आलोक जोशी
दो हिस्सों में लिखा था। मगर अब पूरा एक साथ लगा रहा हूँ। और जो लोग रह गए उनके लिए एक ख़बर। मजाज़ की दास्तान का एक और शो है मुंबई में। अगले शनिवार पंद्रह दिसंबर । बायकला में।
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मैंने पहले भी कहा हिमांशु बाजपेयी अपने आप में चलता फिरता लखनऊ हैं। रामगढ़ में एक मुख्तसर सी मुलाक़ात। फेसबुक पर कुछ देखा देखी और कभी कभार फोन पर कुछ सवाल जवाब। यही था मेरा और हिमांशु का रिश्ता। अतुल तिवारी के शब्दों में लखनऊ का लड़का। लखनऊ के बुजुर्ग लड़के नए वालों को ऐसे ही बुलाते हैं।
तो जनाब ख़बर मिली कि हिमांशु आ रहे हैं और मजाज़ की दास्तान ला रहे हैं। मन हुआ कि चलो सुना जाए। भाई उस लड़के को क्यों न सुना जाए जो लखनऊ से दिल लगाए है और जिसके दिल में बसा लखनऊ साथ साथ दुनिया का दौरा करता है, अपना रंग बखेरता है।
तो हम सुनने गए थे हिमांशु को। लगातार दो दिन। शनिवार और रविवार। दास्तान ए आवारगी यानी क़िस्सा मजाज़ लखनवी का। Dastan-e-Aawaargi ( A Dastangoi Performance by Himanshu Bajpai)
शनिवार बांद्रा के कुकू क्लब में फ़ुल हाउस। पहले तो हिमांशु ने सिखाई रिवायत दास्तान गोई की, फिर ये भी बताया कि यहाँ तालियाँ बजाना गुनाह होता है। दिल खुश हो तो दाद दीजिए। मगर दाद की भी कुछ शर्तें हैं, वरना वाह वाह को आह आह में बदलते वक़्त नहीं लगता।
ज़ाहिर है, महफ़िल को अदब सिखाना भी तो लखनऊ का फ़र्ज़ है। तो फ़र्ज़ अंजाम दिया गया और शुरू हुई -दास्तान ए आवारगी।
बस शुरू होने का ही होश है, बाद उसके तो हम बस घूँट घूँट भरते गए और मजाज़ दिल में उतरते गए। कब कहें वाह! कब न कहें, सोचने की कोई ज़रूरत ही न रही।
मजाज़ को जानना हो, गहराई से पहचानना हो और अपने दिल में उतारना हो, तो बस हिमांशु की ये दास्तान सुननी काफी है। और अगर आपने ये न सुनी तो जितना भी मजाज़ पढ़ा सुना हो, सब नाकाफ़ी है।
तकलीफ़ सिर्फ ये कि कुकू क्लब में महफ़िल की शुरुआत में ही सख़्त हिदायत दी गई कि मोबाइल बंद कर दें और फ़ोटो खींचने या वीडियो बनाने की जुर्रत न करें।
मगर बाद में लगा कि ये तकलीफ़ दरअसल कोई तकलीफ़ नहीं दिमाग का वहम था। ...2
...
आप पूछेंगे कि क्यों था दिमाग का वहम? तो जवाब अगले दिन मिला। जब भवन्स के एस पी जैन कॉलेज में हिमांशु Himanshu Bajpai फिर पहुँचे दास्तान ए आवारगी के साथ। और हम भी पहुँचे। इस बार Namita, Vineeta और Siddharth के साथ। यहाँमाहौल कुछ फ़र्क़ था। Ajay Brahmatmaj जी भी मिल गए और Ila Joshi भी।
महफ़िल थी चौपाल। आग़ाज़ ही हुआ अतुल तिवारी की एक शानदार तक़रीर से जिसने ज़मीन बना दी, हवा में नमी घोल दी और हाज़रीन नाज़रीन को बेताब कर दिया सोचने के लिए कि आख़िर अब क्या बचा है जानने को जो हिमांशु की दास्तान में मिलेगा?
