाड़ी में थे तो पीछे दूसरी गाड़ी में सिंगरौली में विस्थापित आदिवासियों के बीच काम करने वाली एकता और रवि रजनीश अवस्थी के साथ थे ।कुरूद से निकलते निकलते साढ़े सात बज चुके थे इसलिए धमतरी में एक ठेले वाले से इडली लेकर नास्ता हुआ तो विजय वहां की मशहूर मुंग की पकौड़ी भी ले आए हालाँकि वे खुद उपवास कर रहे थे । रवि और एकता पहली बार बस्तर जा रहे थे और मै इतनी बार गया कि अब याद भी नहीं रहता ।रास्ते के सारे मोड़ और ढाबे याद हो गए है ।इससे पहले विधान सभा चुनाव में भरी बरसात में आना हुआ था तब उफनाई इंद्रावती नदी को चित्रकोट पहाड़ी से नीचे गिरते देख रोमांचित हो गया था वह भी छाते के बावजूद भीगते हुए ।समूची नदी नीचे गिर रही थी और पानी की बूंदें ऊपर तक उछल रही थी ।पहले लिखा था इस बस्तर के बारे में ।बस्तर क्षेत्र को दण्डकारण्य कहा जाता है। समता मूलक समाज की लड़ाई लड़ने वाले आधुनिक नक्सलियों तक ने अपने इस जोन का नाम दंडकारण्य जोन रखा है जिसके कमांडर अलग होते हैं। यह वही दंडकारणय है जहां कभी भगवान राम ने वनवास काटा था। वाल्मीकी रामायण के अनुसार भगवान राम ने वनवास का ज्यादातर समय यहां दण्डकारण्य वन में गुजारा था। इस दंडकारणय की खूबसूरती अद्भुत है। घने जंगलों में महुआ-कन्दमूल, फलफूल और लकड़ियां चुनती कमनीय आदिवासी बालाएं आज भी सल्फी पीकर मृदंग की ताल पर नृत्य करती नजर आ जाती हैं। यहीं पर घोटुल की मादक आवाजें सुनाई पड़ती हैं। असंख्य झरने, इठलाती बलखाती नदियां, जंगल से लदे पहाड़ और पहाड़ी से उतरती नदियां। कुटुम्बसर की रहस्यमयी गुफाएं और कभी सूरज का दर्शन न करने वाली अंधी मछलियां, यह इसी दण्डकारण्य में है।और इसी दण्डकारण्य में एक बार फिर यात्रा पर था नए साथियों के साथ ।इस बार आदिवासी अस्मिता की प्रतीक बनी सोनी सोरी के चुनाव अभियान से जुड़ने जा रहा था जन आंदोलनों की अभियान समिति की तरफ से ।आन्दोलन के साथी डा सुनीलम साथ थे तो विश्विद्यालय के साथी रजनीश अवस्थी और बड़ी नौकरी छोड़ कर आदिवासियों के बीच काम करने वाली एकता और रवि शेखर ।सड़क के दोनों ओर बीच बीच में शाल के घने जंगल आते तो उनकी छाया से दृश्य बदल जाता ।आम के पेड़ों की कतार दूर तक जा रही थी ।बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि देश में अमचुर की कुल खपत का चालीस फीसद सिर्फ बस्तर पूरा करता है तो देश में ईमली कि खपत का सत्तर फीसद इसी बस्तर से जाता है । आम ,ईमली, चिरौंजी ,महुआ और सल्फी आदि से ही आदिवासी जंगल में अपना जीवन बिताते है । जंगल के जानवरों का शिकार भी करते है पर नियंत्रित ढंग से ।उनकी चिंता अब जंगली जानवरों को लेकर भी है क्योंकि अगर जानवर ख़त्म हुए तो जंगल भी ख़त्म हो जाएंगे । अचानक बगल के जंगल पर नजर गई तो देखा एक आदिवासी महुआ बीन रहा था ।उसे देख फोटो लेने उतरा तो डा सुनीलम और रजनीश भी उतर कर जंगल के बीच आ गए ।नीचे की जमीन सूखे पत्तों से ढकी हुई थी और उसपर पैर पड़ते ही अलग किस्म की आवाज आ रही थी ।सुनीलम ने उस आदिवासी बुजुर्ग से महुआ और उसके बाजार भाव पर बात की तो हैरान रह गए ।उससे सुखा महुआ बहुत कम दाम पर लिया जाता है ।खैर भानुपुरी में चाय के लिए रुके तो एक घर पर ' हर नर मोदी -घर घर मोदी ' का नारा नजर आया ।