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Wednesday, August 8, 2012

पुलिस ने मानसिक यातना दी -सीमा आजाद

अंबरीश कुमार
लखनऊ, ७ अगस्त । मानवाधिकार कार्यकर्त्ता सीमा आजाद को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने मानसिक रूप से प्रताड़ित किया था । यह जानकारी आज सीमा आजाद ने जनसत्ता से बात करते हुए दी । माओवादियों से संबंध और नक्सली साहित्य रखने के आरोप में गिरफ्तार की गई सीमा आजाद और विश्व विजय को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद मंगलवार को रिहा किया गया था । इनपर देशद्रोह का आरोप भी लगा जो देश के प्राक्रृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ संघर्ष कर रही थे । करीब ढाई साल जेल में बिताने वाली सीमा आजाद अब सबकुछ नए सिरे से शुरू करने जा रही है । हालत यह है कि इस समय उनकी पास संपर्क के लिए न तो कोई फोन है और न लैपटाप आदि । सीमा आजाद अब उन राजनैतिक बंदियों की लड़ाई शुरू करेंगी जो विभिन्न मामलों में उत्तर प्रदेश की जेलों में है । इस बीच पीयूसीएल ने ११ अगस्त से विभिन्न प्रदेशों की राजधानी में जल जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वालों पर देशद्रोह और अन्य आपराधिक धाराएँ लगाने के खिलाफ अभियान छेड़ेगा जिसमे सीमा आजाद भी शरीक होंगी । गौरतलब है कि पांच फरवरी २०१० को दिल्ली के पुस्तक मेले से झोला भर किताबो के साथ इलाहाबाद लौट रही सीमा आजाद को पुलिस ने गिरफ्तार कर मार्क्स ,लेनिन और चेग्वेरा की पुस्तकों को माओवादी साहित्य बताकर जो जेल भेजा तो वे तबसे बाहर नही आ पाई और बाद में निचली अदालत ने न सिर्फ उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी बल्कि अस्सी हजार का जुर्माना भी ठोक दिया । इस सजा को सुनकर सभी हैरान थे क्योकि न कोई हथियार ,न कोई खून खराबा न कोई गंभीर जुर्म और आजीवन कारावास ।पर जेल से बाहर आने के बाद वे और मजबूरी के सरह संघर्ष के लिए तैयार है । भविष्य के बारे में पूछने पर सीमा आजाद का जवाब था -सही बात तो यह है कि हम जब प्रदेश की जेलों में बंद राजनैतिक बंदियों का सवाल उठाने की तैयारी में थे तभी मुझे भी गिरफ्तार कर लिया गया । हमने तो शुरुआती सर्वेक्षण भी किया था पर सब पर पानी फिर गया ,अब फिर से शुरू किया जाएगा । गिरफ्तारी के बाद पुलिस का और बाद में जेल का अनुभव कैसा था यह पूछने पर उनका जवाब था -गिरफ्तारी के बाद शारीरिक यातना तो नही दी गई पर मानसिक रूप से बहुत प्रताड़ित किया गया । जेल में भी काफी संघर्ष करना पड़ा । अख़बार बहुत मुश्किल से मिलना शुरू हुआ । जो कुछ वहा लिखा वह जेल क अफसरों ने संभवतः खुद ही रख लिया आगे नहीं भेजा । जो लिखा गया उसकी भी पड़ताल की जाती । बाहर से जो पत्र आता वह भी नहीं मिलता । जेल में महिला बंदियों की स्थिति कैसी है के जवाब में सीमा ने कहा -महिला बैरक में भी बहुत ख़राब हालत है । औसतन साठ सत्तर बंदी रहती है पर बुनियादी सुविधाएँ भी न की बराबर है । संख्या के लिहाज से टायलट बहुत कम है । वहां भी बहुत सी महिला बंदी ऎसी है जो जमानत न मिलने की वजह से जेल में है । उनकी यह स्थिति नहीं कि अदालत जा सके हाईकोर्ट जाना तो बहुत बड़ी बड़ी बात है । यह बहुत ही गंभीर सवाल है जिनकी बारे में मानवाधिकार संगठनों को आगे आना चाहिए । इस बीच कुछ संगठन भारत छोड़ो आंदोलन की 70वीं सालगिरह के मौक़े पर कल 9 अगस्त से लखनऊ में जनद्रोही क़ानूनों और राज्य दमन के ख़िलाफ़ साझा दस्तक देने जा रहे है । सांस्कृतिक संगठन दख़ल की पहल पर आयोजित हो रहे इस सात दिवसीय कार्यक्रम का समापन स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त को होगा। कार्यक्रम का मक़सद है- जनद्रोही क़ानूनों और राज्य दमन के ख़िलाफ़ लोगों को जगाना और जोड़ना, सच्ची आज़ादी के लिए आवाज़ बुलंद करना। कार्यक्रम का नारा है- देशभक्ति का स्वांग बंद करो, जनद्रोही क़ानून रद्द करो, पिंजरा खोलो, जनता को आज़ादी दो।कार्यक्रम के साझीदारों में राष्ट्रीय स्तर पर गठित काला क़ानून एवं दमन विरोधी मंच और सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच के अलावा अमुक आर्टिस्ट ग्रुप, भारतीय जन संसद, इंडियन वर्कर्स कौंसिल, इनसानी बिरादरी, क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच, मज़दूर परिषद आदि जनपक्षधर संगठन शामिल हैं।इस साझा कार्यक्रम का पहला पड़ाव धरना स्थल होगा जहां 9 अगस्त को शाम 3 से 5 बजे तक नुक्कड़ सभा होगी। सभा में शायर तश्ना आलमी अपना कलाम भी पेश करेंगे। 15 अगस्त को कार्यक्रम का समापन भी धरना स्थल पर होगा। बाक़ी पांच दिन शहर के विभिन्न इलाक़ों में नुक्कड़ सभाएं होंगी। jansatta

