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Tuesday, December 11, 2018

क्या टूटने लगा है मोदी का तिलिस्म !

अंबरीश कुमार धान का कटोरा कहे जाने वाले छतीसगढ़ में भाजपा के चाउर वाले बाबा की सरकार जा चुकी है । छतीसगढ़ में भाजपा बुरी तरह हारी है । वोट काटने की रणनीति के चलते खड़े किए गए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी कोई मदद नहीं कर पाए । राजा महाराजों के अंचल राजस्थान में महारानी का राजपाट भी जा रहा है । सिर्फ मध्य प्रदेश में भाजपा के पिछड़े नेता शिवराज सिंह चौहान ही मुकाबला कर पाए हैं ।हालांकि सपा बसपा ने यह साफ़ कर दिया है कि वह भाजपा के साथ नहीं जाएंगे ऐसे में कांटे के मुकाबले में मध्य प्रदेश में भी भाजपा का रास्ता बहुत आसान नहीं है । तीनो ही हिंदी भाषी राज्यों में शाम तक के रुझान के मुताबिक भाजपा को बड़ा झटका लगा है ।इसके साथ ही भाजपा के शीर्ष नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तिलिस्म टूटता नजर आ रहा है । हिंदी पट्टी जिसे ' गाय पट्टी ' भी कहते है वहां के तीन राज्यों से भारतीय जनता पार्टी पिछले चुनाव के मुकाबले बुरी तरह हार गई है।हालांकि भाजपा कई बार चुनाव हारने के बाद भी जोड़ तोड़ से सरकार बना लेती है।राज्यपाल तो अभी अपनी भूमिका निभाएंगे ही । पर भाजपा और मोदी को बड़ा झटका लग चुका है यह वास्तविकता भी है । ये वही ' गाय पट्टी ' है जहां भाजपा गाय ,गोकशी और मंदिर का मुद्दा लगातार उठा रही थी । पर जमीनी मुद्दों ने भाजपा का खेल बिगाड़ दिया । इन तीनो राज्यों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल थी । कहीं नेतृत्व था तो कहीं बिखरा हुआ नेतृत्व था । कांग्रेस के लिए इन राज्यों में कुछ खोने को नहीं था । हालांकि कांग्रेस ने अगर अपना अहंकार छोड़ कर तीनो ही राज्यों में बसपा सपा के साथ गठजोड़ किया होता तो जीत और बड़ी होती । राहुल गांधी के लिए भी यह एक सबक है ।इसके बावजूद राहुल गांधी की राजनैतिक ताकत बढ़ी है । पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी मोदी को सीधी चुनौती देते रहे हैं । राहुल गांधी ने नोटबंदी ,राफेल से लेकर बैंकों को हजारों करोड़ का चूना लगाने वाले उद्योगपतियों का सवाल ढंग से उठाया था । संजोग से आज ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल का पार्टी अध्यक्ष के रूप में एक साल पूरा हुआ है।साल भर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कैसा काम किया यह उसका नतीजा भी है।पिछले एक दशक में की राजनीति में काफी बदलाव आया है । अब वे अपनी तीखी राजनैतिक टिपण्णी की वजह से भी चर्चा में रहते हैं । जैसे कभी मोदी अपने भाषण की वजह से चर्चित हुए थे । पर अब तो मोदी के भाषण भी उनकी हताशा को दर्शा रहे हैं तो सरकार के कामकाज को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं । अब मोदी के भाषण में न तो राजनैतिक धार बची है न ही भाषा की मर्यादा ।' कांग्रेस की विधवा ' वाली टिपण्णी की देशभर में मोदी की निंदा हुई है । बहरहाल सरकार का कामकाज ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है । मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कामकाज का भी यह नतीजा है।यह चुनाव नतीजा कामकाज और भाषण के फर्क को भी दर्शाता है।आप बहुत अच्छे वक्ता हो सकते हैं पर अगर सरकार ढंग से नहीं चला सकते हैं तो आम जनता को ज्यादा दिन भरमा नहीं सकते ।साफ़ है केंद्र और राज्य सरकार ने जो भी काम करने का दावा किया था वह जमीनी स्तर पर हवा में था । दूसरे उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में भाजपा जिस हिंदुत्व के मुद्दे को उभारने में जुटी थी उसका कोई बहुत ज्यादा असर इन राज्यों पर नहीं पड़ा । किसानो का सवाल ,नौजवानों का सवाल हो या दलित आदिवासियों का सवाल ज्यादा प्रभावी रहा । इन तीनो हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बना हुआ था । तरह तरह के घपले घोटाले तो थे ही साथ ही सरकार के कामकाज के तौर तरीकों से हर वर्ग नाराज हो रहा था । सबसे ज्यादा नाराजगी किसानो को की थी .नतीजा सामने है । दो राज्यों में तो काफी लंबे समय से ही भाजपा की सरकार थी.राजस्थान में पांच साल में ही भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बना हुआ था । इन चुनाव नतीजों पर बात करने से पहले देश में पिछले एक वर्ष की घटनाओं पर नजर डालें।सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के चार जज सार्वजनिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस करते हैं।वे चीफ जस्टिस की मनमानी के खिलाफ सवाल उठाते हैं।मुद्दा मनचाही बेंच को मनचाहा मामला देने से शुरू हुआ।जानकारी के मुताबिक केस था लालू प्रसाद यादव वाला।विवादों में घिरे चीफ जस्टिस के खिलाफ कांग्रेस महाभियोग प्रस्ताव भी लाती है।हाल में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर हुए जस्टिस कुरियन जोसेफ ने मीडिया कप बताया कि चीफ जस्टिस किसी बाहरी ताकत के इशारे पर काम कर रहे थे।यह आरोप आजाद भारत में पहले कभी नहीं लगा।लोकतंत्र का एक स्तंभ न्यायपालिका की साख किस तरह गिरी यह इस उदाहरण से साफ़ है।अब आइए सीबीआई पर।सीबीआई चीफ को सरकार ने तब छुट्टी पर भेजा जब उनके मातहत अफसर पर सीबीआई ने ही आपराधिक मामला दर्ज कर लिया।इस मामले के तार प्रधानमंत्री कार्यालय तक जुड़े हैं ऐसा आरोप लगा है।सोमवार को रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा दे दिया।उससे पहले सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हुआ विवाद चर्चा का विषय बना रहा।यह बानगी है मोदी सरकार के कामकाज की।नोटबंदी से लेकर जीएसटी जैसे मुद्दों को अलग रखे।डीजल पेट्रोल के लगातार बढती कीमतों को भी अलग रखे तो भी केंद्र सरकार के खिलाफ हिंदी पट्टी में एक आक्रोश तो उभरता हुआ दिख ही रहा था। जिन हिंदी भाषी राज्यों में चुनाव हुए उन सभी राज्यों में अलग अलग मुद्दे प्रभावी हुए। छतीसगढ़ में भाजपा ने चुनाव से पहले ही बहुत जोड़तोड़ किया था पर मामला बना नहीं । अजीत जोगी वाला पैंतरा भी नहीं चला ।भाजपा तो जा ही रही है साथ ही जोगी को भी निपटाती जा रही है । पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इन तीनो राज्यों के चुनाव के बाद की राजनीति हो गई है । अब लोकसभा का चुनाव सामने है । विपक्ष एकजुट होने लगा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न सिर्फ एकजुट विपक्ष की बड़ी चुनौती मिलेगी बल्कि पार्टी के भीतर भी चुनौती मिल सकती है । अब मोदी का चेहरा पार्टी को लोकसभा चुनाव में जीत दिला पाएगा या नहीं यह सवाल भी उठ सकता है । पार्टी ही नहीं संघ नेतृत्व में भी मंथन तो होगा ही । संघ अगर भाजपा के लौह पुरुष रहे आडवाणी को हाशिए पर डाल सकता है तो दूसरे को भी उसी रास्ते पर भेजने में वे क्यों हिचकेंगे । इसकी बड़ी वजह उत्तर प्रदेश और बिहार की मौजूदा बदलती राजनैतिक स्थितियां हैं ।बिहार में भाजपा लगातार कमजोर हो रही है ।उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का मुद्दा अब भाजपा के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है । दूसरे बसपा और सपा के बीच गठजोड़ होना तय है ,ऐसे में भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती यूपी से ही मिलेगी ।प्रदेश से भाजपा में सबसे ज्यादा सीटें जीती है । इन तीनो राज्यों के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी असर पड़ना तय है । हालांकि दिल्ली में विपक्ष की राजनीति से समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने जिस तरह दूरी बनाई हुई है वह समझ से बाहर है। जबकि अब क्षेत्रीय दल सीबीआई के खौफ से मुक्त होते जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा । आज दिल्ली के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित संशोधित टिपण्णी

Saturday, March 11, 2017

उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज !

उत्तर प्रदेश में मोदी का रामराज ! अंबरीश कुमार लखनऊ. उत्तर प्रदेश में रामराज आ गया है. पूरी ताकत के साथ लोगों ने इसके लिए वोट दिया है. हो सकता है यह किसी प्रतिक्रिया में हो पर यह हिंदू लहर है. इस लहर में अखिलेश का विकास का एजेंडा भी बह गया तो मायावती जैसी आयरन लेडी के कुशल प्रशासन की धमक भी ध्वस्त हो गयी. ऐसी लहर होगी यह कोई नहीं समझ पाया था. हम भी इस लहर को नहीं देख पाये. पर यह लहर मोदी की रणनीति से बनी जिसकी तैयारी उन्होंने काफी पहले शुरू कर दी थी. पहले सोशल इंजीनियरिंग की फिर प्रदेश के समूचे हिंदू मन को प्रभावित कर मजहबी गोलबंदी कर दी. वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश में जो मोदी की लहर चली उसमे हिंदुत्व के चूल्हे पर चढ़ी रोटी को तवे पर एक तरफ से पलट दिया गया था, इस बार वह रोटी दूसरी तरफ से भी पलट दी गयी है. मोदी ने चुनाव प्रचार में झूठ बोला हो या सच, लोगों ने उनपर भरोसा किया. अखिलेश, राहुल और मायावती पर भरोसा नहीं किया, यह सच है. ये नेता अब आत्ममंथन करें कि आखिर ऐसा क्यों हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश को लेकर हर तरह की रणनीति बनायी और उसमे वे कामयाब भी हुए. पहले पिछड़ों को जोड़ा. एक-एक करके प्रदेश अध्यक्ष बदला. पार्टी के संगठन में गैर यादव पिछड़ी जातियों को जोड़ने का काम किया तो उन्हें उम्मीदवार भी बनाया. ऐसे राजनैतिक दलों से तालमेल किया जो अति पिछड़ी जातियों में जनाधार रखते हैं. भारतीय समाज पार्टी हो या अपना दल. वे तिनका तिनका जोड़ रहे थे, काफी समय से. भाजपा किसी वार रूम के भरोसे नहीं थी. उसके साथ वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्त्ता, पत्रकार और बुद्धिजीवी जमात थी. और अंत में वे उस मजहबी गोलबंदी में भी कामयाब हुए जो उनका अंतिम अस्त्र था. पर यह सब एक के बाद एक रणनीति के साथ हुआ. अमित शाह और मोदी ने एक-एक जिले और एक एक बूथ के समीकरण को समझा .परस्पर विरोधी धारा वाले नेताओं को साथ खड़ा कर दिया .यह सब उनकी जीत की वजह बने. पर समाजवादी तो तिनका-तिनका बिखेर रहे थे. सत्ता,पैसा और आर्थिक लूट को लेकर सरकार लगातार घिरी तो अंत में सैफई का परिवारवाद भी विपक्ष के निशाने पर रहा. इस सबके बावजूद समाजवादी विचार धारा से जुड़े बहुत से नेता ,कार्यकर्त्ता और बुद्धजीवी जो मदद भी करना चाहते थे उनसे भी कोई संवाद करने को तैयार नहीं नजर आया. कुछ समाजवादी धारा के कार्यकर्त्ता जो चुनाव में प्रचार में भी जुटे उन्हें भी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. फिर भी अन्य राजनैतिक दलों के कार्यकर्त्ता अपने स्तर पर काम करते रहे. यही राजनैतिक अहंकार उन्हें ले डूबा. कांग्रेस तो इसमें और आगे थी. इसी अहंकार का नतीजा था कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को किसी ने प्रचार में बुलाने तक की जहमत तक किसी ने नहीं उठाई . इस बारे में केसी त्यागी ने जब खुद फोन किया तो कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ने फोन तक नहीं उठाया. समाजवादी पार्टी ने एक बार भी प्रयास नहीं किया कि इन दिग्गज नेताओं की मदद ली जाये. सोशल इंजीनियरिंग का यह हाल था जो अति पिछड़ा बहुल इलाका था वहां अगड़ा उम्मीदवार दे दिया. कई ऐसे उम्मीदवारों का टिकट पारिवारिक विवाद में कट गया जो जीत सकते थे . कौमी एकता दल के साथ तालमेल सिर्फ मुख्तार अंसारी के नाम पर ख़ारिज कर देना बड़ी रणनीतिक भूल थी. अखिलेश यादव सिर्फ मुस्लिम -यादव समीकरण के भरोसे विकास के एजेंडा पर चुनाव लड़ रहे थे वह भी अराजनैतिक किस्म के वार रूम के जरिये. जबकि चुनाव में अन्य जातियों की भी बड़ी भूमिका होती है. दूसरी जातियों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद गाजियाबाद से लेकर गाजीपुर तक के थाने में सिर्फ अहीर थानेदार नियुक्त होता है. यह स्थिति कई बड़े पदों पर भी होती है. हालांकि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की जातीय छवि को तोड़ने का प्रयास भी किया पर वे भी इस धारणा को तोड़ नहीं पाये. अखिलेश यादव से कभी यह आभास नहीं मिला कि वे दलितों और अति पिछड़ी जातियों के लोगों को भी सत्ता में हिस्सेदारी देंगे. यह क्यों नहीं हो सकता था. आम लोगों से संवाद तो उन्होंने पहले ही बंद कर दिया था. सिर्फ सड़क बिजली और पानी के जरिये ही चुनाव नहीं जीता जा सकता है यह उन्हें सोचना चाहिये. मायावती तो अपना परंपरागत वोट बैंक भी नहीं सहेज सकी यह और दुर्भाग्यपूर्ण है. हालांकि पहले चरण से यह हवा मीडिया के जरिए फैलाई गयी कि बसपा सत्ता में आ रही है. सिर्फ इसलिए ताकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सके और वह हुआ भी. समाजवादी पार्टी इस अफवाह तक का मुकाबला नहीं कर सकी और बहुत सी जगहों पर मुस्लिम वोट ठीक से बंटा भी. साफ़ है राजनैतिक रणनीति में मोदी और शाह की जोड़ी भारी पड़ी.

Wednesday, February 4, 2015

यह चुनाव जिताने का नहीं ' हराने ' का है

यह चुनाव जिताने का नहीं ' हराने ' का है अंबरीश कुमार पिछले दस दिन में दिल्ली का चुनाव एकतरफा होता नजर आ रहा है ।इस चुनाव में केजरीवाल को जिताने से ज्यादा मोदी को हराने की ध्वनि सुनाई पड रही है ।अब ये तो नतीजे ही बताएंगे कि मोदी नसीब वाले है या इस चुनाव बाद ' बदनसीब ' बन जाएंगे। सर्वेक्षण तो केजरीवाल को अगला मुख्यमंत्री बना चुके है तो साथ ही मोदी की हार की भविष्यवाणी कर रहे है ,पर सर्वेक्षण पर हम लोगों का भरोसा कम ही होता है ।इसलिए दस तक का इन्तजार करना चाहिए ।पर आम लोगों का जो मूड समझ में आ रहा है और भाजपा के दिग्गज नेता जिस अंदाज में केजरीवाल के खिलाफ अभियान छेड़े हुए है उससे पार्टी की घबराहट सार्वजनिक होती जा रही है ।पार्टी की दिल्ली इकाई पहले से अलग थलग पड चुकी है और कार्यकर्त्ता भ्रमित और पस्त है । मोदी ने जिस तरह मोहल्लो मोहल्लो में भाषण दिया है उससे यह चुनाव फिर केजरीवाल बनाम मोदी बन गया है ।किरण बेदी अब हाशिए पर है और आलाकमान ने बोलती अलग बंद कर दी है ।योगेंद्र यादव ने सही कहा है कि अगर एक ढंग का लाइव इंटरव्यू किरण बेदी का प्रसारित हो जाए तो आप को पूर्ण बहुमत वैसे ही मिल जाएगा ।किसी प्रचार की जरुरत नही पड़ेगी ।वैसे भी आम आदमी पार्टी का प्रचार भाजपा ज्यादा कर रही है ,आप कम ।पर बहुत ध्यान से देखे दिल्ली में बहुत से राजनैतिक दल क्या कर रहे है । कांग्रेस हारी हुई लड़ाई लड़ रही है और भाजपा उसे ताकत देने में जुटी है ।कांग्रेस और गिरी तो भाजपा मुंह के बल गिरी नजर आएगी ।बाकी दल और उनके कार्यकर्त्ता भी एक साफ स्टैंड ले चुके है ।भाजपा को हारने का ,मोदी को हराने ।मुकाबले में आप है इसलिए जाहिर है वोट आप को ही जाएगा ।पर यह अन्य लोगों का यह वोट आप को जिताने से ज्यादा भाजपा को हराने का है ।आप को जिताने वाला वोट आप के तीस हजार कार्यकर्ताओं ने तैयार कर दिया है जिसमे नौजवान ज्यादा है ।झुग्गी झोपडी वाले ज्यादा है ,दलित और पिछड़े ज्यादा है जिन्हें आम आदमी पार्टी बहुत सी कमजोरियों के बाद अपनी नजर आती है । भाजपा ने नौ महीनों में जो किया उससे पार्टी अमीरों की पक्षधर नजर आने लगी है ,यह भाजपा के शीर्ष नेता भी समझ रहे है ।अडानी अंबानी और अन्य बड़े कारपोरेट घरानों का दस लाख का सूट पहनने वाले मोदी से क्या संबंध है यह सार्वजनिक हो चुका है ।गांव गरीब और आम आदमी मोदी के एजंडा से बाहर है ।वे तो कभी अंबानी के साथ दीखते है तो कभी अडानी के ।उन्हें फायदा पहुँचाने वाला भूमि अधिग्रहण अध्यादेश आ चुका है ।मजदूरों के खिलाफ रुख साफ़ हो चूका है । मोदी की राजनीति भी साफ़ हो चुकी है।और अहंकार भी ।देश ने पहला प्रधानमंत्री देखा जो गली मोहल्ले में एक सामान्य से नेता से मुकाबला कर रहा है और पसीने छूट रहे है ।दरअसल सिर्फ प्रचार प्रसार की राजनीति बहुत लंबी नहीं चलती और यही अप्रत्यक्ष मुद्दा भी है ।फिर जिस अंदाज में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को तरह तरह के मामले फंसाने और उलझाने का प्रयास किया गया उससे आम लोगों में नाराजगी भी बढ़ रही है ।काला धन लेकर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस हो या भाजपा जब चुनावी चंदे के मसले पर उस पार्टी को घेरने का प्रयास करे जो सब कुछ वेब साईट पर डाले हो तो मामला और हास्यास्पद हो जाता है ।इसलिए ज्यादातर लोग वोट के हथियार का इस्तेमाल मोदी को सबक सिखाने के लिए कर सकते है ।इसलिए यह चुनाव जिताने से ज्यादा हराने वाला नजर आता है ।जनादेश

