Showing posts with label आंबेडकर. Show all posts
Showing posts with label आंबेडकर. Show all posts

Monday, May 14, 2012

कई और कार्टूनों को हटाने की मांग

वंदिता मिश्रा
नई दिल्ली, मई। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) की एक किताब में छपे डा. भीमराव आंबेडकर के कार्टून पर शुक्रवार को संसद के दोनों सदनों में खासा हंगामा हुआ था। बहरहाल, उस समय यही समझा गया था कि सांसदों का गुस्सा दलितों के मसीहा समझे जाने वाले आंबेडकर के प्रति कथित असम्मान के खिलाफ था। तमिलनाडु की एक दलित पार्टी विदुथलाई चिरुथइगल के सांसद थोल थिरुमावलवन ने पहली बार संसद का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकृष्ट किया। मायावती और रामविलास पासवान जैसे कद्दावर दलित नेताओं ने इस मुद्दे को लपकते हुए तीखा गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कार्टूनिस्ट और एनसीईआरटी की किताब में इस कार्टून को छापने की इजाजत देने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। संसद में हंगामे के अगले ही दिन पुणे स्थित एक दलित संगठन ने पुणे विश्वविद्यालय के परिसर में सुहास पलशीकर के दफ्तर में तोड़फोड़ की। हालांकि पाठ्यपुस्तकों में शैक्षणिक सामग्री छापने के जिम्मेदार एनसीईआरटी के दोनों मुख्य सलाहकारों पलशीकर और योगेंद्र यादव ने शुक्रवार को ही इस्तीफे दे दिए थे। सांसद एनसीईआरटी की किताबों में सिर्फ आंबेडकर के कार्टून पर ही नाराज नहीं हैं। कई और कार्टूनों को लेकर भी उनकी त्योरियां चढ़ी हुई हैं। वे जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे सवर्ण नेताओं और मनमोहन सिंह के कार्टूनों से भी नाराज हैं। आंबेडकर के कार्टून पर विवाद से कुछ दिन पहले ही बच्चों पर संसदीय फोरम के सदस्यों ने आठ मई को एनसीआईआरटी के पदाधिकारियों के साथ बैठक में पाठ्यपुस्तकों में छपे कई कार्टूनों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने एनसीईआरटी की किताबों के प्रकाशन के लिए जिम्मेदार लोगों और खासतौर से इसके अध्यक्ष, मुख्य सलाहकार, सलाहकार और संकाय के सदस्यों के साथ मई के तीसरे हफ्ते में मुलाकात का वक्त देने के लिए जोर डाला। इस फोरम का गठन मार्च, 2006 में किया गया था और इसमें दोनों सदनों के कुल 40 सदस्य शामिल हैं। लोकसभा के स्पीकर इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। हालांकि यह फोरम कोई आधिकारिक संसदीय संस्था नहीं है और ना ही इसके पास किसी व्यक्ति या दस्तावेज को तलब करने के अधिकार हैं। सामाजिक विज्ञान संकाय में शिक्षा विभाग की विभागाध्यक्ष सरोज यादव ने एनसीईआरटी की किताबों से संबद्ध एक पर्यवेक्षक को लिखी चिट्ठी में कहा था कि फोरम के कई सदस्य सांसद ऐसा महसूस करते हैं कि इन कार्टूनों में राजनीतिज्ञों के प्रति असम्मान दर्शाया गया है और उनकी गलत और नकारात्मक तस्वीर पेश की गई है। बैठक में कई सांसदों की राय थी कि स्कूली किताबों में राजनीतिज्ञों की नकारात्मक छवि पेश करने से कच्ची उम्र के बच्चों के मन में लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा घट सकती है और राजनीतिज्ञों के प्रति असम्मान या अविश्वास की भावना पनप सकती है। यादव की इस चिट्ठी की एक प्रति ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पास भी है। इसमें वे एक-दो कार्टूनों की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि शायद इन्हीं की वजह से सांसदों का गुस्सा भड़क उठा है और शायद इसीलिए वे तत्काल प्रभाव से इस तरह की चीजों को हटाने और इन किताबों के वितरण पर रोक लगाने की इच्छा जता रहे हैं। सांसदों की नाराजगी खासतौर से एनसीईआरटी की नौवीं कक्षा की राजनीति शास्त्र की किताब में छपे आरके लक्ष्मण के एक कार्टून को लेकर है। इसमें दिखाया गया है कि चुनाव से पहले नेता जनता से वोटों की भीख मांग रहे हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद अब जनता उनके सामने भीख मांग रही है। बैठक में सांसदों के साथ हुई चर्चा का सारांश देते हुए यादव ने लिखा है कि राजनीतिज्ञों का मानना है कि इस तरह की धारणाएं सच्चाई से परे हैं। लिहाजा इन्हें पाठ्यपुस्तकों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।इंडियन एक्सप्रेस