महफ़िल की शान में चार चाँद लगाने दास्तान सुननेवालों की अगली क़तार में गुलज़ार साहब भी मौजूद थे।
फिर शुरू हुआ क़िस्सा असरारुल हक़ ‘मजाज़’ लखनवी का। और फिर महफ़िल पर रंग छाने लगा। यहाँ बहुत से थे जो घूँट घूंट पी रहे थे और वाह वाह बरसा रहे थे।
बोल अरी ओ धरती बोल, राज सिंहासन डांवाडोल!
यहाँ से लेकर, आवारगी को बख़्शी गई इज़्ज़त और न जाने कितनी हसीनाओं के ख़्वाब के तारे, आँख के काजल, दिल के क़रार और अरमानों के क़ुतुबमीनार मजाज़ लखनवी की शायरी में औरत के मेयार पर जो और जिस अंदाज में हिमांशु ने रौशनी डाली वो क़ाबिले ग़ौर नहीं, क़ाबिले तारीफ नहीं सिर्फ क़ाबिले रश्क है। -हाय हिमांशु, ऐसा कभी हम क्यों न कर पाए!
ये दूसरी शाम भी दिल में उतर गई, एक जगह घर कर गई। और अब समझिए कि रिकॉर्डिंग न करने की हिदायत तकलीफ़ के बजाय तोहफ़ा क्यों थी।
क्योंकि लगातार दो शाम एक ही दास्तान दोबारा सुनने में भी कहीं यूँ नहीं लगा कि ये तो कल ही सुना था। दोनों बार पूरा मजा आया, नए सिरे से आया। कुछ बहुत फर्क भी था। हाजरीन को देखकर अंदाज भी बदल रहा था तो सुननेवालों का मिज़ाज भी।
अाखिर में गुलज़ार साहब ने दो लाइनें बोलीं मगर सब कुछ कह दिया। उन्हीं की दो लाइनें - हिमांशु , कहा गया कि आप मजाज़पर तालिबे इल्म ( विद्यार्थी) हैं, मगर आप तो मजाज़ पर पूरे प्रोफ़ेसर निकले।
- मार्क्सिज्म के बारे में और कुछ भी कहा जाए लेकिन अगर मार्क्सिज्म ने हमें एक मजाज़ दिया तो उसकी कामयाबीके लिए इतना ही काफी है।
बधाई Himanshu Bajpai और शुक्रिया Dastan-e-Aawaargi ( A Dastangoi Performance by Himanshu Bajpai) के लिए।साभार
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Sunday, December 9, 2018
मुंबई में लखनऊ देखना है तो आएं !
आलोक जोशी
दो हिस्सों में लिखा था। मगर अब पूरा एक साथ लगा रहा हूँ। और जो लोग रह गए उनके लिए एक ख़बर। मजाज़ की दास्तान का एक और शो है मुंबई में। अगले शनिवार पंद्रह दिसंबर । बायकला में।
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मैंने पहले भी कहा हिमांशु बाजपेयी अपने आप में चलता फिरता लखनऊ हैं। रामगढ़ में एक मुख्तसर सी मुलाक़ात। फेसबुक पर कुछ देखा देखी और कभी कभार फोन पर कुछ सवाल जवाब। यही था मेरा और हिमांशु का रिश्ता। अतुल तिवारी के शब्दों में लखनऊ का लड़का। लखनऊ के बुजुर्ग लड़के नए वालों को ऐसे ही बुलाते हैं।
तो जनाब ख़बर मिली कि हिमांशु आ रहे हैं और मजाज़ की दास्तान ला रहे हैं। मन हुआ कि चलो सुना जाए। भाई उस लड़के को क्यों न सुना जाए जो लखनऊ से दिल लगाए है और जिसके दिल में बसा लखनऊ साथ साथ दुनिया का दौरा करता है, अपना रंग बखेरता है।