Wednesday, April 23, 2014

बनारस में मोदी का चुनाव अब एकतरफा नहीं रहा

अंबरीश कुमार वाराणसी ।काशी के लहराबीर से आज देश को नया राजनैतिक सन्देश गया है । यहाँ से भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी अबतक एकतरफ़ा चुनाव लड़ रहे थे । और उनका चुनाव तो मीडिया समेत सभी लड़ रहे है ।पर आज पहली बार लगा कि यह चुनाव एकतरफा नहीं होने जा रहा है ।आज दोपहर की तपतपाती गर्मी में लहराबीर से कचहरी तक उमड़ा जन सैलाब मोदी के लिए चुनौती भी है ।कड़ी धूप में अरविंद केजरीवाल सड़क पर थे और लोगों को बता रहे थे कि कल ' वह ' आसमान से आएगा और आसमान से ही काशी को देखेगा ।मोदी का कार्यक्रम भी कई जगह हेलीकाप्टर से जाने का बनाया गया है ।यह उस आरोप की पुष्टि भी करता है जिसमे भाजपा पर इस चुनाव में पांच हजार रुपए खर्च करने की बात कही गई है ।मोदी के लिए जहाज और हेलीकाप्टर का एक अलग बेडा भी है जो रोज उन्हें देश भर का भ्रमण कराकर रात तक घर पहुंचा देता है ।इस तरह के चुनाव में पांच सौ रुपए लेकर सड़क से कचहरी तक परचा दाखिल करने गए केजरीवाल ने एक चुनौती तो पेश कर ही दी है ।इसे बहुत हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए ।लहुराबीर से अंधरापुल पहुँचने में करीब डेढ़ घंटे का समय लग गया ।आप के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए थे ।कचहरी में विरोध हुआ जो स्वभाविक था ।भाजपा हर स्तर पर विरोध की तैयारी में है ।पर आज के जन सैलाब के बाद विरोध के सुर भी कमजोर हुए है । इस मौके पर केजरीवाल ने चुनाव में पैसे के सवाल को उठाया और कहा -कोई कह रहा था कि मोदी विज्ञापन में 5000 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं।राहुल गांधी भी ढेर सारा धन खर्च कर रहे हैं। पर मैं एक फकीर हूं। मेरे पास पैसे नहीं हैं।मैं आपके पैसे से प्रचार करूंगा।आप फैसला करें कि आप क्या चाहते हैं।'केजरीवाल ने फिर वही तरीका अपनाया है जिसके सहारे शीला दीक्षित को हराया था यानी ' पैसा और भ्रष्टाचार ।' एक तरफ पैसे की लूट दूसरी तरफ गरीबी और महंगाई से परेशान जनता ।भाजपा जिस अंदाज में इस चुनाव में पैसा खर्च कर रही है वह किसी भी दल ने ढंग से मुद्दा नहीं बनाया है ।अरविंद केजरीवाल अब अडानी अंबानी और मोदी के संबंध आम जनता के बीच रख रहे है ।बनारस भाजपा का गढ़ रहा है और इसकी दुर्गति के लिए भाजपा ही ज्यादा जिम्मेदार है ।हिंदुत्व के नाम पर इस दुर्गति को ढका छिपाया जाता रहा है ।पर अब यह भी सवाल है ।मोदी को बनारस में एक ' हिंदू ' नेता की तरह ही देखा जा रहा है और संघ परिवार से सारे संगठन इस काम को बहुत ही सुनियोजित तरीके से कर रहे है ।पर इस हिंदुत्व पर विकास का मुलम्मा भी चढ़ा दिया गया है ।समझदार लोग जिन्हें हिंदुत्व से परेशानी हो वे विकास के एजंडा पर मोदी के साथ आएं। गुजरात हिंदुत्व के विकास का भी माडल है यह समझना चाहिए ।पर पूर्वांचल में विकास कोई मुद्दा होता तो बनारस से भाजपा बाहर हो चुकी होती और योगी बार बार गोरखपुर के संसद में प्रतिनिधि नहीं होते ।इसलिए मोदी के विकास के मुगालते में कोई नहीं है।भाजपा शुद्ध रूप से हिंदुत्व के नाम पर चुनाव लड़ रही है और आगे का एजंडा भी वही होगा ।पूर्वांचल में योगी ने जिस हिंदुत्व की नर्सरी तैयार की है वह कभी भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकती है ।रही सही कसर तोगड़िया ने पूरी कर इस विकास की अवधारणा को ढंग से बता दिया है । पर इस चुनौती का जवाब कांग्रेस ,सपा और बसपा को जिस गंभीरता से देनी चाहिए थी वह नहीं दी गई ।सभी ने अपने अपने उम्मीदवार उतार दिए ।बनारस में लोगों का आरोप है कि कांग्रेस ने जिन अजय राय को उतारा है वे पिछली बार भाजपा के मुरली मनोहर जोशी के मददगार बने थे ।तब भी हिन्दू बनाम मुसलमान हुआ था ।इसलिए परम्परागत राजनैतिक दलों के मुकाबले अरविंद केजरीवाल भारी पड़ सकते है ।दिल्ली में शीला हारी थी अब मोदी की बारी है जैसा नारा चल रहा है । हालाँकि अभी तक यह सभी मान रहे थे कि मोदी भारी बहुमत से चुनाव जीतेंगे ।आज से मुकाबले की बात शुरू हुई है ।यहाँ के एक कारोबारी केके अग्रवाल ने कहा -आज तो यह साफ़ ही हो गया कि मोदी को विरोध का भी सामना करना पड़ेगा । वैसे भी हिंदुत्व के नाम पर अगर सभी एकजुट नहीं हुए और जातीय समीकरण बिगड़ा तो मोदी के लिए चुनौती भी खड़ी हो सकती है । लोग सड़क पर उतरें है तो बूथ तक भी जाएंगे ।नौजवानों का एक बड़ा तबका अरविंद केजरीवाल के साथ था पर वह दिल्ली की घटनाओं से नाराज हुआ ।ऐसे लोगों को अगर वे साथ लेने में कामयाब हुए तो चुनाव रोचक होगा । गौरतलब है कि देश भर से बड़ी संख्या में सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता बनारस पहुँच चुके है और पहुँचने का सिलसिला जारी है ।ये भी स्वतंत्र तरीके से लोगों के बीच जा रहे है ।तमाम समूह अलग अलग तरह से मजहबी गोलबंदी और कारपोरेट घरानों की आगे की राजनीति को लेकर लोगों को आगाह भी करेंगे ।कुछ दिन और इन्तजार करना चाहिए ।जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Thursday, April 17, 2014