Tuesday, August 7, 2012

जनसत्ता' ने बहुत साथ दिया -सीमा आजाद

अंबरीश कुमार
सीमा आजाद अब उन राजनैतिक बंदियों की लड़ाई शुरू करेंगी जो विभिन्न मामलों में उत्तर प्रदेश की जेलों में है । सीमा आजाद ने आज इस संवाददाता से बात करते हुए यह जानकारी दी । सीमा कल ही जेल से बाहर आई है । आज सुबह उनसे बात हुई तो कई महत्वपूर्ण जानकारी भी मिली । जेल में किस तरह का व्यवहार हुआ यह भी बताया । करीब ढाई साल का समय जेल में गुजारने वाली सीमा आजाद अब नए सिरे से अपना जीवन शुरू करने जा रही है । फिलहाल न उनके पास कोई कंप्यूटर है और न फोन । कैसे संपर्क कर रही है यह पूछने पर जवाब था -फिलहाल पापा के फोन से बात हो रही है । बातचीत लंबी हुई जिसे लिख रहा हूँ । पर सीमा आजाद ने यह जरुर कहा -'इस लड़ाई में आपने आर आपके अख़बार 'जनसत्ता ' ने बहुत साथ दिया जब सब साथ छोड़ चुके थे । लखनऊ आना है और आपसे मुलाकात भी करनी है । ' चितरंजन सिंह के मुताबिक इस मामले में लदी गई लड़ाई में जनसत्ता की ख़बरों का हवाला भी दिया गया था । गौरतलब है कि पांच फरवरी २०१० को दिल्ली के पुस्तक मेले से झोला भर किताबो के साथ इलाहाबाद लौट रही सीमा आजाद को पुलिस ने गिरफ्तार कर मार्क्स ,लेनिन और चेग्वेरा की पुस्तकों को माओवादी साहित्य बताकर जो जेल भेजा तो वे तबसे बाहर नही आ पाई और बाद में निचली अदालत ने न सिर्फ उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी बल्कि अस्सी हजार का जुर्माना भी ठोक दिया । इस सजा को सुनकर उत्तर प्रदेश के जन संगठन और बुद्धिजीवी हैरान थे । न कोई हथियार ,न कोई खून खराबा न कोई गंभीर जुर्म और सारा जीवन जेल में ।मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को मानना है कि उत्तर प्रदेश में जहाँ ज्यादातर माफिया और बाहुबली हत्या जैसे गंभीर मामलों में बरी कर दिए जा रहे हो वह झोला भर किताब के नाम पर आजीवन कारावास की सजा न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है । ठीक विनायक सेन की तरह सीमा आजाद को भी सजा सुनाई गई थी ।