तो हम सुनने गए थे हिमांशु को। लगातार दो दिन। शनिवार और रविवार। दास्तान ए आवारगी यानी क़िस्सा मजाज़ लखनवी का। Dastan-e-Aawaargi ( A Dastangoi Performance by Himanshu Bajpai)
शनिवार बांद्रा के कुकू क्लब में फ़ुल हाउस। पहले तो हिमांशु ने सिखाई रिवायत दास्तान गोई की, फिर ये भी बताया कि यहाँ तालियाँ बजाना गुनाह होता है। दिल खुश हो तो दाद दीजिए। मगर दाद की भी कुछ शर्तें हैं, वरना वाह वाह को आह आह में बदलते वक़्त नहीं लगता।
ज़ाहिर है, महफ़िल को अदब सिखाना भी तो लखनऊ का फ़र्ज़ है। तो फ़र्ज़ अंजाम दिया गया और शुरू हुई -दास्तान ए आवारगी।
बस शुरू होने का ही होश है, बाद उसके तो हम बस घूँट घूँट भरते गए और मजाज़ दिल में उतरते गए। कब कहें वाह! कब न कहें, सोचने की कोई ज़रूरत ही न रही।
मजाज़ को जानना हो, गहराई से पहचानना हो और अपने दिल में उतारना हो, तो बस हिमांशु की ये दास्तान सुननी काफी है। और अगर आपने ये न सुनी तो जितना भी मजाज़ पढ़ा सुना हो, सब नाकाफ़ी है।
तकलीफ़ सिर्फ ये कि कुकू क्लब में महफ़िल की शुरुआत में ही सख़्त हिदायत दी गई कि मोबाइल बंद कर दें और फ़ोटो खींचने या वीडियो बनाने की जुर्रत न करें।
मगर बाद में लगा कि ये तकलीफ़ दरअसल कोई तकलीफ़ नहीं दिमाग का वहम था। ...2
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आप पूछेंगे कि क्यों था दिमाग का वहम? तो जवाब अगले दिन मिला। जब भवन्स के एस पी जैन कॉलेज में हिमांशु Himanshu Bajpai फिर पहुँचे दास्तान ए आवारगी के साथ। और हम भी पहुँचे। इस बार Namita, Vineeta और Siddharth के साथ। यहाँमाहौल कुछ फ़र्क़ था। Ajay Brahmatmaj जी भी मिल गए और Ila Joshi भी।
महफ़िल थी चौपाल। आग़ाज़ ही हुआ अतुल तिवारी की एक शानदार तक़रीर से जिसने ज़मीन बना दी, हवा में नमी घोल दी और हाज़रीन नाज़रीन को बेताब कर दिया सोचने के लिए कि आख़िर अब क्या बचा है जानने को जो हिमांशु की दास्तान में मिलेगा?
महफ़िल की शान में चार चाँद लगाने दास्तान सुननेवालों की अगली क़तार में गुलज़ार साहब भी मौजूद थे।
फिर शुरू हुआ क़िस्सा असरारुल हक़ ‘मजाज़’ लखनवी का। और फिर महफ़िल पर रंग छाने लगा। यहाँ बहुत से थे जो घूँट घूंट पी रहे थे और वाह वाह बरसा रहे थे।
बोल अरी ओ धरती बोल, राज सिंहासन डांवाडोल!
यहाँ से लेकर, आवारगी को बख़्शी गई इज़्ज़त और न जाने कितनी हसीनाओं के ख़्वाब के तारे, आँख के काजल, दिल के क़रार और अरमानों के क़ुतुबमीनार मजाज़ लखनवी की शायरी में औरत के मेयार पर जो और जिस अंदाज में हिमांशु ने रौशनी डाली वो क़ाबिले ग़ौर नहीं, क़ाबिले तारीफ नहीं सिर्फ क़ाबिले रश्क है। -हाय हिमांशु, ऐसा कभी हम क्यों न कर पाए!
