Friday, April 27, 2012

वाइन ,सुल्ताना डाकू और जस्टिस प्यारेलाल

अम्बरीश कुमार प्रभा रस्तोगी अब पेंटिंग नहीं बनाती है .वे नब्बे बसंत पार कर चुकी है और रस्तोगी साहब सौ साल से सिर्फ चार साल पीछे है .प्रभा रस्तोगी की पेंटिंग की प्रदर्शनी दिल्ली के अलावा मुंबई के जहाँगीर आर्ट गैलरी में भी लग चुकी है .पर अब वे बागवानी के बाद टीवी सीरियल देखकर ज्यादा समय गुजारती है .सवाल पूछने पर जवाब था -पेंटिंग अब बहुत महंगा शौक भी है ,काफी दिन से छोड़ रखा है .एक ज़माने में बहुत बनाया पर अब मुश्किल हो गया है .प्रभा रस्तोगी की आवाज की खनक महसूस की जा सकती है .इस वीराने में बर्फीली चोटियों ,देवदार और चीड के जंगलों के अलावा फलों का बगीचा ही साथ रहता है .एक बेटा सेना में कर्नल है तो दूसरा डाक्टर पर वे बहुत कम यहाँ आते है .ठंड में यह बुजुर्ग जोड़ा ही दिल्ली पहुँच जाता है . उनका रिश्ता इस अंचल से करीब अस्सी साल से ज्यादा का है .वे जिस जगह रहते है वहाँ किसी की आवाज तक नहीं सुनाई पड़ती सिर्फ हवा चलने पर पेड़ों के पत्तों की आवाज आती है .पड़ोस में दिल्ली की मुख्य सूचना अधिकारी नीलम कपूर का काटेज है तो उससे ऊपर गोंडा के कैप्टन श्रीवास्तव का करीब अस्सी नाली का बड़ा बगीचा है जो एअर फ़ोर्स की नौकरी छोड़ने के साथ सत्तर के दशक में लिया था .वे भी अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते है .दोनों परिवार सालों से साथ है .रस्तोगी साहब के पिता जस्टिस प्यारेलाल १९२९ -३० में नैनीताल के डिस्ट्रिक्ट जज थे .ये वही जज थे जिन्होंने १९३० में मशहूर सुल्ताना डाकू को फांसी की सजा दी थी .बाद में वे दलितों को लामबंद करने में जुटे .उस दौर में नैनीताल के इस अंचल में दलितों के साथ बड़ी जातियों के भेदभाव की कई शिकायते मिली तो उन्होंने आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष नारायण स्वामी को यहाँ बुलाया और फिर जातीय पूर्वाग्रहों को लेकर टकराव हुआ ,आंदोलन चला ,अनशन हुआ तब दलितों के साथ भेदभाव खत्म हुआ .प्रोफ़ेसर रस्तोगी के शब्दों में -बड़ी जातियों के लोग दलितो को घर में आना तो दूर सामने पड़ना भी अशुभ मानते थे .उन्हें समाज का हिस्सा तक नहीं माना जाता था .ऐसे में यहाँ आर्य समाज की स्थापना कर दलितों को आर्य कहा गया और जाती की जगह उन्हें आर्य लिखने को कहा गया .आज जो लोग यहाँ आर्य लिखते है वे उसी का नतीजा है . इस चर्चा के बीच रस्तोगी जी ने कहा -आप को वाइन का स्वाद लेना चाहिए .फिर वे एक बोतल से तीन छोटे वाइन ग्लास में एक पैग उडेला .एक मेरे लिए दूसरा अपनी संगनी के लिए तो तीसरा खुद के लिए .बड़ा ही गजब का अनुभव था नब्बे पार लोगों की संगत में बैठने का .दूसरे इस उम्र के किसी जोड़े को पहली बार ग्लास लिए देख रहा था .साथ ही उस दौर के किस्से भी सुनते जा रहे थे .रस्तोगी साहब बोले -यह तो प्लम का था अब खुमानी का स्वाद लें .यह सब इनका ही बनाया है .तभी मैंने बताया कि आज शादी की सालगिरह है तो फिर इसके नाम भी एक पैग हो गया .इसके बाद आडू अंगूर का स्वाद भी लिया .तबतक कुछ असर होने लगा था ,बहार बहादुर आवाज दे रहा था -साब ,बारिश होने वाला है जल्दी निकलना चाहिए .शाम ढल रही थी और सामने की पहाड़ियां काले बादलों से ढकती जा रही थी .पर मन नही माना तो उनसे बनाने की विधि पूछ ली .प्रभा जी का जवाब था -यह सब बगीचे के फलों से ही बनाते है .एक मर्तबान में फल को डालकर उसमे दो चम्मच ईस्ट और एक पोटली में गेंहूँ भी दाल देते है साथ ही चीनी भी .फिर इसे ढककर रख दिया जाता है करीब तीन महीने के लिए .बाद में इसे छानकर बोतल में भर देते है .सुनकर हैरान रह गया .बाहर अँधेरा हो चूका था और करीब एक किलोमीटर चलना था इसलिए उनसे विदा ली . फोटो -रस्तोगी जी का घर और इस जोड़े की फोटो

1 comment:

  1. बढ़िया, अंबरीष सर वहाँ से जुड़े संस्मरणों का हम इंतजार कर रहे हैं। सुनते हैं वहाँ से कई नामचीन लेखकों के रोचक संस्मरण जुड़े हुए हैं।

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