जीते तो मोदी पर भारी पड़ेंगे राजनाथ

जीते तो मोदी पर भारी पड़ेंगे राजनाथ उतर प्रदेश से तय होगा किसकी हवा चली और कितनी चली अंबरीश कुमार लखनऊ । मोदी इस चुनाव के साथ ही राजनैतिक प्रबंधन के गुरु बन रहे है पर अभी भी आगे का उनका रास्ता बहुत साफ़ नहीं है । लखनऊ और कानपूर से ब्राह्मण और ठाकुर नेता जो संकेत दे और दिलवा रहे है उससे चुनाव नतीजों के बाद का संकेत समझा जा सकता है । पहले मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि यह ' लहर ' मोदी की नहीं भाजपा की है । इस टिपण्णी का अर्थ चुनाव नतीजों के बाद ही ठीक से समझ में आएगा। इसके बाद राजनीति में बड़ी सफाई से सबको ठिकाने लगाने वाले भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद नकवी ने कहा -प्रधानमंत्री के लिए राजनाथ सिंह को आगे करना चाहिए मोदी से तो डर लगता है । साथ यह भी जोड़ दिया कि राजनाथ तो सामाजिक समरसता में वाजपेयी की परम्परा वाले है । भाषा में कुछ बदलाव भले हो पर भावना साफ़ है । कल्बे जव्वाद नकवी सियासत के गलियारे से गुजरते रहते है और जो भी सत्ता में हो उससे बेहतर संबंध रखते है । उत्तर प्रदेश की राजनीति में उलेमा का काफी महत्व रहा है और मायावती से मुलायम तक के घर की चौखट पर इन्हें महत्वपूर्ण मौकों पर देखा जाता रहा है । मायावती के घर तो ये जूते बाहर उतार कर जाते है । ऐसे में कल्बे जव्वाद की टिपण्णी आगे की राजनीति का संकेत दे रही है । अगर एनडीए को बहुमत के आसपास कि संख्या मिल गई तो प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर नए सिरे से बहस हो सकती है । ऐसे में राजनाथ सिंह कई वजहों से भारी पड़ सकते है । वे उतर प्रदेश से है और उत्तर प्रदेश में भाजपा अगर तीस सीट से ज्यादा पाती है तो इसका श्रेय कोई अकेले मोदी को नहीं लेने देगा । और अगर भाजपा के कुछ दिग्गज नेता मसलन उमा भारती ,कलराज मिश्र और मुरली मनोहर जोशी आदि में कोई हारा तो मोदी की हवा की हवा निकल जाएगी और फिर जीते हुए नेता भीं दावेदार होंगे । राजनाथ सिंह अटल विहारी वाजपेयी के निर्वाचन क्षेत्र से यूँ ही नहीं चुनाव लड़ रहे है । वे उनके राजनैतिक उतराधिकारी बनना चाहते है जो मोदी को कोई नहीं मानने वाला है । वे कई दलों से बेहतर संबंध बनाए हुए है जिसमे मायावती और मुलायम भी शामिल है । इस मामले में मोदी राजनाथ सिंह के मुकाबले कमजोर है । राजनाथ सिंह देश में चंद्रशेखर के बाद अपने को राजपूत नेता के रूप में पेश कर चुके है और राजपूत नेताओं का एक बड़ा खेमा भी उनके साथ आ सकता है । इस लिहाज से मोदी जिनकी जाति को लेकर फिलहाल जानकर लोगों में मतभेत है वे किसी भी जातीय समीकरण में फिट नहीं हो पा रहे है । ऐसे में पार्टी के भीतर जातीय गोलबंदी की राजनीति भी राजनाथ के पक्ष में है । मुस्लिम समाज ने अगर प्रधानमंत्री के पद पर उनकी दावेदारी का सवाल चुनाव से पहले उठाया है तो नतीजों के बाद इसे वे पुरी ताकत से उठाएंगे यह साफ़ है । यह सभी को पता है कि लखनऊ का चुनाव मोदी नहीं राजनाथ सिंह का चुनाव है और जिस तरह सुल्तानपुर में वरुण गाँधी के अप्रत्यक्ष निर्देश के चलते मंच से मोदी का कोई नारा नहीं लगता वैसे ही राजनाथ यहाँ खुद के नाम पर चुनाव लड़ रहे है । यदि मोदी का ज्यादा नाम लिया तो वह शिया वोट चला जाएगा जो वाजपेयी के चलते भाजपा को मिलता रहा है । इसलिए लखनऊ में मोदी की न कोई लहर बना रहा है और न ही स्वत बन पा रही है । उत्तर प्रदेश में पहले दुसरे दौर के बाद कि स्थिति में फर्क आया है । ऐसे में मुस्लिम बिरादरी के जरिए राजनाथ सिंह की नई छवि गढ़ी जा रही है । हालाँकि संघ परिवार को यह सब रास नहीं आ रहा है जो इस चुनाव में पूरी ताकत से लगा हुआ है । यह नाराजगी सामने ना आए पर ज्यादा कुरेदने पर सब बाहर आ जाता है । सारा खेल उत्तर प्रदेश से भाजपा को मिलने वाली सीटों की संख्या पर निर्भर है । तीस पैंतीस का आंकड़ा इसलिए क्योंकि यह मोदी की हवा का प्रतीक नहीं बन पाएगा । जब सर्वे एजंसियों ने पचास का आंकड़ा दे दिया है तो मोदी से लोगों की अपेक्षा भी यही है । इस प्रदर्शन में अगर मोदी नाकाम हुए तो प्रधानमंत्री पद दावेदार भी बदल जाएंगे । और फिर राजनाथ सिंह ज्यादा मजबूत दावेदार होंगे । जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Tuesday, April 8, 2014

चंबल के डाकू भी करने लगे है मोदी की जय जयकार !

चंबल के डाकू भी करने लगे है मोदी की जय जयकार ! बीहड़ में भी मोदी लहर दिनेश शाक्य भिंड। इस समय पूरे देश मे मोदी लहर का प्रभाव व्यापक स्तर पर दिख रहा है इसी लहर से प्रभावित हुए बिना चंबल घाटी मे कभी आंतक मचाये रहे डाकू भी नही रह सके है। मलखान सिंह,मोहर सिंह समेत दर्जनो डाकुओ के मददगार चंबल मे नरेंद्र मोदी की जय जयकार करने मे लग करके अपने मोदी प्रेम को उजाकर कर रहे है। उधर महिला डकैत सीमा परिहार दिल्ली मे भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी के पक्ष मे वोट मांग रही है। टीवी शो बिग बॉस मे आ चुकी सीमा ने सोनिया बिहार और करावलनगर मे नार्थ ईस्ट लोकसभा सीट के भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी के समर्थन मे प्रचार कर रही है। सीमा परिहार चंबल के खूंखार दस्यु सरगना निर्भय गुर्जर के गैंग मे होते हुए लालाराम के गैंग मे रह चुकी है। सीमा परिहार की डाकू जिंदगी पर वुन्डेड नाम की फिल्म का भी निर्माण हो चुका है। खुद सीमा परिहार शिवसेना,समाजवादी पार्टी मे रह चुकी है लेकिन राजनैतिक ताकत नही मिल पाने के बाद सीमा ने अपना कैरियर भोजपुरी फिल्म मे काम करके करना शुरू कर दिया है। कई दशको तक चंबल घाटी को अपने आतंक से थर्राने वाले खूंखार डाकू भी अब मोदी लहर मे मोदी की जय जयकार करने मे लग गये है। आंतक के पर्याय रहे खूंखार डाकुओ मे भी जग गया है भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रति प्रेम भाव। एक समय हत्या,लूट,डाकेजनी और अपहरणो की वारदातो से चंबल को थर्राने वाले मलखान सिंह ने चंबल की भिंड और ग्वालियर संसदीय सीट के लिए भाजपा प्रत्याशी डा.भागीरथ सिंह और नरेंद्र सिंह तोमर के लिए खुल करके प्रचार शुरू कर दिया है। मलखान सिंह और मोहर सिंह के मोदी लहर मे बहने के कारण डाकुओ के कुछ पुराने साथी बेहद खफा भी है। आचार्य विनोबा भावे के आवाहन मे 1960 मे समर्पण करने वाले करीब 90 साल लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का का कहना है कि डाकुओ ने एक जमाने मे आंतक मचा कर लोगो की मुसीबत बढाई है आज वे समर्पण के बाद राजनेताओ की मदद करते है तो उनको आंतकी छवि के तौर पर ही देखा जायेगा इससे किसी को भी लाभ नही मिलेगा। मलखान सिंह मध्यप्रदेश के भिंड जिले के उमरी इलाके के विलाव गांव के रहने वाले है। करीब 15 साल मलखान सिंह ने चंबल के बीहडो मे काटे है। न्याय की तलाश मे भटके मलखान सिंह ने हाथो मे बंदूक थामी और चंबल के बीहड का रास्ता अपनाया। मलखान सिंह खुल के डाकू बनने की वेदना बयान करते हुए कहते है कि उनको डाकू बनानी वाली काग्रेंस है काग्रेंस ने हमेशा घोखा दिया है इस समय पूरे देश मे नरेंद्र मोदी की लहर दिख रही है देश मे सही दिशा सुशासन और विकास सिर्फ भाजपा ही दे सकती है। 17 जून 1982 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के समक्ष सर्मपण करने वाले मलखान सिंह का कहना है कि आम आदमी और गरीबो को समय पर उचित न्याय मिल जाए,तो कोई भी समाज व परिवार को छोड करके बीहड का रास्ता नही पकडेगा। उनका कहना है कि शिवराज सरकार की यह सबसे बडी उपलब्धि है कि आज चंबल घाटी पूरी तरह से दस्यु विहीन बन गई है। अस्सी के दशक में आतंक का पर्याय रहे मलखान अब नरेन्द्र मोदी को पीएम बनाने के लिए लोगों से गुजारिश कर रहे हैं। सरेंडर करने के बाद एक आम नागरिक का जीवन बिता रहे मलखान अब बीजेपी के साथ हैं। वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ एक मंच पर बैठते हैं। साथ ही भिंड और ग्वालियर से बीजेपी प्रत्याशियों के लिए वोट मांगते हैं। मध्य प्रदेश की भिंड लोकसभा सीट में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है। 1962 के बाद हुए 13 लोकसभा चुनावों में यहां से कांग्रेस सिर्फ तीन बार ही जीती है। साथ ही 1989 के बाद से कांग्रेस का यहां खाता तक नहीं खुला। हालांकि बीजेपी के इस बार के प्रत्याशी भगीरथ प्रसाद 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ से प्रत्याशी थे। लेकिन वे बीजेपी के अशोक अर्गल से हार गए। मोदी लहर मे डाकुओ के प्रचार से प्रभावित हो कर सामान्य प्रशासन राज्यमंत्री लाल सिंह आर्य का कहना है कि कांग्रेस स कुशासन से परेशान होकर मखखान सिंह और मोहर सिंह जैसे लोगो ने बीहड का रास्ता अपनाया था लेकिन आज भाजपा की नीतियो से प्रभावित होकर नरेंद्र मोदी के पक्ष मे प्रचार करने से जाहिर है कि भाजपाई प्रत्याशियो को लाभ मिलेगा। इसके ठीक विपरीत काग्रेंस की भिंड ईकाई के उपाध्यक्ष डा.राधेश्याम शर्मा का कहना है कि चंबल मे कभी आंतक मचाये रहे डाकुओ के प्रभाव का इस्तेमाल भाजपा अपने प्रत्याशियो को जिताने के लिए कर भले ही रही हो लेकिन हकीकत मे भाजपा को डाकुओ के सर्मथन और सहयोग का कोई लाभ नही मिलेगा क्यो कि डाकुओ की आंतकी छवि का असर हमेशा बरकरार रहता है। जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