Monday, August 6, 2012

यह जश्न का नहीं संघर्ष तेज करने का समय है

अंबरीश कुमार लखनऊ,६ अगस्त ।मानवाधिकार कार्यकर्त्ता
की जमानत के बाद उत्तर प्रदेश में उन राजनैतिक बंदियों की उम्मीद बढ़ गई है जो देशद्रोह या इससे मिलते जुलते अपराध के चलते जेल में है । सीमा आजाद और विश्वविजय की जमानत मिलने के बाद प्रदेश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद हो गए है और वे अब इस संघर्ष और आगे बढ़ने जा रहे है ।सीमा आजाद को लेकर उत्तर प्रदेश से लेकर देश के कुछ हिस्सों में आंदोलन चला था । पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने कहा -यह जश्न का नहीं संघर्ष तेज करने का समय है ,सीमा आजाद को अभी सिर्फ जमानत मिली है और जबतक मुकदमा ख़त्म न हो जाए लडाई जारी रहेगी । यह मामला एक नजीर बनेगा जिससे अन्य राजनैतिक बंदियों की रिहाई का रास्ता साफ़ हो सकता है । मानवाधिकार कार्यकर्ताओ का यह आरोप है कि सीमा आजाद को जमानत दिए जाने और आजीवन कारावास की सजा पर रोक लगाये जाने से यह भी साफ़ हुआ कि निचली अदालते पुलिस की जाँच पड़ताल को अंतिम सत्य मानकर चलती है जिससे बेगुनाह को भी सजा हो सकती है । गौरतलब है कि मिर्जापुर से लेकर वाराणसी तक की जेलों में सौ से ज्यादा राजनैतिक बंदी सालों से बंद है । नक्सली आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किये गए इन बंदियों में ज्यादातर बेगुनाह है पर इनकी जमानत लेने वाला कोई नहीं है । परिवार ने साथ छोड़ा और जिस संगठन के नाम पर ये बदलाव की राजनीति करने निकले उसने भी किनारा कर लिया । नक्सल आंदोलन के नाम पर प्रदेश के विभिन्न जेल में सौ से ज्यादा लोग सालों से पड़े है जिसमे महिलाएं भी शामिल है । मिर्जापुर जेल में बंद सोमरी उर्फ बबिता ,सरिता चेरो और कुसुम आदि इसका उदाहरण है । नौजवानों के बीच सीमा आजाद की रिहाई की मुहिम चलने वाले मानवाधिकार कार्यकर्त्ता शाहनवाज और राजीव यादव ने कहा -पिछली सरकार के कार्यकाल में अगर कोई मुस्लिम फंसा तो उसे आतंकवादी और हिन्दू फंसा तो उसे माओवादी घोषित करने में जरा भी देर नहीं की जाती थी । दुर्भाग्य तो यह रहा कि मीडिया का एक हिस्सा भी पुलिस की जबान बोलता नजर आया था । दूसरी तरफ मायावती सरकार के राज में कई माफिया जो गंभी आपराधिक मामलो में फंसे थे उन्हें धीरे धीरे बरी किया गया । सीमा आजाद के मामले में पुलिस ने शुरू से ही गुमराह करने का काम किया था ।दिल्ली के पुस्तक मेले से वामपंथी धारा की पुस्तके लेकर आने की वजह से उन्हें इलाहाबाद में गिरफ्तार किया गया था । तब इलाहाबाद के डीआईजी प्रेमप्रकाश से यह पूछने पर कि सीमा को क्यों गिरफ्तार किया है, जवाब था -वो देश विरोधी हैं और माओवाद समर्थक हैं और उनके पास से माओवादी साहित्य मिला है । मार्क्स ,लेनिन और चेग्वेरा की पुस्तकों को हर जगह पढ़ाया जाता है पर उत्तर प्रदेश के पुलिस विभाग के अफसर यह नहीं जानते । दुर्भाग्य तो यह है कि पुलिस के वे लोग जो माओवाद विरोधी अभियान की कमान संभाले है उन्हें न तो वामपंथियों के वैचारिक मतभेद का पता है और न यह पता कि वामपंथ की कौन सी धारा हिंसा के विरोध में है । पर सीमा आजाद का मामला अलग था और गिरफ्तारी से पहले वह पूर्वांचल में प्राकृतिक संसाधनों की लूट और घोटालों पर लिख चुकी थी जिससे पुलिस का एक तबका नाराज था । सीमा की गिरफ्तारी के बाद एक पुलिस अफसर से बात हुई तो उसका जवाब था -जाँच अधिकारी जब आरोप पत्र दाखिल कर दे तो अदालत भी कुछ नहीं कर सकती । यह टिपण्णी बताती है कि मौजूदा कानून व्यवस्था में पुलिस का अर्थ क्या है और यही वजह है कि दर्जनों बेगुनाह राजनैतिक बंदी आज भी जेल में है ।

Tuesday, June 19, 2012

सीमा आजाद के लिए तेज हुआ अभियान ,अखिलेश यादव को देंगे पुलिस की फर्जी कहानी का ब्यौरा