Sunday, May 13, 2012

प्रो. पालशिकर ! मुझे खेद है - डॉ. आंबेडकर

एसआर दारापुरी प्रो. पालशिकर कल आप के कार्यालय में तथाकथित रिपब्लिकन पार्टी के चार सदस्यों दुआरा मेरे कार्टून को लेकर जो तोड़फोड़ की गयी उसके लिए मुझे बहुत खेद है. मुझे विश्वास है कि शायद वे नहीं जानते कि उन्होंने क्या किया है. इस लिए आप उन्हें माफ़ करदें. उनके इस कृत्य पर मैं भी बहुत दुखी हूँ कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि ऐसा करके उन्होंने मेरे कौन से आदर्श की पूर्ती की है. मैं तो जीवन भर दलितों के बोलने की आज़ादी की लडाई लड़ता रहा क्योंकि दलित सदियों से चुप्पी का शिकार रहे हैं. उन्हें सदियों से गूंगे बहरे बना कर रखा गया था. वे सदियों से सभी प्रकार का अपमान सह कर चुप रहने के लिए बाध्य किये गए. मैंने भी यह सब झेला. पढ़ लिख कर मैं उनकी ज़ुबान बना और मैंने उन्हें ज़ुबान देने की जीवन भर कोशिश की. परन्तु कल उन्होंने आप के साथ ऐसा करके मेरी ज़ुबान ही बंद कर दी . नहीं ! मैं चुप नहीं रह सकता. मैं इस घटना पर अवश्य बोलूँगा क्योंकि यह सब कुछ मेरे नाम पर किया गया है. मुझे पता चला है कि यह सब एक पुस्तक में मेरे से सम्बंधित एक कार्टून को लेकर किया गया है. इस में मुझे अपमानित किये जाने का बहाना लेकर पहले तो पार्लिआमेंट में मेरे अति उत्साही अनुयायिओं ने दिनभर हंगामा किया और सदन का काम काम काज नहीं चलने दिया. कुछ ने तो पुस्तक को तैयार करने वाले विद्वानों पर एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत मुकदमा कायम करके कार्रवाही करने की मांग कर डाली. मेरे एक शुभचिंतक ने तो इन पुस्तकों को तैयार करने वाली संस्था को ही भंग करने का प्रशन उठा दिया. मुझे यह सब जान कर बहुत दुःख हुआ है. मैं तो जीवन भर पुस्तक प्रेमी रहा हूँ और मैंने जीवन भर अपनी लाईब्रेरी में सभी प्रकार की पुस्तकों का संग्रह किया और उन्हें पढ़ा भी था . अब अगर मेरे नाम पर किसी पुस्तक को प्रतिबंधित करने की मांग की जाती है तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इस से मुझे कितना कष्ट होगा. मुझे उम्मीद थी कि जब सदन में सरकार ने किसी औचित्य पर विचार किये बिना वोट की राजनीति के अंतर्गत केवल कुछ लोगों के दबाव में पुस्तक में से उस कार्टून को निकाल देने का आश्वासन दे दिया था तो उन्हें शांत हो जाना चाहिए था परन्तु उन्हें इस से भी संतुष्टि नहीं मिली और कल उन्होंने आप के कार्यालय में आ क़र तोड़फोड़ की कार्रवाही की जो कि मेरे दुआरा अपने विरोधियों के तमाम कटाक्षों और आलोचनायों को धैर्य से सुनने और शालीनता से उनका उत्तर देने के स्वभाव का अपमान है. मैंने तो अपने जीवन में कितने कटाक्षों और आलोचनाओ का सामना किया था परन्तु मैं ने कभी भी अपना मानसिक संतुलन नही खोया था. मैं तो जीवन भर वाल्टेयर के उस कथन का कायल रहा हूँ जिस में उसने कहा था ," मैं आप से सहमत न होते हुए भी आप के ऐसा कहने के अधिकार की आखरी सांस तक रक्षा करूँगा." मैंने गाँधी, नेहरु, पटेल न जाने कितने लोगों से गंभीर मुद्दों पर बहसें की थीं परन्तु मैंने कभी भी विरोधियों के कथन को दबाने की कोशिश नहीं की बल्कि हमेशा तर्क और तथ्यों सहित शालीनतापूर्वक उनका उत्तर दिया था . मैंने तो गाँधी जी को भी पहली मीटिंग में ही कहा था, "अगर आप मुझे मारना चाहते हैं तो सिद्धांतो से मारिये भावनायों से नहीं." अब अगर कुछ लोग मेरे नाम पर वार्तालाप का रास्ता छोड़ कर तोड़फोड़ का रास्ता अपनाते हैं तो यह मेरे सिद्धांतों के बिलकुल खिलाफ है. जिस कार्टून को लेकर ये सब हंगामा खड़ा किया गया है वह कार्टून तो १९४९ में मेरे सामने ही छपा था. मैं ने भी उसे देखा था और उसमे शंकर के संविधान निर्माण की धीमी गति को लेकर किये गए व्यंग और चिंता को भी पहचाना था. मुझे यह बहुत अच्छा लगा था. नेहरु और हम दोनों ही संविधान निर्माण की धीमी गति को लेकर चिंतित रहते थे परन्तु संविधान निर्माण की प्रक्रिया में ऐसा होना स्वाभाविक था. बाद में मैंने २५ नवम्बर, १९४९ को संविधान को अंगीकार करने वाले भाषण में संविधान निर्माण में लगे समय के औचित्य के बारे में सफाई भी दी थी. मुझे ज्ञात हुआ है कि उक्त कार्टून वाली पुस्तक में भी संविधान निर्माण की धीमी गति के कारणों का उल्लेख किया गया था और कार्टून के माध्यम से इस के बारे में छात्रों से प्रशन पूछा गया था. काश ! कार्टून में मेरे अपमान के नाम पर तोड़फोड़ और हंगामा करने वालों ने भी पुस्तक में कार्टून के सन्धर्भ को पढ़ा होता तो शायद वे ऐसा नहीं करते. मैंने जीवन भर विरोध के संविधानिक तरीकों की ही वकालत की थी. मैंने अपने जीवन काल में जो भी आन्दोलन किये वे सभी शांति पूर्ण और कानून के दायरे में ही थे. मैं ने कभी भी हिंसा और तोड़फोड़ की सलाह नहीं दी थी. मेरे नाम पर तोड़फोड़ करने वालों को मैं सलाह दूंगा कि वे मेरे संविधान अंगीकार के अवसर पर दिए भाषण के उस अंश को ज़रूर पढ़ लें जिस में मैंने कहा था, "हमें सत्याग्रह, असहयोग और अवज्ञा के तरीको को छोड़ देना चाहिए. जब सामाजिक और आर्थिक उद्धेश्यों