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Friday, June 1, 2018

टूट रहा है ब्रांड मोदी का तिलिस्म !

अंबरीश कुमार देश के विभिन्न हिस्सों में हुए उप चुनाव के बाद से भाजपा सदमे में है .उसके सबसे बड़े ब्रांड यानी ' मोदी मैजिक ' का तिलिस्म टूटता नजर आ रहा है .बीते कुछ महीने के सभी चुनाव पर नजर डाल ले .गुजरात में नरेंद्र मोदी ने पूरा जोर लगा लिया पर बहुत मुश्किल से बचे .क्या नहीं बोले .पकिस्तान को तो वे हर चुनाव में ले आते है .याद है न गुजरात चुनाव में पाकिस्तान से उड़ा वह सी प्लेन भी आया था जिसे साबरमती पर उतार कर विकास की झलकी उन्होंने दिखाई थी .फिर वह जहाज अपने देश चला गया .विकास यहीं रह गया .कर्नाटक चुनाव हुआ तो वे फिर अपने भाषणों में पकिस्तान चले गए .बची खुची कसर चेलों ने पूरी कर दी जिन्ना की फोटो का विवाद उछालकर .यह बात अलग है उसी दौर में जिन्ना के देश की चीनी का स्वाद भी देश ने ले लिए .कर्नाटक चुनाव में तो लोकतंत्र को ताक पर रख कर सरकार बनाने और खरीद फरोख्त करने का प्रयास भाजपा नेतृत्व ने किया .और भाजपा के राज्यपाल ने इसमें पूरी मदद की .न्यायपालिका की जो थोड़ी बहुत साख बची हुई है उसके चलते कर्नाटक में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी .पर इससे भी कोई सबक पार्टी ने नहीं लिया .यह इन उप चुनाव के नतीजों से साफ़ हो गया है . इन चुनाव में क्या नहीं किया भाजपा और योगी, मोदी ने .योगी ने यूपी के में सीधे मजहबी गोलबंदी का प्रयास किया और विपक्ष पर हमला करने में वे मुख्यमंत्री की मर्यादा तक भूल गए .और मोदी ने एक उप चुनाव में प्रचार करने के लिए जो भौंडा तरीका अपनाया वह कोई भूल नहीं सकता .बगल के जिलें में कार्यक्रम लगवा कर प्रचार किया और चुनाव आयोग कठपुतली की तरह देखता रहा .पर इस सबका जवाब किसानों ने दे दिया .पूरी आईटी सेल लगी रही पर पर माहौल बिगाड़ने का कोई हथकंडा काम नहीं आया तो ईवीएम को लू लगवा दी गई .गोरखपुर में भी यही सब हथकंडा अपनाया गया था पर वहां भी भाजपा हारी और माहौल बिगाड़ कर कैराना जीतने की योजना भी धरी रह गई .इस चुनाव में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से प्रचार किया था फिर भी हारे .जबकि न मायावती ने प्रचार किया न मुलायम ने .न ही अखिलेश यादव निकले .साफ़ है मोदी ब्रांड का तिलिस्म अब टूट रहा है .वजह जातीय /धार्मिक दुर्भावना और सुशासन में नाकाम होना .इसी कैराना के आसपास दलितों का उत्पीडन हुआ .दलित नेता चंद्रशेखर को जेल में ठूंस दिया गया गंभीर धाराओं में .इसका हिसाब भी इस चुनाव में हुआ है .दूसरे गन्ना किसानो से जो धोखाधड़ी इस सरकार ने वादा कर की थी उसका भी हिसाब हुआ है . यूपी के लोग लगातार तरह तरह के नाटक देख रहे है .चाहे रोमियो स्क्वायड हो या कसाइयों के खिलाफ अभियान या फिर गाय भैंस का मुद्दा .इससे देश के सबसे बड़े सूबे की सरकार कितने दिन चलेगी .विकास के मुद्दे को तो पलीता लगाया जा चुका है .सिर्फ भाषण से ज्यादा दिन शासन नहीं किया जा सकता .अब छतीसगढ़ ,मध्य प्रदेश और राजस्थान की बारी है .बाबू राजनाथ सिंह ने पता नहीं मोदी पर तंज कसते हुए कहा या मजाक किया कि कुछ कदम पीछे हटना पड़ता है उंची छलांग के लिए .तीन राज्य और हैं इस प्रयोग के लिए .बाकी ब्रांड मोदी का तिलिस्म टूटा तो बड़ी छलांग राजनाथ सिंह की ही होगी .