लखनऊ , जून। सीमा आजाद और अन्य राजनैतिक बंदियों की रिहाई के लिए उत्तर प्रदेश में अभियान तेज हो गया है । आज इलाहाबाद में इस मुद्दे को लेकर विभिन्न जन संगठनों की एक बैठक उस जगह होने जा रही है जहाँ चंद्रशेखर आजाद की शहादत हुई थी तो बुधवार को लखनऊ के प्रेस क्लब में कई संगठन इस सवाल पर जन दबाव बनाने जा रहे है । इस मुद्दे को लेकर प्रदेश और देश के विभिन्न जन संगठन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी गुहार लगाने जा रहे है ।यह जानकारी पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने दी ।छब्बीस जून के कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री से एक प्रतिनिधिमंडल मुलाकात कर उन हालात की जानकारी देगा जिनके चलते पुलिस ने बेगुनाह सीमा आजाद और अन्य को न सिर्फ फंसाया गया बल्कि आजीवन कारावास की सजा तक दिला दी गई । फैसले में किस तरह के अंतर्विरोध सामने आए है इसका ब्यौरा बना कर मुख्यमंत्री को भी दिया जाएगा । छब्बीस जून के अभियान में अब वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर और जस्टिस राजेंद्र सच्चर भी शिरकत करेंगे । गौरतलब है कि मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की सांगठनिक सचिव और युवा पत्रकार सीमा आजाद को उनके जीवन साथी विश्वविजय के साथ 6 फरवरी 2010 को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन पर लगभग उन्ही धाराओं में आरोप लगाया गया है जिन धाराओं में डाक्टर विनायक सेन को आरोपित किया गया था। यानी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इन्डिया माओवादी का सदस्य होना और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना। इसके अलावा कुछ अन्य धाराओं में भी आरोप लगाए गए हैं। सीमा आजाद कि रिहाई के लिए अभियान चला रहे चितरंजन सिंह और साहित्यकार नीलाभ ने कहा -डा. विनायक सेन तो रिहा हो चुके हैं लेकिन सीमा और विश्वविजय को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी है और उनपर जुर्माना भी ठोंक दिया गया है। शायद यह उन बिरले मामलों में से ही होगा जिनमें इन धाराओं के तहत आरोपित व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी है। स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह की सरकार उन सभी से बदला ले रही है जो उनकी नीतियों से सहमत नहीं हैं। यह बात ध्यान देने की है कि ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है कि सीमा आजाद और विश्वविजय किसी भी समय हथियारों या विस्फोटकों की कार्यवाइयों में लिप्त रहे हों। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यही है कि वे अपनी रजिस्टर्ड द्वैमासिक पत्रिका ‘दस्तक’ के माध्यम से सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे थे और गंगा एक्सप्रेस वे और आपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ अभियान छेड़े हुए थे थे। प्रदेश की तत्कालीन सरकार किस तरह सीमा आजाद को दोषी सिद्ध करने के फ़िराक में थी इसका ब्यौरा तैयार किया गया है जो मुख्यमंत्री को भी बताया जाएगा । जिसके मुताबिक फैसले के पृष्ठ नम्बर 57 पर यह स्पष्ट उल्लिखित है कि रिमाण्ड के दौरान जिस सामग्री की बरामदगी की गयी थी और उसे सीलबन्द किया गया था, उसे पुलिस स्टेशन में बिना कोर्ट की अनुमति के ‘अध्ययन के उद्देश्य से’ पुनः खोला गया। लेकिन दुर्भाग्य से कोर्ट ने इस प्रक्रिया में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं पाया। यह भी उल्लेखनीय है कि रिमाण्ड को दो बार अदालत द्वारा अस्वीकार किया गया और अन्ततः जब रिमाण्ड दिया गया तो यह गैरकानूनी तरीके से हुआ। इसमें उन सभी कानूनों का उल्लंघन हुआ जो किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को रिमाण्ड पर लेने के लिए कानून द्वारा तय हैं। अदालत ने इस स्पष्ट गैर कानूनी काम को क्यों होने दिया। क्या यह इसलिए था कि एफआईआर के बाद पुलिस ने जिन मनगढ़न्त और झूठे साक्ष्यों का उल्लेख किया था उनको रिमाण्ड के दौरान तथाकथित बरामदगी के रूप में पेश किया जा सके? सीमा के मोबाइल काल डिटेल्स को अदालत में पेश किया गया। लेकिन उनमें सिर्फ 5 फरवरी 2010 तक का ही ब्योरा था। उनमें उसकी गिरफ्तारी के दिन यानी 6 फरवरी 2010 की काॅल डिटेल्स का कोई ब्योरा नहीं है। सवाल यह है कि काल डिटेल्स को जान-बूझ कर क्यों छिपाया गया। यदि 6 फरवरी की काल डिटेल्स को अदालत में प्रस्तुत किया जाता तो इस तथ्य की पुष्टि हो जाती कि सीमा और विश्वविजय को, सीमा के नई दिल्ली से रीवा एक्सप्रेस द्वारा 6 फरवरी को सुबह 11.45 बजे इलाहाबाद उतरते ही गिरफ्तार कर लिया गया था। यानी 6 फरवरी को दोपहर 2.30 बजे हीरामनि की गिरफ्तारी के बहुत पहले। पुलिस यह कहानी क्यों गढ़ रही है कि हीरामनि द्वारा पुलिस को सीमा और विश्वविजय के बारे में दी गयी सूचना के बाद उन्होंने सीमा और विश्वविजय को 6 फरवरी को रात 9.30 बजे गिरफ्तार किया। पुलिस की क्या मजबूरी थी कि उसने जान-बूझ कर 6 फरवरी 2010 की काल डिटेल्स को छिपाया। इस तरह और भी कई तथ्य है जिससे मुख्यमंत्री को अवगत कराया जाएगा । खास बात यह है कि सीमा आजाद की गिरफ्तारी के समय समाजवादी पार्टी ने इसका पुरजोर विरोध भी किया था इसलिए मानवाधिकार संगठनों को उम्मीद है अखिलेश यादव इसे गंभीरता से लेंगे । जनसत्ता

Wednesday, June 13, 2012

उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद है सौ से ज्यादा बेगुनाह राजनैतिक बंदी

