जबरसिंह वर्मा
करीब सात हजार फुट से अधिक की ऊंचाई पर बसा उत्तराखंड का जौनसार बाबर क्षेत्र अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है लेकिन साथ-साथ यह सामाजिक भेदभाव और शोषण आधारित व्यवस्था के लिए बदनाम भी है. यहां आज भी देश का नहीं बल्कि 'मंदिर' का कानून चलता है, विभिन्न मान्यताओं, परंपराओं, नीतियों और रीति-रिवाज के नाम पर दलितों का शोषण होता है. हिमालय के अंचल में बसे इस क्षेत्र की भौगोलिक विशेषता के कारण यहां के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) भी जनजाति घोषित हैं इसलिए यहां अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम (एससीएसटी एक्ट) भी लागू नहीं है.
यह क्षेत्र सन 1967 से ही जनजाति घोषित है और यहां के सवर्णों को जनजातीय आरक्षण का लाभ मिलता है, नतीजा तकरीबन हर घर में सरकारी अधिकारी मिलते हैं. आश्चर्य नहीं कि जौनसार बाबर को उत्तराखंड के सबसे संपन्न क्षेत्रों में से एक माना जाता है. बहरहाल यह संपन्नता पूरी तरह आर्थिक प्रतीत होती है क्योंकि अगर समृद्धि का एक कतरा भी मानसिक स्तर पर पहुंचा होता तो रीति रिवाज के नाम पर दलितों का जो शोषण हमें देखने को मिल रहा है, वह न होता.
दरअसल जौनसारियों के अराध्य देव महासू हैं. उनके कई भव्य मंदिर भी वहां हैं. माना जाता है कि महासू देवता के रहते कानून, पुलिस, प्रशासन की यहां कोई जरूरत नहीं है. नतीजतन, देवता के नाम पर कायदे कानून बनाने और दंड आदि देने का अधिकार इन मंदिरों के पुजारियों और संरक्षकों आदि ने हथिया रखा है. यह व्यवस्था दलितों के शोषण की बुनियाद बनती है. यह पूरा क्षेत्र आज भी डायन और दासी प्रथा जैसी रुढिय़ों को ढो रहा है.
यही वजह है कि हनोल स्थित महासू देवता के मंदिर में क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गायक नंदलाल भारती ने अलबम की शूटिंग के दौरान मंदिर के दरवाजे के भीतर सर क्या डाला, तमाशा ही खड़ा हो गया.मंदिर के पुजारी नाराज हो गये और न केवल मंदिर परिसर में गंगा जल छिडक़ कर उसे पवित्र किया बल्कि खुद भी स्नान को चले गये. मानो इतना ही काफी नहीं था, उन्होंने भारती को भरपूर भला बुरा कहने के बाद जुर्माना चुकाने का आदेश भी सुना दिया. विडंबना देखिये कि भारती खुद महासू देवता की स्तुति में गीत गाने के लिये प्रसिद्ध हैं.
इस घटना के साल भर बाद जब राखी नामक दलित युवती ने मंदिर में जाने की जुर्रत की तो पुजारियों ने उसे अर्द्धनग्न करके लोगों के सामने बाहर खदेड़ दिया.
इसी तरह लखवाड़ स्थिति महासू मंदिर में जौनसार से दुल्हन को लेकर लौटी गढ़वाल क्षेत्र के कांडी गांव की एक बारात को ग्रामीणों ने इसलिए दो घंटे तक घेर कर रखा, क्योंकि दूल्हा दुल्हन मंदिर के आंगन के उस हिस्से तक चले गये थे जहां सवर्ण जाति के लोग अपने जूते रखते हैं. इस 'अपराध' के लिये दोनों पक्षों को न केवल सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी बल्कि एक बकरा और 501 रुपये तुरंत देने के अलावा यह आश्वासन देना पड़ा कि मंदिर में चांदी के सिक्के चढ़ायेंगे.
दलित सामाजिक कार्यकर्ता ध्वजवीरसिंह इस विडंबना की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि देवता के मंदिर बनाने, धार्मिक अनुष्ठान करने के लिये दलितों से चंदा आदि वसूला जाता है, मंदिर निर्माण में भी उनका योगदान लिया जाता है, राजमिस्त्री, मिस्त्री, मजदूर से लेकर मूर्तिकार तक सब उनके होते हैं लेकिन मंदिर तैयार होते ही उनको अछूत ठहराकर प्रवेश तक से वंचित कर दिया जाता है. मंदिरों में पुजारी- पुरोहित दलितों का चढ़ावा सीधे हाथ में लेने की बजाय पहले जमीन पर रखवाते हैं, फिर वहां से उठाते हैं. तर्क है कि दलित के हाथ के नीचे सवर्ण (पुजारी) का हाथ नहीं रहना चाहिए. मंदिर में चढ़ावा जमीन पर रखकर नहीं देने पर कई बार दलितों संग मारपीट हो चुकी है. पेयजल के स्रोतों पर दलितों को यह कह कर नहीं जाने दिया जाता है कि वह अपवित्र हो जायेगा. नतीजतन दलित गंदा पानी पीकर बीमार होने को अभिशप्त हैं.
महासू के किसी भी मंदिर में आप यदि गये तो पुजारी 'आप किस जाति के हो' ये पूछने की बजाय सीधे कहेगा 'आप राजपूत हो या ब्राहमण' ? वजह साफ है, यहां इन जातियों के सिवाय किसी को प्रवेश की इजाजत ही नहीं.
चकराता तहसील मुख्यालय से सटे बाडो गांव में दलितों की स्थिति की असली तस्वीर दिखती है. जो दलित महिला या पुरुष गांव में सवर्णों के साथ काम पर (पशु चराने, घास काटने, खेतों में काम करने) जाता है, उसके लिए टूटे-फूटे बर्तन अलग स्थान पर रखे होते हैं। खाना खाते समय दलित खुद इन बर्तनों को निकालेगा और खाने के बाद धोकर वहीं रखेगा. बमुश्किल 100 मीटर के दायरे में बसे करीब 40 परिवारों के बाडो गांव में 14 दलित परिवारों का 10 फुट की संकरी गली में बना एक खंडहरनुमा सामुदायिक भवन है, वहां से 50 फुट की दूरी पर 25 सवर्ण परिवारों का दो मंजिला आलीशान भवन है. त्रासदी तो यह है कि यहां दलित अपने सामुदायिक भवन में भी प्रवेश नहीं कर सकते. जबकि सामुदायिक भवन तथा वहां मौजूद तमाम चीजें सरकारी पैसे से लोगों के उपयोग के लिये खरीदी गयी हैं. कुछ गांवों में दलित मंदिर के सामने से और गांव के सार्वजनिक रास्ते से गुजरते समय जूते उतारकर गुजरते हैं.
कालसी गांव में दलित प्रधान ध्यानचंद के वकील बेटे ने प्रेम प्रसंग के चलते सर्वण युवती संग विवाह रचा लिया, तो पूरे क्षेत्र के सवर्ण उन पर टूट पड़े. बुजुर्ग, महिला से लेकर बच्चे तक की पिटाई की, हड्यिां तक तोड़ दीं. बुलडोजर की मदद से नया घर ध्वस्त कर दिया गया. सवर्णों की इस भीड़ का नेतृत्व भाजपा के एक विधायक कर रहे थे. एक विवाह समारोह में सवर्णों की पंक्ति में बैठकर खाना खा रहे दलित युवक की न केवल पिटायी की गयी बल्कि उससे भारी जुर्माना भी लिया गया. ये घटनायें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं. इन पर न मीडिया कान देता है न प्रशासन.
सरकारी स्कूलों में दलित बच्चे जरूर पढ़ रहे हैं लेकिन मध्याह्न भोजन बनाने वाली कोई स्त्री दलित नहीं है. दलित जनप्रतिनिधियों के साथ प्रताडऩा, मारपीट, छेडख़ानी और बलात्कार की घटनाएं आये दिन होती रहती हैं. उनकी सुनवाई न आकाश में बैठे देवता कर रहे हैं न ही जमीन पर लोकतंत्र के 'मंदिर' में बैठे नये देवता.
