Tuesday, September 13, 2016

नियामक आयोग मत बने

शेखर गुप्ता को लेकर सबसे ज्यादा एतराज इस बात पर हो रहा है कि उन्होंने एमसीडी के बारे में नहीं लिखा दिल्ली सरकार के बारे में ट्वीट किया .उन्होंने जो लिखा वह सोशल मीडिया पर लिखा जिसपर न जाने कितने लोग हर समय अल्ल बल्ल लिखते रहते हैं .कोई क्या लिखेगा इसका नियामक आयोग खुद को न बनाये .अभिव्यक्ति की आजादी इस मुल्क में है तो उसे बने रहने दे .वे भाजपाई हो गए हैं इससे अगर एतराज है तो इससे ज्यादा मूर्खतापूर्ण तर्क और कोई नहीं हो सकता .किसी पत्रकार के लिए क्या यह कोई नियम है कि वह सिर्फ कांग्रेसी बने ,सिर्फ वामपंथी बने या संघी बने .आप यानी आम आदमी पार्टी वाली धारा तो सबसे नई है जिसकी अभी तक कोई विचार धारा ही साफ़ नहीं है .इसके बावजूद बहुत से रिपोर्टर से लेकर संपादक तक बह गए और अब ठीकठाक जगह पहुंच भी गए है तो क्या इस तर्क के आधार पर सब दलाल हो जायेंगे .जो भाजपा का गुणगान करते करते सरकार से सम्मानित हुए और लाभ के पद पर पहुंच गए क्या वे सब दलाल हो जाएंगे .जो कांग्रेस के दौर में साल में छह महीने विदेश रहते थे कई तरह का लाभ लेते थे क्या वे सब दलाल हो गए .इंडियन एक्सप्रेस समूह में मैंने अरुण शौरी को मंडल आयोग के खिलाफ जहर भरा अभियान चलाते देखा जिसके चलते उन्हें एक्सप्रेस से जाना भी पड़ा तो प्रभाष जोशी को आपरेशन ब्लू स्टार का समर्थन करते .हम लोग इसके खिलाफ थे .पर कोई क्या लिख रहा है उसके आधार पर उसे किसी का दलाल कह दे यह कौन सा कुतर्क है .पत्रकार अपनी धारा तय करता है और उसपर चलता है .रिपोर्टर से यह अपेक्षा होती है कि वह खबर और विचार का घालमेल न करे .पर वह अपना निजी विचार न जाहिर करे यह कौन सा तर्क .लोकतंत्र है और विचार इस लोकतंत्र की आक्सीजन है .तानाशाही नहीं है .सवाल उठाइए असहमति जताइए पर खुद को खुदा बनाकर किसी को भी ' दलाल ' घोषित करने का फ़तवा न दे .ये तो पूर्ण राज्य वाले भी नहीं है .हमने बड़े बड़े क्षत्रपो को हाशिये पर जाते देखा है .

Thursday, February 18, 2016

देश डर न जाये इस देशभक्ति से !