यह बदलाव नया था । बस्तर के जगदलपुर पहुँचते पहुंचे दोपहर हो चुकी थी और मौसम गर्म था । एकता और रवि को करीब हफ्ता भर सोनी सोरी के चुनाव संचालन में मदद के लिए बस्तर में रुकना था तो डा सुनीलम को तीन तक प्रचार करना था ।मेरा कार्यक्रम कवरेज के नजरिये से बना था इसलिए दो दिन ही रहना था । हर बार जगदलपुर के सर्किट हाउस में ठहरता था पर इस बार किसी से कहा भी नहीं था इसलिए जगदलपुर में एक नए होटल देवांश में रुका ।जगदलपुर पहुँचने के बाद डा सुनीलम सोनी सोरी के कार्यकर्ताओं की बैठक में जम गए और मै अचानक मिले साथी अल्लू चौबे के साथ राजनैतिक हालात पर चर्चा करने लगा । अल्लू की भाव भंगिमा से साफ़ लगा वे सत्तारूढ़ दल के लिए माहौल का जायजा लेने आए है । सुनीलम की बैठक ख़त्म होने के बाद हम सब दंतेवाडा की तरफ चल पड़े ।यह इलाका माओवादियों के प्रभाव वाला है और जिस जगह से रास्ता सुकमा और झीरम घटी के लिए मुड़ता है वही पर एक ढाबे में खाने के लिए रुके ।छोटा सा बाजार सामने था ।एक तरफ शाक सब्जी बेचती महिलाएं थी तो सामने मछली और मुर्गा एक ठेले पर बिक रहा था ।विजय शुक्ल लगातार नवरात्रि का उपवास कर रहे थे और सिर्फ फल खाना था इसलिए बीस रुपए में दो बड़े तरबूज ले लिए जो विशाखापत्तनम तक साथ चला ।खाना खाकर आगे बढे तो दंतेवाडा कि तरफ जाने वाली सड़क पर सन्नाटा पसरा था ।बीच बीच में जब पहाड़िया आती तो बताया जाता कि माओवादी हमेशा घात लगाकर पहाड़ी के ऊपर से ही हमला करते है या सड़क को बारूद से उड़ा देते है ।यह सब जानकर डर तो लगा पर अब डरकर करते क्या ।गीदम का बाजार दिखा तो चिता ख़त्म हुई । सोनी सोरी के घर पहुंचे तो स्वागत उनकी ननद ने किया जो एक शहरी युवती कि तरह नजर आ रही थी ।कुछ ही देर में सोनी सोरी आ गई तो बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ ।उन्होंने चुनाव में आने वाली दिक्कतों का ब्यौरा भी दिया ।उनपर सत्ता का भी दबाव था तो सत्ता से लड़ने वाले माओवादियों का भी ।इस बीच दो दिन के प्रचार कार्यक्रम की योजना डा सुनीलम को ध्यान रखकर बनाई गई । कुछ घंटो बाद मैंने चलने को कहा क्योकि अँधेरा हो चूका था और अँधेरे में पचास किलोमीटर के जंगल से गुजरना जोखम भरा काम था खासकर माओवादियों के प्रभाव को देखते हुए ।फिर भी जगदलपुर पहुँचते पहुंचे रात के नौ से ऊपर हो चुके थे ।मुझे और विजय शुक्ल को सुबह ट्रेन से विशाखापत्तनम निकलना था । सुबह दस बजे से पहले जगदलपुर स्टेशन पहुंचे तो पता चला किरंदुल विशाखापत्तनम पैसेंजर देर से आएगी ।दो दिन पहले ही इस गाड़ी से जगदलपुर स्टेशन पर सारी सवारियां उतार कर लाइट बंद कर किरंदुल भेजा गया था ताकि माओवादियों के हमले में कोई दुर्घटना न हो ।बहरहाल इस ट्रेन से कार्यक्रम समय का ध्यान रखते हुए बनाया गया था ताकि दो दिन सीमान्ध्र में गुजर कर सीधे विशाखापत्तनम से लखनऊ पहुंचा जा सके ।एअर इंडिया की फ्लाईट से कुल चार घंटे लगते ।इसके साथ ही विजय शुक्ल को इस रेल यात्रा अनुभव लेना था ।कुछ देर में ट्रेन आई तो तो सभी सवार हो गए ।एक फर्स्ट क्लास का बहुत पुराना डिब्बा लगा था जिसके ई कूपे में हम दोनों आ गए ।तरबूज को ऊपर रख दिया और बाकी सामन नीचे । ओडिशा के आमागुड़ा स्टेशन आते आते कुरते पैजामे की जगह बरमूडा वाली पोशाक में बैठ चुके थे क्योकि गर्मी में सफ़र करना था ।यह ट्रेन ओडिशा के नदी पहाड़ पर करते हुए आंध्र प्रदेश जो अब सीमान्ध्र में बदल चूका है उसके सबसे खुबसूरत हिल स्टेशन अरकू वैली से गुजरती है । इस लेख की शुरुआत इसी अरकू स्टेशन पर हो पाई क्योकि नेट का सिग्नल नहीं मिल पा रहा था ।जारी