को संवैधानिक तरीके से प्राप्त करने के साधन न बचे हों तो तो गैर संवैधानिक तरीके अपनाने का कुछ औचित्य हो सकता है. परन्तु जहाँ संवैधानिक तरीके उपलब्ध हों तो गैर संवैधानिक तरीकों को अपनाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता. यह तरीके अराजकता का व्याकरण हैं और इन्हें जितनी जल्दी छोड़ दिया जाये उतना ही हमारे लिए अच्छा होगा." मुझे आज यह देख कर बहुत दुःख होता है जब मैं देखता हूँ कि हमारे देश में विरोध की आवाज़ को सरकारी और गैर सरकारी तौर पर दबाने की कितनी कोशिश की जा रही है. मैं जानता हूँ कि हम लोगों ने संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समावेश कितनी उम्मीद के साथ किया था. आज मैं देखता हूँ कि कुछ लोग अपने संख्याबल या बाहुबल से कमज़ोर लोगों की सही आवाज़ को दबाने में सफल हो जाते हैं. आज की सरकारें भी इसी प्रकार से जनता की आवाज़ को दबा देती हैं. हमारे देश में से तर्क और बहस का माहौल ख़त्म हो चुका है. मैं जानता हूँ कि कुछ लोग धर्म अथवा सम्प्रदाय की भावनाओं के आहत होने की बात कर के दूसरों की आवाज़ को दबा देते हैं. मैंने देखा है कि किस तरह कुछ लोगों ने हो हल्ला करके शिवाजी पर लिखी गयी पुस्तक, तसलीमा नसरीन तथा सलमान रश्दी दुआरा लिखी गयी पुस्तकों को प्रतिबंधित करवा दिया था. इन लोगों ने तो मुझे भी नहीं बख्शा था. आप को याद होगा कि जब महारष्ट्र सरकार ने मेरी अप्रकाशित पुस्तक "रिडल्स इन हिन्दुइज्म' को प्रकाशित करवाया था तो किस प्रकार कुछ लोगों ने इसे हिन्दू तथा हिन्दू देवी देवता विरोधी कह कर इसे प्रतिबंधित करने की मांग उठाई थी. यह तो मेरे दलित अनुयायिओं और बुद्धिजीवियों का ही प्रयास था कि उन्होंने इस के पक्ष में बम्बई में भारी जन प्रदर्शन करके इसे बचा लिया था. परन्तु कल उन्होंने जो कुछ किया है वह तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिलकुल खिलाफ है. कल अगर कुछ लोग मेरे दुआरा लिखी गयी पुस्तकों में अंकित आलोचना को लेकर मेरी पुस्तकों को प्रतिबंधित करने की मांग उठा दें तो दलितों के पास इस के विरोध का क्या तर्क बचेगा. मैं समझता हूँ कि मेरे दलित अनुयायी ऐसा क्यों करते हैं. मैं जानता हूँ कि वे मेरा कितना सम्मान करते हैं. वे मुझ से भावनात्मक तौर पर किस सीमा तक जुड़े हुए हैं. जब कभी कोई भी उन्हें मेरे बारे में कुछ भी सही या गलत बता देता है तो वे भड़क जाते हैं और इस प्रकार की कार्रवाही कर बैठते हैं. इस में उनका कसूर नहीं हैं. वे अपने नेताओं दुआरा गुमराह कर दिए जाते हैं. उनमें से तो बहुतों ने मुझे पूरी तरह से पढ़ा भी नहीं है. अतः वे दूसरों दुआरा निर्देशित हो जाते हैं. मुझे लगता है दलितों ने मेरे " शिक्षित करो, संघर्ष करो और संघटित करो " नारे को सही रूप में समझा नहीं है. मुझे यह भी देख कर बहुत दुःख होता है कि मेरे नाम पर आज किस प्रकार की दलित राजनीति हो रही है. मेरे दुआरा बहुत उम्मीद के साथ बनायीं गयी रिपबल्किन पार्टी आज कितने टुकड़ों में बंट चुकी है और उसके नेता व्यक्तिगत लाभ के लिए किस तरह के सिद्धान्तहीन एवं अवसरवादी गठ जोड़ कर ले रहे हैं. वे दलितों के मुद्दों के स्थान पर विशुद्ध वोट बैंक और सत्ता की राजनीति कर रहे हैं और लोगों का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं. इस कार्टून के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है. मुझे यह देख कर बहुत कष्ट होता है कि मेरे कुछ अतिउत्साही और अज्ञानी अनुयायियों ने मुझे केवल दलितों का ही मसीहा बना कर रख दिया है. मैं तो पूरे राष्ट्र का हूँ. मैंने जब स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात की थी तो यह केवल दलितों के लिए ही नहीं की थी. मैंने इसे देश के सभी लोगों के लिए माँगा था. मैंने जब हिन्दू कोड बिल बनाया था तो मैंने इस में सम्पूर्ण हिन्दू नारी की मुक्ति की बात उठाई थी. हाँ मैंने दलितों को कुछ विशेष अधिकार ज़रूर दिलाये थे जो कि उनको समानता का अधिकार प्राप्त कराने के लिए ज़रूरी थे. अतः मेरा अपने अनुयायिओं और प्रशंसकों से अनुरोध है कि वे मुझे एक जाति के दायरे में न बांध कर पूरे राष्ट्र के फलक पर देखें. मैं अपने अनुयायियों से यह भी अनुरोध करता हूँ कि वे मेरे जीवन दर्शन और मेरे जीवन मूल्यों को सही तरीके से जानें और उन्हें अपने आचरण में उतारें. उन्हें यह भी स्पष्ट तौर पर समझ लेना चाहिए कि उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रहेगी जब वे दूसरों की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे अन्यथा वे देश में बढ़ते फासीवाद और कट्टरपंथ को ही मज़बूत करेंगे. मेरे नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं से भी मुझे कहना है कि वे दलितों का भावनात्मक शोषण, वोट बैंक और जाति की राजनीति के स्थान पर मुदों पर आधारित मूल परिवर्तन की राजनीति करें जिस से न केवल दलितों बल्कि सभी भारतवासियों का कल्याण होगा. प्रो. पालशिकर ! अन्तः में मैं आप के साथ मेरे तथाकथित कुछ अनुयायियों दुआरा किये गए दुर्व्यवहार के लिए पुनः खेद प्रकट करता हूँ.

