अंबरीश कुमार
अठहत्तर साल के मुलायम सिंह यादव आज शाम जब दिल्ली में निर्वाचन आयोग के दफ्तर गए तो उनके साथ चार नेता भी नहीं थे .यह उस पार्टी के अध्यक्ष का हाल था जिसने देश के सबसे बड़े सूबे में तीन बार खुद मुख्यमंत्री रहे ,देश के रक्षा मंत्री रहे और प्रधानमंत्री बनतेबनते रह गए .यूपी में उनकी सरकार है पर साथ कौन लोग थे अमर सिंह .जयाप्रदा और शिवपाल .ये तीन नेता किस राजनैतिक संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं ,यह किसी को बताने की जरुरत नहीं है .यह देख बहुत ही खराब लगा. जो व्यक्ति अपनी राजनैतिक दबंगई के लिए मशहूर था वह कितना असहाय नजर आ रहा था . मुलायम सिंह यूपी में पिछड़ी जातियों की आक्रामक राजनीति के प्रतीक रहे .एक बार उन्होंने कहा था कि अगर इटावा के अहीरों को पता चल जाए कि मै प्रधानमंत्री बनने जा रहा हूं तो यह खबर सुनने के घंटे भर के भीतर वे उत्तेजित होकर किसी का भी सिर फोड़ सकते हैं .पर दुर्भाग्य देखिए उन्ही मुलायम को निर्वाचन आयोग यह बताने के लिए खुद जाना पड़ा कि वे ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं .इससे पहले उनकी पार्टी मुख्यालय भी छीन लिया गया और उन्हें ऐसा ' रहनुमा ' बना दिया गया जिसपर कर दल का पानी पीने वाले नरेश अग्रवाल भी हल्की टिपण्णी कर रहे थे .पर क्या खुद मुलायम सिंह इन हालात के लिए जिम्मेदार नहीं है .उन्होंने समाजवाद को अपने परिवार की राजनैतिक ढाल बना दिया .किसी भी खांटी समाजवादी को उन्होंने वह ताकत ही नहीं दी कि वह परिवार से अलग अपनी कोई जगह बना सके . मोहन सिंह ,बृजभूषण तिवारी से लेकर जनेश्वर मिश्र जैसे समाजवादी पर अमर सिंह ज्यादा भारी पड़ते थे .क्योंकि मुलायम सिंह ने ही अमर सिंह को समाजवाद के सिर पर बैठा रखा था .जुझारू समाजवादी राजबब्बर को किस तरह बेइज्जत कर पार्टी से बाहर किया गया ,यह कोई भूला नहीं है .
खैर मामला यहीं तक नहीं रुका .उन्होंने राजनीति में अपराधियों को जमकर बढ़ावा दिया ..प्रदेश के हर माफिया डान का समाजवादी पार्टी में स्वागत होता था .हत्या और अपहरण के आरोपी अमरमणि त्रिपाठी को तो उन्होंने प्रदेश को बचाने वाला महापुरुष घोषित कर दिया था .कौन बाहुबली बचा था उस दौर में जो समाजवादी नहीं कहलाता था .जिस गाडी पर सपा का झंडा उस गाड़ी में में बैठा गुंडा , जैसा नारा उसी दौर का तो है .मुलायम सिंह ने दांव भी सभी को दिया .न चंद्रशेखर बचे न वीपी .और आगे बढाने को तो अपने जिले के कप्तान को भी वे कैबिनेट मंत्री बना सकते थे .पर दुर्भाग्य देखिये ये सब संकट की घड़ी में उनका साथ छोड़ गए .मुझे याद है लखनऊ से गोरखपुर फिर जौनपुर जा रहा था .हेलीकाप्टर में जोई सज्जन मुलायम के साथ बैठे थे उन्हें मै पहचानता नहीं था .उनसे मैंने कहा आप सामने की सीट पर आ जाएं मुझे बात करनी है .वे फ़ौरन मेरी सीट पर आ गए .बाद में मुलायम के सुरक्षा प्रभारी शिवकुमार ने कहा ,आप इन्हें नेताजी के साथ बैठने दे ये बंगाल के बड़े नेता है .बाद में पता चला कि ये किरणमय नंदा थे जिन्होंने बाद में उस सम्मलेन की अध्यक्षता की जिसमे मुलायम सिंह को ' रहनुमा ' बना दिया गया .किरणमय नंदा को क्या नहीं दिया मुलायम सिंह ने पर वे भी साथ छोड़ गए .वजह वे लोग रहे जिन्हें मुलायम सिंह यादव ने आगे बढाया .अमर सिंह ,शिवपाल और गायत्री से लेकर मुख़्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बहुत से उदाहरण है .एक तरफ परिवार के लोग तो दूसरी तरफ तरह तरह के दागी .टकराव तब बढ़ा जब मुलायम सिंह ने अपनी दूसरी पत्नी के दबाव में कुछ फैसले लिए .इसे अमर सिंह ,शिवपाल और गायत्री आदि ने शाह दी .अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से इसी दबाव में मुलायम सिंह ने हटाया और उसी के बाद पार्टी बंटने लगी और अब बंटी नहीं पूरी तरह एक तरफ चली गई है .यही वजह है आज चार कद्दावर नेता भी मुलायम को नहीं मिले .दुःख हुआ ' धरती पुत्र ' को धरती पर गिरते देख .यह तय है जिस चुनाव चिन्ह को वे बचाने गए थे वह अंततः जब्त ही होना है .