Friday, April 4, 2014

माओवादी भले न बदले पर बस्तर में बदल रहा है आदिवासियों का नज़रिया

माओवादी भले न बदले पर बस्तर में बदल रहा है आदिवासियों का नज़रिया दंडकारण्य से अंबरीश कुमार क्या बस्तर में आदिवासी समाज का मन बदल रहा है? यह सवाल राजनैतिक हलकों में उठ रहा है। विधानसभा चुनाव में इस अंचल में भाजपा को बड़ा झटका लगा था पर मीडिया ने इसे नजरंदाज कर दिया था। विधान सभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यहाँ ज्यादा ताकत झोंक दी है। यह अंचल संघ की प्राथमिकता पर आ गया है। बावजूद इसके जानकारों के मुताबिक आदिवासी समाज को लेकर संघ परिवार दुविधा में है। विधान सभा चुनाव में यहाँ न मोदी थे और ना कोई उनका नारा। पर; लोकसभा चुनाव में हर नर मोदी, घर घर मोदी का नारा भी है तो दूरदराज के गीदम में संघ से जुड़ी महिलाएं घर घर जा रही हैं। इतना जोर विधानसभा चुनाव में नहीं दिखा था। यह चिंता आदिवासी समाज के बदले रुख की वजह से मानी जा रही है। हालाँकि लोकसभा चुनाव में दोनों प्रमुख राजनैतिक दल के एजेंडे से आदिवासी समाज के जीवन से जुड़े मुद्दे गायब हैं। राजनैतिक दल न तो आदिवासियों के जीवन से जुडी इमली, चिरौंजी और आम के दाम की बात करते हैं, न उनके स्वास्थ्य या शिक्षा की। यह बात दो दिन बस्तर में आदवासियों से बात करने के बाद सामने आई। इसकी पुष्टि फिर आज दंडकारण्य से गुजरने वाली किरंदुल पैसेंजर ट्रेन से जगह जगह लोगों से चर्चा करने पर हुई। यह ट्रेन छतीसगढ़ के इस अंचल के साथ ओडिशा और अविभाजित आंध्र के गरीब आदिवासी लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है तो माओवादियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह ट्रेन माओवादियों के गढ़ से निकलती है तो समुद्र तट के बंदरगाह तक प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से निकली सामग्री पहुंचाती है। दो दिन पहले ही जगदलपुर से इस ट्रेन की सारी सवारी उतारकर सभी लाइट बंद कर इसे किरंदुल भेजा गया ताकि माओवादी हमला न कर दें। हाल ही में किरंदुल के पास ही माओवादियों ने पटरी उखाड़कर एक मालगाड़ी गिरा दी थी तो दूसरे पर बैनर टांग कर भेजा था। इससे इस अंचल के साथ इस गाड़ी का रिश्ता समझा जा सकता है। बहुत दिन बाद किसी ट्रेन में खुली खिड़की के सामने बैठकर लिखने का मौका मिला है वह भी तब जब शाम को किरंदुल विशाखापत्तनम पैसेंजर अरकू जंक्शन पर पहुंची। इस पैसेंजर गाड़ी में एक पुराने ज़माने का फर्स्ट क्लास भी है जिसके दो बर्थ वाले एक कूपे में हम हैं। गाड़ी जगह-जगह रूकती तो लोगों से बातचीत भी होती। गाड़ी में चढ़ने वाले ज्यादातर गरीब और बेबस लोग हैं जो जलावन की लकड़ी और सब्जी भाजी के साथ एक स्टेशन पर चढ़ते है तो दो-चार स्टेशन बाद उतर जाते हैं। माओवादी इस अंचल को दंडकारण्य जोन कहते है और छतीसगढ़ में जब इंडियन एक्सप्रेस की कवरेज के सिलसिले में लगातार इधर आना पड़ा तो माओवादियों की राजनीति को भी करीब से देखा। पर डेढ़ दशक के बाद भी वे वहीं खड़े नजर आ रहे