कानून बना मजाक
जौनसार के सवर्ण अनुसूचित जनजाति में आते हैं यही वजह है कि यहां यदि कोई सवर्ण किसी दलित के साथ ज्यादती करता है तो वह एससीएसटी एक्ट के तहत कार्रवाई भी नहीं कर पाता क्योंकि सवर्ण खुद एसटी घोषित है. दलितों पर हो रहे अत्याचार को रोकने की राह में यह सबसे बड़ा अड़ंगा है.
'मान्यता, संस्कृति, आस्था और परंपरा के नाम पर दलितों के मंदिर प्रवेश पर रोक को जायज नहीं ठहराया जा सकता. पार्टियों और सरकारों को यह सुनिचित करना चाहिए कि दलित समुदाय को उनके संवैधानिक अधिकार प्राप्त हों.'
- डा. सुनीलम, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम
------
' जौनसारी कोई समुदाय नहीं, बल्कि जाति आधारित समाज है. जौनसार-बाबर में कोई जनजाति निवास नहीं करती. यहां समूचे उत्तराखंड की ही तरह जाति व्यवस्था विद्यमान है और दलितों के साथ छुआछूत होता है, बल्कि जौनसार में जातिगत भेदभाव ज्यादा ही है. क्षेत्र के आधार पर जनजाति घोषित होने से यहां के सवर्णों को आरक्षण मिल रहा है, जो खत्म होना चाहिए. संसद की एक समिति ने जौनसार क्षेत्र का दौरा करके अपनी रिपोर्ट में जौनसार-बाबर को जाति आधारित समाज बताते हुए इसे जनजाति क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश की है। एलबीएसएनएए मसूरी के प्रशिक्षु अधिकारियों की रिसर्च रिपोर्ट में भी जौनसार को जनजाति क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश की गई है. यह गंभीर मामला है, जिस पर भारत सरकार को त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए.'
- प्रदीप टम्टा, पूर्व सांसद एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता उत्तराखंड
----
'जौनसार की कुल आबादी में कोल्टा जाति करीब 40 फीसदी है, जो पूरे उत्तराखंड में अनुसूचित जाति में शामिल है लेकिन, जौनसार में इसे राजनैतिक लाभ देने के लिए साजिशन अनुसूचित जनजाति घोषित कर दिया गया. इससे वहां की विधानसभा सीट जनजाति के लिए आरक्षित हो गई है, जबकि पंचायत चुनावों में भी जनजाति को ज्यादा सीटें मिलती हैं. एक तरफ जहां कोल्टा जनजाति में होने से अल्पसंख्यक हैं और राजनीति में पूरी तरह निष्प्रभावी, वहीं शेष दलितों का भी यही हाल है. उत्तराखंड विधानसभा को कोल्टा समुदाय को एससी में शामिल करने के लिए संकल्प प्रस्ताव पारित कर जल्द से जल्द केंद्र को भेजना चाहिए. रहा मंदिर प्रवेश का सवाल तो दलितों को मंदिरों में जाने की जरूरत ही क्या है? इससे दलितों को कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि हताशा ही हाथ लगेगी. मंदिर में चले भी गए तो पुजारी नहीं बनने दिया जाएगा.'
चंद्रसिंह, पूर्व आईएएस-कमिश्नर, उत्तराखंड
(शुक्रवार )
Friday, July 17, 2015
यहां कानून का नहीं देवता का राज है.
यहां कानून का नहीं देवता का राज है
जबरसिंह वर्मा
करीब सात हजार फुट से अधिक की ऊंचाई पर बसा उत्तराखंड का जौनसार बाबर क्षेत्र अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है लेकिन साथ-साथ यह सामाजिक भेदभाव और शोषण आधारित व्यवस्था के लिए बदनाम भी है. यहां आज भी देश का नहीं बल्कि 'मंदिर' का कानून चलता है, विभिन्न मान्यताओं, परंपराओं, नीतियों और रीति-रिवाज के नाम पर दलितों का शोषण होता है. हिमालय के अंचल में बसे इस क्षेत्र की भौगोलिक विशेषता के कारण यहां के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) भी जनजाति घोषित हैं इसलिए यहां अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम (एससीएसटी एक्ट) भी लागू नहीं है.
यह क्षेत्र सन 1967 से ही जनजाति घोषित है और यहां के सवर्णों को जनजातीय आरक्षण का लाभ मिलता है, नतीजा तकरीबन हर घर में सरकारी अधिकारी मिलते हैं. आश्चर्य नहीं कि जौनसार बाबर को उत्तराखंड के सबसे संपन्न क्षेत्रों में से एक माना जाता है. बहरहाल यह संपन्नता पूरी तरह आर्थिक प्रतीत होती है क्योंकि अगर समृद्धि का एक कतरा भी मानसिक स्तर पर पहुंचा होता तो रीति रिवाज के नाम पर दलितों का जो शोषण हमें देखने को मिल रहा है, वह न होता.
दरअसल जौनसारियों के अराध्य देव महासू हैं. उनके कई भव्य मंदिर भी वहां हैं. माना जाता है कि महासू देवता के रहते कानून, पुलिस, प्रशासन की यहां कोई जरूरत नहीं है. नतीजतन, देवता के नाम पर कायदे कानून बनाने और दंड आदि देने का अधिकार इन मंदिरों के पुजारियों और संरक्षकों आदि ने हथिया रखा है. यह व्यवस्था दलितों के शोषण की बुनियाद बनती है. यह पूरा क्षेत्र आज भी डायन और दासी प्रथा जैसी रुढिय़ों को ढो रहा है.
यही वजह है कि हनोल स्थित महासू देवता के मंदिर में क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गायक नंदलाल भारती ने अलबम की शूटिंग के दौरान मंदिर के दरवाजे के भीतर सर क्या डाला, तमाशा ही खड़ा हो गया.मंदिर के पुजारी नाराज हो गये और न केवल मंदिर परिसर में गंगा जल छिडक़ कर उसे पवित्र किया बल्कि खुद भी स्नान को चले गये. मानो इतना ही काफी नहीं था, उन्होंने भारती को भरपूर भला बुरा कहने के बाद जुर्माना चुकाने का आदेश भी सुना दिया. विडंबना देखिये कि भारती खुद महासू देवता की स्तुति में गीत गाने के लिये प्रसिद्ध हैं.
इस घटना के साल भर बाद जब राखी नामक दलित युवती ने मंदिर में जाने की जुर्रत की तो पुजारियों ने उसे अर्द्धनग्न करके लोगों के सामने बाहर खदेड़ दिया.
इसी तरह लखवाड़ स्थिति महासू मंदिर में जौनसार से दुल्हन को लेकर लौटी गढ़वाल क्षेत्र के कांडी गांव की एक बारात को ग्रामीणों ने इसलिए दो घंटे तक घेर कर रखा, क्योंकि दूल्हा दुल्हन मंदिर के आंगन के उस हिस्से तक चले गये थे जहां सवर्ण जाति के लोग अपने जूते रखते हैं. इस 'अपराध' के लिये दोनों पक्षों को न केवल सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी बल्कि एक बकरा और 501 रुपये तुरंत देने के अलावा यह आश्वासन देना पड़ा कि मंदिर में चांदी के सिक्के चढ़ायेंगे.
दलित सामाजिक कार्यकर्ता ध्वजवीरसिंह इस विडंबना की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि देवता के मंदिर बनाने, धार्मिक अनुष्ठान करने के लिये दलितों से चंदा आदि वसूला जाता है, मंदिर निर्माण में भी उनका योगदान लिया जाता है, राजमिस्त्री, मिस्त्री, मजदूर से लेकर मूर्तिकार तक सब उनके होते हैं लेकिन मंदिर तैयार होते ही उनको अछूत ठहराकर प्रवेश तक से वंचित कर दिया जाता है. मंदिरों में पुजारी- पुरोहित दलितों का चढ़ावा सीधे हाथ में लेने की बजाय पहले जमीन पर रखवाते हैं, फिर वहां से उठाते हैं. तर्क है कि दलित के हाथ के नीचे सवर्ण (पुजारी) का हाथ नहीं रहना चाहिए. मंदिर में चढ़ावा जमीन पर रखकर नहीं देने पर कई बार दलितों संग मारपीट हो चुकी है. पेयजल के स्रोतों पर दलितों को यह कह कर नहीं जाने दिया जाता है कि वह अपवित्र हो जायेगा. नतीजतन दलित गंदा पानी पीकर बीमार होने को अभिशप्त हैं.
