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Saturday, March 17, 2012

महुआ फूले सारा गाँव





अंबरीश कुमार
सरस मूर्तियों के लिए मशहूर खजुराहो के आसपास महुआ के फूलों को झड़ते देखना एक अलग तरह का अनुभव है । ये फूल आदिवासी समाज के लिए रोजीरोटी का जरिया भी है । इन फूलो की मादकता और सामाजिक सरोकार खजुराहो के आसपास के गांवों में महसूस किया जा सकता है । मध्य प्रदेश का मशहूर पर्यटन स्थल खजुराहो आज भी एक गाँव जैसा नजर आता है । खजुराहो से बहार निकलते ही महुआ के फूलों की मादकता महसूस की जा सकती है । अप्रैल से मई के शुरुआती दिनों तक यह अंचल महुआ के फूलों से गुलजार नजर आता है । खजुराहो से टीकमगढ़ या पन्ना किसी तरफ निकले महुआ के पेड़ों की कतार मिलती है जिनके पेड़ों से महुआ का फूल झरता नजर आता है । पेड़ पर महुआ का जो फूल सफ़ेद नजर आता है जमीन पर गिरते ही गुलाबी हो जाता है जिसे हाथ में लेते ही उसकी खुसबू भीतर तक समां जाती है । सुबह के समय जब खजुराहो के मंदिरों के सामने खड़े महुआ के पेड़ों के नीचे एक व्यक्ती को झाड़ू से इन फूलों का इकठ्ठा करते देखा तो वहा आए विदेशी सैलानी भी खड़े हो गए और उन्होंने भी महुआ के फूलों को हाथ में लेकर अपने गाइड से इनका बोटनिकल नाम पूछना शुरू किया । उत्सुकता बढ़ी तो हरी घास से लेकर सीमेंट की सड़क से महुआ के फूल इकठ्ठा करने वाले नंदलाल से बात की । जिसके मुताबिक खजुराहो के मंदिर परिसर में महुआ के जितने भी पेड़ है फूलो के आने से पहले उनका ठेका दे दिया जाता है । नंदलाल ने यह ठेका लिया था और रोज करीब तीस चालीस किलों वह फूल बटोर कर ले जाता है जिसे सुखाने के बाद करीब बारह रुपए किलों के भाव बेच दिया जाता है ।
खजुराहो के बाद जब किशनगढ़ के आदिवादी इलाकों में आगे बढे तो गांव गांव में महुआ के फूलों से लदे पेड़ तो नजर आए ही हर घर की छत पर सूखते हुए महुआ के फूल भी दिखे । बुंदेलखंड में किशनगढ़ का पहाड़ी रास्ता जंगलों से होकर जाता है पर उत्तर प्रदेश के हिस्से में पड़ने वाले बुंदेलखंड के कई जिलों के मुकाबले यह हराभरा और ताल तालाब वाला अंचल है । शायद इसलिए यह बचा हुआ है क्योकि इस तरफ प्राकृतिक संसाधनों की उस तरह लूट नही हुई है जैसे उत्तर प्रदेश के हिस्से में पड़ने वाले बुंदेलखंड की हुई है । इस तरफ के रास्तों के किनारे नीम ,इमली ,पीपल ,आम और महुआ जैसे पेड़ है तो छतरपुर पार कर महोबा से आगे बढ़ते ही बबूल ही बबूल नजर आते है । खैर इन पेड़ों में भी महुआ का स्थान आदिवासी समाज में सबसे ऊपर है । यह पेड़ बच्चों ,बूढों से लेकर मवेशियों तक को भाता है । पिपरिया गांव से बाहर लगे महुआ के पेड़ के नीचे गाय से लेकर बकरियों के झुंड महुआ के फूल चबाते नजर आए । गांव के भीतर पहुँचने पर नंग धडंग एक छोटा बच्चा एक कटोरे में महुआ के सूखे फूलों के बदले सौदागर से तरबूज का टुकड़ा लेता नजर आया । यह ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का दूसरा पहलू देखने को मिला । बचपन में गांव में सेर की माप वाले बर्तन से हाट बाजार में तरकारी से लेकर लकठा ,बताशा खरीदते देखा था । पिपरिया गांव में बच्चे से लेकर बूढ़े तक मोटर साइकिल पर आए इस सौदागर को घेरे हुए थे ।वह तरबूज साथ लिए था जिसके चलते गांव भर के बच्चे अपने अपने घर से कटोरे और भगोने में सूखा महुआ लेकर सौदा कर रहे थे । कोई मोलभाव नही जितना महुआ उतने वजन का तरबूज कट कर वह सौदागर दे देता था ।