हैं और आदिवासी भी उसी हाल में हैं। यह उनके भी मंथन का दौर है जो हर बार चुनाव आने पर बायकाट का नारा देने के साथ हिंसा की छोटी बड़ी घटना से चर्चा में आते हैं। यह भी बहुत रोचक है कि जबसे शोषण और जुल्म के खिलाफ बंदूक से लड़ने वालों की ताकत इस अंचल में बढ़ी है तबसे धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकते बहुत कमजोर हुई हैं। कट्टरपंथी ताकतों का हौसला ज्यादा बढ़ा है। इस पर नए सिरे से बहस और मंथन की जरूरत है। बस्तर में माओवादियों की रणनीति का फायदा पिछले कई चुनाव में भाजपा को मिला। सलवा जुडूम को लेकर माओवादियों की कांग्रेस के दिग्गज नेता महेंद्र कर्मा से जिस तरह की दुश्मनी थी उससे इसे स्वाभाविक माना जाता था पर सलवा जुडूम को भाजपा की रमन सरकार ने जिस तरह इसे वैधानिक मान्यता दी उसे देखते हुए माओवादियों के नजरिए पर सवाल भी उठा। जिस अंचल में ये धुर वामपंथी दो दशक से ज्यादा काम कर रहे हों वहां के आदिवासी किसी दक्षिणपंथी पार्टी के सांसद और विधायक को चुनें, यह राजनीति अपन के समझ में कभी नहीं आई। पर जब धुर वामपंथियों ने अपने को नहीं बदला तो खुद आदिवासी अपने को बदलने लगे हैं। विधान सभा चुनाव में बस्तर में आदिवासियों ने न सिर्फ माओवादियों के धुर विरोधी महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को जिताया बल्कि झीरम घाटी की घटना के खिलाफ जनादेश देते हुए कांग्रेस को फिर सर माथे बैठाया। यह संकेत समझना चाहिए। खासकर उन्हें जो यह मानते हैं कि आदिवासी तो दारू मुर्गा पर वोट देता है। उन्हें भी यह संकेत समझना चाहिए जो यह मानते है कि माओवादियों का आदेश आदिवासियों के लिए पत्थर की लकीर है। बस्तर में फिलहाल लड़ाई दोनों मुख्य राजनैतिक दलों के बीच ही मानी जा रही है, पर बदलाव की राजनीति करने वालों को अभी भी उम्मीद है कि अन्याय के खिलाफ लड़ने वाली सोनी सोरी को बड़ा समर्थन मिल सकता है। हालाँकि जिस तरह उनका चुनाव लड़ा जा रहा है उसे देखते हुए राजनैतिक विश्लेषकों को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

कांग्रेस से लेंगे तेलंगाना का बदला सीमांध्र के लोग

अंबरीश कुमार विशाखापत्तनम। सीमांध्र के लोग तेलंगाना का बदला कांग्रेस से लेने जा रहे हैं। इस तटीय अंचल में कांग्रेस मुकाबले से ही बाहर हो चुकी है। वजह आंध्र को बांटकर तेलंगाना बनाना है। आंध्र से तेलंगाना निकलने के बाद जो बचा है उसे कोस्टल आंध्र या सीमांध्र कहा जाता है। एक झटके में जिस राज्य की भौगोलिक और राजनैतिक पहचान बदल दी गयी हो उसे समझने के लिये इस तटीय अंचल में आना चाहिए। तेलंगाना और कांग्रेस को लेकर हर तरफ नाराजगी। विशाखापत्तनम के रुशिकोंडा समुद्र तट को आभिजात्य वर्गीय लोगों का नया ठिकाना माना जाता है और यहाँ पर बहुत सारे रिसार्ट है। काम करने वाले कर्मचारी आसपास के इलाकों से आते हैं और देर रात तक वापस लौटते हैं क्योंकि यह इलाका शहर से दूर होने के बावजूद शांति वाला इलाका रहा है। पर तेलंगाना राज्य बनने के बाद यहाँ के लोगों में अजीब सी असुरक्षा का भाव नजर आता है। यहाँ के आफशोर रेस्तरां के कर्मचारी गोपालन ने कहा एक फ़्लाइओवर ब्रिज बनाने में पांच छह साल लगते हैं तो एक नई राजधानी बंनने में कितना साल लगेगा। राजधानी बनी तो यह शहर राजधानी की