महासू के किसी भी मंदिर में आप यदि गये तो पुजारी 'आप किस जाति के हो' ये पूछने की बजाय सीधे कहेगा 'आप राजपूत हो या ब्राहमण' ? वजह साफ है, यहां इन जातियों के सिवाय किसी को प्रवेश की इजाजत ही नहीं.
चकराता तहसील मुख्यालय से सटे बाडो गांव में दलितों की स्थिति की असली तस्वीर दिखती है. जो दलित महिला या पुरुष गांव में सवर्णों के साथ काम पर (पशु चराने, घास काटने, खेतों में काम करने) जाता है, उसके लिए टूटे-फूटे बर्तन अलग स्थान पर रखे होते हैं। खाना खाते समय दलित खुद इन बर्तनों को निकालेगा और खाने के बाद धोकर वहीं रखेगा. बमुश्किल 100 मीटर के दायरे में बसे करीब 40 परिवारों के बाडो गांव में 14 दलित परिवारों का 10 फुट की संकरी गली में बना एक खंडहरनुमा सामुदायिक भवन है, वहां से 50 फुट की दूरी पर 25 सवर्ण परिवारों का दो मंजिला आलीशान भवन है. त्रासदी तो यह है कि यहां दलित अपने सामुदायिक भवन में भी प्रवेश नहीं कर सकते. जबकि सामुदायिक भवन तथा वहां मौजूद तमाम चीजें सरकारी पैसे से लोगों के उपयोग के लिये खरीदी गयी हैं. कुछ गांवों में दलित मंदिर के सामने से और गांव के सार्वजनिक रास्ते से गुजरते समय जूते उतारकर गुजरते हैं.
कालसी गांव में दलित प्रधान ध्यानचंद के वकील बेटे ने प्रेम प्रसंग के चलते सर्वण युवती संग विवाह रचा लिया, तो पूरे क्षेत्र के सवर्ण उन पर टूट पड़े. बुजुर्ग, महिला से लेकर बच्चे तक की पिटाई की, हड्यिां तक तोड़ दीं. बुलडोजर की मदद से नया घर ध्वस्त कर दिया गया. सवर्णों की इस भीड़ का नेतृत्व भाजपा के एक विधायक कर रहे थे. एक विवाह समारोह में सवर्णों की पंक्ति में बैठकर खाना खा रहे दलित युवक की न केवल पिटायी की गयी बल्कि उससे भारी जुर्माना भी लिया गया. ये घटनायें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं. इन पर न मीडिया कान देता है न प्रशासन.
सरकारी स्कूलों में दलित बच्चे जरूर पढ़ रहे हैं लेकिन मध्याह्न भोजन बनाने वाली कोई स्त्री दलित नहीं है. दलित जनप्रतिनिधियों के साथ प्रताडऩा, मारपीट, छेडख़ानी और बलात्कार की घटनाएं आये दिन होती रहती हैं. उनकी सुनवाई न आकाश में बैठे देवता कर रहे हैं न ही जमीन पर लोकतंत्र के 'मंदिर' में बैठे नये देवता.
कानून बना मजाक
जौनसार के सवर्ण अनुसूचित जनजाति में आते हैं यही वजह है कि यहां यदि कोई सवर्ण किसी दलित के साथ ज्यादती करता है तो वह एससीएसटी एक्ट के तहत कार्रवाई भी नहीं कर पाता क्योंकि सवर्ण खुद एसटी घोषित है. दलितों पर हो रहे अत्याचार को रोकने की राह में यह सबसे बड़ा अड़ंगा है.
'मान्यता, संस्कृति, आस्था और परंपरा के नाम पर दलितों के मंदिर प्रवेश पर रोक को जायज नहीं ठहराया जा सकता. पार्टियों और सरकारों को यह सुनिचित करना चाहिए कि दलित समुदाय को उनके संवैधानिक अधिकार प्राप्त हों.'
- डा. सुनीलम, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम
------
' जौनसारी कोई समुदाय नहीं, बल्कि जाति आधारित समाज है. जौनसार-बाबर में कोई जनजाति निवास नहीं करती. यहां समूचे उत्तराखंड की ही तरह जाति व्यवस्था विद्यमान है और दलितों के साथ छुआछूत होता है, बल्कि जौनसार में जातिगत भेदभाव ज्यादा ही है. क्षेत्र के आधार पर जनजाति घोषित होने से यहां के सवर्णों को आरक्षण मिल रहा है, जो खत्म होना चाहिए. संसद की एक समिति ने जौनसार क्षेत्र का दौरा करके अपनी रिपोर्ट में जौनसार-बाबर को जाति आधारित समाज बताते हुए इसे जनजाति क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश की है। एलबीएसएनएए मसूरी के प्रशिक्षु अधिकारियों की रिसर्च रिपोर्ट में भी जौनसार को जनजाति क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश की गई है. यह गंभीर मामला है, जिस पर भारत सरकार को त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए.'
- प्रदीप टम्टा, पूर्व सांसद एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता उत्तराखंड
----
'जौनसार की कुल आबादी में कोल्टा जाति करीब 40 फीसदी है, जो पूरे उत्तराखंड में अनुसूचित जाति में शामिल है लेकिन, जौनसार में इसे राजनैतिक लाभ देने के लिए साजिशन अनुसूचित जनजाति घोषित कर दिया गया. इससे वहां की विधानसभा सीट जनजाति के लिए आरक्षित हो गई है, जबकि पंचायत चुनावों में भी जनजाति को ज्यादा सीटें मिलती हैं. एक तरफ जहां कोल्टा जनजाति में होने से अल्पसंख्यक हैं और राजनीति में पूरी तरह निष्प्रभावी, वहीं शेष दलितों का भी यही हाल है. उत्तराखंड विधानसभा को कोल्टा समुदाय को एससी में शामिल करने के लिए संकल्प प्रस्ताव पारित कर जल्द से जल्द केंद्र को भेजना चाहिए. रहा मंदिर प्रवेश का सवाल तो दलितों को मंदिरों में जाने की जरूरत ही क्या है? इससे दलितों को कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि हताशा ही हाथ लगेगी. मंदिर में चले भी गए तो पुजारी नहीं बनने दिया जाएगा.'
चंद्रसिंह, पूर्व आईएएस-कमिश्नर, उत्तराखंड
(शुक्रवार )
जबरसिंह वर्मा
करीब सात हजार फुट से अधिक की ऊंचाई पर बसा उत्तराखंड का जौनसार बाबर क्षेत्र अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है लेकिन साथ-साथ यह सामाजिक भेदभाव और शोषण आधारित व्यवस्था के लिए बदनाम भी है. यहां आज भी देश का नहीं बल्कि 'मंदिर' का कानून चलता है, विभिन्न मान्यताओं, परंपराओं, नीतियों और रीति-रिवाज के नाम पर दलितों का शोषण होता है. हिमालय के अंचल में बसे इस क्षेत्र की भौगोलिक विशेषता के कारण यहां के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) भी जनजाति घोषित हैं इसलिए यहां अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम (एससीएसटी एक्ट) भी लागू नहीं है.
यह क्षेत्र सन 1967 से ही जनजाति घोषित है और यहां के सवर्णों को जनजातीय आरक्षण का लाभ मिलता है, नतीजा तकरीबन हर घर में सरकारी अधिकारी मिलते हैं. आश्चर्य नहीं कि जौनसार बाबर को उत्तराखंड के सबसे संपन्न क्षेत्रों में से एक माना जाता है. बहरहाल यह संपन्नता पूरी तरह आर्थिक प्रतीत होती है क्योंकि अगर समृद्धि का एक कतरा भी मानसिक स्तर पर पहुंचा होता तो रीति रिवाज के नाम पर दलितों का जो शोषण हमें देखने को मिल रहा है, वह न होता.