अमीर बनाम गरीब में बदलती मानवाधिकार की लड़ाई का ठीकरा बेगुनाहों पर अंबरीश कुमार लखनऊ,13 जून ।मिर्जापुर से लेकर वाराणसी तक की जेलों में सौ से ज्यादा राजनैतिक बंदी सालों से बंद है । इनमे से ज्यादातर बेगुनाह है पर जेल से बाहर नही आ सकते क्योकि न इनकी कोई पैरवी करने वाला है और न जमानतदार । यह मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वालों का दूसरा पहलू है जो आज अमीर बनाम गरीब में बदल चुकी है जिसका खामियाजा कई बेगुनाह भुगत रहे है ।अब इनकी आवाज उठाने का एक और बड़ा प्रयास आपातकाल की सालगिरह २६ जून को सम्मलेन के रूप में दिल्ली से होने जा रहा है जो बाद में इलाहबाद से लेकर लखनऊ तक फैलेगा । राजनैतिक बंदियों का यह मुद्दा सीमा आजाद के चलते नए सिरे से उठने जा रहा है जिसमे छात्र ,शिक्षक ,रंगकर्मी ,साहित्यकार ,पत्रकार ,मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और जन संगठनों के कार्यकर्त्ता शामिल होंगे । प्रदेश के विभिन्न जेल में बंद इन राजनैतिक बंदियों की संख्या भी कम नही सौ से ज्यादा है जिसमे महिलाएं भी शामिल है । सिर्फ मिर्जापुर जेल में पचास से ज्यादा बंदी ऐसे है जिन्हें नक्सली बताकर जेल में डाल दिया गया तो सालों से वे वही पड़े है । मानवाधिकार संगठन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक वाराणसी और मिर्जापुर जेल में सौ से ज्यादा ऐसे बंदी है जिन्होंने कोई संगीन अपराध नहीं किया पर एक खास राजनैतिक धारा के प्रभाव में आकर राजनैतिक गतिविधियों से जुड गए ।इनमे ज्यादातर आदिवासी है जिनपर देशद्रोह वाली धारा लगा दी गई । पर न इन्होने कभी अरुंधती राय कि भाषा बोली और न कभी जन अदालत लगाकर सजा दी । अब इस पूरे अंचल में न तो माओवाद बचा और न माओ के समर्थक । पर यह लोग भगत सिंह से लेकर मार्क्स लेनिन को पढ़ने पढाने से लेकर माओ की राजनैतिक रणनीति पर चलने के लिए प्रेरित करने की वजह से जेल में है । दुर्भाग्य यह है कि माओ और माओवादियों की रणनीति पर चलते हुए ये एक इंच जमीन तो मुक्त करा नही पाए पर अपनी जमीन और परिवार खो बैठे है । वर्ष २००६ में एमसीसी की गुरिल्ला विंग कि सदस्य कंचन को पुलिस ने गिरफ्तार किया और उसे खतरनाक नक्सली बताया । वैसे पुलिस ऐसे मामलो में जिसे भी गिरफ्तार करती है उसे काफी खतरनाक बताती है । बाद में यह खुशनसीब थी कि जमानत मिल गई पर पता चला बंदूक थमने वाली यह महिला सोनभद्र में गिट्टी तोड़कर अपना गुजर कर रही थी । इसी तरह एमसीसी की सविता मजदूरी पर मजबूर थी तो चंपा को दोतरफा हिंसा का सामना करना पड़ा और वह बदहाल जीवन गुजर रही है । ये मजदूरी करने को मजबूर महिलाएं देश के लिए किस तरह और कितना बड़ा खतरा बन गई यह कोई नही बताता । यह बानगी है देशद्रोह जैसी धाराओं में गिरफ्तार महिलाओं की । इनकी सूची लंबी है । सोनभद्र से विजय विनीत के मुताबिक मिर्जापुर जेल में सोमरी उर्फ बबिता ,सरिता चेरो और कुसुम बंद है । चंदौली की सुषमा और पुष्पा वाराणसी जेल में है तो इसी जिले की किरण और सुमन बिहार के रोहतास व जहानाबाद जेल में बंद है । वजह जमानत नही मिल रही और कोई पैरवी वाला भी नही है । इनकी लड़ाई लड़ने न तो माओवादी समर्थक आते है न कोई एनजीओ और न अंतरष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन । विनायक सेन की लड़ाई लड़ने देश के ढेर सरे एनजीओ से लेकर आभिजात्य वर्गीय मानवाधिकार एक्टविस्ट उतर आए थे क्योकि विनायक सेन भद्र समाज के भद्र पुरुष थे जिनकी अंतर्राष्ट्रीय साख थी । पर सोनभद्र चंदौली की सविता ,बबीता और इलाहाबाद की सीमा के लिए कोई बड़ा नाम सामने नही आया क्योकि वह आभिजात्य वर्गीय समाज की नही है । पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने इस बात से सहमती जताते हुए कहा -जिस तरह विनायक सेन की पैरवी में देश के ज्यादातर एनजीओ और भद्र समाज के लिए लोग जुटे वैसा समर्थन सीमा आजाद समेत गरीब तबके के राजनैतिक एक्टिविस्टों को नही मिला ,यह सच है ।