तमाम बुराइयाँ लेकर आएगा। अपराध बढ़ेगा, महंगाई बढ़ेगी और लोगों की शांति ख़त्म हो जायेगी। इस सबके साथ वह हैदराबाद हाथ से निकल जायेगा जो आंध्र के विकास की पहचान है। यही नजरिया इस अंचल के ज्यादातर लोगों का है। हैदराबाद शिक्षा, स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाओं के साथ कारपोरेट जगत का एक मुख्यालय भी है। इस अंचल के हाथ से यह सब निकल गया है तो नाराजगी है जिसे दूर होने में समय लगेगा। पर फिलहाल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को इसकी कीमत देनी पड़ेगी। कांग्रेस ने सीमान्ध्र में जो ग्यारह उम्मीदवार उतारे हैं उसमें तीन नए चेहरे हैं। पर कांग्रेस की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। एक कांग्रेस कार्यकर्ता जी राजगोपाल मानते हैं कि इस बार पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है। इसका सीधा फायदा चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस को मिलने जा रहा है। तटीय तेलंगाना का यह इलाका काफी संपन्न है और पिछले कुछ सालों में विशाखापत्तनम का विकास तेजी से हुआ है। यह कभी मछुवारों की बस्ती थी तो आज तेजी से उभरता महानगर। साफ़ सुथरी और चौड़ी सड़कों के साथ यह तटीय इलाका सैलानियों को भी भा रहा है जो अरकू जैसे हिल स्टेशन से कुछ दूरी पर समुद्र तट पर पहुंचा देता है। कई जगह बात चीत हुयी तो साफ़ लगा कि इस महानगर में छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों की पहली पसंद टीडीपी ही है। जगन मोहन रेड्डी को सारे करिश्मे के बावजूद एक ईमानदार नेता लोग नहीं मानते हैं पर कई समीकरण ऐसे है जिसपर ईमानदारी प्राथमिकता से खिसक जाती है। एक ऑटो ड्राइवर ने कहा-यहाँ भी वोट की कीमत तय है और फिलहाल एक वोट का बाजार भाव तीन हजार रुपए है। यह कीमत वाईएसआर आसानी से दे सकती है क्योंकि उसके पास बहुत पैसा है। यहाँ पर लोगों में जब आक्रोश हो तो कांग्रेस को हराने वाला नेता ही महत्वपूर्ण माना जायेगा। यही वजह है कि इस अंचल में मुख्य मुकाबला टीडीपी और वाईएसआर में सिमट गया है। टीडीपी को कुछ हद तक भाजपा से तालमेल और नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व का भी मिल सकता है। शिक्षक मोहम्मद माजिद के मुताबिक जिस प्रकार की मजहबी गोलबंदी देश के कुछ भागों में हो रही है उसका असर इस इलाके पर भी है पर बहुत ज्यादा नहीं। इधर गैर हिंदू मतदाताओं की संख्या भी कम नहीं है इसलिये भाजपा से तालमेल का अगर फायदा है तो उसकी कुछ कीमत भी नायडू को देनी पड़ सकती है। हालाँकि विजयनगरम से लेकर विशाखापत्तनम के बीच जिन लोगों से भी बातचीत हुई वे टीडीपी की बढ़त मान रहे हैं और उसके बाद वाईएसआर का नंबर है। कांग्रेस अगर एक दो सीट पा जाये तो वह भी उसके लिये बहुत होगा। इस सब से यह तो साफ़ हो ही गया कि विकास का सवाल और विकसित राजधानी को खोने का बदला तटीय इलाकों के लोग कांग्रेस से लेने जा रहे है। राज्य तो बहुत बने पर यह पहली बार है कि एक राज्य अपने एक हिस्से के खोने का बदला लेने जा रहा हो। जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

संघ कुन्बे को तबाह करेंगे मोदी