Saturday, May 12, 2012

आंबेडकर के कार्टून पर राजनीति

एसआर दारापुरी
कल लोक सभा और राज्य सभा में राष्ट्रीय शैक्षिक एवं अनुसन्धान परिषद ( एनसीआरटी) की किताब में डॉ. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर पर छपे कार्टून को लेकर कुछ सदस्यों दुआरा इसे आपत्तिजनक कह कर हंगामा किया गया. दोनों सदनों में विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया. इसमें मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के इस्तीफे की मांग भी उठी. शोर शराबे और हंगामे के कारण पूर्वान्ह में सदन की कार्रवाही सुचारू रूप से नहीं चल सकी. बाद में सिब्बल के दोषियों के खिलाफ कार्रवाही का आश्वासन देने के साथ इसके लिए माफ़ी mangni पड़ी. कक्षा ११ में पढाई जाने वाली राजनीति शास्त्र की पुस्तक में आंबेडकर के तथाकथित आपतिजनक कार्टून का मुद्दा सबसे पहले लोकसभा में वीसीके पार्टी के थिरुवा बलवान तोल ने उठाया और आपतिजनक कार्टून की प्रति भी सदन में दिखाई. उनके समर्थन में भाजपा,सपा, बसपा, और अन्य दलों के सदस्यों ने भी शोर शराबा किया. वे मानव संसाधन मंत्री का इस्तीफा मांग रहे थे. राज्य सभा में प्रश्न काल के दौरान जब सिब्बल एक प्रशन का जवाब देने के लिए खड़े हुए तो बसपा के ब्रजेश पाठक ने कार्टून की प्रति दिखाते हुए इस मुद्दे को उठा दिया. इस पर अन्य सदस्य भी उनसे सफाई मांगने लगे. सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल ने दोनों सदनों में सफाई दी और इस गलती के लिए माफी मांगी. इस पर बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि वह सरकार की सफाई से संतुष्ट नहीं है. सरकार बताये कि यह कृत्य करने वालों पर क्या कार्रवाही की गयी, यह अपराधिक कृत्य है. मायावती ने इसे लोकतंत्र का अपमान कहा. बाद में संसद भवन परिसर में लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान ने भी कहा, " दोषियों का निलंबन ही नहीं उन पर एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा चलाना चाहिए. उन्होंने ने तो एनसीआरटी को ही बंद करने की मांग भी कर डाली. दोनों सदनों में उपरोक्त हंगामे के फलस्वरूप सरकार ने एनसीआरटी की उपरोक्त पुस्तक से विवादित कार्टून को निकालने की घोषणा की जिस पर एनसीआरटी की पुस्तक सलाहकार समिति के दो सदस्यों योगेन्द्र यादव और सुहास पल्शिकर ने समिति से इस्तीफा दे दिया. इस पर योगेन्द्र यादव ने कहा , "लोक सभा में हुई बहस पूरी तरह से सूचित नहीं थी . हम लोग पुस्तक निर्माता समिति के मुख्य सलाहकार थे. इस लिए हम लोगों ने इस्तीफा देना ही उचित समझा. मैं चाहता था कि सांसद लोग पुस्तक या जिस पृष्ट पर कार्टून छ्पा था को पढ़ लेते." आंबेडकर नेहरु कार्टून विवाद पर राजनीतिक विश्लेषकों और समाज विज्ञानियों में विरोधी प्रतिक्रया है. कुछ दलित बुद्धिजीविओं का कहना है कि कार्टून डॉ. आंबेडकर के लिए अपमानजनक है. दूसरों का विशवास है कि यह विवाद अनावश्यक है. एक टिप्पणीकार के अनुसार इस में चुनाव तंत्र, जिस में वोट की राजनीति और प्राथमिकतायें ही निर्णय लेने की बाध्यताएं होती हैं, की बू आती है. समाज विज्ञानी आशीष नंदी ने कहा, " उक्त विवाद से प्रकट होता है कि यद्यपि लोक्तंत्रिकर्ण हुआ है परन्तु समाज में लोकतान्त्रिक मूल्यों का समावेश नहीं हुआ है. लोकतंत्र केवल चुनाव तंत्र बन कर रह गया है." एक अन्य समाज विज्ञानी शिव विशाव्नाथान ने कहा कि अगर इसे गहराई से देखा जाए तो यह विवाद नेहरु और अम्बेडकर दोनों के लिए अनुचित है. " शंकर एक सम्मानित कार्टूनिस्ट के रूप में राजनीति के व्यंग को समझते थे. कार्टून इस बात की ताईद करता है कि डॉ. आंबेडकर संविधान के निर्माता और खेवट थे यद्यपि नेहरु चिंतित दिखाई पड़ते हैं . इस में किसी के लिए कुछ भी अपमानजनक नहीं है. डॉ. आंबेडकर सबसे पहले इस कार्टून का व्यंग और समानुभूति पहचान लेते." कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह कार्टून संभवतया १९४९ में पहली वार छ्पा था जब डॉ. आंबेडकर जीवित थे परन्तु उन्होंने तो इस पर कोई आपत्ति नहीं की थी तो फिर अब इस पर आपत्ति क्यों? आइये अब इस कार्टून पर चर्चा की जाए. उक्त कार्टून प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट केशव शंकर पिल्लै दुआरा बनाया गया था. इस में संविधान निर्माण की गति पर व्यंग किया गया है. इस में डॉ. आंबेडकर संविधान रुपी घोंघे प़र चाबुक लेकर उसे आगे बढ़ाते हुए दिखाई देते है. उनके पीछे नेहरु भी चाबुक लेकर घोंघे को आगे बढ़ाने की मुद्रा में दिखाए गए हैं. कार्टून में जनता इसे देखते हुए दिखाई गई है. इस कार्टून के माध्यम से छात्रों से यह पूछा गया है कि संविधान निर्माण में इतना समय क्यों लगा? इस कार्टून के बगल में संविधान निर्माण की प्रक्रिया का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है. अब अगर इसे