Monday, March 6, 2017

लुट जाओगे सरकार बनारस की गली में ...

अंबरीश कुमार छह मार्च यानी सोमवार की शाम चार बजे से ही वाराणसी के बाबतपुर हवाई अड्डे पर नेताओं की भीड़ लगने लगी थी .सब लौट रहे थे .उत्तर प्रदेश के चुनाव का प्रचार थम चुका है .थके हुए नेता ,कुछ अभिनेता और पत्रकार आदि भी .सवाल यही था इस चुनाव में हासिल क्या होगा . अपना साफ़ मानना है कि नतीजा चाहे जो हो इस चुनाव का हासिल राहुल और अखिलेश की राजनीतिक जोड़ी हैं .इस चुनाव में ये लालू और नीतीश की तरह एक जोड़ी के रूप में उभरे .प्रदेश के करीब आधा दर्जन बड़े शहरों में राहुल और अखिलेश ने साझा रैली की .मोदी पर अपने अंदाज में निशाना साधा और अंततः मोदी इस जोड़ी के जाल में फंस ही गए .जिसके चलते मोदी इस चुनाव में अपनी विशिष्ट शैली से बाहर चले गए .जिसके चलते कभी गधा चुनाव के एजंडा में आया तो कभी अनानास को नारियल समझने और समझाने की गल्ती वे कर बैठे .वे मेट्रो का टिकट किस खिड़की पर मिलेगा यह पूछने लगे जब लखनऊ में मेट्रो का ट्रायल रन शुरू हो चुका था .यह कुछ ज्यादा ही लग रहा था .ठीक है वे गुजरात में मेट्रो न शुरू कर पाए पर देश के किसी भी हिस्से में अगर मेट्रो की शुरुआत हो रही हो तो प्रधानमंत्री को उसकी खिल्ली उडाना शोभा नहीं देता .यह बात आम लोग कर रहे हैं .बैंक गया था तो प्रभात कुमार से बनारस पर बात हुई कोई सज्जन जो पैसा निकलवाने आए थे बीच में कूद पड़े ,बोले -प्रधानमंत्री को तीन दिन तक बनारस में डेरा डालना और भाषा का स्तर गिराना शोभा नहीं देता .यह एक मध्य वर्गीय पढ़े लिखे जमात की आम राय है .उनकी नहीं जो अगड़ी जातियों के दिमागी ताले में बंद हो .प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने चुनावी भाषण में कर्बला और कब्रिस्तान का हवाला देकर अपने विकास के एजंडा का मजाक बना दिया .रही सही कसर बनारस की गली गली छानकर पूरी कर दी . दूसरी तरह अखिलेश यादव ने चुनाव के शुरू से लेकर अंत तक अपने चुटीले अंदाज को नहीं छोड़ा ,मुस्कुराना नहीं छोड़ा .तब भी नहीं छोड़ा था जब मुलायम सिंह ,अमर सिंह और शिवपाल उनके खिलाफ विद्रोह में जुटे थे .तब भी लोग कहते थे मुलायम के बिना अखिलेश कुछ नहीं है .पर देश के सबसे बड़े सूबे का चुनाव समाजवादी पार्टी ने सिर्फ अखिलेश यादव के कंधे पर रख कर लड़ा .तीन चरण बाद डिंपल यादव निकली और वे भी लोकप्रिय हुई अपने अंदाज से .अब सीटें चाहे जितनी आएं समाजवादी पार्टी को नया नेता मिल चुका है जो दो दशक से ज्यादा की पारी खेलने की तैयारी में है .ख़ास बात यह है कि अखिलेश का रुख लचीला है ,जोड़तोड़ वाला दिमाग नहीं है .इसी वजह से कांग्रेस से तालमेल भी हुआ . यह ठीक है कि अभी उनका राजनैतिक अनुभव मुलायम जैसा नहीं है न ही उनके साथ जनेश्वर मिश्र ,बृजभूषण तिवारी ,कपिल देव सिंह .मोहन सिंह जिजसे खांटी समाजवादियों की कोई टीम है .