संघ कुन्बे को तबाह करेंगे मोदी हिसाम सिद्दीक़ी भारतीय जनता पार्टी को जनम देने वाले राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को आगे बढ़ाया, इतना आगे कि अब वह किसी के कंट्रोल में नहीं रहे। अपनी इज्जत बचाए रखने के लिए भले ही आरएसएस चीफ मोहन भागवत अपने खास प्रचारको की मीटिंग में बंगलौर में यह कह आए हो कि मोदी-मोदी की रट लगाना आरएसएस का काम नहीं है, हकीकत यही है कि अब नरेन्द्र मोदी अपने कुन्बे के सबसे बड़े ओहदेदार आरएसएस चीफ मोहन भागवत को भी अपने से बहुत छोटा समझने लगे है। इसीलिए तो बंगलौर से दिल्ली आकर भागवत को अपने तर्जुमान राम माधव से बयान दिलाना पड़ा कि मीडिया में जो खबरें आई हैं आरएसएस चीफ ने ऐसा नहीं कहा था। भारतीय जनता पार्टी में आज राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज समेत किसी भी लीडर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह मोदी से अपनी मर्जी मुताबिक कोई बात भी कर सके। जिस किस्म की डिक्टेटरशिप इस वक्त नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी में चला रखी है उससे साफ दिखता है कि नरेन्द्र मोदी ही पूरे आरएसएस कुन्बे के लिए ‘‘भस्मासुर’’ साबित होने वाले हैं। मुल्क के जो मुसलमान और सेक्युलर जेहन लोग इस फिक्र में है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने से उन्हें कोई बड़ा झटका लगेगा उन्हें अब इस ख्याल को तर्क कर देना चाहिए क्योंकि मोदी अपने अलावा आरएसएस और बीजेपी में किसी को रहने ही नहीं देंगे। वह खुद ही अपनी पूरी की पूरी तंजीम तबाह कर देंगे। सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही नहीं उनके साथ काम करने वाले अमित शाह की तानाशाही का आलम यह है कि बीजेपी सदर राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के रामपुर से अपने एक करीबी मुसलमान को और नई दिल्ली लोकसभा हलके से एमजे अकबर को टिकट देना चाहते थे लेकिन अमित शाह इन दोनों को टिकट देने के लिए तैयार नहीं हुए यह बात खुद राजनाथ सिंह ने अपने करीबियों से कही है। बीजेपी के कई सीनियर लीडरान खुद ही बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी के चीफ मिनिस्टर बनने के तकरीबन साल भर बाद दो हजार दो में गुजरात असम्बली का जो एलक्शन हुआ था उसी वक्त से मोदी ने अपनी मर्जी मुताबिक टिकट देने की कोशिश की थी उस वक्त चूंकि पंडित अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, सुषमा स्वराज और प्रमोद महाजन जैसे कई ताकतवर लोग पार्टी में मौजूद थे इसलिए 2002 के असम्बली एलक्शन में मोदी पूरी तरह अपनी मनमानी नहीं चला सके थे लेकिन उसके बाद 2005 और 2012 के जो असम्बली और 2009 के लोकसभा एलक्शन हुए उन सभी में नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ और सिर्फ अपनी मर्जी से ही टिकट दिए वह मीटिंग में जरूर आते थे लेकिन किसी से राय मश्विरा किए बगैर अपनी जेब में रखी फेहरिस्त दे दिया करते थे और फिर फेहरिस्त में किसी किस्म की तरमीम वह बर्दाश्त नहीं करते थे। पूरी पार्टी ही मोदी की फेहरिस्त पर अपनी तस्दीक की मोहर लगाने पर मजबूर हुआ करती थी। अब सूरतेहाल और भी ज्यादा खराब हो चुकी है। आज बीजेपी, आरएसएस और उससे जुड़ी हुई तमाम तंजीमों की कोई हैसियत बाकी नहीं रह गई है अब मोदी खुद को सबका भगवान बना चुके हैं। वह जो चाहते हैं करते हैं कोई उनके सामने बोलने तक की हिम्मत नहीं रखता