दरअसल जौनसारियों के अराध्य देव महासू हैं. उनके कई भव्य मंदिर भी वहां हैं. माना जाता है कि महासू देवता के रहते कानून, पुलिस, प्रशासन की यहां कोई जरूरत नहीं है. नतीजतन, देवता के नाम पर कायदे कानून बनाने और दंड आदि देने का अधिकार इन मंदिरों के पुजारियों और संरक्षकों आदि ने हथिया रखा है. यह व्यवस्था दलितों के शोषण की बुनियाद बनती है. यह पूरा क्षेत्र आज भी डायन और दासी प्रथा जैसी रुढिय़ों को ढो रहा है.
यही वजह है कि हनोल स्थित महासू देवता के मंदिर में क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गायक नंदलाल भारती ने अलबम की शूटिंग के दौरान मंदिर के दरवाजे के भीतर सर क्या डाला, तमाशा ही खड़ा हो गया.मंदिर के पुजारी नाराज हो गये और न केवल मंदिर परिसर में गंगा जल छिडक़ कर उसे पवित्र किया बल्कि खुद भी स्नान को चले गये. मानो इतना ही काफी नहीं था, उन्होंने भारती को भरपूर भला बुरा कहने के बाद जुर्माना चुकाने का आदेश भी सुना दिया. विडंबना देखिये कि भारती खुद महासू देवता की स्तुति में गीत गाने के लिये प्रसिद्ध हैं.
इस घटना के साल भर बाद जब राखी नामक दलित युवती ने मंदिर में जाने की जुर्रत की तो पुजारियों ने उसे अर्द्धनग्न करके लोगों के सामने बाहर खदेड़ दिया.
इसी तरह लखवाड़ स्थिति महासू मंदिर में जौनसार से दुल्हन को लेकर लौटी गढ़वाल क्षेत्र के कांडी गांव की एक बारात को ग्रामीणों ने इसलिए दो घंटे तक घेर कर रखा, क्योंकि दूल्हा दुल्हन मंदिर के आंगन के उस हिस्से तक चले गये थे जहां सवर्ण जाति के लोग अपने जूते रखते हैं. इस 'अपराध' के लिये दोनों पक्षों को न केवल सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी बल्कि एक बकरा और 501 रुपये तुरंत देने के अलावा यह आश्वासन देना पड़ा कि मंदिर में चांदी के सिक्के चढ़ायेंगे.
दलित सामाजिक कार्यकर्ता ध्वजवीरसिंह इस विडंबना की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि देवता के मंदिर बनाने, धार्मिक अनुष्ठान करने के लिये दलितों से चंदा आदि वसूला जाता है, मंदिर निर्माण में भी उनका योगदान लिया जाता है, राजमिस्त्री, मिस्त्री, मजदूर से लेकर मूर्तिकार तक सब उनके होते हैं लेकिन मंदिर तैयार होते ही उनको अछूत ठहराकर प्रवेश तक से वंचित कर दिया जाता है. मंदिरों में पुजारी- पुरोहित दलितों का चढ़ावा सीधे हाथ में लेने की बजाय पहले जमीन पर रखवाते हैं, फिर वहां से उठाते हैं. तर्क है कि दलित के हाथ के नीचे सवर्ण (पुजारी) का हाथ नहीं रहना चाहिए. मंदिर में चढ़ावा जमीन पर रखकर नहीं देने पर कई बार दलितों संग मारपीट हो चुकी है. पेयजल के स्रोतों पर दलितों को यह कह कर नहीं जाने दिया जाता है कि वह अपवित्र हो जायेगा. नतीजतन दलित गंदा पानी पीकर बीमार होने को अभिशप्त हैं.
महासू के किसी भी मंदिर में आप यदि गये तो पुजारी 'आप किस जाति के हो' ये पूछने की बजाय सीधे कहेगा 'आप राजपूत हो या ब्राहमण' ? वजह साफ है, यहां इन जातियों के सिवाय किसी को प्रवेश की इजाजत ही नहीं.
चकराता तहसील मुख्यालय से सटे बाडो गांव में दलितों की स्थिति की असली तस्वीर दिखती है. जो दलित महिला या पुरुष गांव में सवर्णों के साथ काम पर (पशु चराने, घास काटने, खेतों में काम करने) जाता है, उसके लिए टूटे-फूटे बर्तन अलग स्थान पर रखे होते हैं। खाना खाते समय दलित खुद इन बर्तनों को निकालेगा और खाने के बाद धोकर वहीं रखेगा. बमुश्किल 100 मीटर के दायरे में बसे करीब 40 परिवारों के बाडो गांव में 14 दलित परिवारों का 10 फुट की संकरी गली में बना एक खंडहरनुमा सामुदायिक भवन है, वहां से 50 फुट की दूरी पर 25 सवर्ण परिवारों का दो मंजिला आलीशान भवन है. त्रासदी तो यह है कि यहां दलित अपने सामुदायिक भवन में भी प्रवेश नहीं कर सकते. जबकि सामुदायिक भवन तथा वहां मौजूद तमाम चीजें सरकारी पैसे से लोगों के उपयोग के लिये खरीदी गयी हैं. कुछ गांवों में दलित मंदिर के सामने से और गांव के सार्वजनिक रास्ते से गुजरते समय जूते उतारकर गुजरते हैं.
कालसी गांव में दलित प्रधान ध्यानचंद के वकील बेटे ने प्रेम प्रसंग के चलते सर्वण युवती संग विवाह रचा लिया, तो पूरे क्षेत्र के सवर्ण उन पर टूट पड़े. बुजुर्ग, महिला से लेकर बच्चे तक की पिटाई की, हड्यिां तक तोड़ दीं. बुलडोजर की मदद से नया घर ध्वस्त कर दिया गया. सवर्णों की इस भीड़ का नेतृत्व भाजपा के एक विधायक कर रहे थे. एक विवाह समारोह में सवर्णों की पंक्ति में बैठकर खाना खा रहे दलित युवक की न केवल पिटायी की गयी बल्कि उससे भारी जुर्माना भी लिया गया. ये घटनायें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं. इन पर न मीडिया कान देता है न प्रशासन.
सरकारी स्कूलों में दलित बच्चे जरूर पढ़ रहे हैं लेकिन मध्याह्न भोजन बनाने वाली कोई स्त्री दलित नहीं है. दलित जनप्रतिनिधियों के साथ प्रताडऩा, मारपीट, छेडख़ानी और बलात्कार की घटनाएं आये दिन होती रहती हैं. उनकी सुनवाई न आकाश में बैठे देवता कर रहे हैं न ही जमीन पर लोकतंत्र के 'मंदिर' में बैठे नये देवता.
कानून बना मजाक
जौनसार के सवर्ण अनुसूचित जनजाति में आते हैं यही वजह है कि यहां यदि कोई सवर्ण किसी दलित के साथ ज्यादती करता है तो वह एससीएसटी एक्ट के तहत कार्रवाई भी नहीं कर पाता क्योंकि सवर्ण खुद एसटी घोषित है. दलितों पर हो रहे अत्याचार को रोकने की राह में यह सबसे बड़ा अड़ंगा है.
'मान्यता, संस्कृति, आस्था और परंपरा के नाम पर दलितों के मंदिर प्रवेश पर रोक को जायज नहीं ठहराया जा सकता. पार्टियों और सरकारों को यह सुनिचित करना चाहिए कि दलित समुदाय को उनके संवैधानिक अधिकार प्राप्त हों.'