बिना किसी पूर्वाग्रह के देखा जाए तो इस में कुछ भी आपत्तिजनक दिखाई नहीं देता है. परन्तु फिर भी इस पर कुछ अति उत्साही व्यक्तियों खास करके कुछ दलित राजनेताओं दुआरा यह कह क़र कि यह डॉ. आंबेडकर के लिए अपमानजनक है, बवाल खड़ा किया. अब यह चुनाव तंत्र का गणित नहीं तो और क्या है? इस में कुछ लोगों ने यह दिखाने कि कोशिश कि है कि वे डॉ. आंबेडकर और दलितों के बहुत बड़े हितैषी हैं. अब अगर इस पूरे हंगामे के पीछे की राजनीति और इस से उपजे खतरों को देखा जाए तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहुत बड़ी चोट है. इस से हमारे समाज में पहले से व्याप्त फासीवाद और कट्टरपंथ को और ताकत मिली है. हम जानते हैं कि इस से पहले किस प्रकार हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथी शिवाजी पर पुस्तक और सलमान रुश्दी की पुस्तक प़र बवाल खड़ा कर उन्हें जब्त करवा चुके हैं. इसी प्रकार विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक पुलिस लोगों पर कहर ढाती रही है. आज हालत यह है कि इस बढ़ते फासीवादी और कट्टरपंथी रुझान के कारण लोग सही बात कहने से भी डरने लगे हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दिन बदिन ख़तम होती जा रही है जो कि लोकतंत्र की बुनियाद है. यदि इतिहास को देखा जाये तो यह पाया जाता है कि दलित बोलने की स्वतंत्रता से सबसे अधिक वंचित रहे हैं. अब तक वे चुप्पी का सब से बड़ा शिकार रहे हैं. अतः उनके लिए इस स्वतंत्रता को बनाये रखना सब से अधिक महत्वपूर्ण काम है. अगर हाल में वाराणसी में बौद्ध पूर्णिमा पर घटी घटना को देखा जाए तो इस से दलितों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आसन्न खतरों का आभास होता है. इस वर्ष ६ मई को वाराणसी में कचहरी स्थित डॉ. अम्बेद्कार की प्रतिमा पर बौद्ध जयंती का आयोजन किया गया था. वहां पर आयोजकों ने बुद्ध के साथ डॉ. आंबेडकर और पेरियार के चित्र भी लगाये थे. इन में से डॉ. आंबेडकर के चित्र के नीचे "हम हिन्दू नहीं हैं" और पेरियार के चित्र के नीचे " हिन्दू देवी देवताओं में विशवास मत करो. " लिखा था. इस को देखने से आप को कुछ भी आपत्तिजनक दिखाई नहीं देगा परन्तु इस पर भी हिन्दू वाहिनी के कुछ लोगों दुआरा आपत्ति की गयी और इस की शिकायत जिला प्रशासन से की गयी. इस पर जिला प्रशासन ने आयोजकों के विरोध को नज़र अंदाज़ करते हुए वहां से उन दोनों चित्रों को हटवा दिया और तभी वहां पर बौद्ध जयंती का कार्यक्रम संपन्न हो सका. यद्यपि इस घटना की थोड़ी चर्चा कुछ स्थानीय समाचार पत्रों में हुयी परन्तु विरोध करने वाले अपने मकसद में सफल हो गए. इस छोटी सी घटना से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दलितों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कितना बड़ा खतरा है. अतः इस अधिकार को बचाना न केवल दलितों बल्कि सभी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. हम लोग इस से भी अवगत हैं कि महाराष्ट्र में कुछ वर्ष पूर्व किस प्रकार बाबा साहेब की पुस्तक "रिडल्स इन हिन्दुइज्म" को लेकर आपत्तियां की गयी थीं और यह पुस्तक तभी बच सकी थी जब इस के समर्थन में बम्बई में दलितों दुआरा एक बहुत बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया गया. इस समय बाबा साहेब के कार्टून को लेकर जो बवाल किया गया है उससे न तो बाबा साहेब का ही सम्मान बढ़ा है न ही दलितों का. इस के उल्ट दलितों ने जाने अनजाने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नुक्सान ही पहुँचाया है और फासीवादी और कट्टरपंथी ताकतों को ही मज़बूत किया है. अब अगर कल को बाबा साहेब के हिन्दू धर्म के विरुद्ध और बौद्ध धर्म के पक्ष में विचारों को लेकर हिन्दुत्ववादियों दुआरा आपत्ति करके पाठ्य पुस्तकों में से इस के निकाले जाने की मांग शुरू हो जाये तो दलितों के पास इस का क्या जवाब होगा. यदि कट्टरपंथी बाबा साहेब की कुछ पुस्तकों को आपतिजनक कह कर ज़ब्त करने की मांग करने लगें तो दलित इस का विरोध किस आधार पर कर पाएंगे. अतः मेरे विचार में बाबा साहेब के कार्टून प़र अनावश्यक आपत्ति उठाकर उसे पुस्तक में से निकलवाने से दलितों का कोई भला नहीं हुआ है बल्कि इस से तानाशाही और कट्टरपंथी ताकतें ही मज़बूत हुई हैं. डॉ. आंबेडकर अभिवयक्ति की स्वतंत्रता के बहुत बड़े समर्थक थे. एक बहस के दौरान बाबा साहेब ने वाल्टेयर को उधृत करते हुए कहा था, "मैं आप से सहमत न होते हुए भी आप के ऐसा कहने के अधिकार की आखरी साँस तक रक्षा करूँगा." मुझे विश्वास है कि अगार आज बाबा साहेब जीवित होते तो वे अपने कार्टून के मामले में कुछ दलित नेताओं दुआरा राजनीति करके अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता की की गई क्षति तथा फासीवादी और कट्टरपंथी ताकतों को मज़बूत करने की दिशा में की गयी कार्रवाई को कतई पसंद नहीं करते.