Friday, April 4, 2014

संघ कुन्बे को तबाह करेंगे मोदी

संघ कुन्बे को तबाह करेंगे मोदी हिसाम सिद्दीक़ी भारतीय जनता पार्टी को जनम देने वाले राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने नरेन्द्र मोदी को आगे बढ़ाया, इतना आगे कि अब वह किसी के कंट्रोल में नहीं रहे। अपनी इज्जत बचाए रखने के लिए भले ही आरएसएस चीफ मोहन भागवत अपने खास प्रचारको की मीटिंग में बंगलौर में यह कह आए हो कि मोदी-मोदी की रट लगाना आरएसएस का काम नहीं है, हकीकत यही है कि अब नरेन्द्र मोदी अपने कुन्बे के सबसे बड़े ओहदेदार आरएसएस चीफ मोहन भागवत को भी अपने से बहुत छोटा समझने लगे है। इसीलिए तो बंगलौर से दिल्ली आकर भागवत को अपने तर्जुमान राम माधव से बयान दिलाना पड़ा कि मीडिया में जो खबरें आई हैं आरएसएस चीफ ने ऐसा नहीं कहा था। भारतीय जनता पार्टी में आज राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज समेत किसी भी लीडर में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह मोदी से अपनी मर्जी मुताबिक कोई बात भी कर सके। जिस किस्म की डिक्टेटरशिप इस वक्त नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी में चला रखी है उससे साफ दिखता है कि नरेन्द्र मोदी ही पूरे आरएसएस कुन्बे के लिए ‘‘भस्मासुर’’ साबित होने वाले हैं। मुल्क के जो मुसलमान और सेक्युलर जेहन लोग इस फिक्र में है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने से उन्हें कोई बड़ा झटका लगेगा उन्हें अब इस ख्याल को तर्क कर देना चाहिए क्योंकि मोदी अपने अलावा आरएसएस और बीजेपी में किसी को रहने ही नहीं देंगे। वह खुद ही अपनी पूरी की पूरी तंजीम तबाह कर देंगे। सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही नहीं उनके साथ काम करने वाले अमित शाह की तानाशाही का आलम यह है कि बीजेपी सदर राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के रामपुर से अपने एक करीबी मुसलमान को और नई दिल्ली लोकसभा हलके से एमजे अकबर को टिकट देना चाहते थे लेकिन अमित शाह इन दोनों को टिकट देने के लिए तैयार नहीं हुए यह बात खुद राजनाथ सिंह ने अपने करीबियों से कही है। बीजेपी के कई सीनियर लीडरान खुद ही बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी के चीफ मिनिस्टर बनने के तकरीबन साल भर बाद दो हजार दो में गुजरात असम्बली का जो एलक्शन हुआ था उसी वक्त से मोदी ने अपनी मर्जी मुताबिक टिकट देने की कोशिश की थी उस वक्त चूंकि पंडित अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी, सुषमा स्वराज और प्रमोद महाजन जैसे कई ताकतवर लोग पार्टी में मौजूद थे इसलिए 2002 के असम्बली एलक्शन में मोदी पूरी तरह अपनी मनमानी नहीं चला सके थे लेकिन उसके बाद 2005 और 2012 के जो असम्बली और 2009 के लोकसभा एलक्शन हुए उन सभी में नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ और सिर्फ अपनी मर्जी से ही टिकट दिए वह मीटिंग में जरूर आते थे लेकिन किसी से राय मश्विरा किए बगैर अपनी जेब में रखी फेहरिस्त दे दिया करते थे और फिर फेहरिस्त में किसी किस्म की तरमीम वह बर्दाश्त नहीं करते थे। पूरी पार्टी ही मोदी की फेहरिस्त पर अपनी तस्दीक की मोहर लगाने पर मजबूर हुआ करती थी। अब सूरतेहाल और भी ज्यादा खराब हो चुकी है। आज बीजेपी, आरएसएस और उससे जुड़ी हुई तमाम तंजीमों की कोई हैसियत बाकी नहीं रह गई है अब मोदी खुद को सबका भगवान बना चुके हैं। वह जो चाहते हैं करते हैं कोई उनके सामने बोलने तक की हिम्मत नहीं रखता है। एक तरफ आरएसएस कुन्बा हिन्दुत्व का दम भरता है दूसरी तरफ मोदी आरएसएस कुन्बे के सभी बूढ़ों को बेइज्जत करके अपनी तंजीम से बाहर निकलने को ठीक उसी तरह मजबूर करते जा रहे हैं जैसे कुछ बदकिस्मत लोग अपने बूढ़े वाल्दैन को ‘‘ओल्ड ऐज होम्स’’ (बूढ़ों के यतीमखानों) में मरने के लिए छोड़ देते हैं। भारतीय जनता पार्टी में लालकृष्ण आडवानी की हैसियत मोदी के वालिद जैसी रही है। आडवानी ने ही एक जिम्मेदार वालिद की तरह नरेन्द्र मोदी को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी को नजर अंदाज करके मोदी को पहली बार वजीर-ए-आला बनाया और गुजरात दंगो के बाद जब वजीर-ए-आजम की हैसियत से वाजपेयी ने मोदी को हटाने का फैसला किया तो आडवानी अड़ गए और मोदी को हटने नहीं दिया। पहली फुर्सत में नरेन्द्र मोदी ने अपने उन्हीं वालिद जैसे सीनियर लीडर को बेइज्जत करके उन्हें उनकी औकात बता दी। सवाल यह है कि जो शख्स अपने ‘‘बाप’’ या बाप जैसे सरपरस्त का वफादार नहीं हुआ उस शख्स से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह पूरे मुल्क और मुल्क के अवाम का वफादार होगा या दूसरे लोगों की इज्जत करेगा। ऐसे बेटों को समाज में नालायक औलाद कहा जाता है। जब से बीजेपी और आरएसएस में नरेन्द्र मोदी कुछ ज्यादा ताकतवर हुए हैं तभी से उन्होंने एक एक कर संघियों को ठिकाने लगाने का काम भी किया है। अब चूंकि वह सबसे ज्यादा ताकतवर बन चुके हैं इसलिए सबसे सीनियर स्वंय सेवक और बीजेपी में सबसे बड़े कद के समझे जाने वाले अपने ही गुरू लालकृष्ण आडवानी को भी उनकी औकात बताने में जरा सी भी देर नहीं की। एक ही झटके में उन्होंने आडवानी को बता दिया कि अब उनकी कोई हैसियत बाकी नहीं रह गई है। आडवानी उनके नजदीकी हरेन पाठक, वाजपेयी के नजदीकी बालू शुक्ला जैसों को तो नरेन्द्र मोदी ने अब ऐन लोक सभा एलक्शन के वक्त हैसियत बताने और किनारे लगाने का काम किया है इससे पहले वह दीगर कई पुराने संघियों को अपने रास्ते से हटा चुके हैं जो लोग मोदी का मुआजना (तुलना) हिटलर से करते हैं वह तो हिटलर की तौहीन करते हैं लेकिन इतना सच है कि उनके काम करने का तरीका ठीक वैसा ही है जैसा किसी डिक्टेटर और बड़े अण्डरवल्र्ड सरगना का हुआ करता है। उन्हें इस बात में यकीन है कि अगर केाई मुकाबले में आ जाए या किसी से खतरा महसूस हो तो उसे अपने रास्ते से पहले ही मरहले में हटा दिया जाए। भले ही मुखालिफ को कत्ल क्यों न कराना पड़े। गुजरात में शुरूआती दिनों में हरेन पाड्या एक ऐसे संघी थे जो कभी मोदी के लिए सियासी खतरा बन सकते थे। वह दुनिया से ही उठा दिए गए। उनकी बीवी और बूढ़े वालिद सालों तक चीखते रहे कि उनके कत्ल के पीछे बहुत बड़ी साजिश है और वह साजिश नरेन्द्र मोदी की जानिब से रची गई है लेकिन उन दोनों की किसी ने नहीं सुनीं। आरएसएस के सीनियर प्रचारक हुआ करते थे संजय जोशी, पहले तो केशुभाई पटेल की जगह पर जोशी को ही गुजरात का चीफ मिनिस्टर बनाए जाने का फैसला बीजेपी ने किया था। उन्होंने चीफ मिनिस्टर बनने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि वह आरएसएस तंजीम (संगठन) का ही काम करना चाहते हैं तभी आडवानी ने मोदी को चीफ मिनिस्टर बनवाया था। संजय जोशी की उंगली पकड़ कर मोदी ने प्रचारक की शक्ल में चलना सीखा था। सबसे पहले उन्हीं संजय जोशी को मोदी ने अपनी नफरत का शिकार बनाया। उनकी एक खुफिया सीडी मैदान में आ गई जिसमें उन्हें किसी खातून के साथ सेक्स में मुलव्विस दिखाया गया था। कई सालों तक संजय जोशी गुमनामी में खोए रहे फिर बाहर आए तो उन्हें बीजेपी में ओहदा मिल गया। मुंबई में पार्टी का अधिवेशन हुआ तो मोदी ने शर्त लगा दी कि जब तक संजय जोशी को पार्टी से निकाला नहीं जाता वह मुंबई अधिवेशन में शरीक नहीं होंगे और संजय जोशी को हटाया गया। जोशी जैसे बड़े स्वंय सेवक व प्रचारक को ठिकाने लगाने के बाद मोदी के हौसले और भी बढ़ गए फिर तो इस शख्स ने बीजेपी और आरएसएस में किसी को कुछ समझा ही नहीं। नरेन्द्र मोदी के ताकतवर होने से ठीक पहले तक आरएसएस की दंगा ब्रिगेड बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद का हर तरफ जिक्र हुआ करता था। 2002 के गुजरात दंगो में मोदी ने इन दोनों को भरपूर इस्तेमाल भी खूब किया। अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया जैसों के जहरीले बयानात के बगैर अखबार और टीवी चैनलों के न्यूज बुलेटिन अधूरे रहते थे। बजरंग दल के नाम पर गुण्डई करने वाले हर वक्त मुल्क के कोने कोने में गड़बड़ियां कराने के लिए हमेशा तैयार दिखते थे। आज इन दोनों का क्या हाल है और सिंघल व तोगड़िया अपने किन बिलों में छुपे हैं कोई नहीं जानता। इनकी गुमनामी के पीछे भी नरेन्द्र मोदी ही हैं। 2002 का असम्बली एलक्शन जीतने के बाद ही मोदी ने साफ कर दिया था कि गुजरात और मुल्क में एक ही बड़ा फिरकापरस्त और दंगाई रह सकता है, जो वह खुद हैं। अब प्रवीण तोगड़िया और सिंघल जैसों का क्या काम है। सिंघल और तोगड़िया को मोदी ने बर्फ में लगाया तो विश्व हिन्दू परिषद किसी जिले की सतह की भी तंजीम नहीं रही। इस तरह नरेन्द्र मोदी ने मुल्क पर पहला एहसान तो विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसी दंगाई ब्रिगेड्स को खत्म करके किया। यह दोनों फिरकापरस्त तंजीमें दहशत की अलामत बन चुकी थी और आरएसएस व भारतीय जनता पार्टी की बहुत बड़ी ताकत हुआ करती थीं। इनसे भी पहले गुजरात में फिरकापरस्तों की सबसे बड़ी ताकत समझे जाने वाले केशुभाई पटेल को भी मोदी इस हद तक पहुंचा चुके थे कि उस बेचारे बूढ़े को राज्य सभा तक नहीं पहुंचने दिया। उसी गुजरात से बेजमीन शख्स अरूण जेटली राज्य सभा पहुंचा दिए गए तो दूसरी रियासतों से स्मृति इरानी और हेमा मालिनी तक पहुंच गई लेकिन केशुभाई पटेल को नहीं पहुंचने दिया गया। केशुभाई पटेल, राजेन्द्र राणा और शंकर सिंह वाघेला समेत आज गुजरात में एक मोदी के अलावा बाकी कोई पुराना संघी किसी जिले की सतह तक का लीडर नहीं बचा है। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, संजय जोशी और गुजरात के सीनियर स्वंय सेवकों को ठिकाने लगाने के बाद नरेन्द्र मोदी को मौका मिला तो आडवानी, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी समेत बीजेपी की मरकजी कयादत का एक जो भ्रम था उसे भी मोदी ने तोड़ दिया है अब उनके साथ राजनाथ सिंह ही बचे हैं वह भी उस वक्त तक जब तक उनका इस्तेमाल है। इन्हीं हकायक की बिना पर हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि कुदरत ने शायद नरेन्द्र मोदी के हाथों बीजेपी और आरएसएस का किला तबाह करने का फैसला किया है।