- डा. सुनीलम, राष्ट्रीय संयोजक, समाजवादी समागम
------
' जौनसारी कोई समुदाय नहीं, बल्कि जाति आधारित समाज है. जौनसार-बाबर में कोई जनजाति निवास नहीं करती. यहां समूचे उत्तराखंड की ही तरह जाति व्यवस्था विद्यमान है और दलितों के साथ छुआछूत होता है, बल्कि जौनसार में जातिगत भेदभाव ज्यादा ही है. क्षेत्र के आधार पर जनजाति घोषित होने से यहां के सवर्णों को आरक्षण मिल रहा है, जो खत्म होना चाहिए. संसद की एक समिति ने जौनसार क्षेत्र का दौरा करके अपनी रिपोर्ट में जौनसार-बाबर को जाति आधारित समाज बताते हुए इसे जनजाति क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश की है। एलबीएसएनएए मसूरी के प्रशिक्षु अधिकारियों की रिसर्च रिपोर्ट में भी जौनसार को जनजाति क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश की गई है. यह गंभीर मामला है, जिस पर भारत सरकार को त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए.'
- प्रदीप टम्टा, पूर्व सांसद एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता उत्तराखंड
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'जौनसार की कुल आबादी में कोल्टा जाति करीब 40 फीसदी है, जो पूरे उत्तराखंड में अनुसूचित जाति में शामिल है लेकिन, जौनसार में इसे राजनैतिक लाभ देने के लिए साजिशन अनुसूचित जनजाति घोषित कर दिया गया. इससे वहां की विधानसभा सीट जनजाति के लिए आरक्षित हो गई है, जबकि पंचायत चुनावों में भी जनजाति को ज्यादा सीटें मिलती हैं. एक तरफ जहां कोल्टा जनजाति में होने से अल्पसंख्यक हैं और राजनीति में पूरी तरह निष्प्रभावी, वहीं शेष दलितों का भी यही हाल है. उत्तराखंड विधानसभा को कोल्टा समुदाय को एससी में शामिल करने के लिए संकल्प प्रस्ताव पारित कर जल्द से जल्द केंद्र को भेजना चाहिए. रहा मंदिर प्रवेश का सवाल तो दलितों को मंदिरों में जाने की जरूरत ही क्या है? इससे दलितों को कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि हताशा ही हाथ लगेगी. मंदिर में चले भी गए तो पुजारी नहीं बनने दिया जाएगा.'
चंद्रसिंह, पूर्व आईएएस-कमिश्नर, उत्तराखंड
(शुक्रवार )
Monday, April 27, 2015
वही जगह और वही काटेज
अंबरीश कुमार
कलंगूट । वही जगह और वही काटेज । यह संयोग ही था तब नीचे रुके थे और अबकी ऊपर ।सामने नारियल के पेड़ों के बीच से वह समुद्र आधा अधूरा दिख रहा है जो करीब पच्चीस साल पहले खुला हुआ था । यह जानकारी सविता ने कमरे की बालकनी से समुद्र को देखते हुए दी । बताया कि तब जो नारियल औए काजू के पेड़ तब छोटे छोटे थे बवे अब काफी बड़े हो गए है और उनकी कतार से सामने का समुद्र ढक गया है । यानी पच्चीस साल बीत गए इधर के । आज एक पुरानी फिल्म की तरह सब गुजर गया । यह हफ्ता अपने सह जीवन का पच्चीसवां साल भी पूरा कर रहा है । उधर के पच्चीस साल तो अराजकता के ज्यादा रहे इधर के कम रहे ।इस समय कैसे गोवा में है यह कई मित्रों की उत्सुकता का विषय था ।इसी पच्चीस साल को याद करने के लिए इस अरब सागर के इस तट पर ठहरे हुए है ।कायदे से इस समय शुक्रवार के प्रिंट में जाने के वक्त मुझे दिल्ली / लखनऊ में होना चाहिए था । पर इधर के पच्चीस साल को याद करने का कार्यक्रम पहले से बना हुआ था इसलिए उसमे कोई फेरबदल नहीं किया गया । गोवा कई बार आना हुआ है । सविता के आने से पहले एक बार और उसके बाद चार बार । पंजिम की गलियां याद है तो वेगाटार से लेकर कोलवा और मीरमार के समुद्र तट की बहुत सी शाम भी । तब गोवा एक गांव लगता था और अब यह स्मार्ट सिटी में तब्दील हो गया है । तब बेंति से आगे जो पतली पतली सर्पीली सड़के थी वे फोर लें में बदल चुकी है तो तो दोनों तरफ भव्य होटल माल और आलीशान भवन । पुर्तगाली वास्तुशिल्प अब पुराने गोवा या गांवों में सिमटता जा रहा है ।मंडावी नदी पर पांच सितारा कैसिनो आ चुका है और गोवा के पर्यटन विभाग का फोकस भी अब मध्य वर्ग की बजाए आभिजात्य वर्ग की तरफ हो चुका है ।वर्ना इसी रिसार्ट के सामने के रेस्तरां में दाल चावल और आम सब्जियां खाने के मीनू से गायब नहीं होती और उनकी जगह इटैलियन से लेकर फ्रांसीसी व्यंजन प्रमुखता पर नहीं होते । पर्यटन गोवा का मुख्य व्यवसाय है और गोवा के पर्यटन विभाग ने नब्बे के दशक में बहुत अच्छी सुविधाएं सैलानियों को दी थी और वह भी कम दाम में ।अब सुविधाएं तो है पर उच्च वर्ग के सैलानियों के लिए ज्यादा । खैर शहर का मिजाज सभी जगह बदला है तो गोवा क्यों न बदले । हमने इसीलिए गाँवों से लगे पुराने समुद्र तट का रुख किया और सुबह शाम इन्हें फिर से देखा भी ठीक से । आज सुबह तो कलंगूट से बागा समुद्र तट तक पैदल ही चले । खूब बादल उमड़ रहे थे और बूंदें भी पड़ी पर भीगे नहीं । कई जोड़े हाथों में हाथ डाले लहरों के साथ चल रहे थे । रात में गुलजार रहने वाले झोपडीनुमा रेस्तरां अभी बंद थे । मेज पर मेज लदी थी तो कुर्सियों के ढेर पड़े थे । कुछ बैरा उठ गए थे तो कुछ उठ रहे थे । आस पास कुत्तों के झुंड समुद्र से आई मछलियों पर जुटे हुए थे । मौसम काफी खुशनुमा था और सामने पहाड़ी के ऊपर बादल काले हो रहे थे तो नीचे समुद्र का शोर बढ़ रहा था ।हम बीच बीच में अपने भी पच्चीस साल को याद कर रहे थे ।दो तीन फोटो यादगार है ।एक जब पहली बार मुलाकात हुई तो दूसरी चकराता की जब सविता मौत के मुह से वापस आ गई ।तब चकराता के डाक बंगले में रुके थे और पैदल जंगल के बीच पांच छह किलोमीटर नीचे उतर उतर कर गए टाइगर फाल देखने ।लौटते समय आंधी पानी और तूफ़ान की वजह से जिन रास्तो पर चढ़ना था वे झरनों में तब्दील हो चुके थे और दो बार मरते हाथ से फिसल चुकी सविता ने उम्मीद छोड़ कर कहा अब जाओं हम नहीं बच सकते । बाद में अपने ब्लाग पर यह घटना लिखी थी । बहरहाल लौट कर आए तो जो एक फोटो ली वह इस पोस्ट के साथ दे रहा हूँ जो बरसात के बाद चकराता के बस स्टैंड के पास की है ।जबकि पहली फोटो सगाई की मिली ।