Showing posts with label मुलायम सिंह यादव. Show all posts
Showing posts with label मुलायम सिंह यादव. Show all posts
Monday, January 2, 2017
चार लोग भी नहीं मिले आज मुलायम को !
अंबरीश कुमार
अठहत्तर साल के मुलायम सिंह यादव आज शाम जब दिल्ली में निर्वाचन आयोग के दफ्तर गए तो उनके साथ चार नेता भी नहीं थे .यह उस पार्टी के अध्यक्ष का हाल था जिसने देश के सबसे बड़े सूबे में तीन बार खुद मुख्यमंत्री रहे ,देश के रक्षा मंत्री रहे और प्रधानमंत्री बनतेबनते रह गए .यूपी में उनकी सरकार है पर साथ कौन लोग थे अमर सिंह .जयाप्रदा और शिवपाल .ये तीन नेता किस राजनैतिक संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं ,यह किसी को बताने की जरुरत नहीं है .यह देख बहुत ही खराब लगा. जो व्यक्ति अपनी राजनैतिक दबंगई के लिए मशहूर था वह कितना असहाय नजर आ रहा था . मुलायम सिंह यूपी में पिछड़ी जातियों की आक्रामक राजनीति के प्रतीक रहे .एक बार उन्होंने कहा था कि अगर इटावा के अहीरों को पता चल जाए कि मै प्रधानमंत्री बनने जा रहा हूं तो यह खबर सुनने के घंटे भर के भीतर वे उत्तेजित होकर किसी का भी सिर फोड़ सकते हैं .पर दुर्भाग्य देखिए उन्ही मुलायम को निर्वाचन आयोग यह बताने के लिए खुद जाना पड़ा कि वे ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं .इससे पहले उनकी पार्टी मुख्यालय भी छीन लिया गया और उन्हें ऐसा ' रहनुमा ' बना दिया गया जिसपर कर दल का पानी पीने वाले नरेश अग्रवाल भी हल्की टिपण्णी कर रहे थे .पर क्या खुद मुलायम सिंह इन हालात के लिए जिम्मेदार नहीं है .उन्होंने समाजवाद को अपने परिवार की राजनैतिक ढाल बना दिया .किसी भी खांटी समाजवादी को उन्होंने वह ताकत ही नहीं दी कि वह परिवार से अलग अपनी कोई जगह बना सके . मोहन सिंह ,बृजभूषण तिवारी से लेकर जनेश्वर मिश्र जैसे समाजवादी पर अमर सिंह ज्यादा भारी पड़ते थे .क्योंकि मुलायम सिंह ने ही अमर सिंह को समाजवाद के सिर पर बैठा रखा था .जुझारू समाजवादी राजबब्बर को किस तरह बेइज्जत कर पार्टी से बाहर किया गया ,यह कोई भूला नहीं है .