Sunday, March 23, 2014

कारपोरेट खेल था ' महादेव ' की जगह ' मोदी '

कारपोरेट खेल था ' महादेव ' की जगह ' मोदी ' अंबरीश कुमार वाराणसी । भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार महादेव की नगरी में हर हर महादेव के उद्घोष से मुकाबला करने चले थे पर पहले ही धराशाई हो गए ।कारपोरेट प्रचार के तौर तरीकों में कपडे से लेकर हाव भाव और नारे तक विज्ञापन एजंसियां गढ़ती है ,यह सबको पता है ।हर हर मोदी के नारे पर संघ और भाजपा अब भले सफाई दे कि यह भक्तों का गढ़ा है , यह कोई कम से कम यहाँ पर मानने को तैयार नहीं है ।गुजरात में जो दो बड़े प्रमुख तीर्थ स्थान है उनमे एक द्वारिका है जहाँ का आम संबोधन है ' जय द्वारिकाधीश ' और ' जय सोमनाथ ' से सभी परिचित है ।आजतक मोदी के इस राज्य में यह संबोधन और नारा नहीं बदला तो बनारस में मोदी को महादेव के मुकाबले कैसे खड़ा कर दिया गया ।जानकार इसे कारपोरेट घराने की एक विज्ञापन एजंसी का खेल बता रहे है ।हर हर मोदी घर घर घर मोदी भी इसी तर्ज पर गढ़ा गया । इसपर साधू संत नाराज हुए तो संघ परिवार सक्रिय हुआ । 'हर हर महादेव' की तर्ज पर नए नारे 'हर हर मोदी' पर द्वारिका और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने खासा ऐतराज जताया है। उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत से बात की । उन्होंने इसे भगवान् का अपमान बताया ।उन्होंने कहा कि यह नारा हर-हर महादेव और हर-हर गंगे के लिए लगाया जाता है। किसी व्यक्ति विशेष से नारा जोड़ने पर लोगों की धार्मिक आस्था आहत हो रही है। वाराणसी एक प्राचीन धार्मिक नगरी है और लोगों की आस्था को भुनाने के लिए विज्ञापन एजंसियां कुछ भी कर सकती है यह ' हर हर मोदी ' के नारे से साफ़ है । बनारस में एक नहीं कई मदिर और मठ के महंत इस नारे से आहत है । उनका यह भी कहना है कि भाजपा और संघ इसे लेकर गुमराह कर रहे है ।कोई भी आस्तिक हिंदू महादेव कि जगह किसी भी नेता को नहीं बैठा सकता और ना ही ऐसा नारा गढ़ सकता है । यह सब मोदी के प्रबंधको का प्रपंच है । जब से मोदी के प्रबंधक बनारस में जमे है तभी से यह सब हो रहा है ।पहली बार यह नारा मोदी की जनसभा में लगवाया गया था । गौरतलब है कि मंदिर आन्दोलन के दौर में भी जब आडवाणी शिखर पर थे तब भी उन्हें श्रीराम के बराबर किसी ने नहीं बैठाया ।अयोध्या में कभी भाजपा के किसी नेता के लिए इस तरह का कोई नारा नही गढ़ा गया ।एक नारा तब चला था ' अयोध्या तो झांकी है - मथुरा काशी बाकी है ।' अयोध्या को तो भाजपा ने लावारिस छोड़ दिया है और अब काशी तरफ कूंच कर दिया गया है ।शुरुआत हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी से कर उनके प्रबंधकों ने आगाज कर दिया था ।इसी से आगे की राजनीति का भी संकेत मिल रहा था ।वैसे भी अयोध्या से जो खबरे आ रही है उसके मुताबिक भाजपा वहां मोदी लहर में पिछड़ गई है और फिलहाल मुकाबले से भी बाहर नजर आ रही है ।पत्रकार त्रियुग नारायण तिवारी के मुताबिक भाजपा तीसर नंबर पर थी और इसमें बदलाव की कोई गुंजाइश फिलहाल दिख नहीं रही है ।अब काशी की बात हो जाए।यहाँ बाहर से माहौल भाजपा के पक्ष में दिख रहा है क्योकि अभी किसी और दल ने ढंग से मोर्चा भी नहीं खोला है ।दुसरे प्रचार और दुष्प्रचार दोनों में संघ माहिर है ।इसी प्रचार के चलते प्रबंधकों ने महादेव का नारा चुरा लिया गया था जो अब भारी पड़ रहा है ।अब भगवान् से मुक्त हुए तो ठोस जमीनी राजनीति पर मोदी को मुकाबला करना है जो बहुत आसान नहीं है ।जोशी काफी कुछ राजनैतिक उधार विरासत में छोड़ गए है ।दूसरे पंद्रह दिन में ही मोदी ने भाजपा को जिस हालत में पहुंचा दिया है उससे जो शुरुआती लहर बनी थी वह ढहती जा रही है ।पूर्वांचल की कई सीटों पर फिर जाति का समीकरण देखा जा रहा है ।ऐसे में मोदी खुद बनारस से ठीक से जीत जाएं तो वही बड़ी बात होगी ।आसपास की सीटों पर कोई ज्यादा असर पड़ता नजर नहीं आ रहा है ।www.janadesh.in (ambrish2000kumar@gmail.com)

Friday, July 26, 2013

मोदी के आने से पहले ही उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुमत !

अंबरीश कुमार पिछ्ले महीने ही उत्तर प्रदेश में एक उप चुनाव हुआ था । इलाहाबाद के हंडिया में । हंडिया विधान सभा के इस उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को तीन हजार आठ सौ नौ वोट मिल तो कांग्रेस को दो हजार आठ सौ अस्सी वोट । एक को पौने दो फीसद तो दूसरे को पौने तीन फीसद । पर यह चुनाव समाजवादी पार्टी ने छब्बीस हजार से ज्यादा वोट से जीता था । दोनों राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा की जमानत जब्त हो गई थी ।यह इसलिए याद रखना चाहिए कि एक सर्वे रपट में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को करीब आधी सीट मिलने का आकलन किया गया है । लोकसभा आधी सीट का सीधा अर्थ विधान सभा में बहुमत के पास पहुंचना होता है । यह किसी चमत्कार से कम नहीं है खासकर उस पार्टी के लिए जिसका प्रदेश अध्यक्ष भी पिछले विधान सभा चुनाव में बुरी तरह हारा हो । इस आकलन के बारे में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से बात की तो वे ठहाका मार कर हँसने लगे । बोले ,जब पार्टी का खुद का अंदरूनी आकलन ज्यादा से ज्यादा बीस सीट का हो तो यह सर्वे हैरान करने वाला तो लगेगा ही । उत्तर प्रदेश के राजनैतिक हलकों में इस सर्वे के साथ भाजपा की राजनैतिक ताकत को लेकर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है । इसकी मुख्य वजह यह है कि भाजपा को अभी भी तीसरे चौथे नंबर की पार्टी माना जा रहा है और न तो प्रदेश में हिंदुत्व की कोई लहर नजर आ रही है और न ही पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग में कोई बदलाव आया है । ऐसे में भाजपा का अचानक नंबर एक पर आ जाना सभी को चौंकता है । उत्तर प्रदेश का चुनाव जातियों के गठजोड़ पर ही होना है जबतक कि कोई बड़ा परिवर्तन न हो जाए। मंदिर आंदोलन के बाद प्रदेश में मजहबी ध्रुवीकरण का फिर वैसा माहौल नहीं बना जिससे भाजपा को बहुत फायदा हो । अपवाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल संसदीय क्षेत्रों को बताया जा रहा जिसे लेकर पिछले दो महीने से चर्चा हो रही है । कहा जा रहा है इस बार लोकसभा चुनाव में इस अंचल में भाजपा या हिंदू उम्मीदवार ज्यादा संख्या में जीतेंगे । यही एक ऐसा तर्क है जिसके आधार पर भाजपा के बढ़त की बात कही जा रही है । पर बहुत सी सीटों पर तो पहल्र से ही गैर मुस्लिम सांसद है । मसलन पिछले लोकसभा चुनाव में बिजनौर से संजय चौहान ,अमरोहा से देवेन्द्र नागपाल ,रामपुर से जयाप्रदा ,आंवला से मेनका गाँधी ,बरेली से प्रवीन सिंह ऐरन पीलीभीत से वरुण गाँधी ,अलीगढ से राजकुमारी चौहान ,हाथरस से सारिका बघेल ,बुलंदशहर से कमलेश वाल्मीकि ,मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल ,सहारनपुर से जगदीश सिंह राणा ,फिरोजाबाद से राजबब्बर आदि चुनाव जीत चुके है । यह उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक बानगी है जिसके बारे में बताया जा रहा है आगामी लोकसभा चुनाव में इस अंचल से बड़ी संख्या में गैर मुस्लिम सांसद जीतेंगे क्योकि मजहबी ध्रुवीकरण तेज हो रहा है । उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार बनने के बाद शुरुआती दौर में ही कई जगह दंगे फसाद हुए और सरकार की साख पर बट्टा भी लगा । पर यह भी साफ हुआ कि दंगे फसाद के पीछे कट्टरपंथी ताकते भी है जिनका मकसद लोकसभा चुनाव से पहले कई इलाकों में मजहबी ध्रुवीकरण तेज कराना रहा है । पर फिलहाल कट्टरपंथी ताकतों के मंसूबो पर अंकुश लग चुका है इसलिए इस आधार पर भाजपा को बहुत फायदा होने की स्थिति नजर नहीं आती है । पार्टी की राजनैतिक ताकत का आकलन चुनाव नतीजों से भी होता है जिसपर एक नजर डालना चाहिए । पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा ने अगड़ी जातियों के १९५ उम्मीदवार खड़े किए थे जिसमे कुल तीस जीते तो पिछडी जाति के १०५ उम्मीदवारों में बारह जीते । कुल चार सौ में एक कम यानी ३९९ उम्मीदवारों में ४८ उम्मीदवार जीते थे । तबसे अब तक उत्तर प्रदेश भाजपा की राजनैतिक ताकत में कोई बड़ा इजाफा हुआ हो यह नजर नहीं आता । यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को लेकर ताजा सर्वे को लोग हैरानी से देख रहे है । वरिष्ठ भाकपा नेता अशोक मिश्र के मुताबिक भाजपा अगर तीसरे नंबर से दूसरे नंबर पर भी पहुँच जाए तो यह बड़ा चमत्कार होगा नंबर एक की बात तो छोड़ ही दे ।

Tuesday, July 9, 2013

मोदी के नाम पर फिर से उग्र हिंदुत्व की राह पर भाजपा

अंबरीश कुमार लखनऊ ,8 जुलाई ।उत्तर प्रदेश में भाजपा फिर उग्र हिंदुत्व की राह पर जा रही है । इस बार यह कवायद नरेंद्र मोदी के चेहरे के पीछे से होगी ।यह बात मोदी के सिपहसालार अमित शाह की भाषा से साफ़ हो गई है ।फिर वही जुमले ' जिस हिंदू का खून न खौला खून नही वह पानी है , उछलने लगे है ।अमित शाह ने कल पूर्वांचल के गोरखपुर में पार्टी के जिला अध्यक्षों की बैठक में कहा - जब समाजवादी पार्टी द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने की बात की जाती है, गो तरस्करी हो रही है। बांग्ला देशी घुसपैठियों पर कोई नियत्रण नही है। क्या यह सब देखकर सुनकर भाजपा के कार्यकर्ता का खून नही खौलता ? खून खौलने वाली इस तरह की भाषा इससे पहले नब्बे के दशक में मंदिर आंदोलन के दौर सुनी गई थी ।अब नरेंद्र मोदी ने प्रदेश की कमान अप्रत्यक्ष ढंग से संभाल ली है तो उनकर राजनैतिक हथकंडे भी सामने आने लगे है ।यह उसकी बानगी है । भाजपा के चुनाव अभियान के प्रभारी नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलों की राजनैतिक नब्ज पकडना शुरू कर दिया है ।उनके सिपहसालार और उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह अबतक मेरठ ,लखनऊ ,अयोध्या और गोरखपुर का दौरा कर बैठकों का सिलसिला शुरू कर चुके है ।उनके साथ सह प्रभारी रामेश्वर चौरसिया और सतेन्द्र कुशवाहा पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ बुंदेलखंड के हालात का जायजा ले रहे है ।ये सिर्फ हालात का जायजा ही नही ले रहे बल्कि हर समस्या का समाधान भी बताएँगे ।पार्टी कार्यकर्त्ता मोदी और उनकी इस टीम को लेकर उत्साहित भी है ।भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -अमित शाह की कार्य शैली से कार्यकर्ताओं का उत्साह बढा है ।वे बगैर लाग लपेट के अपनी बात रखते है । जिलों जिलों में प्रदेश स्तर के एक एक नेता को प्रभारी बना कर भेजा गया है ।मै खुद अबतक पांच बार आंबेडकर नगर जा चुका हूँ ऐसे में जिलों के नेता गांव गांव तक तो पहुँच ही चुके है । पूर्वांचल में भाजपा को काफी उम्मीद है । यह अंचल पहले से ही योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है।अब नरेंद्र मोदी के आ जाने के बाद यहाँ के हालात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ।यह तय है कि हिन्दुत्ववादी ताकते चुनाव से पहले ही माहौल बनाकर ध्रुवीकरण का प्रयास करेंगी ।यह अमित शाह की भाषा से साफ़ हो गया है । पूर्वांचल के गोरखपुर में अमित शाह ने जिला अध्यक्षों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया और कहा -भारतीय जनता पार्टी इस तरह की पार्टी है जो बिना प्रत्याशी के बावजूद भी चुनाव अभियान की शुरूआत कर सकती है। हम पार्टी की रीति नीति को मण्डल, शहर, गांव में क्या प्रत्याशी के माध्यम से ही जाएंगे। क्या हम एक व्यक्ति के आधार पर चुनाव लड़ेंगे। पहले से मन से निकाल कर उखाड़ कर फेक दीजिए कि भाजपा को प्रत्याशी जिताएगा । भाजपा का कार्यकर्ता भाजपा को हिन्दुत्व व विचारधारा के साथ पार्टी को जिताएगा। पार्टी चलाने का दायित्व विधायक, सांसद का नही है। बल्कि दायित्व जिलाध्यक्ष का है। शाह ने कहा कि आप सभी अपने अपने जिलों में पार्टी का चेहरा है। बूथ की रचना यह सोच कर नही करना है कि हमें 2014 का लोकसभा का चुनाव लड़ना है। बल्कि बूथ की रचना अगले 20 वर्षो के लिए मजबूत ढाचे पर भाजपा को खड़ा करने के लिए बनाना है। चुनाव में बूथ की अहम भूमिका होती है। चुनाव जीतते है तो बूथ प्रबन्धन से और हारते है तो भी बूथ की वजह से । शाह ने कहा कि जब समाजवादी पार्टी द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने की बात की जाती है, गो तरस्करी हो रही है। बंगलादेशी घूसपैठीयों पर कोई नियत्रण नही है। क्या यह सब देखकर सुनकर भाजपा के कार्यकर्ता का खून नही खौलता ? इन सबको रोकने की जिम्मेदारी हमारी है। कांग्रेस और सपा पिछड़ो के हितों की बात करती है। और संविधान द्वारा 50 प्रतिशत आरक्षण की सुविधा पिछड़ो और दलितो को दी गयी है। यदि कांग्रेस और सपा मुस्लिमो को आरक्षण देने की बात करती है। तो वह पिछड़ो व दलितो के ही हक को मारने का काम कर रही है। यह बात पिछड़ो और दलितो को समझाना होगा। भाजपा ही पिछड़ो व दलितो के हित व अधिकार की बात करती है। गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी व सदर सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हम सब अपने पराक्रम को विस्मृत कर देते है। इसी नाते हम पीछे है। हमारा पराक्रम हिन्दू राष्ट्रवाद के आधार पर होगा। हम लोग यदि जाति के पीछे अगड़े पीछड़े के चक्कर में फसे तो नतीजा अच्छा नही होगा। हमारे पास सबसे बड़ा वोट बैंक है। उस दायरा को अगर हम तोड़ने का काम करते है तो हमारा नुकसान होगा। इसलिए हमें हिन्दूत्व व विकास के आधार पर जनता के बीच में जाना चाहिए।