इन पच्चीस सालों में भी जमकर घूमना हुआ । पहाड़ पर भी ,रेगिस्तान में भी और समुद्र में भी । समुद्र से अपना लगाव पुराना है । समुद्र जहाज पर यादगार यात्रा भी हुई । रुकने की व्यवस्था भी समुद्र तट पर हो इसका हमेशा ध्यान रखा । दीव का सर्किट हाउस तो समुद्र तट पर ही बना है और वहा भी दीव प्रशासन का अतिथि रहने का मौका मिला तो दमन में भी । जब पहली बार पच्चीस दिसंबर को गोवा पहुंचा था तो बिना पहले से बुकिंग के ।पर तब एक सरदार जी पर्यटन विभाग के आला अफसर थे और उन्होंने पहले दिन सर्किट हाउस और दूसरे दिन कलंगूट बीच के इसी रिसार्ट पर ठाह्रने की व्यवस्था कर दी ।तब सर्किट हाउस का किराया दस रुपए एक दिन का पड़ा था और इस रिसार्ट का एक सौ नब्बे रुपए । तभी पता चला की गोवा के सर्किट हाउस में भव्य बार भी है जो और कही नहीं मिलेगा । बहरहाल कल से हम इसी सब को गोवा में याद कर रहे है और बीच बिओइच में अपने साझा इतिहास में भी लौट जाते है ।












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Wednesday, March 4, 2015
यह तो आप का 'दोफाड़ ' है
यह तो आप का 'दोफाड़ ' है
अंबरीश कुमार
नई दिल्ली ।आंदोलन से निकली आम आदमी की पार्टी आज 'खास ' में ही बदल गई ।पार्टी के सभी प्रवक्ता चाहे जितनी दलील दे आज यह पार्टी बंट गई और आम आदमी का सपना टूट गया ।बैठक से बाहर निकल कर जिस आवाज में प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्हें और योगेंद्र यादव को पीएसी से बाहर कर दिया गया है वह आहत आवाज बहुत कुछ कह रही थी । पार्टी में बहुत दिन से सब कुछ चल रहा था पर इस अंदाज में यह सब ख़त्म होगा यह उम्मीद किसी को नहीं थी ।जो कुछ आज घटा है उसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल पर है और किसी पर नहीं ।भले योगेंद्र यादव पार्टी पर कब्जे की फिराक में हो जो उनपर आरोप है ।आज संजय सिंह ,मनीष सिसोदिया ,आशुतोष ,दिलीप पांडेय से लेकर कुमार विश्वास केजरीवाल के साथ पूरी ताकत के साथ खड़े थे जिसकी उम्मीद पहले से थी ।इनमे संजय सिंह को छोड़ कोई भी राजनैतिक कार्यकर्त्ता नहीं रहा है ।वोट हुआ तो अरविन्द केजरीवाल खेमा सिर्फ तीन वोट से जीता है यह ध्यान रखने वाली बात है ,योगेंद्र यादव के साथ कार्यकारिणी के आठ लोग खड़े थे ।इससे ही इस राजनैतिक संकट का अंदाजा लगाया जा सकता है ।सभी इस उम्मीद में थे कि अरविंद अंतत इस समस्या को सुलझा लेंगे और योगेंद्र यादव ,प्रशांत भूषण को पीएसी से हटाया नहीं जाएगा ।
आप के जानकारों का आरोप है कि योगेंद्र यादव खेमे का विधान सभा चुनाव से पहले ही यह आकलन था कि पार्टी बीस बाईस सीट पर निपट जाएगी और इस स्थिति में केजरीवाल को हटाकर पार्टी पर आधिपत्य जमा लिया जाएगा ।यह एक आरोप है ,सच्चाई कितनी है इसमें कहा नहीं जा सकता ।पर यह भी सही है कि आप के उदय के साथ आप पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में जिस तरह का अहंकार आया था उससे योगेंद्र यादव भी नहीं बच पाए थे ।सभी जानते है कि पार्टी के लिए समाजवादी जन परिषद की भी बलि दे दी गई थी ।बावजूद इसके विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे जन आंदोलनों के लोगों को पार्टी का टिकट तो दिया गया पर उनकी कोई ढंग से मदद भी नहीं की गई ।इसमें आप पार्टी के खांटी समाजवादी भी शामिल थे ।यह सही है आप पार्टी अरविंद केजरीवाल के अपने आभा मंडल और राजनैतिक चमत्कार पर ज्यादा टिकी थी किसी वैचारिक आधार पर बहुत कम ।इसीलिए योगेंद्र यादव आज इस अंदाज में बाहर भी हुए ।वे दो दिन से लंबे लंबे इंटरव्यू दे कर माहौल बना रहे थे ,अपनी बात घर घर तक पहुंचा रहे थे ।पर दूसरी तरफ केजरीवाल समर्थक अपने अंदाज में साफ़ कर चुके थे कि योगेंद्र यादव को जाना ही होगा ।और वे चले भी गए । कार्यकारिणी की बैठक ने तो उसपर मोहर लगा दी ।यह बात अरविंद केजरीवाल जानते थे और चाहते भी थे ।तभी यह हुआ भी ।सब कह रहे थे कि आप पार्टी में जो कुछ हो रहा है वह बिना केजरीवाल की मर्जी के नहीं हो रहा । दिलीप पांडे से लेकर खेतान तक जो भाषा बोल रहे थे वह पहले से तय थी ।इसीलिए लोगों को दुःख हुआ ।सोनिया राहुल की कांग्रेस हो या मोदी की भाजपा ,यह आम आदमी की पार्टी भी तो वैसी ही निकली ।केजरीवाल ने ठीक वैसी ही गलती दोहराई है जैसी दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर की थी ।इसका भी नफा नुकसान सामने आ जाएगा ।
Tuesday, March 3, 2015
समुद्र तट पर बढ़ता संकट
समुद्र तट पर बढ़ता संकट
अंबरीश कुमार
कुछ वर्ष पहले तक देश के कई द्वीप और पहाड़ी क्षेत्र सैलानियों के लिए प्रतिबंधित थे पर बाद में उन्हें भी पर्यटन के नाम पर खोल दिया गया ।इनमें लक्ष्यद्वीप ,अंडमान निकोबार से लेकर लद्दाख और पूर्वोत्तर के कई अंचल शामिल थे । पर कुछ ही समय में पर्यटन के नाम पर इन क्षेत्रों का जिस तरह अंधाधुंध व्यावसायिक दोहन हुआ उससे सभी जगह कई तरह की समस्या सामने आने लगी है ।इसमें सबसे बुरा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है । इन द्वीप के साथ समुदी तट पर भी संकट बढा है । पुरी ,विशाखापत्तनम ,चेन्नई से पांडिचेरी ,केरल के कोवलम से लेकर कन्याकुमारी के समुद्र तटों पर जिस तरह अतिक्रमण बढ़ रहा है उसे देखते हुए नहीं लगता कि एक दो दशक बाद ये खुले समुद्र तट बच पाएंगे ।पहले समुद्र तट पर निर्माण की दूरी पांच सौ मीटर थी जिसे कई जगहों पर घटा कर दो सौ मीटर कर दिया गया है ।इसके बावजूद चाहे पुरी का समुद्र तट देख ले या कोवलम का बीस से पचास मीटर दूरी तक निर्माण नजर आ जाएगा ।समुद्र तटों की सुरक्षा के लिए बना तटीय नियमन क्षेत्र कानून भी इसे रोक नही पा रहा है ।लक्ष्य द्वीप का मशहूर बंगरम द्वीप वर्षों से एक होटल समूह के पास है और इस द्वीप तक पहुँचने के लिए कवरेती और अगाती द्वीप तक जाना होता है ।पिछले दो दशक में इन दोनों द्वीप के आसपास का पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित हो चूका है जिसका असर समुद्री जीव जंतुओं पर भी पड़ चुका है । वजह समुद्री जहाजों का बढ़ता फेरा और हवाई यातायात भी है ।