खैर मामला यहीं तक नहीं रुका .उन्होंने राजनीति में अपराधियों को जमकर बढ़ावा दिया ..प्रदेश के हर माफिया डान का समाजवादी पार्टी में स्वागत होता था .हत्या और अपहरण के आरोपी अमरमणि त्रिपाठी को तो उन्होंने प्रदेश को बचाने वाला महापुरुष घोषित कर दिया था .कौन बाहुबली बचा था उस दौर में जो समाजवादी नहीं कहलाता था .जिस गाडी पर सपा का झंडा उस गाड़ी में में बैठा गुंडा , जैसा नारा उसी दौर का तो है .मुलायम सिंह ने दांव भी सभी को दिया .न चंद्रशेखर बचे न वीपी .और आगे बढाने को तो अपने जिले के कप्तान को भी वे कैबिनेट मंत्री बना सकते थे .पर दुर्भाग्य देखिये ये सब संकट की घड़ी में उनका साथ छोड़ गए .मुझे याद है लखनऊ से गोरखपुर फिर जौनपुर जा रहा था .हेलीकाप्टर में जोई सज्जन मुलायम के साथ बैठे थे उन्हें मै पहचानता नहीं था .उनसे मैंने कहा आप सामने की सीट पर आ जाएं मुझे बात करनी है .वे फ़ौरन मेरी सीट पर आ गए .बाद में मुलायम के सुरक्षा प्रभारी शिवकुमार ने कहा ,आप इन्हें नेताजी के साथ बैठने दे ये बंगाल के बड़े नेता है .बाद में पता चला कि ये किरणमय नंदा थे जिन्होंने बाद में उस सम्मलेन की अध्यक्षता की जिसमे मुलायम सिंह को ' रहनुमा ' बना दिया गया .किरणमय नंदा को क्या नहीं दिया मुलायम सिंह ने पर वे भी साथ छोड़ गए .वजह वे लोग रहे जिन्हें मुलायम सिंह यादव ने आगे बढाया .अमर सिंह ,शिवपाल और गायत्री से लेकर मुख़्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बहुत से उदाहरण है .एक तरफ परिवार के लोग तो दूसरी तरफ तरह तरह के दागी .टकराव तब बढ़ा जब मुलायम सिंह ने अपनी दूसरी पत्नी के दबाव में कुछ फैसले लिए .इसे अमर सिंह ,शिवपाल और गायत्री आदि ने शाह दी .अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से इसी दबाव में मुलायम सिंह ने हटाया और उसी के बाद पार्टी बंटने लगी और अब बंटी नहीं पूरी तरह एक तरफ चली गई है .यही वजह है आज चार कद्दावर नेता भी मुलायम को नहीं मिले .दुःख हुआ ' धरती पुत्र ' को धरती पर गिरते देख .यह तय है जिस चुनाव चिन्ह को वे बचाने गए थे वह अंततः जब्त ही होना है .
Friday, December 30, 2016
अब सूतक उतर गया !
अंबरीश कुमार
लखनऊ .उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ राजनीति का सूतक आज शाम उतर गया .गम वाले घरों में तो इसकी सीमा दस दिन से तीस तीन होती है पर समाजवादी पार्टी की राजनीति में यह साठ दिन तक चली .अब अखिलेश यादव की राजनीति का नया दौर शुरू हो रहा है .कुछ दल खासकर भाजपा को इससे फौरी ख़ुशी हो सकती है पर ज्यादा देर यह चलने वाली नहीं है . मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से बाहर कर दिया .जैसे ही यह खबर आई लखनऊ के पांच कालीदास मार्ग से लेकर विक्रमादित्य मार्ग तक नौजवान कार्यकर्त्ता अखिलेश यादव के समर्थन में सड़क पर उतर आया .यह भीड़ काफी हद तक तमिलनाडु में अन्नादुरै से लेकर जयललिता समर्थक जैसी भी थी .उत्तर प्रदेश के लिए यह नई घटना थी .मुलायम सिंह और उनके संगी साथी को यह उम्मीद नहीं होगी .ये नौजवान दागी नहीं बागी हैं .यह फौरी प्रतिक्रिया थी .कुछ घंटे इन्तजार करे प्रदेश में कई जगह यह दृश्य नजर आएगा .मुलायम सिंह ने अमर सिंह और शिवपाल यादव के कहने पर जो यह कार्यवाई की है उससे अखिलेश यादव का कद और बड़ा होने जा रहा है .वे अब बड़ी चुनौती बनेंगे .विधान सभा चुनाव की हार जीत से आगे अखिलेश यादव की लंबी राजनैतिक पारी के लिए यह निर्णायक मोड़ साबित होगा . यह कार्यवाई विधान सभा चुनाव से ठीक पहले हुई है .मुलायम सिंह काफी समय से जिन ताकतों के हाथ में खेल रहे थे उससे सभी को यह लग रहा था कि देर सबेर अखिलेश यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा .वे मुलायम सिंह यादव के समाजवादी रास्ते पर नहीं चल रहे थे .वे बाहुबलियों के पक्ष में नहीं थे .मुख़्तार अंसारी से लेकर अतीक अहमद तक विरोध किया तो डीपी यादव का भी .खनन से बदनाम हुए गायत्री का भी वे विरोध कर रहे थे तो मुलायामवादी अमर सिंह का भी विरोध कर रहे थे .
अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के अकेले नेता हैं जिन्होंने समाजवादी पार्टी का परम्परागत एजंडा बदला और छवि बदली .ये वही समाजवादी पार्टी है जिसके बारे में इस संवाददाता ने लिखा था 'बाहुबलियों का समाजवाद .'उत्तर प्रदेश के ज्यादर बाहुबली एक दौर में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में ही बंटे थे .ये वही पार्टी है जिसके सत्ता में आते ही यह धारणा बनती थी कि अब गुंडों बदमाश और माफिया का राज आ जायेगा .यह धारणा बदली तो सिर्फ अखिलेश यादव के राज में बदली .वे लाठी वाली पार्टी को लैपटाप तक ले गए .पहली बार 2012 में समाजवादी पार्टी को गैर मुस्लिम गैर पिछड़ा वोट मिला तो उसकी मुख्य वजह अखिलेश यादव की बदली हुई राजनीति थी .यह सही है कि अखिलेश यादव ने कुछ दागी को भी साथ रखा पर ज्यादातर छांट दिए गए यह भी उतना ही सच है .आप एक झटके में उत्तर प्रदेश की समूची राजनीति को बदल देंगे जो इस मुगालते में हैं उनका कुछ नहीं हो सकता .बहरहाल जातीय गोलबंदी और बाहुबलियों से घिरी राजनीति पिछले पांच साल में बहुत बदली है तो इसका श्रेय अखिलेश यादव को जाता है .कितना विकास हुआ या नहीं हुआ यह यूपी के लोग जानते है किसी विज्ञापन से बताने की जरुरत नहीं है .अमौसी से इंदिरा नगर तक चले जाएं खुद समझ आ जाएगा .नारायण दत्त तिवारी के बाद अखिलेश यादव दूसरे मुख्यमंत्री हैं जो विकास को एजंडा बना चुके है .ऐसे में चुनावी राजनीति में अखिलेश यादव को काफी आगे ले जा सकती हैं .कुछ दिन और इंतजार करे .पर मुलायम सिंह यादव अब नायक नहीं खलनायक बन चुके हैं .वे लाठी वाली राजनीति पर वापस लौट चुके हैं . किसके इशारे पर उन्होंने यह सब किया यह जानने के लिए किसी शोध की जरुरत नहीं है ,वे तो मोदी के बड़े प्रशंसक बन चुके हैं .
Labels:
अखिलेश यादव,
मुलायम सिंह यादव,
समाजवादी पार्टी
Tuesday, March 18, 2014
मुसलमानो को साधने की कोशिश है मुलायम का आजमगढ़ जाना
मुसलमानो को साधने की कोशिश है मुलायम का आजमगढ़ जाना
उत्कर्ष सिन्हा
लखनऊ। इटावा दिल है तो आजमगढ़ धड़कन के नारे के साथ समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी । मुलायम सिंह मैनपुरी के अलावा पूर्वांचल की आजमगढ़ सीट से भी किस्मत आजमाएंगे। सपा सुप्रीमो फिलहाल मैनपुरी सीट से सांसद हैं. वहीं, आजमगढ़ सीट पर बीजेपी का कब्जा है. रमाकांत यादव यहां से सांसद हैं। मुलायम के अगमगढ़ पहुचने से पूर्वांचल के इस इलाके का चुनावी दंगल और भी रुचिकर हो गया है। पूर्वांचल के इस इलाके में बनारस से ले कर बलिया तक के आठ लोकसभा सीटों में अभी सपा की सबसे ज्यादा सीटें हैं. समाजवादी पार्टी की इस इलाके में चंदौली,गाज़ीपुर,मछलीशहर और बलिया के रूप में आठ सीटे हैं तो बहुजन समाज पार्टी का भदोही, जौनपुर और घोसी सीट पर कब्ज़ा है। भाजपा के पास महज बनारस की एक सीट है जहाँ से अभी मुरली मनोहर जोशी संसद है और इस चुनावो में नरेंद्र मोदी के उम्मेदवारी के जरिये भाजपा पूर्वांचल को प्रभावित करने की रणनीति बना रही है। मोदी के मैदान में उतरने से पार्टी को यह उम्मीद है की मोदी की कथित लहर के जरिये वह पूर्वांचल के साथ साथ बिहार की कई सीटें प्रभावित कर सकती है।