Sunday, September 9, 2012

नितीश,मोदी को पीछे छोडा अखिलेश ने

अंबरीश कुमार
लखनऊ , सितंबर । सत्तर के दशक में कालेज और विश्वविद्यालयों में एक नारा चलता था ' रोजगार दो या बेरोजगारी भत्ता दो ' जिसे बाद में कुछ राज्यों ने लागू भी किया ।इन राज्यों में बंगाल ,हरियाणा और बिहार शामिल थे पर अब यह सब जगह बंद हो चुका है ऐसे में दस हजार बेरोजगार नौजवानों को बेरोजगारी भत्ता देकर जो शुरुआत अखिलेश यादव ने की है वह केंद्र समेत सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए एक बड़ी लकीर की तरह है ।अखिलेश यादव ने अपनी चुनावी सभाओ में जो एलान किया था उसमे एक सबसे बड़ा वादा बेरोजगारी भत्ता देने का था ।आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा भी -जो कहा था उसे पूरा किया और अन्य सभी वायदे भी पूरे होंगे । जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्त्ता महात्मा भाई ने कहा -इस कदम से अखिलेश यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार और विकास के प्रतीक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पीछे छोड़ दिया है ।अब अन्य राज्यों के सामने यह चुनौती है कि वे अपने प्रदेश के बेरोजगार नौजवानों के लिए क्या पहल करते है । सत्ता में आने के छह महीने के भीतर उस वायदे पर पहल कर देना जिसने प्रदेश के नौजवानों को सबसे ज्यादा आकर्षित किया यकीनन अखिलेश यादव के लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है ।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्र ने कहा -यह तय रूप से सार्थक और ठोस पहल है । हम लोग छात्र जीवन में नारा देते थे काम दो या बेरोजगारी भत्ता दो । बाद में केरल और बंगाल में दिया भी गया पर अब देश में कही पर भी नहीं दिया जाता है इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण कदम है ।भाकपा की तरह अन्य राजनैतिक दल के नेता भी इसे बड़ा कदम मानते है पर खुलकर कुछ कहने को तैयार नहीं । इसलिए अखिलेश यादव का यह कदम राजनैतिक चुनौती के रूप में भी उभरने वाला है । संघर्ष वाहिनी मंच के राष्ट्रीय संयोजक राजीव हेम केशव ने कहा -अखिलेश यादव की इस पहल ने उन्हें देश के अग्रणी मुख्यमंत्रियों की कतार में तो खड़ा कर ही दिया है । इसे नौजवानों के बीच उनकी साख भी बड़ी है जो लोकसभा चुनाव में मदद भी करेगी । दरअसल अभी तक अखिलेश यादव की किसी भी पहल ने उन्हें राष्टीय फलक पर चर्चित नहीं किया था ।बेरोजगारी भत्ता और फिर लैपटाप की योजना उन्हें नई पहचान दिलाने जा रही है । समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा - यह तो शुरुआत हुई है डा लोहिया के सपनो को पूरा करने की । दस हजार को बेरोजगारी भत्ता दिया गया और नौ लाख नौजवानों को दिया जाएगा । बहुत से कदम उठाए जाने है । उदाहरण के रूप में देखे तो मुख्यमंत्री ने शासन सँभालते ही लोकतंत्र सेनानियों के प्रति पूर्ववत् सम्मान की भावना रखी और चुनाव घोषणा पत्र में लोकतंत्र रक्षक सेनानियों के साथ किए वायदे को निभाने में देर नहीं की। प्रदेश की राज्य सरकार ने लोकतंत्र रक्षक सेनानियों को मुफ्त सरकारी बसों से यात्रा, एक सहायक को भी साथ यात्रा की अनुमति देने, चिकित्सा सुविधा के साथ तीन हजार रूपए मासिक की पेंशन देने की भी घोषणा की है। मुलायम सिंह यादव ने अपने समय में लोकतंत्र रक्षक सेनानियों की पेंषन राशि एक हजार रूपए रखी थी। अखिलेश यादव ने इस राशि में तीन गुना बढ़ोत्तरी कर दी है। पर सरकार की सोच सिर्फ बेरोजगारी भत्ते तक ही नही है बल्कि रोजगार की तरफ भी है । आज समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कहा कि उनकी पार्टी की सरकार बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने की भी व्यवस्था करेगी और जो रोजगार से वंचित रहेंगे उन्हें बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। जनसत्ता

Wednesday, August 29, 2012

अगला चुनाव राहुल बनाम मोदी

अंबरीश कुमार लखनऊ ,अगस्त।राहुल गाँधी फिर उत्तर प्रदेश से बड़ा दांव लगाने जा रहे है । प्रदेश के पिछले चुनाव में उनके सामने अखिलेश यादव जैसा युवा चेहरा बड़ी चुनौती बना था पर देश के चुनाव में राहुल गाँधी को चुनौती देने वाला कोई युवा चेहरा नहीं है यह भी सच है । लोकसभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश फिर से संघर्ष का मैदान बनेगा और इसकी तैयारी कांग्रेस ने शुरू कर दी है । राजनीति में समाजवादी संत के रूप में मशहूर आचार्य नरेंद्र देव की तीसरी पीढी के सौम्य छवि वाले अयोध्या -फ़ैजाबाद के सांसद निर्मल खत्री को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने एक नया सन्देश देने का प्रयास किया है । देश के मौजूदा हालात को देखते हुए कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी बनाम नरेंद्र मोदी का मुकाबला दिखाकर मुस्लिम मतदाताओं को लामबंद कर सकती है । इस हालात में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बड़ा फायदा भले ना हो पर दूसरे राज्यों में कांग्रेस का समर्थन बढ़ सकता है । खांटी समाजवादी और कांग्रेस के बडबोले काबीना मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा यह कह चुके है कि अगला चुनाव राहुल और मोदी की बीच होना है । अगर मुकाबला राहुल बनाम मोदी हुआ तो उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस कुछ बेहतर कर दिखा सकती है ऐसा राजनीति के जानकारों का मानना है । हालाँकि भाजपा अभी इसपर कुछ बोलने को तैयार नहीं है क्योकि उसे गुजरात चुनाव के नतीजों का इंतजार है । गुजरात विधान सभा का चुनाव मोदी का आगे का रास्ता तय करेगा । पर मोदी को लेकर न भाजपा गंभीर है और न कांग्रेस ,यह भी रोचक तथ्य है । भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -भाजपा में प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार तय नही किया गया है और हमारे यहाँ चार पांच नेता इस पद के लायक है । जबकि कांग्रेस प्रवक्ता वीरेंद्र मदान ने कहा -आप बहुत गलत तुलना कर रहे है । मोदी एक फिरकापरस्त दल के क्षेत्रीय नेता है जबकि राहुल गाँधी राष्ट्रीय दल के राष्ट्रीय नेता है जिसके मुकाबले में कोई नहीं है । पार्टी आलाकमान उत्तर प्रदेश के लिए नई रणनीति बना रहा है और राहुल गाँधी जल्द ही पूरी ताकत की साथ प्रदेश में फिर उसी तेवर में नजर आएंगे ।दूसरी तरफ राजनैतिक विश्लेषक वीरेंद्र नाथ भट्ट के मुताबिक अगर लोकसभा चुनाव राहुल बनाम मोदी हुआ तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को ज्यादा फायदा होगा पर दूसरे राज्यों में कांग्रेस भारी पड़ेगी । दूसरे यह मुद्दा उठते ही महंगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा हाशिए पर जा सकता है । हालाँकि उत्तर प्रदेश में राहुल गाँधी के लिए रास्ता बहुत आसन नही है । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी सरकार के छह महीने पूरे होने के साथ ही गाँव ,किसान और नौजवान के लिए कई ठोस पहल करने जा रहे है । जिसमे किसानो को बिजली से लेकर नौजवानों को बेरोजगारी भत्ता आदि शामिल है ।समाजवादी पार्टी भी लोकसभा चुनाव की तैयारी में है । सूत्रों की मुताबिक पार्टी नेतृत्व वामपंथी नेताओं से संवाद शुरू कर रहा है और तीसरे विकल्प के लिए नई जमीन तैयार करने की भी कवायद चल रही है । पर इसके लिए समाजवादी पार्टी को लोकसभा में अपनी ताकत बढ़ानी होगी । पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा -लोकसभा में हम तीन चौथाई सीटे जीतेंगे और मुलायम सिंह केंद्र में बड़ी भूमिका निभाएंगे ।ऐसे में कांग्रेस के लिए खासकर राहुल गाँधी के लिए उत्तर प्रदेश चुनौती भी है ।jansatta