यहां पर नारियल और पपीता के अलावा कुछ नहीं होता और सारा सामान पहले बड़े समुद्री जहाज और फिर मोटर बोट के जरिए इस द्वीप तक लाया जाता है । दिनभर में कई बार इन मोटर बोट का आना जाना होता है और इनका कचरा भी गहरे समुद्र से लेकर लैगून में ही फेंका जाता है ।समुद्र तटों के किनारे बसे रिसार्ट हो या द्वीप में यह एक बड़ी समस्या है जिसके चलते इनके आसपास का पर्यावरण प्रभावित हो रहा है , यह एक बानगी है और कई द्वीप इस संकट से जूझ रहे है ।दूसरी तरफ तटीय राज्यों में स्थिति और बदतर होती जा रही है ।कोवलम समुद्र तट केरल का सबसे खुबसूरत तट माना जाता है पर अब पहले जैसी प्राकृतिक खूबसूरती नजर नहीं आती ।इस तट पर इस कदर अतिक्रमण हुआ है कि कोस्टल रेगुलेशन जोन यानी तटीय नियमन क्षेत्र अध्यादेश के उलंघन की करीब दो हजार शिकायते आ चुकी है ।यह हाल सभी तटीय राज्यों का है ।ओडिशा में समुद्र तट पर होटलों के बढ़ते अतिक्रमण को लेकर अदालत को दखल देना पड़ा तो गोवा में प्रभावशाली नेताओं से लेकर कई बिल्डरों के खिलाफ मामला चल रहा है । समुद्र तटों पर सैलानियों की बढती संख्या से पर्यटन उद्योग तेजी से फल फूल रहा है तो इसके चलते अवैध अतिक्रमण भी बढ़ रहा है ।गोवा के समुद्र तटों पर अवैध कब्जे की घटनाएं लगातार बढती जा रही है ।एक तरफ होटल और रिसार्ट इन तटों पर तेजी से खुल रहे है तो दूसरी तरफ आवासीय योजनाएं । विशाखापत्तनम में समुद्र तट के किनारे से गुजरने वाली सड़क पर बहुमंजिली इमारतों की कतार खड़ी हो चुकी है और ये इस शहर का सबसे महंगा रिहायशी इलाका माना जाता है । समुद्र तट पर बसे हर शहर की यही स्थिति है ।पर इसका दूसरा और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह भी है कि इनका सारा कचरा भी समुद्र में बहाया जा रहा है । चाहे समुद्र तट पर बसे रिसार्ट और होटल हो या एपार्टमेंट ,आम तौर पर इनका कचरा सीवर लाइन के जरिए समुद्र में डाला जा रहा है ।देर सब्स्र इसका घातक परिणाम हमें भुगतना होगा ।साभार -दैनिक हिंदुस्तान
Monday, February 9, 2015
यह मोदी के खिलाफ ' जनादेश ' है
यह मोदी के खिलाफ ' जनादेश ' है
अंबरीश कुमार
नई दिल्ली ।दिल्ली में वही हुआ जिसकी उम्मीद थी ।सड़क के आदमी ने सत्ता के शीर्ष पर बैठे मोदी को जमीन दिखा दिया है ।दिल्ली में जब आप के नेताओं ने झंडा लहराते हुए इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ कहा -दिल्ली जीत गए है हम तो तालियों की गडगडाहट सुनने वाली थी ।आप के नेताओं ने इस जनादेश का श्रेय अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दिया है जिस कार्यकर्त्ता को कांग्रेस और भाजपा ने किनारे लगा दिया था । यह भाजपा के शीर्ष नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति के खिलाफ जनादेश है ।यह अमित शाह की चौकड़ी वाली राजनीति के खिलाफ जनमत संग्रह है ।मोदी ने जिस पार्टी को हाशिए पर पहुंचाया उसके कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में उन्हें राजनीति का पाठ भी पढ़ा दिया ।इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ आम आदमी से भी मोदी और शाह लड़ रहे थे ।पर भाजपा नहीं लड़ रही थी ।संघ भी किनारे खड़ा था ।यह चुनाव मोदी और शाह कारपोरेट घरानों के साथ साम दाम दंड भेद सभी हथकंडो से लड़ा था । मोदी एक मिथक बन रहे थे और अहंकार में दूब चुके थे ।दिल्ली चुनाव के प्रचार में उनका यह अहंकार बार बार दिखा ।वे कहते थे -हमारी मास्टरी सरकार चलने की है हमें वह काम दीजिए , उनकी मास्टरी धरना देने की है उन्हें वह काम दीजिए ।पर दिल्ली ने मोदी को दिल्ली नहीं दी ।वे बुरी तरह हारे है , अपनी राजनीति से ।पहले के माहौल पर नजर डाले । कांग्रेस के खिलाफ लोगों में गुस्सा था ।इस गुस्से को अन्ना हजारे ने आंदोलन में बदल दिया था ।राजनैतिक प्रयोग हुआ और केजरीवाल की दिल्ली में सरकार बनी ।इसके बाद समूचे देश में माहौल बना और आम आदमी पार्टी से देश भर के लोग अपेक्षा करने लगे ।पर केजरीवाल ने जिस तरीके से अचानक दिल्ली की सत्ता छोड़ी और वाराणसी चुनाव में खुद उतरे उसने देश भर के युवा आक्रोश को मोदी की तरफ एक झटके में मोड़ दिया ।तब मोदी कांग्रेस के खिलाफ एकछत्र नेता के रूप में उभर रहे थे ।ऐसे में केजरीवाल का उन्हें सीधी चुनौती देने एक बड़े वर्ग को खला और देशभर में जो माहौल बना था वह भाजपा के पक्ष में चला गया ।पर उसके मूल में जो आम आदमी था उसे केजरीवाल और उनकी युवा टीम ने फिर जगा दिया है ।आम आदमी के मुद्दों को लेकर ।भाजपा ,सही बात यह है कि मोदी और शाह ने इस चुनाव में केजरीवाल के खिलाफ जो जो हथकंडे अपनाए वे सब न सिर्फ भोथरे साबित हुए बल्कि उसने आम आदमी के गुस्से को भी भड़काया ।इस चुनाव में जाति धर्म से ऊपर उठकर वोट पड़ा भले डेरा सच्चा सौदा आया हो या मौलाना बुखारी ।दरअसल दिल्ली का यह पूरा चुनाव तो प्रतीक रूप में देश लड़ रहा था ।यह लड़ाई गरीब बनाम अमीर भी थी ।यह लड़ाई अहंकार और सत्ता के सारे हथकंडो के खिलाफ थी ।ध्यान से देखे भाजपा छोड़ सभी राजनैतिक दल अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी के पीछे खड़े थे ।और सबसे बड़ी जीत तो यह उन नौजवान कार्यकर्ताओं की है जिन्होंने अपनी जान लगा थी इस चुनाव में ।आज जब ज्यादातर राजनैतिक दल एनजीओ के सहारे होते जा रहे है ऐसे समय में एनजीओ से निकले लोगों ने अगर तीस हजार प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की फौज दिल्ली में कड़ी कर दी तो इसे एक बड़ा आन्दोलन मानना चाहिए ।और अभी यह आंदोलन और आगे बढ़ने जा रहा है ।चौबीस फरवरी के बाद किसानो की जमीन के सवाल पर अन्ना हजारे फिर दिल्ली आ रहे है ।आर पार की लड़ाई के संकल्प के साथ ।मोदी के लिए आत्ममंथन का समय अब आ गया है ।जनादेश
Saturday, February 7, 2015
तो टूट गया मोदी का तिलिस्म ?
तो टूट गया मोदी का तिलिस्म ?