यह पूछने पर कि क्या सीमा आजाद के मामले पर अरुंधती राय से कोई समर्थन मिला उनका जवाब था -उनसे बात करने का प्रयास किया गया पर उन्होंने फोन नहीं उठाया । मानवाधिकार की लड़ाई में इस तरह का भेदभाव पहली बार दिख रहा है ।और तो और खुद विनायक सेन ने केंद्र सरकार की समिति से जुडने के बाद कभी सीमा आजाद के मुद्दे पर कोई पहल नही की । यही वजह है कि मानवाधिकार संगठनों की साख भी संकट में है । जन संघर्ष मोर्चा के संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह तो इसे मानवाधिकार का सवाल तक नहीं मानते । जनसत्ता से बात करते हुए अखिलेन्द्र ने कहा -यह अब मानवाधिकार संगठनों के बस का सवाल भी नही है बल्कि राजनैतिक सवाल है और राजनैतिक ढंग से हल भी किया जा सकता है । अब बहस यह होनी चाहिए कि राज्य सत्ता के खिलाफ कोई संघर्ष किस तरह देशद्रोह की श्रेणी में आ जाएगा । अब तो देशद्रोह की परिभाषा पर भी बहस होनी चाहिए । चंदौली ,सोनभद्र और वाराणसी में अब कोई माओवादी बचा ही नही है ज्यादातर लोग मुख्यधारा की राजनीति से जुड चुके है । राजनाथ सिंह के राज में नक्सलियों के खिलाफ एक के बदले चार मारो का नारा दिया गया और श्रीराम सेना तक आ गई । पर बाद में वह बड़ा बदलाव भी हुआ और आज यह अंचल माओवाद से मुक्त है ।ऐसे में जेल में बंद आदिवासी नौजवानों को अखिलेश यादव सरकार को रिहा करना चाहिए । राज्य में पिछली सरकार के समय आतंकवाद के नाम मुसलमान और माओवाद के नाम आदिवासी नौजवानों को फंसाया गया । कई जो सरेंडर करना चाहते थे वे मुठभेड के डर से भाग गए । गौरतलब है कि मायावती सरकार के राज में कई माफिया जो संगीन मामलो में फंसे थे धीरे धीरे बरी होते गए । पर सीमा आजाद के में पुलिस ने जो किया वह तो किया ही जो जज इस मामले को दो साल से देख रहे थे उन्हें अंतिम समय ने तबादला कर बदायूं भेज दिया गया । चितरंजन सिंह का साफ़ आरोप है कि यह सब सरकार के इशारे पर हुआ । अगर सीमा आजाद बरी हो जाती तो पुलिस की कार्यवाई पर सवाल उठता । आलोचक वीरेंद्र यादव का मानना है कि सीमा आज़ाद और विश्वविजय को देशद्रोह के अपराध में आजन्म कारावास की सजा के खिलाफ देश में तेजी से जनमत बन रहा है पर इस मुहिम को भी उसी तरह बनाने जरूरत है जैसे विनायक सेन के लिए किया गया था ।किसान मंच के विनोद सिंह ने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने कि अपील की है क्योकि सीमा आजाद को बेगुनाह होने के बावजूद नौकरशाही ने फंसाया है । इस बीच जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के उत्तर प्रदेश इकाई की मांग है कि सीमा आज़ाद और विश्वविजय की रिहाई हो और उनपर लगे झूठे मुकदमे खारिज किए जाएँ। सीमा आज़ाद, अनेक सालों से एक प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता रही हैं और सम्मानजनक संगठनों जैसे कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (उत्तर प्रदेश इकाई) के साथ जुड़ कर सामाजिक न्याय से जुड़े अनेक मुद्दों पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय के ऊपर झूठे मुकदमे थोपने से साफ ज़ाहिर है कि सरकार कैसे अपने खिलाफ उठ रही आवाज़ों पर अंकुश लगाना चाहती है।अधिवक्ता आरके जैन, डॉ संदीप पांडे, रोमा, एसआर दारापुरी , अरुंधति धुरु, अशोक चौधरी, राजीव यादव, शांता भट्टाचार्य, रिचा सिंह, शाहनवाज़ आलम, आदि ने इस मुद्दे पर देश भर में आंदोलन का एलान किया है । इन लोगो ने अखिलेश यादव सरकार से इस मामले में फ़ौरन ठोस कदम उठाने की अपील की है । जनसत्ता