देश डर न जाये इस देशभक्ति से ! अंबरीश कुमार जिन छात्रों और नौजवानों से बनी लहर पर सवार होकर नरेंद्र मोदी सत्ता में आये थे. आज उन्हीं छात्रों के खिलाफ सरकार ने लगता है. अघोषित युद्ध छेड़ दिया है. कहा जा रहा है कि यह रणनीति है .देशभक्त बनाम देशद्रोही में बांटने की .इससे पार्टी को फायदा पहुंचेगा . इसी वजह से अदालत में झंडा ,डंडा और ईंटा पत्थर लेकर कुछ देशभक्त वकील न्याय करने उतरे . पर यह रणनीति नाकामयाब होती नजर आ रही है .जेएनयू में विद्यार्थी परिषद के छात्र संघ पदाधिकारी ही विरोध में खड़े हो गये . यह आगे बढ़ा तो यह संगठन और सरकार दोनों पर भारी पड़ेगा.यह देश इतना कमजोर नहीं है कि दर्जन भर गुमराह लोग नारा लगा दे तो देश दरक जाये .यह समझना चाहिये .आज उत्तर से दक्षिण तक परिसर सुलग रहे हैं. मुद्दे अलग अलग हैं. जेएनयू के मुद्दे से देश में बहस छिड़ गयी है. धुर वामपंथी दलों को भी अब मंथन करना चाहिये जिनके ज्यादातर नायक अधिनायक इस देश के नहीं हैं. गांधी, लोहिया और जयप्रकाश का वे नाम नहीं लेंगे. अंबेडकर अब उनकी सूची में जुड़े हैं. वे अफजल गुरु और मकबूल बट के नाम पर कौन सी राजनीति खड़ी करना चाहते हैं. उनकी प्राथमिकता पर शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे होने चाहिए या दूसरे मुद्दे. परिसर में बहस हो, संवाद हो पर कश्मीर की आजादी की लड़ाई इस देश के विश्विद्यालय परिसर में तो नहीं लड़ी जा सकती. पर यह एक पहलू है. दूसरा पहलू परिसर में कट्टरपंथ के बढ़ते दायरे का है. अगर जेएनयू में गलत हुआ तो बनारस हिंदू विश्विद्यालय में संघ का लाठी के साथ पथ संचलन भी ठीक नहीं कहा जा सकता. परिसर में संवाद हो बहस हो हिंसक टकराव की जमीन न तैयार करे. ऐसा हुआ तो छात्र युवा आक्रोश की जमीन तैयार हो जायेगी. हालात वैसे ही बन भी रहें हैं. हैदराबाद से लेकर इलाहाबाद तक. यह युवा आक्रोश बहुत कुछ फिर बदल देगा.शुरुआत हो गई है गुरूवार को दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में छात्र नौजवान सड़क पर उतरे . इस तरह का युवा आक्रोश पहली बार साल 1966 -67 में दिखा था. जो नक्सलबाड़ी से शुरू होकर देश के विभिन्न हिस्सों में फ़ैल गया था. इसके बाद चौहत्तर के आंदोलन में यह आक्रोश उभरा और इस तरह का ही आक्रोश अन्ना हजारे के आंदोलन के दौर में दिखा. बहुत ध्यान से छात्र युवा आक्रोश के समय पर गौर करें. जब-जब छात्र युवा आक्रोश उभरा है. सत्ता भी बदली है. प्रदेश से लेकर देश तक. इसलिए मोदी सरकार को इस आक्रोश को गंभीरता से लेना चाहिए. कौन हैं ये लोग जो छात्रों पर राष्ट्रभक्ति के नाम पर हमला कर रहे हैं. अदालत में अराजकता हो रही है. हमला हो रहा है. पत्रकारों पर हमला कर रहे हैं. जो चेहरे पुलिस को नहीं दिख रहे हैं. वह मीडिया लगातार दिखा रहा है. ये चेहरे कभी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ खड़े नजर आते हैं. अखबार में चैनलों में सभी हमलावर के चेहरे सामने आ चुके हैं. फिर भी सबकी आंखे बंद हैं. यह पहली बार है कि सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर पुलिस को फटकार लगाना पड़ा और कोर्ट परिसर को खाली कराने को कहना पड़ा. यह कौन सा राज स्थापित हुआ है. जंगलराज सिर्फ बिहार में ही नहीं दिल्ली में भी आ सकता है. इसी तरह जब मीडिया पर अदालत परिसर में दो दिन लगातार हमला होता है और केंद्र सरकार के मंत्री प्रकाश जावड़ेकर एनडीटीवी की एक महिला एंकर को पत्रकारिता का ककहरा सिखाते हैं. सत्तारूढ़ दल कौन से आदर्श स्थापित कर रहा है. जो कल तक खालिस्तान के नारे लगाते थे, पंजाब में पूर्व मुख्यमंत्री की हत्या करने वाले नेताओं का महिमामंडन करते थे. उनके साथ भी हाथ मिलाया जाता है. अफजल गुरु को शहीद मानने वाली और कश्मीर में आजादी का नारा देने वाली ताकतों के साथ खड़ी पीडीपी के साथ आप सरकार चलाते हो और दिल्ली में दूसरों को राष्ट्रभक्ति का पाठ भी पढ़ाते हो. यह कैसा विरोधाभाष है. हम कई दशक से अलगाववादियों से संवाद करते रहे हैं. ताकि उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके. खालिस्तान का नारा देने वाले भी इसमें शामिल थे. तो पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण में अलगाववाद की बात करने वाले भी. हम पकिस्तान से भी संवाद करते हैं. ताकि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर हो. जब सबसे बात कर सकते हैं तो इस देश की युवा पीढी के एक हिस्से को क्यों छोड़ दें. जो नौजवान भटक गये हो उन्हें भी मुख्यधारा में लाने का प्रयास होना चाहिए या उन्हें भी अलगाववादी आंदोलन में ढकेल देंगे. यह एक छोटा सा हिस्सा हो सकता है पर जरा ध्यान से देखे हैदराबाद से लेकर इलाहाबाद तक में तो मुख्यधारा से जुड़े छात्रों पर हमला हो रहा है. बनारस से लेकर लखनऊ में तो संसदीय राजनीति के पक्षधर ताकतों पर हमला हो रहा है. यह न नौजवान बर्दाश्त करेगा न समाज. अगर युवा आक्रोश बढ़ा,परिसर अशांत हुआ तो उसकी बड़ी कीमत भी देनी पड़ेगी. बहुत छोटी सी शुरुआत होती है. यह सभी जानते हैं. गुजरात में मेस के मुद्दे से छात्रों का जो आंदोलन शुरू हुआ था. उसने देश की सत्ता से इंदिरा गांधी को बेदखल कर दिया था. यह जरुर ध्यान रखें. शुक्रवार