यह चुनाव लोकसभा चुनाव के बाद पहला वह चुनाव है जिसने मोदी का राजनैतिक तिलिस्म तोड़ दिया है ।अहंकार भी तोड़ दिया है । नसीब भी गया ।पहली बार कोई प्रधानमंत्री बड़ी म्युनिस्पैलिटी के चुनाव में मोहल्ला मोहल्ला घूमा था ।जिसकी जरुरत नहीं थी ,फिर भी कही अश्वमेघ का घोडा मोहल्ले का नौजवान न रोक ले यह डर जरुर था ।साथ ही अपने पर कुछ ज्यादा ही विश्वास भी तो अन्य नेताओं पर अविश्वास । हारी हुई बाजी को जीत में बदल देने का विश्वास ।पर यह भूल गए कि जनता नौ महीने के राजकाज पर अपनी राय भी देने वाली है ।जो पेट्रोल और डीजल के अंतरराष्ट्रीय दाम में हुई गिरावट से देश की महंगाई को नहीं देखने वाली थी ।नून तेल लकड़ी से महंगाई देखी जाती है ,आटा दाल चावल और आलू प्याज से महंगाई नापी जाती है । फिर तुर्रा यह कि ' आपकी टेंट में तो अब पैसा बच रहा होगा , जैसे जुमले भी घाव पर नमक जैसे ही लगते है ।इस सबके बाद एक ठीक ठाक पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को ताक पर रखकर जिस तरह किरण बेदी को मोदी और शाह ने पार्टी की दिल्ली इकाई पर थोपा उसने रही सही कसर भी पूरी कर दी ।मोदी और शाह तो आम आदमी पार्टी ही नही भाजपा की दिल्ली इकाई से भी लड़ रहे थे ।पैसे के बूते पर ,सत्ता के बूते पर और कारपोरेट घरानों और उनके चैनलों के बूते पर ।वे भूल गए हर बार विज्ञापन से जीत नही मिल पाती ।
भारतीय जनता पार्टी के संगठन के हिसाब से भी यह चुनाव बहुत निर्णायक हो गया है ।पार्टी में मोदी-शाह की कार्यशैली को लेकर दिल्ली का यह चुनाव अभी काफी उथल पुथल मचाने वाला है ।किरण बेदी से लेकर शाजिया इल्मी जैसे उधार के दगे हुए कारतूसों से जंग नही लड़ी जाती यह भी दस को साफ़ हो जाएगा ।इस चुनाव को मोदी और मीडिया ने जरुरत से ज्यादा तूल दिया और तरह तरह के हथकंडे भी अपनाए ।जो चुनाव दिल्ली भाजपा बनाम आप पार्टी था उसे मोदी ने अपने अहंकार में मोदी बनाम मफलर वाला बना दिया ।आम लोगों को यह मफलर वाला अपनी गली का ही नौजवान नजर आया ।जो अडानी से लेकर अंबानी तक को चुनौती देता है ,बिना किसी डर के ।उधर एक अड़ियल पुलिस वाली को मुकाबले में आगे कर मोदी शाह ने रही सही कसर पूरी कर दी ।कभी भी कोई युद्ध के दौरान सेनापति नही बदलता ।पर मोदी ने बीच युद्ध में पार्टी का सेनापति बदल दिया और किसी की भी नही सुनी ।और इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गिया जो पार्टी के आम कार्यकर्ताओं को रास नही आया था ।इसके बाद चुनावी शतरंज में साम दाम दंड भेद सारे हथकंडे अपना लिए गए ।पुलिस भी लगे गई तो बदमाश भी और साजिश वाले भी जुट गए । सारी लड़ाई ' एक दिए की और तूफ़ान , की लड़ाई में बदल गई ।इस सबके चलते झुग्गी झोपडी से लेकर हाशिए का समाज आज सड़क पर उतरा और फिर चुनावी आकलन ने माहौल बदल दिया है ।अब दस के बाद शुरू होगी दूसरी राजनैतिक लड़ाई ।अब आम आदमी पार्टी इस देश के मुख्यधारा की पार्टियों में पूरी ताकत के साथ शामिल हो गई है ।और इसका श्रेय श्री नरेंद्र मोदी को सौ फीसद दिया जाना चाहिए । जनादेश
Wednesday, February 4, 2015
यह चुनाव जिताने का नहीं ' हराने ' का है
यह चुनाव जिताने का नहीं ' हराने ' का है
अंबरीश कुमार
पिछले दस दिन में दिल्ली का चुनाव एकतरफा होता नजर आ रहा है ।इस चुनाव में केजरीवाल को जिताने से ज्यादा मोदी को हराने की ध्वनि सुनाई पड रही है ।अब ये तो नतीजे ही बताएंगे कि मोदी नसीब वाले है या इस चुनाव बाद ' बदनसीब ' बन जाएंगे। सर्वेक्षण तो केजरीवाल को अगला मुख्यमंत्री बना चुके है तो साथ ही मोदी की हार की भविष्यवाणी कर रहे है ,पर सर्वेक्षण पर हम लोगों का भरोसा कम ही होता है ।इसलिए दस तक का इन्तजार करना चाहिए ।पर आम लोगों का जो मूड समझ में आ रहा है और भाजपा के दिग्गज नेता जिस अंदाज में केजरीवाल के खिलाफ अभियान छेड़े हुए है उससे पार्टी की घबराहट सार्वजनिक होती जा रही है ।पार्टी की दिल्ली इकाई पहले से अलग थलग पड चुकी है और कार्यकर्त्ता भ्रमित और पस्त है । मोदी ने जिस तरह मोहल्लो मोहल्लो में भाषण दिया है उससे यह चुनाव फिर केजरीवाल बनाम मोदी बन गया है ।किरण बेदी अब हाशिए पर है और आलाकमान ने बोलती अलग बंद कर दी है ।योगेंद्र यादव ने सही कहा है कि अगर एक ढंग का लाइव इंटरव्यू किरण बेदी का प्रसारित हो जाए तो आप को पूर्ण बहुमत वैसे ही मिल जाएगा ।किसी प्रचार की जरुरत नही पड़ेगी ।वैसे भी आम आदमी पार्टी का प्रचार भाजपा ज्यादा कर रही है ,आप कम ।पर बहुत ध्यान से देखे दिल्ली में बहुत से राजनैतिक दल क्या कर रहे है । कांग्रेस हारी हुई लड़ाई लड़ रही है और भाजपा उसे ताकत देने में जुटी है ।कांग्रेस और गिरी तो भाजपा मुंह के बल गिरी नजर आएगी ।बाकी दल और उनके कार्यकर्त्ता भी एक साफ स्टैंड ले चुके है ।भाजपा को हारने का ,मोदी को हराने ।मुकाबले में आप है इसलिए जाहिर है वोट आप को ही जाएगा ।पर यह अन्य लोगों का यह वोट आप को जिताने से ज्यादा भाजपा को हराने का है ।आप को जिताने वाला वोट आप के तीस हजार कार्यकर्ताओं ने तैयार कर दिया है जिसमे नौजवान ज्यादा है ।झुग्गी झोपडी वाले ज्यादा है ,दलित और पिछड़े ज्यादा है जिन्हें आम आदमी पार्टी बहुत सी कमजोरियों के बाद अपनी नजर आती है । भाजपा ने नौ महीनों में जो किया उससे पार्टी अमीरों की पक्षधर नजर आने लगी है ,यह भाजपा के शीर्ष नेता भी समझ रहे है ।अडानी अंबानी और अन्य बड़े कारपोरेट घरानों का दस लाख का सूट पहनने वाले मोदी से क्या संबंध है यह सार्वजनिक हो चुका है ।गांव गरीब और आम आदमी मोदी के एजंडा से बाहर है ।वे तो कभी अंबानी के साथ दीखते है तो कभी अडानी के ।उन्हें फायदा पहुँचाने वाला भूमि अधिग्रहण अध्यादेश आ चुका है ।मजदूरों के खिलाफ रुख साफ़ हो चूका है । मोदी की राजनीति भी साफ़ हो चुकी है।और अहंकार भी ।देश ने पहला प्रधानमंत्री देखा जो गली मोहल्ले में एक सामान्य से नेता से मुकाबला कर रहा है और पसीने छूट रहे है ।दरअसल सिर्फ प्रचार प्रसार की राजनीति बहुत लंबी नहीं चलती और यही अप्रत्यक्ष मुद्दा भी है ।फिर जिस अंदाज में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को तरह तरह के मामले फंसाने और उलझाने का प्रयास किया गया उससे आम लोगों में नाराजगी भी बढ़ रही है ।काला धन लेकर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस हो या भाजपा जब चुनावी चंदे के मसले पर उस पार्टी को घेरने का प्रयास करे जो सब कुछ वेब साईट पर डाले हो तो मामला और हास्यास्पद हो जाता है ।इसलिए ज्यादातर लोग वोट के हथियार का इस्तेमाल मोदी को सबक सिखाने के लिए कर सकते है ।इसलिए यह चुनाव जिताने से ज्यादा हराने वाला नजर आता है ।जनादेश
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