Monday, June 11, 2012

सीमा आजाद के खिलाफ अपराधिक मामले सरकार वापस ले -- जन संगठनों ने कहा

लखनऊ 11 जून । मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और पत्रकार सीमा आजाद को लेकर उत्तर प्रदेश के बुद्धजीवियों व जनसंगठनों ने अखिलेश सरकार को इसमें तत्काल दखल देने कि मांग की है । इन जन संगठनों ने सरकार से सीमा आजाद पर लगाए गए सभी अपराधिक मामलों को फ़ौरन वापस लेने की मांग की है । तहरीके निसवां की अध्यक्ष ताहिरा हसन ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि सीमा आजाद और अन्य लोगों पर से अपराधिक मामला वापस लिया जाए। उन्होंने कहा कि सीमा आजाद कोई अपराधी नहीं हैं वह एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता व पत्रकार हैं । राजनैतिक कार्यकर्त्ता अफलातून ने भी सीमा आजाद पर लगाए गए सभी आरोपों को वापस लेने कि मांग की है। इस बीच देश व प्रदेश के सामाजिक और राजनैतिक व बुद्धजीवियों को लेकर सीमा आजाद की रिहाई के लिए एक मंच बनाकर अभियान छेड़ने की तैयारी शुरी हो गई है । इस मुद्दे को अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल से जोड़कर पहल की जा रही है। इस बीच पीयूसीएल नेता और इलाहाबाद हाईकोर्ट के चर्चित वकील रवि किरन जैन इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि सीमा और विश्वविजय के पास से कुछ कागजों के सिवाय अभियोजन पक्ष कुछ भी नहीं दिखा पाया। बावजूद इसके निचली अदालत ने उन्हें उम्र कैद सुना दी। इससे यही साबित होता है कि न्यायालय में अब कार्यपालिका से भी ज्यादा कार्यपालिका वाली मानसिकता पनप रही है। जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। कानून व विधि कि जानकर नीलाक्षी सिंह ने कहा कि इस पूरे मामले ने देशद्रोह के कानून पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। विदित हो यह कानून अंग्रेजों द्वारा भारतीय जनता के प्रतिरोध के नंगे दमन के लिए बनाया गया सबसे कुख्यात कानून है। इस कानून का आजादी मिलने के बाद भी कायम रहना एक विडंबना ही है। गाँधी और तिलक को इसी कानून के तहत दोषी ठहराया गया था। गाँधीजी ने कहा था कि इस कानून ने न्याय को शासकों की रखैल बना दिया है और यह कानूनी अन्याय का प्रतीक है। नेहरू का भी मानना था कि हमें जितनी जल्दी हो सके इस कानून से छुटकारा पा लेना चाहिए। हाल ही में विनायक सेन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि किसी भी विचारधारा से जुड़ी किताबें किसी के घर में मिलना देशद्रोह नहीं हो सकता। अगर किसी के घर से महात्मा गांधी की जीवनी मिलती है तो वह व्यक्ति गांधीवादी नहीं मान लिया जायेगा. इसी प्रकार नक्सल साहित्य रखने से कोई नक्सली नहीं हो जाता। सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहाँ तक कहा है कि नक्सलियों से सहानुभूति रखना भी राष्ट्रद्रोह नहीं हो सकता। दुख की बात है कि इस समय सरकारी दमन का विरोध करने वालों को देशद्रोही कहने का एक माहौल बना दिया गया है। मौजूदा न्यायपालिका भी इसी लुटेरी व्यवस्था का एक अंग बन कर रह गई है। न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। लेकिन अफसोस कि सेशन कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, न्यायपालिका के सभी स्तम्भ इस भ्रष्ट व्यवस्था के रवाँ तरीके से चलने को ही सुनिश्चित करते नजर आते हैं। जनसंघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा - सवाल लोकतांत्रिक अधिकार का है जो किसी को भी किसी विचारधारा का हिमायती होने का अधिकार देता है। इसलिए इस मामले को सिर्फ एक पत्रकार या मानवाधिकार नेता की गिरफ्तारी और सजा के बतौर ही नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे राज्य का किसी भी राजनीतिक विचारधारा को मानने की आजादी पर हमला माना जाना चाहिए । जिसमें बहुजन समाज पार्टी और सपा दोनों ही हुकूमतों में आम सहमति है। उन्होंने कहा कि इन दोनों पार्टियों के शासन में सोनभद्र में अनगिनत आदिवासी माओवादी होने के फर्जी आरोप में बंद किए गए थे। वहीं इस मसले पर प्रदेश व्यापी अभियान चलाने की तैयारी कर रहे मानवाधिकार नेता शाहनवाज आलम व राजीव यादव ने कहा कि इस फैसले के बाद राज्य और राज्य के बाहर के कई मानवाधिकार नेताओं और सगठनों से विचार विमर्श किया जा रहा है। जल्द ही एक साझा मोर्चा बनाकर इस मसले को सपा सरकार के समक्ष उठाया जाएगा। नेताओं ने कहा कि पिछली सरकार की लोकतंत्र विरोधी और दमनकारी नीतियों से उपजे आक्रोश के चलते सत्ता में आई सपा सरकार में सीमा और विश्वविजय जैसे युवा सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार का जेल में बंद रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। शाहनवाज आलम व राजीव यादव ने कहा कि सरकार के लिए यह शर्मनाक है कि एक तरफ सरकार डिंपल यादव को लोकसभा में भेजकर इसे महिला सशक्तीकरण के बतौर प्रचारित कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ सीमा जैसी जुझारु और प्रतिभावान पत्रकार जो समाज को नई दिशा दे रही थी उसको जेल में कैद कर दिया । मानवाधिकार नेताओं ने याद दिलाया कि पिछली बसपा सरकार के समय सीमा आजाद की गिरफ्तारी को उस समय सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताते हुए इसके लिए बसपा सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।जनसत्ता

Sunday, June 10, 2012

झोलाभर किताबे खरीदने की सजा आजीवन कारावास !