Saturday, April 21, 2012

आंबेडकर बनाम लोहिया

अरुण कुमार त्रिपाठी बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि विवाद से लंबे समय बाद निकला उत्तर प्रदेश अब आंबेडकर और दलित पार्कों के विवाद की तरफ बढ़ रहा है। जिस प्रदेश का भावुक राजनीति का लंबा इतिहास रहा हो, वहां इस तरह के विवाद कितने घातक हो सकते हैं, उसे वहां के लोगों से ज्यादा कौन जान सकता है? इसके बावजूद इसे आंबेडकर बनाम लोहिया, पार्क बनाम अस्पताल, मायावती बनाम मुलायम सिंह बना कर हवा दी जा रही है तो इसमें जरूर कुछ निहित स्वार्थ है। जाहिर है, इस विवाद से बसपा नेता मायावती को विशेष तौर पर दलितों में अपना घटता जनाधार समेटने में आसानी होगी, जो इस चुनाव में प्रदेश की पचासी आरक्षित विधानसभा सीटों में सिर्फ पंद्रह पर जीत दिला सका है। उससे ज्यादा आसानी उन लोगों को भी होगी जो विघ्नसंतोषी प्रवृत्ति के होते हैं और जो इसी तरह से विवादों में अपना उल्लू सीधा करते हैं और सत्ता के करीब पहुंचते हैं। ऐसे लोगों में अफसर, राजनेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी सभी शामिल होते हैं। बाबा साहब आंबेडकर की इसी जयंती पर मायावती ने लखनऊ के सामाजिक प्रेरणा स्थल पर चेतावनी दी कि अगर पार्कों और मूर्तियों से छेड़छाड़ की जाएगी तो कानून और व्यवस्था की समस्या खड़ी हो जाएगी और उसका दायरा महज प्रदेश नहीं पूरा देश होगा। जाहिर-सी बात है कि उत्तर प्रदेश सरकार और उसके मुखिया अखिलेश यादव को इस चेतावनी को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि आंबेडकर कोई महात्मा गांधी नहीं हैं जिनके अनुयायियों को सहनशीलता और अहिंसा की शिक्षा दी गई है। बाबा साहब के अनुयायियों में एक प्रकार का जुझारू जज्बा है और वे उनके लिए मरने-मिटने को तैयार हो सकते हैं। इसी जज्बे के कारण समाज के दूसरे तबकों में दलितों की समस्या के प्रति एक समझ और चेतना भी आई है और दलित चेतना का सामाजिक और राजनीतिक विस्तार हुआ है। इस जज्बे की झलक हम महाराष्ट्र सहित देश के अन्य राज्यों में समय-समय पर मूर्तियों से छेड़छाड़ के सवाल पर होने वाली हिंसक घटनाओं में देख सकते हैं। नब्बे के दशक में उत्तर भारत ने उस चेतना के उभार को तब देखा था, जब महात्मा गांधी के हरिजन को पूरी तरह से नकार कर उसकी जगह दलित शब्द अपना लिया गया था और कांशीराम की रैली से लौटते हुए दलितों ने राजघाट पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि को अपवित्र भी किया था। जबकि महात्मा गांधी को मानने वालों की तरफ से उसका कोई विशेष प्रतिकार या निंदा नहीं हुई थी। हालांकि बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार महाराष्ट्र के दलित आंदोलन की तर्ज पर नहीं बनाया और न ही उसने समाज के विभिन्न तबकों की सांस्कृतिक संवेदनाओं को आहत किया। उसने अपने आरंभिक चरण में तिलक तराजू और तलवार के नारों के अलावा प्रतीकवाद का इस्तेमाल कम ही किया। सर्वजन की राजनीति करने के दौरान तो बसपा ने उन्हीं ब्राह्मणों की सभाएं और रैलियां करवार्इं, जिनकी राजनीति से आंबेडकर का सर्वाधिक विरोध था। लेकिन तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जब मायावती ने बाबा साहब और कांशीराम के साथ अपनी मूर्तियां लगवानी शुरू कर दीं तो यह स्पष्ट हो चला था कि ब्राह्मणों के सम्मेलनों के साथ-साथ वे प्रतीकवाद की ठोस राजनीति कर रही हैं। इसके लिए संसाधन जुटाने में उन्होंने उस लोकतांत्रिक मर्यादा और नियम-कानून को ताक पर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी, जिसे कायम करने के लिए आंबेडकर ने संविधान लिखा था। इन स्मारकों के निर्माण में पार्टी और अफसरशाही दोनों को लाभ हो रहा था। धन तो आ ही रहा था, राजनीतिक जमीन भी तैयार हो रही थी। उन्हें मालूम था कि ये स्मारक आगे उनकी राजनीति के लिए भौतिक ही नहीं भावुक आधार बन सकते हैं। उन्हें छेड़ा गया तो उनका एक स्वरूप मंदिर-मस्जिद विवाद जैसा भी हो सकता है और दलित प्रतीकवाद पर एक राष्ट्रीय माहौल भी बन सकता है। मायावती की चेतावनी और अखिलेश यादव की टिप्पणियों से साफ लग रहा है कि कुछ न कुछ टकराव तो होगा ही। क्योंकि अखिलेश यादव ने यह नहीं कहा है कि इन विशाल पार्कों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। बल्कि उन्होंने यह कहा है कि मूर्तियों से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, पर वहां पड़ी अतिरिक्त जमीन का इस्तेमाल अस्पतालों के लिए किया जाएगा, जिससे औरतों और बच्चों को फायदा होगा। ऐसे में अखिलेश को ध्यान रखना चाहिए कि अयोध्या की विवादित जमीन- जिसका भाजपा सांप्रदायिक इस्तेमाल करती रही है- के धर्मनिरपेक्ष इस्तेमाल के तमाम सुझाव परवान नहीं चढ़ सके। मुलायम सिंह ने एक बार वहां बाबरी मस्जिद फिर से बनाने का वादा किया था तो कांशीराम ने सार्वजनिक शौचालय बनवाने का। विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश में आंबेडकरवाद के उदय का दौर भी वही है, जब वहां हिंदुत्व के मंदिर निर्माण का प्रचंड आंदोलन चल रहा था। अयोध्या में राम मंदिर के लिए खंभे गढ़े जा रहे थे और शिलापूजन के नाम पर चंदा इकट्ठा किया जा रहा था। परोक्ष तौर पर मायावती ने अपने समर्थकों की उसी भावना पर सवार होकर इन स्मारकों का निर्माण करवाया है और मायावती की