यह सब देख कर हैरानी भी हुई और जिज्ञासा भी । इस गांव में पानी का कोई श्रोत नहीं था और एक फसल मुश्किल से हो पाती थी । करीब सत्तर अस्सी परिवार वाले इस गांव के लोगो की आमदनी का जरिया बरसात के जरिए हो जाने वाली एक फसल और नरेगा ,मनरेगा योजना में काम के बदले होने वाली आमदनी के साथ महुआ के फुल भी थे ।
चार पांच सदस्यों एक परिवार के मुखिया और औरत को मजदूरी से साल भर में पांच छह हजार रुपए मिल जाते है । इन्द्र देवता मेहरबान हुए चार पांच बोरा अन्न भी हो जाता है । पर अप्रैल -मई के दौरान समूचा घर आसपास के महुआ के फूलों को इकठ्ठा करके सुखाता है जिससे चार पांच हजार की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है । इस अर्थ व्यवस्था में ऐसे गांव वालों के लिए महुआ कितना उपयोगी है ,इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । गांव के किनारे से लेकर जंगल में लगे महुआ के पेड़ों का गांव के समाज ने बंटवारा भी कर रखा है । जिसका पेड़ पर हक़ है वाही उस पेड़ से फूल भी बटोरेगा । दिन में बारह बजे से तीन चार बजे शाम तक महुआ के फूल बिने जाते है क्योकि शाम ढलते ही जंगली जानवरों का खतरा बढ़ जाता है । आसपास के जिलों में भी महुआ किसानो की अर्थ व्यवस्था का अभिन्न अंग बना हुआ है । पर इस दिशा में न तो कोई वैज्ञानिक पहल हुई है और न ही बाजार के लिए कोई सरकारी प्रयास । छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में इमली ठीक इसी तरह आदिवासी समाज की अर्थ व्यवस्था मजबूत किए हुए है । पर वहा इमली को लेकर सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाये बनाकर आदिवासियों को वाजिब दाम दिलाने का प्रयास किया था । बस्तर की इमली दक्षिण भारत के चारों राज्यों में पसंद की जाती है । अगर महुआ को लेकर बागवानी विशेषग्य और सरकार कुछ नई पहल कर नए उत्पाद के साथ बाजार की व्यवस्था कर दे तो सूखे और भूखे बुंदेलखंड में महुआ आदिवासियों का जीवन भी बदल सकता है ।

जनसत्ता से साभार

Wednesday, February 22, 2012

गोवा के जंगल में ट्रेन का इंतजार



अंबरीश कुमार
गोवा और कर्नाटक सीमा पर एक बहुत खूबसूरत जल प्रपात पड़ता है दूध सागर .घने जंगल में इस जल प्रपात को देखने के चक्कर में कुछ साल पहले विकट स्थिति में फंस गए थे और जान पर बन आई थी .कलंगूट समुंद्र तट पर पर्यटन विभाग के रिसार्ट पर रुके थे जो मेरा सबसे पसंदीदा तट है और जब भी जाता हूँ वहां एक रात जरुर रुकता हूँ .गोवा के कई समुंद्र तट अपनी अलग अलग विशेषताओं की वजह से जाने जाते है जिनमे कलंगूट सत्तर के दशक में हिप्पियों के चलते चर्चा में आया था .