सीमा आजाद को आजीवन कारावास के खिलाफ देशभर में अभियान चलेगा अंबरीश कुमार लखनऊ ,१० जून । मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और पत्रकार सीमा आजाद को आजीवन कारावास के खिलाफ देशभर में अभियान चलेगा । पांच फरवरी २०१० को दिल्ली के पुस्तक मेले से झोला भर किताबो के साथ इलाहाबाद लौट रही सीमा आजाद को पुलिस ने गिरफ्तार कर मार्क्स ,लेनिन और चेग्वेरा की पुस्तकों को माओवादी साहित्य बताकर जो जेल भेजा तो वे तबसे बाहर नही आ पाई और अब निचली अदालत ने न सिर्फ उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुना दी बल्कि अस्सी हजार का जुर्माना भी ठोक दिया । इस सजा को सुनकर उत्तर प्रदेश के जन संगठन और बुद्धिजीवी हैरान है । न कोई हथियार ,न कोई खून खराबा न कोई गंभीर जुर्म और सारा जीवन जेल में ।मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को मानना है कि उत्तर प्रदेश में जहाँ ज्यादातर माफिया और बाहुबली हत्या जैसे गंभीर मामलों में बरी कर दिए जा रहे हो वह झोला भर किताब के नाम पर आजीवन कारावास की सजा न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है । ठीक विनायक सेन की तरह सीमा आजाद को भी सजा सुनाई गई है । पीयूसीएल के सचिव चितरंजन सिंह ने जनसत्ता से कहा -यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और इस मुद्दे को लेकर तेरह जून को दिल्ली में बैठक बुलाई गई है जिसमे मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और बुद्धिजीवी हिसा लेंगे और आगे की रणनीति तैयार की जाएगी । देश के विभिन्न राज्यों में इस मुद्दे को लेकर आंदोलन किया जाएगा । गौरतलब है कि सीमा आजाद के मुद्दे पर खुद विनायक सेन ने इस संवाददाता से कहा था - सीमा आजाद पीयूसीएल में हमारी सहयोगी रही है और मैं इस मुद्दे पर पहल करूँगा ।पर विनायक सेन इस दिशा में ज्यादा कुछ नही कर पाए । सीमा आजाद की गिरफ्तारी उस समय हुई जब वे दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला देखने के बाद कुछ पुस्तकें लकर लौट रही थी। इलाहाबाद की पुलिस को इन पुस्तकों में माओवाद भी नजर आया जिसके बाद कई माओवादी कमांडरों से संपर्क आदि तलाश कर पुलिस ने वे सभी धाराएं लगा दी, जिससे जमानत न मिलने पाए। पीयूसीएल ने सीमा आजाद की गिरफ्तारी और राजद्रोह की धारा 124 ए को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी। गौरतलब है कि कई राज्यों में पुलिस आमतौर पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादियों का मुखौटा मानती है । छत्तीसगढ़ में पुलिस ने करीब आधा दर्जन पत्रकारों की सूची बनी है जिन्हें वह माओवादियों का समर्थक मानती है। उत्तर प्रदेश में जब मायावती सत्ता में आई तब सोनभद्र में मानवाधिकार कार्यकर्त्ता रोमा को भी माओवादी बताकर उनपर एनएसए लगा दिया गया था पर जनसत्ता कि खबर के बाद मायावती ने उनपर से सारे फर्जी मामले हटवा दिए थे । जाने माने चित्रकार चंचल ने कहा -इलाहाबाद की पुलिस जिसे किताब (तथाकथित नक्सली साहित्य) से क्रान्ति का ख़तरा लग रहा है ,उसे इलाज की दरकार है ।यह बीमार महकमा है ।छतीसगढ़ में यह अंकित गर्ग बन कर सोनी सोरी के गुप्तांग में कंकड पत्थर डालता है ,इलाहाबाद में सीमा आजाद और विश्व विजय को किताब रखने के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा दिलवाता है ।लोंगो को 'हिंसा' की तरफ जाने के लिए यह पुलिस कितनी जिम्मेवार है ...? इसपर भारतीय विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में शोध किया जाना चाहिए ? राजनैतिक टीकाकार वीरेंद्र नाथ भट्ट ने कहा - उत्तर प्रदेश में शातिर अपराधी बारी हो जाते है और पुस्तक रखने के जुर्म में इतनी बड़ी सजा हैरान करने वाली है ।इस मामले में अखिलेश यादव से किसी ठोस पहल की उम्मीद है वर्ना उनमे और बाकी नेताओं में फर्क क्या रह जाएगा । मायावती सरकार ने तो कई अपराधियों के खिलाफ डंके की चोट पर मुक़दमे वापस लिए गए तो दूसरी तरफ पुस्तक रखने के जुर्म में आजीवन कारावास दे तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है । जन संस्कृति मंच के कौशल किशोर ने कहा -आज ऐसी व्यवस्था है जहाँ साम्प्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कॉरपोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी, बाहुबली व माफिया सत्ता की शोभा बढ़ा रहे हैं ,सम्मानित हो रहे हैं, देशभक्ति का तमगा पा रहे हैं, वहीं इनका विरोध करने वाले, सर उठाकर चलने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, उनके लिए जेल की काल कोठरी और उम्रकैद है। यह लोकतांत्रिक अधिकार आंदोलन तथा इस देश में वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों के लिए बड़ा आघात है। जन संस्कृति मंच का मानना है कि सीमा आजाद को कोई भी राहत मिलनी है तो इसकी संभावना सुप्रीम कोर्ट से ही है क्योंकि देखा गया है कि शासन प्रशासन निचली अदालतों को प्रभावित करने में सफल हो रहे हैं । आज सरकारों के लिए माओवाद लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने.कुचलने का हथकण्डा बन गया है। जन आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर राज्य के खिलाफ हिंसा व युद्ध भड़काने, राजद्रोह, देशद्रोह जैसे आरोप आम होते जा रहे है। सामाजिक कार्यकर्त्ता और साहित्यकार वीरेंद्र यादव ने कहा -जनाधिकारके लिए समर्पित आन्दोलनों के साथ एकजुटता व् समर्थन व्यक्त करने वाले सभी बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए यह स्तब्धकारी समाचार है । राज्य की इस एकतरफा कारवाई के विरूद्ध प्रभावी जनमत बनाया जाना अत्यंत जरूरी है ।jansatta