उनके टीम में नए लोग है .पर वे लोग है जिन्होंने संघर्ष के दौर में छोड़ा नहीं था और पुलिस की बर्बरता के शिकार भी हुए .बहुत से फैसले अखिलेश ने दबाव में लिए और खुद भी कई गलत फैसले किए .पर यह राजनैतिक प्रक्रिया में हमेशा से होता आया है .कई को दबाव में साथ लिया तो कई को अपनी नासमझी में भी .ये ही गायत्री प्रजापति हैं जिनके चक्कर में पिता और चाचा दोनों से झगड़ा हुआ और अंततः टिकट भी देना पड़ा .तब जितने लोग मुलायम के पक्ष में खड़े थे सब गायत्री को भी पवित्र बनाए हुए थे .गायत्री पर खनन के भारी खेल का आरोप है ठीक उसी तरह जैसे बाबू सिंह कुशवाहा पर था .बाकी दो साल उनके साथ रहने वाली महिला के मामले में राज्यपाल राम नाइक ने जितनी दिलचस्पी दिखाई वह भी समझ में आ रही थी .रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी के मामले में अपनी केंद्रीय मंत्री को कैसे बचाया जाता है ,यह सब इनसे सीखना चाहिए .खैर ऐसे तत्वों से अखिलेश को दूर रहना चाहिए और इसका संकेत वे दे चुके है .उन्होंने जिनको जिनको पार्टी से बाहर किया सब को भाजपा और बसपा ने शरण दी .माफिया सरगना की दूसरी पीढ़ी को भाजपा ने भी खाद पानी दिया है तो बसपा तो उन्हें मजलूमों का मसीहा ही मानती है .सपा में अभी भी दागी है पर बाकी दलों के मुकाबले कम ,जिन्हें बाहर करना बेहतर है . पर असली मुद्दा राजनैतिक है .अखिलेश यादव ने अपने दम पर यह चुनाव लड़ा उस पार्टी का जिसपर मुलायम सिंह जैसे कद्दावर नेता का साया दो महीने पहले तक रहा .साथ ही राहुल गांधी से उनकी राजनैतिक केमेस्ट्री बनती नजर आई .कांग्रेस प्रदेश में बहुत ही बुरी स्थिति में रही है .ऐसे में अगर इस गठबंधन को वोट का फायदा होता है तो यह जोड़ी लोकसभा चुनाव तक आराम से चलेगी .दूसरे यह लोकसभा चुनाव को लेकर देश में एक व्यापक गठबंधन की दिशा में भी पहल कर सकती है .समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में नीतीश कुमार को जोड़ने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की .अगर ऐसा करते तो उसका राजनैतिक संदेश दूर तक जाता .फिर भी अखिलेश और राहुल गांधी ने समूची भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को जिस तरह बचाव की मुद्रा में लाने पर मजबूर किया वह ऐतिहासिक है .वे बनारस की गलियों में जिस तरह निकले और जैसी सफाई थी वह भी लोग याद रखेंगे .रोड शो को नादान कलेक्टर ने बताया कि वे दर्शन करने जा रहे थे .क्या कोई व्यक्ति दो क्विंटल फूल रास्ते भर उछालता हुआ बाबा विश्वनाथ के दर्शन करे जाता है काशी में .पर उससे भी क्या होगा .नजीर बनारसी ने जो लिखा है उसपर भी एक नजर डाल लें तो सब समझ में आ जाएगा . ऎसा भी है बाजार बनारस की गली में ,बिक जाए खरीदार बनारस की गली में ,सड़कों पे दिखाओगे अगर अपनी रईसी,लुट जाओगे सरकार बनारस की गली में .