पहली बार जब मुंबई होते गोवा गया था तब सांसद संजय निरुपम मुंबई जनसत्ता में थे और वहां जाने में मदद भी की थी क्योकि २५ दिसंबर के दिन गोवा पहुँच गया था .खैर जब किसी होटल में जगह नहीं मिली तो सर्किट हाउस जो पहाड़ पर सबसे ऊपर है वहां गया . जगह नहीं थी पर गोवा पर्यटन विभाग के एमडी से संपर्क करने को कहा और बात भी कराई गई .एक सरदारजी उस दौर में पर्यटन विभाग के मुखिया थे और दिल्ली से तबादले पर वहां गए थे .वह जनसत्ता का उभार वाला दौर था और प्रभाष जोशी लिख चुके थे -पाठक माईबाप अब जनसत्ता मांग कर पढ़े इससे ज्यादा नहीं छापा जा सकता .वह दौर भी था जब सिख दंगों की कवरेज से अख़बार ने पत्रकारिता को नई दिशा दी थी .यकीनन इसमे बड़ा योगदान आलोक तोमर का था जिन्होंने भाषा और भावनाओं का अलग प्रयोग दिखाया .इससे सिख समाज में अख़बार की बहुत अलग पहचान थी .ऐसे में पर्यटन विभाग के मुखिया सरदारजी को जब परिचय दिया तो बोले ,आप एक सन्देश भेज देते तो कोई दिक्कत नहीं होती .सर्किट हाउस में एक कमरा खाली है और मध्य प्रदेश के एक आईजी उसके लिए कई बार कह चुके है पर आप सर्किट हाउस में आज रुक जाए और इसका किराया दस रुपए जमा करा दे कल पर्यटन विभाग का कलंगूट बीच के रिसार्ट पर शिफ्ट करा देंगे .इससे पहले हजार दो हजार रुपए में भी कोई होटल नहीं मिल रहा था और भाग दौड़ काफी हो चुकी थी .अकेले था इसलिए कही जाने की इच्छा भी नहीं रह गई थी .खाने के लिए पूछा तो बताया रेस्टोरेंट में सब मिल जाएगा .गोवा का सर्किट हाउस बहुत खूबसूरत और भव्य है .कमरे भी काफी बड़े .नहा कर रेस्टोरेंट पहुंचा तो नजारा देख कर हैरान रह गया .पहला सर्किट हाउस देखा जहा बार की सुविधा थी और दिल्ली के प्रेस क्लब जैसा नजारा था .तब इस तरह का शौक नहीं हुआ करता था पर फेनी का बहुत नाम सुना था इसलिए खाने के साथ मंगाया पर एक घूंट में ही दिमांग ठीक हो गया और खाना खाकर उठ गया .रेस्टोरेंट में तली हुई मछली और फेनी की गंध भरी हुई थी जो बहुत से लोगो को अच्छी नहीं लगेगी .फेनी का नाम खूबसूरत है पर वह गोवा की देशी मदिरा है जो नारियल और काजू से बनती है .जिसकी गंध भी बर्दाश्त नहीं हो सकती .फेनी का वह पहला घूंट ही अंतिम घूंट साबित हुआ .हालाँकि जिसने जिसने माँगा था उनके लिए लेकर जरुर गया .पर गोवा की वाइन का स्वाद किसी भी वेदेशी वाइन से कम नहीं है .मुंबई में इंडियन एक्सप्रेस में उस समय विश्विद्यालय के साथी आनंदराज सिंह थे जिनके साथ एक शाम गुजारने के बाद गोवा गया था और उनके लिए भी फेनी की बोतल ले आया था
खैर जिस यात्रा का जिक्र कर रहा हूँ वह तीसरी यात्रा थी जिसमे हम अपने सहयोगी संजय सिंह के साथ परिवार समेत गोवा घूमने गए थे .मै,सविता और संजय ,संध्या और दो गोदी वाले बच्चे .समुंद्र तटों की सैर के बाद कार्यक्रम बना कि दूध सागर जल प्रपात देखा जाए जो घने जंगल में है .सारी जानकारी लेकर कुलेम रेलवे स्टेशन पहुंचे .वैसे बताया गया मडगांव से भी करीब घंटे भर में दूध सागर पहुंचा जा सकता है .