राजनीती के माहिर खिलाडी मुलायम सिंह ने आजमगढ़ के बहाने कई निशाने साधे हैं। मुलायम के यहाँ आने से एक तो मोदी का प्रभाव दूर तक जाने की सम्भावना ख़त्म हो जाती है और मुलायम की इस उम्मेदवारी से इस इलाके में समजवादी पार्टी की सीटे सुरक्षित होने की उम्मीद बढ़ जायेगी। साथ ही साथ मुलायम सिंह आजमगढ़ के घाव को भी सहलायेंगे। बीते दिनों आजमगढ़ के संजरपुर गाव का नाम मुस्लिम आतंकियो से जोड़ने की एक मुहीम सी चली थी और बाटला हॉउस कांड ने भी इस इलाके को सुर्ख़ियों में रखा था। इसी का नतीजा था की उलेमा काउन्सिल नाम की नयी पार्टी के उम्मीदवार ने पिछले चुनावो में लगभग 90 हजार वोट पाये थे। राजनितिक समीक्षक प्रोफ़ेसर रमेश दिक्सित कहते हैं कि आजमगढ़ सीट पर यादव और मुस्लिम वोटर बड़ी तादात में है इसलिए मुलायम के पारम्परिक वोट समीकरण को बनाये रखने का सन्देश भी वे देना चाहते हैं । यह समाजवादी पार्टी का पहले से ही मजबूत इलाका रहा है और मुलायम सिंह के जाने से उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल भी ऊँचा होगा। मुजफ्फर नगर दंगो के बाद यह अटकले लगायी जा रही थी कि समाजवादी पार्टी से मुसलमान वोटर दूर हो रहा है। मुलायम आजमगढ़ के बहाने यह सन्देश भी रहे हैं कि वे मजलूम मुस्लिम युवको के पक्ष में है। और अगर यह सन्देश काम कर गया तो इस इलाके की कम से कम आठ सीटों पर सपा को फायदा हो सकता है।
आजमगढ़ से मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक यादव को चुनाव लड़ने की भी कई कवायदे हुयी मगर पार्टी ने पहले सूबे की सरकार के मंत्री बलराम यादव का नाम घोषित किया और फिर उसे बदल कर हवलदार यादव का नाम दे दिया। मगर यह उम्मेदवारी बहुत हलकी थी। आजमगढ़ से अखिलेश सरकार में अभी बलराम और दुर्गा यादव के रूप में दो मंत्री है। वही रमाकांत यादव का कद मुलायम के सामने बहुत बौना है। इसलिए मुलायम को तो यह सीट जीतने में अतिरिक्त मेहनत की तो जरूरत नहीं ही होगी साथ ही साथ मुस्लिमों को बड़ा सन्देश देने में भी आजमगढ़ के जरिये मुलायम कामयाब हो गए तो समाजवादी पार्टी के लिए सूबे की सीटें जीतना आसान हो जाएँगा।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क
नरेंद्र मोदी को हरा कर दिखायेगे: डा.रामगोपाल
नरेंद्र मोदी को हरा कर दिखायेगे: डा.रामगोपाल
दिनेश शाक्य
भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए समाजवादी पार्टी पूरी तरह से सजग हो चुकी है इसी कारण समाजवादी पार्टी ने अपने मुखिया मुलायम सिंह यादव को पहली बार पूर्वाचंल की आजमगढ से उतारने का फैसला कर लिया इसके बावजूद मुलायम मैनपुरी से भी चुनाव लडेगे। सपा की यह सब कवायत नरेंद्र मोदी के प्रभाव को पूरी तरह से खत्म करने की मंशा के तहत किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी मे चाणक्य की भूमिका अदा कर रहे डा.रामगोपाल यादव नरेंद्र मोदी की रणनीति पर पूरी तरह से निगाह रखे हुए है। नरेंद्र मोदी को रोकने की कवायत किस ढंग से कर रहे रामगोपाल उनसे कई मुददो पर बात की जनादेश सबांददाता दिनेश शाक्य ने। पेश है डा.रामगोपाल यादव के बातचीत के खास अंश।
00 सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को मैनपुरी के साथ साथ पूर्वाचंल के आजमगढ से लडाने का फैसला लेने के पीछे आखिर क्या मंशा है ?
