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Monday, July 30, 2012

बेतवा से सपरार बांध के डाक बंगले तक

अंबरीश कुमार
ओरछा में बेतवा रिट्रीट से आगे बड़े ही थे की जोर की बरसात शुरू हो गई । इससे पहले पत्रकार हृदेश तिवारी और उनके फिल्कर पिता जगदीश तिवारी के साथ बैठे और ओरछा से बुंदेलखंड पर चाय के साथ लम्बी चर्चा चली वे लोक संस्कृति पर भी काम कर रहे है । चाय से पहले बेतवा तट और बुंदेले राजाओं की छतरियां देखने गए थे । बेतवा के तट पर बादल मंडरा रहे थे और दूसरे किनारे का हरा भरा जंगल आने का आमंत्रण दे रहा था पर गाड़ी का रास्ता बंद था और बरसात कभी भी हो सकती थी । तभी हृदेश ने बताया कि आम के रस की वह विज्ञापन फिल्म इन्ही पेड़ों के झुरमुठ में बनाई गई थी और आम लाकर पेड़ पर लटगाए गए थे । रा वन जैसी कुछ और फिल्मो की शूटिंग भी यही हुई थी । खैर शाम ढल चुकी थी और जाना जंगल के डाक बंगले में था इसलिए निकल गए । रास्ता भी पदादों पर कभी ऊपर जाता तो कभी नीचे आता । दोनों तरफ हरियाली ही हरियाली ,वह भी ऐसी की आँख झपकाने का मन न करे । बगल के पहाड़ों पर पत्थर इस तरह एक दूसरे के ऊपर खड़े थे मनो किसी न हाथ से खड़ा किया हो । तेज बरसात में ओरछा रेल क्रासिंग पर कार रुकी तो बगल में गायों का झुंड खड़ा नजर आया । दो गाय बगल की झोपड़ी में बरसात से बचने के लिए आसरा लिए हुए थी । बहुत दिन क्या सालों बाद दोनों बच्चों के बिना निकले थे क्योकि दोनों व्यस्त थे । बाहर निकलने में पूरे साजो सामन के साथ निकलना पुराना नियम है जिसमे बिजली की चाय की केतली ,पावडर दूध के पाउच ,शुगर क्यूब और डिप वाली चाय । इसके अलावा सब्जी सलाद का सामान रास्ते से लेना ताकि रात में दिक्कत न हो । बरुआ बाजार में सविता को सब्जी देख रहा नहीं गया और भुट्टा ,हरा बैगन ,खीर टमाटर आदि सब ले लिया । इस बीच सपरार बांध के डाक बंगला से संपर्क करने का प्रयास कर रहे थे ताकि खाने की व्यवस्था का पता किया जा सके । एक तो बरसात दूसरे जंगल की व्यवस्था । अगर कोई भी व्यवस्था न हो तो चूल्हे पर खाना बन सके इसलिए कच्चा सामान जरुती था । हिमाचल ,उतराखंड और छत्तीसगढ़ में इसका अनुभव हो चूका है । हालाँकि छत्तीसगढ़ में हर जगह व्यवस्था हो गयी थी सिर्फ उदयन्ती अभ्यारण्य के तौरंगा डाक बंगले को छोड़ पर वहा जो खाना ले गए थे वह काम आ गया था । खैर बरुआ सगर से आगे अँधेरा घिर गया था और बरसात से गाड़ी की रफ़्तार भी काफी कम थी । गजब का मौसम । तभी सुनील ने फोन कर बताया कि खाना पैक कराकर ले जाना होगा क्योकि वहा गैस ख़त्म हो चुकी है । रात के करीब आठ बज चुके थे । फिर सुधीर जी इसकी जानकारी दी तो उन्होंने कहा ,रास्ते में नवोदय विद्यालय में मई हूँ वहा से होकर जाए व्यवस्था हो जाएगी । मौउरानीपुर सविता के पिता जी का ननिहाल भी है इसलिए वे चाह रही थी कि रिश्ते की एक दादी जिन्दा हो तो उनसे मिल लें । रिश्तेदारी निभाने में बहुत कमजोर हूँ और गोरखपुर जाने पर भी बाहर रुकना ही पसंद करता क्योकि मम्मी पापा जल्दी सोने वाले रहे और मै देर तक कई लोगों के साथ बैठने वालों में । अब मम्मी रही नहीं और पापा से औपचारिक बातचीत होती है वे भी अस्सी पार हो चुके है पर घूमने का शौक बरक़रार है । करीब छह महिना पहले कैंसर से ठीक हुए तो गोरखपुर रहने की जिद की क्योकि पेड़ पौधों की हिफाजत करना चाहते थे और फिर तबियत बिगड़ी तो बहन के पास बनारस भेजा । अपने से नाराज रहते है इसलिए लखनऊ /रामगढ नहीं आते । अब उन्हें दिल्ली से गोरखपुर लौटना था । पर इस बीच जब रास्ते में था तभी अमेरिका बस गए छोटे भाई की तरफ से उन्हें बुलाने की जानकारी मिली ,करीब बीस घंटे की बदल कर जाने वाली फ्लाईट । मेरा कहना था गोरखपुर जाने में भी तो इतना ही वक्त ट्रेन से लगेगा । पर चिंता बढ़ गई थी ।मेरे पास लैपटाप नहीं था और उनके टिकट मुझे मेल किये गए थे । यह सब सोचते सोचते अचानक गाड़ी रुकने से ध्यान भंग हुआ । आगे निकल आए थे । करीब चार किलोमीटर पीछे गए तो वहा सुधीर हैं कुछ साथियों के साथ खड़े थे । कुछ देर बैठे तभी तीन टिफिन गाड़ी में रखवा दिए गए । उन्होंने रास्ता भी बताया और फिर आगे चल पड़े । पर शहर में जो घुसे तो निकलना मुश्किल लगने लगा । पूछते पूछते आगे बढे तो शहर पार करते घुप अँधेरा । तीन चार किलोमीटर दूर बताया गया था और सात किलोमीटर दूर आ चुके थे । सड़क के दोनों किनारों पर पानी भरा जंगल नजर आ रहा था । एक जगह लालटेन टिमटिमाती दिखी तो पता किया और उसने बताया अभी आगे जाकर बाएं मुड़ना होगा । सन्नाटा और अँधेरा दोनों डराने वाला था । एक कच्ची सड़क पर कुछ दूर जाने के बाद निरीक्षण भवन का छोटा बोर्र्ड नजर आया आगे गेट बंद था । कुछ देर हार्न देने के बाद दो लोग नजर आए और गेट खुला । किनारे का कमरा खोला जो पुराने जमाने के फर्नीचर वाला था ।अँधेरे में बाहर कुछ दिख नहीं रहा था । जारी