यह झरना कर्नाटक गोवा सीमा पर लोन्दा मडगांव रेल रूट पर एक पहाड़ी से गिरता है .इस रूट पर अब दिल्ली गोवा एक्सप्रेस ,हावड़ा वास्को अमरावती एक्सप्रेस और पुणे एर्नाकुलम एक्सप्रेस जैसी कई ट्रेन चलती है .बहरहाल जब कुलेम से दूध सागर जल प्रपात के लिए सुबह ट्रेन पकड़ी तो रेलवे कैंटीन का एक बैरा भी सामान लेकर चढ़ा .उसने बताया कि दूध सागर एक हाल्ट स्टेशन है जहा सवारी गाड़ियाँ दिन में सिर्फ दो मिनट के लिए रुकती है रात में नही रूकती .जब दूध सागर स्टेशन पहुंचे तो पता चला स्टेशन के नाम पर छोटा सा तिन शेड और कोने में एक टायलेट है .न कोई कमरा न कोई टिकट की खिड़की .जगह भी बहुत छोटी से क्योकि पचास मीटर दूरी पर वह झरना है जिसके दूसरी ओर घना जंगल है .दरअसल एक समूची नदी जब पहाड़ से लिपटती हुई उतरती है तो वह जिस झरने में तब्दील होती है है वह दूध सागर झरना कहलाता है .नदी का पानी पहाड़ पर सफ़ेद दूध की ही तरह नजर भी आता है .अब वहा का दृश्य बदल चुका होगा पर तब बहुत कम जगह थी ट्रेन पटरी से नीचे उतर कर झरने तक हम लोग पहुंचे और बच्चों के साथ पानी से खेल ही हुआ .झरना का पानी दूसरी तरफ जंगलों की तरफ चला जा रहा था .जंगल भी काफी घना था .इस बीच बैरा जो साथ आया था बोला खाना खा लीजिए मुझे जो ट्रेन आने वाली है उससे लौटना है .हम लोगों ने पूछा उसके बाद कौन सी ट्रेन मिलेगी तो बताया शाम साढ़े पांच छह पर जो ट्रेन आयेगी उससे लौट आये क्योकि उसके बाद ट्रेन नहीं है .वह चला गया और हम लोगों की पिकनिक होती रही .घडी में जब साढ़े पांच का समय हुआ तो तिन शेड के नीचे आ गए इंतजार करने .पास के गाँव का एक युवक भी आ गया था मडगाव जाने के लिए .ट्रेन की आवाज सुनाई पड़ी तो सब तैयार हो गए .पर ट्रेन आई और धडधडाती हुई आगे निकल गई .हम लोग सन्नाटे में .उस युवक से पूछा तो जवाब मिला ट्रेन तो अभी और आएगी पर मालगाड़ी ..करीब घंटे भर बाद फिर ट्रेन की आवाज सुनाई पडी .यह मालगाड़ी थी जो तेजी से आगे निकल गई .अब अँधेरा हो चुका था और जंगल से तरह तरह की आवाज सुनाई पड़ रही थी .तब मोबाईल का समय भी नहीं था .सभी परेशान और डरे हुए .पैदल करीब दस किलोमीटर घने जंगल में चलने बाद कोई बस्ती मिलने वाली थी पर इस अँधेरे में चला भी नहीं जा सकता था .युवक जो माचिस रखे था उससे कुछ पत्ते और लकड़ी जलाकर रौशनी भी की गई .इस बीच फिर ट्रेन की आवाज सुनाई पड़ी तो तय कर लिया सभी पटरी पर खड़े होका हाथ हिलाए तो शायद काम बन जाए .ट्रेन कुछ धीरे थी इसलिए इंजन की रौशनी में सब दिख रहा था .भाग्य हमारा अच्छा था जो इंजन रुका और हम दरिवेर के पास पहुँच गए .उसने कहा मालगाड़ी में सब डिब्बे बंद है कोई जगह नही है .हम लोग अड़ गए तो बोला इंजन बैठा सकता हूँ पर दस रुपए सवारी लूँगा बच्चो का नहीं लगेगा और कुलेम में उतर दूंगा वहा से मडगांव दूसरी ट्रेन से जाना पड़ेगा .फ़ौरन हम सब इंजन में चढ़ गए .करीब आधे घंटे बाद जब शहर की रौशनी दिखी तो सभी की जान में जान आई .इस तरह एक न भुलाने वाली यात्रा ख़त्म हुई .