है। एक तरफ आरएसएस कुन्बा हिन्दुत्व का दम भरता है दूसरी तरफ मोदी आरएसएस कुन्बे के सभी बूढ़ों को बेइज्जत करके अपनी तंजीम से बाहर निकलने को ठीक उसी तरह मजबूर करते जा रहे हैं जैसे कुछ बदकिस्मत लोग अपने बूढ़े वाल्दैन को ‘‘ओल्ड ऐज होम्स’’ (बूढ़ों के यतीमखानों) में मरने के लिए छोड़ देते हैं। भारतीय जनता पार्टी में लालकृष्ण आडवानी की हैसियत मोदी के वालिद जैसी रही है। आडवानी ने ही एक जिम्मेदार वालिद की तरह नरेन्द्र मोदी को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी को नजर अंदाज करके मोदी को पहली बार वजीर-ए-आला बनाया और गुजरात दंगो के बाद जब वजीर-ए-आजम की हैसियत से वाजपेयी ने मोदी को हटाने का फैसला किया तो आडवानी अड़ गए और मोदी को हटने नहीं दिया। पहली फुर्सत में नरेन्द्र मोदी ने अपने उन्हीं वालिद जैसे सीनियर लीडर को बेइज्जत करके उन्हें उनकी औकात बता दी। सवाल यह है कि जो शख्स अपने ‘‘बाप’’ या बाप जैसे सरपरस्त का वफादार नहीं हुआ उस शख्स से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह पूरे मुल्क और मुल्क के अवाम का वफादार होगा या दूसरे लोगों की इज्जत करेगा। ऐसे बेटों को समाज में नालायक औलाद कहा जाता है। जब से बीजेपी और आरएसएस में नरेन्द्र मोदी कुछ ज्यादा ताकतवर हुए हैं तभी से उन्होंने एक एक कर संघियों को ठिकाने लगाने का काम भी किया है। अब चूंकि वह सबसे ज्यादा ताकतवर बन चुके हैं इसलिए सबसे सीनियर स्वंय सेवक और बीजेपी में सबसे बड़े कद के समझे जाने वाले अपने ही गुरू लालकृष्ण आडवानी को भी उनकी औकात बताने में जरा सी भी देर नहीं की। एक ही झटके में उन्होंने आडवानी को बता दिया कि अब उनकी कोई हैसियत बाकी नहीं रह गई है। आडवानी उनके नजदीकी हरेन पाठक, वाजपेयी के नजदीकी बालू शुक्ला जैसों को तो नरेन्द्र मोदी ने अब ऐन लोक सभा एलक्शन के वक्त हैसियत बताने और किनारे लगाने का काम किया है इससे पहले वह दीगर कई पुराने संघियों को अपने रास्ते से हटा चुके हैं जो लोग मोदी का मुआजना (तुलना) हिटलर से करते हैं वह तो हिटलर की तौहीन करते हैं लेकिन इतना सच है कि उनके काम करने का तरीका ठीक वैसा ही है जैसा किसी डिक्टेटर और बड़े अण्डरवल्र्ड सरगना का हुआ करता है। उन्हें इस बात में यकीन है कि अगर केाई मुकाबले में आ जाए या किसी से खतरा महसूस हो तो उसे अपने रास्ते से पहले ही मरहले में हटा दिया जाए। भले ही मुखालिफ को कत्ल क्यों न कराना पड़े। गुजरात में शुरूआती दिनों में हरेन पाड्या एक ऐसे संघी थे जो कभी मोदी के लिए सियासी खतरा बन सकते थे। वह दुनिया से ही उठा दिए गए। उनकी बीवी और बूढ़े वालिद सालों तक चीखते रहे कि उनके कत्ल के पीछे बहुत बड़ी साजिश है और वह साजिश नरेन्द्र मोदी की जानिब से रची गई है लेकिन उन दोनों की किसी ने नहीं सुनीं। आरएसएस के सीनियर प्रचारक हुआ करते थे संजय जोशी, पहले तो केशुभाई पटेल की जगह पर जोशी को ही गुजरात का चीफ मिनिस्टर बनाए जाने का फैसला बीजेपी ने किया था। उन्होंने चीफ मिनिस्टर बनने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि वह आरएसएस तंजीम (संगठन) का ही काम करना चाहते हैं तभी आडवानी ने मोदी को चीफ मिनिस्टर बनवाया था। संजय जोशी की उंगली पकड़ कर मोदी ने प्रचारक की शक्ल में चलना सीखा था। सबसे पहले