ये दूसरी शाम भी दिल में उतर गई, एक जगह घर कर गई। और अब समझिए कि रिकॉर्डिंग न करने की हिदायत तकलीफ़ के बजाय तोहफ़ा क्यों थी।
क्योंकि लगातार दो शाम एक ही दास्तान दोबारा सुनने में भी कहीं यूँ नहीं लगा कि ये तो कल ही सुना था। दोनों बार पूरा मजा आया, नए सिरे से आया। कुछ बहुत फर्क भी था। हाजरीन को देखकर अंदाज भी बदल रहा था तो सुननेवालों का मिज़ाज भी।
अाखिर में गुलज़ार साहब ने दो लाइनें बोलीं मगर सब कुछ कह दिया। उन्हीं की दो लाइनें - हिमांशु , कहा गया कि आप मजाज़पर तालिबे इल्म ( विद्यार्थी) हैं, मगर आप तो मजाज़ पर पूरे प्रोफ़ेसर निकले।
- मार्क्सिज्म के बारे में और कुछ भी कहा जाए लेकिन अगर मार्क्सिज्म ने हमें एक मजाज़ दिया तो उसकी कामयाबीके लिए इतना ही काफी है।
बधाई Himanshu Bajpai और शुक्रिया Dastan-e-Aawaargi ( A Dastangoi Performance by Himanshu Bajpai) के लिए।साभार
Friday, February 22, 2013
अस्सी साल पूरे हुए -केपी सक्सेना
अस्सी साल पूरे हुए -केपी सक्सेना
व्यंग्य की दुनिया में लखनऊ के पद्मश्री केपी सक्सेना एक जाना पहचाना और सम्मानित नाम हैं.साथ ही उनकी ख्याति लगान,स्वदेस,जोधा-अकबर और हलचल जैसी चर्चित फिल्मों के संवाद लेखक के रूप में भी है. शोहरत की तमाम बुलंदियों के बावजूद केपी को लखनऊ छोड़ना गवारा नहीं हुआ. शायद इसीलिए आशुतोष गोवारिकर की नई फिल्म की स्क्रिप्ट भी वे अन्य फिल्मों की तरह लखनऊ में रहकर ही लिख रहे हैं. हिमांशु बाजपेयी ने केपी से उनके व्यंग्य और फिल्मी लेखन के अनुभव के बारे में बातचीत की.
आदी सदी से ज्यादा समय हो गया आपको समसामयिक घटनाओं में व्यंग्य का पहलू खोजते हुए, क्या इस दौर में भी ये काम उतना ही सहज है जितना जवानी में हुआ करता था ?
अस्सी साल पूरे कर लिए हैं मैने उम्र के. अट्ठारह हज़ार प्रकाशित व्यंग्य हैं.इन्ही के चलते जो कुछ मिला है वो सब आप जानते ही हैं.इसलिए अब जवानी की तरह ढेर सारा लिखने का मतलब नहीं बनता.चुनिन्दा तौर पर लिखता हूं, जिस विषय पर लिखना अनिवार्य हो जाए. इसीलिए अब कम ही छपता हूं. सिर्फ हिन्दुस्तान में एक कालम जो मेरी बहन मृणाल पान्डेय के विशेष आगृह पर लिखना शुरू किया था वही नियमित लिखता हूं, लेकिन दिमाग व्यंग्य को आज भी उसी तरह सूंघता, खोजता और सोचता है भले ही मै लिखूं न. तीन घंटे पहले ही जो अखबार आया है उसमें अमर सिंह को तिहाड़ भेजे जाने की हेडलाइन है. पढ़ते ही पढ़ते मै सोच रहा था कि तिहाड़ न हुआ कोई महातीर्थ हो गया. सब इसी ओर प्रस्थान कर रहे हैं. अमां और भी तो जेले हैं मुल्क में...इस तरह दिमाग आज भी उसी तरह वयंग्य कसता है.बस अब लिखता कम हूं.
आपके जब लिखना शुरू किया होगा तब तो लखनऊ में कविता,कहानी और उपन्यास का माहौल था, फिर आपने व्यंग्य को ही क्यों चुना ?
आपकी बात सही है. व्यंग्य मैने चुना नहीं, ये मेरे गुरू अमृतलाल नागर ने मेरी पीठ पर लाद दिया, उनकी इच्छा को आजतक निभा रहा हूं. उस दौर में लखनऊ में कहानी, उपन्यास और शायरी की ही धूम थी.इन्ही विधाओं में व्यंग्य यत्र-तत्र निहित रहता था. मै भी शुरूआत में उर्दू में अफसाने लिखा करता था. नागर जी ने मुझसे कहा कि केपी क्रिकेट का खिलाड़ी भी शाट मारने से पहले फील्ड को देख लेता है और उधर ही शाट मारता है जिधर फील्डर कम हों. कहानी में फील्डर बहुत ज्यादा हैं, इसमें आगे बढ़ने में ज्यादा साधना करनी पड़ेगी.जबकि व्यंग्य की विधा में अभी भी मैदान खाली है. तुम्हारी नई शैली का लोग स्वागत करेंगे.(उस समय तक हिन्दी व्यंग्य में सिर्फ परसाई जी स्थापित थे, उनकी शैली विशुद्ध व्यंग्य की मारक शैली थी, नागर जी व्यंग्य में हास्य के पक्षधर थे.) इसी के बाद मैने व्यंग्य में कदम रखा. शरद जोशी भी लगभग उसी समय अवतरित हुए.