0 देखिये पूर्वी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलो के कार्यकर्त्ता और नेता यह चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव आजमगढ से भी चुनाव लडे और पार्टी के कार्यकर्त्ताओ की इच्छा का सम्मान करते हुए समाजवादी पार्टी ने आज यह निर्णय लिया है कि वो मैनपुरी के साथ साथ आजमगढ से भी चुनाव लडेगे। आजमगढ से चुनाव लडने से हम पूर्वाचंल की लगभग सारी सीटे जीतेगे चाहे वो आजमगढ हो,चाहे लालगंज हो,चाहे गाजीपुर हो,चाहे बलिया हो,सलेमपुर हो,देवरिया हो,बस्ती हो,सिदार्थनगर हो,चाहे जौनपुर हो,चाहे महाराजगंज हो,इन सारी सीटो पर समाजवादी पार्टी चुनाव जीतेगी और मोदी को बनारस मे हरा देगे जो हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे है आज देख लीजिऐगा मुलायम सिंह के आजमगढ से उम्मीदवार घोषित होते ही मोदी बनारस के साथ साथ गुजरात से भी चुनाव लडने के लिए तैयार हो गये है ऐसी खबरे मिलने लगी है मोदी दो जगह से चुनाव लडने का कदम इसलिए उठा रहे है कि कही ऐसा ना हो कि बनारस से चुनाव हार जाये। दो दिन मे यह साफ हो जायेगा कि मोदी कहा कहा से चुनाव लडेगे क्यो कि जो दांव यह लोग चल रहे थे कि मोदी को बनारस से लडाने से लहर पूर्वाचंल और बिहार तक चली जायेगी हकीकत मे मुलायम सिंह यादव के आजमगढ से लडने से लहर पूरे पूर्वाचंल मे जरूर चली जायेगी।
00 आजमगढ से मुलायम सिंह यादव के लडने से समाजवादी पार्टी को क्या फायदा मिलेगा ?
0 समाजवादी पार्टी पूरे पूर्वाचंल मे स्वीप करेगी भारतीय जनता पार्टी को एक भी सीट नही मिलेगी ढूढने से भी।
00 रैलियो और विकास के मामले मे समाजवादी पार्टी पहले ही मोदी को पछाड चुकी है ऐसे मे उनको डर इस बात का लग रहा है कि वो बनारस से हार जायेगे इसलिए गुजरात से भी लडने का मन बना रहे है ?
0 देखिये,पहले मुरली मनोहर जोशी का कद बहुत बडा है वो केवल बनारस मे 17000 वोटो से ही जीते थे तो कोई आसन सीट तो है नही कि जाये और चुनाव जीत करके चले आये कोई वेस वोट भी नही है इसलिए उन्हे सुरिक्षत सीट तो ढूढनी ही होगी और हम लोग कोशिश यह करेगे कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश से पराजित होकर जाये कि उत्तर प्रदेश मे जो हमला करने की इनकी कोशिश है आधी तो उनकी उसी दिन फेल हो गई कि जब उनको कही उम्मीदवार नही मिले आप देख रहे आसपास जो भाजपा का उम्मीदवार हो कोई बीएसपी आया है तो कोई और किसी दल से,कोई किसी पार्टी से नही आया है। सब ऐसे ही है करीब करीब 50 प्रत्याशी। जो प्रत्याशी घोषित किये गये है उनके क्षेत्रो मे विरोध इस कदर शुरू हो गया है कि काले झंडे दिखाये जाने लगे है। पार्टी दफतरो मे मारपीट शुरू हो गई है । देवरिया से गाजियाबाद तक बस्ती से लेकर गाजियाबाद तक हंगामा ही मचा हुआ भाजपा के प्रत्याशी घोषित करने मे,यह चल रहा है मीडिया की ही बदौलत भाजपा चुनाव प्रचार मे दिख रही है वर्ना कही भी नजर नही आती भाजपा।
00भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ बनारस से वैसे तो समाजवादी पार्टी ने पहले ही अपना प्रत्याशी उतार रखा है फिर भी किसी साझा उम्मीदवार के उतारने की मंशा है ऐसी खबरे कही जा रही है ?
0 नही,समाजवादी पार्टी के वहा से उम्मीदवार है कैलाश चौरसिया,जो उत्तर प्रदेश सरकार मे राज्यमंत्री है और समाजवादी पार्टी स्वंय अपने बल पर अपने उम्मीदवार के जरिये ही नरेंद्र मोदी को हराने की स्थिति मे है इसलिए किसी साझा उम्मीदवार को उतारने का सवाल ही पैदा नही होता है अगर कोई दल हमारे उम्मीदवार का समर्थन करता है तो समाजवादी पार्टी इस पर विचार करेगी।
Subscribe to:
Posts (Atom)