Sunday, January 1, 2017

चूहे के हाथ तो चिंदी है !

चू अंबरीश कुमार नोटबंदी के पचास दिन बीत गए .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पचास दिन ही तो मांगे थे .उसके बाद के तीन दिन भी बीत गए .अब नया साल भी शुरू हो गया है .पर बीते साल की नोटबंदी ने कई घरों में अंधेरा छाया हुआ है .बीते साल के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोले .पर ऐसा कुछ नहीं बोले जिसकी देश के लोगों को उम्मीद थी .इससे पहले भी बोले थे तो चूहे की बात कही .वे अपने अंदाज में बोले ,' एक नेता कहते हैं कि मोदी ने खोदा पहाड़ और निकली चुहिया. मैं बता दूं कि मैं चुहिया ही चाहता था. क्योंकि वो ही सभी कुतर-कुतर के खा जाती है.' प्रधानमंत्री ने ही कहा कि वे सिर्फ चुहिया ही निकालना चाहते थे .इससे ज्यादा कुछ नहीं .शेर का पिंजड़ा लगाकर उन्होंने जिस चुहिया को पकड़ा उसके हाथ तो सिर्फ चिंदी लगी है .क्या आपने सुना किसी बड़े कारपोरेट घराने का कोई बड़ा काला धन पकड़ा गया .क्या कोई बड़ा नेता काला धन के साथ पकड़ा गया ,क्या कोई बड़ा आतंकवादी काला धन के साथ पकड़ा गया .ये तो काला धन के जंगल के शेर चीते है .पर मोदी ने चुहिया पकड़ी है .क्या देश इसी ' चुहिया ' को पकड़ना चाहता था .क्या इसी चुहिया को पकड़ने के लिए करीब सवा सौ लोग घोषित रूप से कतार में शहीद हो गए .अघोषित यानी नकदी के आभाव में गंभीर रूप से बीमार लोग जो मर गए वे अलग हैं .जिन घरों में शादियां टूट गई वे परिवार अलग है .छोटे मझोले उद्योगों के जो मजदूर शहर से गांव लौट आए वे अलग है .जो किसान रबी की फसल समय पर कर्ज के बावजूद नहीं बो पाए वे अलग है .कर्ज भी तो पुरानी करेंसी में था .पर इस सब पर प्रधानमंत्री खामोश रहे .वे आगे बोले , 'यही देश, यही लोग, यही कानून, यही सरकार और यही फाइलें थीं. वो भी वक्त था कि जब सिर्फ जाने की चर्चा होती थी. ये भी एक वक्त है कि अब आने की चर्चा होती है. देश के लिए जज्बा, लोगों के प्रति समर्पण हो तो कुछ करने के लिए ईश्वर भी ताकत देता है.पर मोदी जी माल्या को क्यों भूल जाते हैं .मध्य प्रदेश के व्यापम को क्यों भूल जाते हैं .छतीसगढ़ के अनाज घोटाले को क्यों भूल जाते है .आपके राज में भी बहुत माल जा रहा है . वे कल बोले पर बहुत सपाट सा बजट भाषण जैसा .चेहरे पर थकावट का भाव .यह उम्मीद तो किसी को नहीं थी .सभी मान कर चल रहे थे कि प्रधानमंत्री बताएंगे कि देश को कितना काला धन मिला .कितने उद्योगपति पकडे गए ,कितने नेता धरे गए .पर उन्होंने इसपर कुछ नहीं कहा क्योंकि नोटबंदी से इनपर कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पडा .पकडे गए तो चंद मिठाई वाले ,दवाई वाले या कुछ बैंक मैनेजर .क्या इन्ही के लिए देश को आर्थिक आपातकाल का सामना करना पड़ा .कृषि के जानकार देवेंद्र शर्मा ने बताया है कि इस नोटबंदी से किस तरह छोटे और मझोले किसान तबाह हो गए .तराई के इलाके में दलहन की फसल पर बुरा असर पड़ चुका है .पर इनके अर्थशास्त्री भी गजब के हैं जो बता रहें हैं कि इस नोटबंदी में किसानो ने झूम कर बुआई कर डाली है .बंपर फसल होगी .जब सबकुछ कागज पर ,भाषण में ही करना है तो कोई भी सब्जबाग दिखा सकते है .ये गंजों के शहर में कंघे का कारोबार कर सकते है .यूपी का चुनाव होने जा रहा है .वे कल भी बोलेंगे .पर देखिएगा अबकी कितना गजब का बोलेंगे .हाथ हिलाकर ,चेहरा बनाकर .वाराणसी याद है न किस तरह राहुल गांधी के कथित घूस के आरोप पर नाटकीय अंदाज में तालियां बटोर ली थी .पर याद रहे सारे नाटकीय अंदाज के बावजूद न ये दिल्ली बचा पाए न बिहार .अब यूपी की बारी है .यूपी की नजर भी उसी ' चूहे ' पर है जिसकी तलाश में इन्होने किसानो का खेत खलिहान खोद डाला .उद्योग धंधे की नीव खोद डाली .पर उस चूहे के हाथ तो चिंदी है .बड़े लोग तो निकल चुके हैं .

Saturday, February 7, 2015

तो टूट गया मोदी का तिलिस्म ?