परसाई जी और आपके सोचने में मूल अंतर क्या है ?
परसाई जी की शैली तीखी और गहरा काटते हुए चले जाने वाले व्यंग्य की है. मै व्यंग्य में नागर जी की प्रेरणा से आया. नागर जी के व्यंग्य में हास्य घुला हुआ रहता था.वही शैली मेरी भी रही. मतलब तीखी बात हंसी की मिठास के साथ देने की.कई बार इससे चोट भले ही कम लगती हो लेकिन असर देरतक रहता है.शरद जोशी की शैली भी इसी तरह की है. मेरा मानना है कि व्यंग्य एक तरह की तीखी एंटीबायोटिक दवा है जिसे अंदर पहुंचाने के लिए उसे हास्य के स्टार्च कैप्सूल खोल में लपेटना जरूरी होता है. वरना कई बार दवा अंदर नहीं जा पाती.मै व्यंग्य में हास्य मिलाकर पेश करने का हिमायती हूं.
व्यंग्य लिखते-२ फिल्मी संवाद कैसे लिखने लगे ?
परेश रावल की वजह से. उन्होने ही आमिर खान को लगान के लेखन के लिए मेरा नाम सुझाया था. परेश मेरे बहुत पुराने दोस्त हैं.असल में आमिर को फिल्म में अवधी जुबान, अंग्रेजी मिली हिन्दी और बादशाही जुबान तीनों में संवाद चाहिए थे. परेश रावल ने आमिर खान को कहा कि इसके लिए एकदम फिट आदमी को जानता हूं लेकिन वो फिल्म का आदमी नहीं हैं. पहली बार लिखेगा. आमिर ने कहा कि मेरा भी पहला प्रोडक्शन है. फिर आमिर खान ने मुझे फोन किया. पहले तो मुझे लगा कि कोई मुझसे मजाक कर रहा है. मैने उनसे पूछा भी कि स्थापित फिल्मी लेखकों के होते हुए भी मेरे जैसे अखबारों, मैगजीनों में लिखने वाले को क्यो याद किया. आमिर ने कहा क्योंकि इस फिल्म को आपकी जरूरत है.
आपने चार फिल्मों के संवाद लिखे, सबसे ज्यादा संतुष्टि किस फिल्म से मिली ?
जोधा-अकबर से. क्योंकि एक तो इसमें मुझे दौरे-मुगलिया के असली ऐतिहासिक पात्रों के संवाद लिखने थे,जिनमें अकबर,जोधाबाई,मान सिंह,टोडरमल जैसी बड़ी ऐतिहासिक शख्सियतें थी.दूसरी और ज्यादा अहम बात ये है कि इसमें मुझे मेरी उर्दू को बाहर लाने का मौका मिला था.मुझे ज्यादा खुशी इसी बात की थी.क्योंकि मूलत: मै उर्दू का ही आदमी हूं. मैने लेखन की शुरूआत इसी से की थी. इस फिल्म में मुझे मेरे हिन्दी उर्दू के भाषाई हुनर को पूरी तरह दिखाने का मौका मिला.
आगे कौन सी फिल्मों के लिए लिख रहे हैं ?
ज्यादा नहीं. आशुतोष गोवारिकर प्रागैतिहासिक विषय पर एक फिल्म बनाने वाले हैं. जिसके संवाद लिखने हैं इसके अलावा उन्ही की एक कामेडी फिल्म भी लिखनी है.
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क
ज्यादा नहीं. आशुतोष गोवारिकर प्रागैतिहासिक विषय पर एक फिल्म बनाने वाले हैं. जिसके संवाद लिखने हैं इसके अलावा उन्ही की एक कामेडी फिल्म भी लिखनी है.
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