उन्हीं संजय जोशी को मोदी ने अपनी नफरत का शिकार बनाया। उनकी एक खुफिया सीडी मैदान में आ गई जिसमें उन्हें किसी खातून के साथ सेक्स में मुलव्विस दिखाया गया था। कई सालों तक संजय जोशी गुमनामी में खोए रहे फिर बाहर आए तो उन्हें बीजेपी में ओहदा मिल गया। मुंबई में पार्टी का अधिवेशन हुआ तो मोदी ने शर्त लगा दी कि जब तक संजय जोशी को पार्टी से निकाला नहीं जाता वह मुंबई अधिवेशन में शरीक नहीं होंगे और संजय जोशी को हटाया गया। जोशी जैसे बड़े स्वंय सेवक व प्रचारक को ठिकाने लगाने के बाद मोदी के हौसले और भी बढ़ गए फिर तो इस शख्स ने बीजेपी और आरएसएस में किसी को कुछ समझा ही नहीं। नरेन्द्र मोदी के ताकतवर होने से ठीक पहले तक आरएसएस की दंगा ब्रिगेड बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद का हर तरफ जिक्र हुआ करता था। 2002 के गुजरात दंगो में मोदी ने इन दोनों को भरपूर इस्तेमाल भी खूब किया। अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया जैसों के जहरीले बयानात के बगैर अखबार और टीवी चैनलों के न्यूज बुलेटिन अधूरे रहते थे। बजरंग दल के नाम पर गुण्डई करने वाले हर वक्त मुल्क के कोने कोने में गड़बड़ियां कराने के लिए हमेशा तैयार दिखते थे। आज इन दोनों का क्या हाल है और सिंघल व तोगड़िया अपने किन बिलों में छुपे हैं कोई नहीं जानता। इनकी गुमनामी के पीछे भी नरेन्द्र मोदी ही हैं। 2002 का असम्बली एलक्शन जीतने के बाद ही मोदी ने साफ कर दिया था कि गुजरात और मुल्क में एक ही बड़ा फिरकापरस्त और दंगाई रह सकता है, जो वह खुद हैं। अब प्रवीण तोगड़िया और सिंघल जैसों का क्या काम है। सिंघल और तोगड़िया को मोदी ने बर्फ में लगाया तो विश्व हिन्दू परिषद किसी जिले की सतह की भी तंजीम नहीं रही। इस तरह नरेन्द्र मोदी ने मुल्क पर पहला एहसान तो विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसी दंगाई ब्रिगेड्स को खत्म करके किया। यह दोनों फिरकापरस्त तंजीमें दहशत की अलामत बन चुकी थी और आरएसएस व भारतीय जनता पार्टी की बहुत बड़ी ताकत हुआ करती थीं। इनसे भी पहले गुजरात में फिरकापरस्तों की सबसे बड़ी ताकत समझे जाने वाले केशुभाई पटेल को भी मोदी इस हद तक पहुंचा चुके थे कि उस बेचारे बूढ़े को राज्य सभा तक नहीं पहुंचने दिया। उसी गुजरात से बेजमीन शख्स अरूण जेटली राज्य सभा पहुंचा दिए गए तो दूसरी रियासतों से स्मृति इरानी और हेमा मालिनी तक पहुंच गई लेकिन केशुभाई पटेल को नहीं पहुंचने दिया गया। केशुभाई पटेल, राजेन्द्र राणा और शंकर सिंह वाघेला समेत आज गुजरात में एक मोदी के अलावा बाकी कोई पुराना संघी किसी जिले की सतह तक का लीडर नहीं बचा है। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, संजय जोशी और गुजरात के सीनियर स्वंय सेवकों को ठिकाने लगाने के बाद नरेन्द्र मोदी को मौका मिला तो आडवानी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी समेत बीजेपी की मरकजी कयादत का एक जो भ्रम था उसे भी मोदी ने तोड़ दिया है अब उनके साथ राजनाथ सिंह ही बचे हैं वह भी उस वक्त तक जब तक उनका इस्तेमाल है। इन्हीं हकायक की बिना पर हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि कुदरत ने शायद नरेन्द्र मोदी के हाथों बीजेपी और आरएसएस का किला तबाह करने का फैसला किया है।