तो टूट गया मोदी का तिलिस्म ? यह चुनाव लोकसभा चुनाव के बाद पहला वह चुनाव है जिसने मोदी का राजनैतिक तिलिस्म तोड़ दिया है ।अहंकार भी तोड़ दिया है । नसीब भी गया ।पहली बार कोई प्रधानमंत्री बड़ी म्युनिस्पैलिटी के चुनाव में मोहल्ला मोहल्ला घूमा था ।जिसकी जरुरत नहीं थी ,फिर भी कही अश्वमेघ का घोडा मोहल्ले का नौजवान न रोक ले यह डर जरुर था ।साथ ही अपने पर कुछ ज्यादा ही विश्वास भी तो अन्य नेताओं पर अविश्वास । हारी हुई बाजी को जीत में बदल देने का विश्वास ।पर यह भूल गए कि जनता नौ महीने के राजकाज पर अपनी राय भी देने वाली है ।जो पेट्रोल और डीजल के अंतरराष्ट्रीय दाम में हुई गिरावट से देश की महंगाई को नहीं देखने वाली थी ।नून तेल लकड़ी से महंगाई देखी जाती है ,आटा दाल चावल और आलू प्याज से महंगाई नापी जाती है । फिर तुर्रा यह कि ' आपकी टेंट में तो अब पैसा बच रहा होगा , जैसे जुमले भी घाव पर नमक जैसे ही लगते है ।इस सबके बाद एक ठीक ठाक पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को ताक पर रखकर जिस तरह किरण बेदी को मोदी और शाह ने पार्टी की दिल्ली इकाई पर थोपा उसने रही सही कसर भी पूरी कर दी ।मोदी और शाह तो आम आदमी पार्टी ही नही भाजपा की दिल्ली इकाई से भी लड़ रहे थे ।पैसे के बूते पर ,सत्ता के बूते पर और कारपोरेट घरानों और उनके चैनलों के बूते पर ।वे भूल गए हर बार विज्ञापन से जीत नही मिल पाती । भारतीय जनता पार्टी के संगठन के हिसाब से भी यह चुनाव बहुत निर्णायक हो गया है ।पार्टी में मोदी-शाह की कार्यशैली को लेकर दिल्ली का यह चुनाव अभी काफी उथल पुथल मचाने वाला है ।किरण बेदी से लेकर शाजिया इल्मी जैसे उधार के दगे हुए कारतूसों से जंग नही लड़ी जाती यह भी दस को साफ़ हो जाएगा ।इस चुनाव को मोदी और मीडिया ने जरुरत से ज्यादा तूल दिया और तरह तरह के हथकंडे भी अपनाए ।जो चुनाव दिल्ली भाजपा बनाम आप पार्टी था उसे मोदी ने अपने अहंकार में मोदी बनाम मफलर वाला बना दिया ।आम लोगों को यह मफलर वाला अपनी गली का ही नौजवान नजर आया ।जो अडानी से लेकर अंबानी तक को चुनौती देता है ,बिना किसी डर के ।उधर एक अड़ियल पुलिस वाली को मुकाबले में आगे कर मोदी शाह ने रही सही कसर पूरी कर दी ।कभी भी कोई युद्ध के दौरान सेनापति नही बदलता ।पर मोदी ने बीच युद्ध में पार्टी का सेनापति बदल दिया और किसी की भी नही सुनी ।और इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गिया जो पार्टी के आम कार्यकर्ताओं को रास नही आया था ।इसके बाद चुनावी शतरंज में साम दाम दंड भेद सारे हथकंडे अपना लिए गए ।पुलिस भी लगे गई तो बदमाश भी और साजिश वाले भी जुट गए । सारी लड़ाई ' एक दिए की और तूफ़ान , की लड़ाई में बदल गई ।इस सबके चलते झुग्गी झोपडी से लेकर हाशिए का समाज आज सड़क पर उतरा और फिर चुनावी आकलन ने माहौल बदल दिया है ।अब दस के बाद शुरू होगी दूसरी राजनैतिक लड़ाई ।अब आम आदमी पार्टी इस देश के मुख्यधारा की पार्टियों में पूरी ताकत के साथ शामिल हो गई है ।और इसका श्रेय श्री नरेंद्र मोदी को सौ फीसद दिया जाना चाहिए । जनादेश