प्रशंसा करने वाले तमाम पत्रकार और बुद्धिजीवी तो यहां तक कहते हैं कि भाजपा और संघ परिवार मंदिर नहीं बनवा पाया, पर मायावती ने उसे कहीं ज्यादा भव्य स्मारक खडेÞ कर दिए। कुछ लोग तो यह तक कहते हैं कि मंदिर निर्माण भी मायावती ही करवा सकती हैं। सवाल उठता है कि मायावती ने दलित प्रतीकों के नाम पर अंधाधुंध निर्माण और अपनी मूर्तियां लगाने की जो अंधेरगर्दी मचाई है उसका क्या किया जाए? निश्चित तौर पर उसके विरुद्ध जनभावनाएं भी हैं और समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में एक तरह का गुस्सा भी। सपा के जनाधार के एक हिस्से के साथ-साथ झगड़ा और टकराव पैदा करने वाले सवर्ण भी चाहते होंगे कि इन पार्कों पर कुछ कार्रवाई हो। इसी तरह मायावती सरकार के तमाम फैसलों को भी पलटने का दबाव सपा सरकार पर होगा और बहुमत होने के कारण उनमें से कुछ निर्णयों को पलटना शुरू भी कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, सरकारी ठेकों में अनुसूचित जाति और जनजाति को आरक्षण देने का जो फैसला मायावती सरकार ने 2009 में किया था, उसे रद्द कर दिया गया है। तरक्की में आरक्षण का मामला भी इसी तरह विवादों है। इससे पढ़े-लिखे दलितों में नाराजगी पैदा होना शुरू हो गई है। अखिलेश सरकार अगर मायावती सरकार के भ्रष्टाचार की जांच करवाती है और उसके गलत फैसलों को पलटती है तो उसमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पर ऐसा करते समय उन्हें खुन्नस और बदले की भावना के बजाय समाजवाद और डॉ राममनोहर लोहिया की उस महान परंपरा को ध्यान में रख कर काम करना चाहिए, जिसमें डॉ भीमराव आंबेडकर की उपेक्षा और अपमान नहीं, उनका सम्मान और उनसे तालमेल का भाव ही नहीं प्रयास भी रहा है। बाबा साहब शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की जगह सर्वजन समावेशक रिपब्लिकन पार्टी बनाना चाहते थे। इस नजरिए से उनमें और डॉ लोहिया में पत्राचार हुआ था। लोहिया ने 10 दिसंबर 1955 को हैदराबाद से आंबेडकर को पत्र लिखा- प्रिय डॉ आंबेडकर, ‘मैनकाइंड’ पूरे मन से जाति समस्या को अपनी संपूर्णता में खोल कर रखने का प्रयास करेगा। इसलिए आप अपना कोई लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी। आप जिस विषय पर चाहें लिखिए। हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर आप लिखना पसंद करें तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ क्रोधित हो, बल्कि आश्चर्य भी करे। मैं चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी होनी चाहिए ताकि आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें, बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के नेता बनें। लोहिया के उस पत्र के बाद उनके दो मित्रों- विमल मेहरोत्रा और धर्मवीर गोस्वामी- ने आंबेडकर से मुलाकात की, जिसका जिक्र आंबेडकर ने लोहिया को लिखे जवाबी पत्र में किया। आंबेडकर ने यह भी आश्वासन दिया कि शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की कार्यसमिति में वे उनके मित्रों का प्रस्ताव रखेंगे। विमल और धर्मवीर ने डॉ आंबेडकर को कानपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का न्योता भी दिया था। यह सिलसिला चल ही रहा था और लोहिया ने आंबेडकर से मिलने का समय मांगा था और उसके टलने और फिर तय होने के बीच ही बाबा साहब का निधन हो गया। कहने का मतलब यह है कि आंबेडकरवादियों की परंपरा भले गांधी और उनके अनुयायियों के प्रति आक्रामक रही हो, लेकिन लोहिया की परंपरा आंबेडकर के प्रति बेहद सम्मान की रही है। रहनी भी चाहिए, क्योंकि आंबेडकर, लोहिया से उन्नीस साल बडेÞ थे और उनका जाति संबंधी अध्ययन और चिंतन काफी व्यवस्थित था। सामाजिक समानता पर बेचैनी तो थी ही। उन्होंने दलितों ही नहीं, शूद्रों के बारे में भी विस्तार से विचार किया है और वे उनके शुभचिंतक थे। इसलिए अखिलेश सरकार अगर अपने को समाजवादी आंदोलन और राममनोहर लोहिया की परंपरा से जोड़ती है और उत्तर प्रदेश में मिले इस ऐतिहासिक मौके का बेहतर इस्तेमाल करना चाहती है तो उसे लोहिया पार्क बनाम आंबेडकर पार्क और उसके बहाने लोहिया बनाम आंबेडकर की नकली लड़ाई में नहीं उतरना चाहिए। उनके विचारों में मतभेद हो सकते हैं, उनके अनुयायी भी अलग हो सकते हैं, लेकिन समाजवादी आंदोलन आज जिस नाजुक और महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है उसमें इस झगड़े से वे ही हासिल कर सकते हैं जो या तो पूंजीवादी खेल खेलना चाहते हैं या फिर सवर्णों की फूट डालो राज करो वाली नीति अपना रहे हैं। समाजवादी पार्टी को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके सत्ता में आने से समाजवाद की चर्चा फिर से शुरू हुई है। वह कैसा होगा, क्या होगा यह अलग बात है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंदी के दौर में उस शब्द में नया अर्थ डालने का अवसर है। भाकपा और माकपा ने अपने हाल में संपन्न हुए सम्मेलनों में समाजवाद के भारतीय स्वरूप की तलाश भी शुरू की है। संवाद और समन्वय की तमाम संभावनाओं को देखते हुए यह कतई शुभ नहीं होगा कि मूर्तियों और पार्कों के बहाने दलित बनाम पिछड़ा और लोहिया बनाम आंबेडकर का नया विवाद शुरू किया जाए। इसे टालने से ही उत्तर प्रदेश का कल्याण होगा और वहां की समाजवादी सरकार का भी।