Wednesday, June 12, 2013

नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश में रास्ता आसान नही

अंबरीश कुमार लखनऊ ,१२ जून ।नरेंद्र मोदी और आडवाणी के विवाद के बाद सबकी नजर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश की तरफ है । उत्तर प्रदेश ही वह राज्य है जहां नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है । आज जैसे ही नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह लखनऊ पहुंचे उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई । भाजपा बम बम दिखी और पार्टी के एक धड़े का मानना है कि नरेंद्र मोदी के आने से भाजपा उत्तर प्रदेश में मुकाबले में आ सकती है हालाँकि पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ से लेकर अयोध्या के विनय कटियार तक जैसे नेता नरेंद्र मोदी का जयकारा लगाने वाले नहीं है । आडवाणी समर्थक खेमा मोदी के साथ नही आने वाला । भाजपा के एक नेता ने कहा -उत्तर प्रदेश में यह पार्टी फादर और गाड फादर के बीच झूल रही है और यहां लीडर कम चियर लीडर्स ज्यादा है । नेता तो भारी भारी पहले भी थे और बाहर से और भारी नेता आ रहे है पर कार्यकर्त्ता किन औजारों से प्रदेश के बड़े क्षत्रपों से लड़ेगा यह उन्हें नहीं पता है ।यह मायावती और मुलायम जैसे बड़े क्षत्रपों का प्रदेश है जो एक बड़े वोट बैंक के साथ खड़े है जिनसे अत्याधुनिक संचार साधनों से आप नहीं लड़ सकते ,यंहा सोशल मीडिया से चुनावी जंग नहीं जीती जा सकती जंहा ज्यादातर जिलों के गांवों में पन्द्रह घंटे बिजली ही नहीं रहती । इस बीच समाजवादी पार्टी ने साफ़ किया कि उत्तर प्रदेश में किसी मोदी की दाल नहीं गलने जा रही ।यहां सांप्रदायिक ताकतों की कलई खुल चुकी है और वह तीसरे चौथे नंबर की पार्टी है ।सांप्रदायिक ताकतों की पहले ही कलई खुल चुकी है और फिर से उन्हें मजबूत करना आसान नहीं है ।समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने आज यहां कहा कि सांप्रदायिकता के बल पर उत्तर प्रदेश में किसी के मंसूबे सफल नहीं होनेवाले हैं। प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है जो धर्मनिरपेक्षता से गहरे जुड़ी है। गुजरात में मुस्लिमों का कत्लेआम करनेवालों को प्रदेश की जनता जरा भी भाव देनेवाली नहीं है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का सिर्फ आधार ही नही खिसका बल्कि शीर्ष नेताओं की कलह के चलते पार्टी संगठन का भठ्ठा बैठ बैठ चुका है ।पिछले विधान सभा चुनाव में पार्टी ने एक छोड़ सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारा था जिसमे अढतालीस उम्मीदवार जीते थे अगडी जातियों के तीस उम्मीदवार थे तो बारह पिछड़े और तीन दलित ।इससे इनकी सोशल इंजीनियरिंग को समझा जा सकता है । बाबूसिंह कुशवाहा के बावजूद इन्हें पिछडों की राजनीति में कोई खास फायदा नहीं हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी के संसदीय सीट रही लखनऊ में बड़ी मुश्किल से कलराज मिश्र की सीट के चलते इज्जत बची थी । पिछली लोकसभा में पार्टी की दस सीटें थी जिसे बहुत ज्यादा बढ़ाना आसान नहीं ।ऐसे में नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए जनाधार बढा सके यह बहुत आसान नहीं दिखता । यहां भाजपा खेमों में बंटी है तो अंचलों में भी बंटी है ।पूर्वांचल में सिर्फ और सिर्फ योगी आदित्यनाथ है और वहां पहुँचते पहुँचते भाजपा हिंदू युवा वाहिनी में तब्दील हो जाती है जिसके सर्वेसर्वा योगी है । टिकट उनकी मर्जी से नहीं दिया गया तो उस उम्मीदवार की हार वे सुनश्चित कर देते है ।इसी तरह कुछ और नेता भी अपने गढ़ में किसी की चलने नहीं देते ।यह सब चुनौतियां नरेंद्र मोदी के सामने है तो उन्हें लेकर भाजपा को कुछ फायदा भी मिल सकता है । धार्मिक आधार पर जिस भी जगह गोलबंदी हुई वह मोदी के आने के बाद और तेज होगी यह तय है । ऎसी जगहों पर भाजपा को फायदा मिल जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए ।भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -मोदी के आने से पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढा है और लोकसभा चुनाव में हमें बड़ा फायदा होने जा रहा है । वैसे भी अमित शाह ने आज कहा कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर ही जाता है ।साफ़ है उन्हें भी उत्तर प्रदेश से बहुत उम्मीद है । अमित शाह की इस टिपण्णी से नरेंद्र मोदी के मंसूबों को भी समझा जा सकता है । jansatta