Wednesday, March 21, 2012

उत्तर प्रदेश में फिर लोहिया बनाम आंबेडकर


अंबरीश कुमार
लखनऊ मार्च । उत्तर प्रदेश में डा राम मनोहर लोहिया बनाम भीमराव आंबेडकर का विषय फिर उठ गया है। करीब साढ़े चार साल उपेक्षित रहा लोहिया पार्क और लोहिया पथ अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने से पहले झाड़ पोछ चमकाया जाने लगा था । आगामी २३ मार्च को समाजवादी आन्दोलन के नायक डा0 राममनोहर लोहिया का जन्म दिन है जो लखनऊ में लोहिया पार्क में मनाया जायगा। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के प्रदेश के सभी जिला/महानगर अध्यक्ष से लेकर पार्टी के वधायक और सांसदों से कहा है कि समाजवाद के चिन्तक राममनोहर लोहिया की जन्मतिथि पर हमें उनकी नीतियों पर चर्चा के साथ उनके विचारों से प्रेरणा लेनी चाहिए। दूसरी तरफ दलित चिंतक आशंकित है कि आंबेडकर ,कांशीराम समेत दलित विभूतियों के स्मारकों का स्वरूप न बदल जाए। रोचक तथ्य यह है कि राजधानी की सबसे प्रमुख सडक को आंबेडकर के नाम करना हो या विधान सभा में उनका भव्य चित्र लगवाना या आम्बेडकर ग्राम योजनाओं की शुरुआत सभी मुलायम सिंह की शुरू की है और इस चुनाव में सबसे ज्यादा करीब पचास दलित विधायक समाजवादी पार्टी के जीते है। इसलिए मुलायम सिंह से दलित चिंतकों को यह अपेक्षा है कि वे इस स्मारकों का स्वरुप बदलने नहीं देंगे वर्ना देश भर के दलितों के बीच गलत सन्देश जा सकता है ।
आंबेडकर महासभा के अध्यक्ष डा निर्मल ने जनसत्ता से कहा -दलित विभतियों के नाम से जो भी स्मारक लखनऊ में बने है उनके मौजूदा स्वरुप में किसी तरह की छेड़छाड़ ठीक नहीं होगी । इससे वह दलित समाज भी आहत होगा जो मुलायम सिंह के साथ खड़ा है और उनका संरक्षण चाहता है । मुलायम सिंह ने आम्बेडकर के नाम योजनाए शुरू की ,सड़क का नामकरण किया और उनका बड़ा तैल चित्र विधान सभा में लगवा कर अपना सम्मान जताते रहे है । दलितों के सवाल पर पुरी ताकत से लड़े है । ऐसे में तो यह होना चाहिए कि वे मूर्तियों को लेकर एक नई नीति बनवाएं ताकि आगे भी कोई विवाद न हो ।
गौरतलब है कि दक्षिण के मशहूर दलित चिंतक कांचा एलैय्या बहुत पहले से कहते रहे है कि लखनऊ को देश की दलित राजधानी घोषित कर देनी चाहिए । इसकी मुख्य वजह एक जगह इतनी ज्यादा दलित विभूतियों का स्मारक होना है । दलित चिंतक एसआर दारापुरी मायावती के आलोचक रहे है पर इस मुद्दे को वे अलग ढंग से देखते है । दारापुरी ने कहा -यह सही है कि कई स्मारकों में जगह ज्यादा ली गई है पर उस जगह के सदुपयोग के चक्कर में इन स्मारकों का मौजूदा स्वरुप पूरी तरह चौपट हो जाएगा और उसका सौन्दर्य भी ख़त्म हो जाएगा । इसलिए इनके स्वरुप को बदलना या यहाँ अस्पताल बना देना ठीक नहीं होगा ।
राजनैतिक टीकाकार सीएम शुक्ल ने कहा -इतिहास से नहीं लड़ा जाता है । यह ठीक नहीं कि मायावती रहे तो लोहिया के स्मारकों की अनदेखी हो और मुलायम आए तो आंबेडकर हाशिए पर चले जाए । बदले की इस राजनीति का राजनैतिक सन्देश ठीक नहीं जाएगा । दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा -किसी भी मूर्ति के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी यह तो मुलायम सिंह पहले ही साफ कर चुके है । अब करीब छह सौ एकड़ जमीन इस सब मर लगे गई है तो उसके सदुपयोग पर विचार हो तो गलत क्या है । उन्होंने यह भी कहा कि राम मनोहर लोहिया का जन्म दिवस बहुत उत्साह से मनाया जाएगा । सभी पदाधिकारियों से कहा है कि इस अवसर पर वे जिला स्तर पर गोष्ठी आदि कार्यक्रम के आयोजन करें, जिसमें पार्टी की नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को डा लोहिया के सिद्धान्तों और नीतियों से परिचित कराया जाए। समाजवादी पार्टी आज भी उनके रास्ते पर चल रही है। jansatta