Tuesday, February 9, 2016

नदी को नहर में तो न बदलें

नदी को नहर में तो न बदलें अंबरीश कुमार देश के विभिन्न हिस्सों में शहरों से बहने वाली नदी पर रिवर फ्रंट बनाने की योजना शुरू हो चुकी है । देश में इस योजना की प्रेरणा अहमदाबाद के बीच से बहने वाली साबरमती रिवर फ्रंट से मिली तो विदेश में न्यूयार्क की हडसन नदी से । इसका लोग उदाहरण भी देते है । इसी के चलते पर शुरू होना है । इसका कल्पना भी बहुत अच्छी लगती है और जो सब बताया जाता है वह भी मध्य वर्ग को बहुत लुभाता है । मंद मंद बहती नदी के दोनों तट पर पक्की चमचमाती सड़क । बैठने के लिए शानदार बेंच । संगीत के साथ तरह तरह के व्यंजन परोसते रेस्तरां और नदी में वाटर स्पोर्ट । अत्याधुनिक नाव ,होवरक्राफ्ट और क्रूज सबकुछ । बस नहीं होगा तो नदी का अपना साफ़ पानी । पर इसकी कीमत बहुत ज्यादा है । जिस नदी पर यह बनेगा उसका हाइड्रोलिक सिस्टम पूरी तरह बिगड़ जाएगा । जो जलचर नदी के कच्चे किनारे पर आते जाते अंडा देते वे सब निपट जाएंगे । नदी अपने को रिचार्ज करने के लिए जो पानी अपने कच्चे किनारों से बरसात में लेती वह व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी । साफ पानी तो तो कम मिलेगा सीवेज का पानी ज्यादा मिलेगा । इस योजना से शहर का कुछ सौंदर्य भले बढ़ जाए ,कुछ होटल और क्रूज वालों को मुनाफा भले हो जाए पर पर्यावरण को जो नुकसान होगा उसकी भरपाई सौ साल में भी संभव नहीं होगी । और जो सरकार इस तरह की योजना पर काम कर रही है उन्हें इनके राजनैतिक नुकसान का आकलन जातीय समीकरण से ऊपर उठकर कर लेना चाहिए । इससे पानी का बड़ा संकट भी पैदा होगा । अब लोग पानी के संकट को गंभीरता से लेते है और उसकी वजह भी जानना चाहते है । जिस साबरमती रिवर फ्रंट से लोग प्रेरणा ले रहे है उन्हें यह जानना चाहिए कि इस योजना के चलते साबरमती में बार बार नर्मदा का उधार का पानी डाला जाता है तब वह बची हुई है वर्ना वह भी कई महीने नदी की जगह नाला नजर आएगी । और इसकी कितनी कीमत साबरमती ने चुकाई है वह भी जान ले । शहर के बीच साबरमती की औसत चौड़ाई 1253 फुट थी जो रिवर फ्रंट योजना के बाद 902 फुट बची । यह जो कटौती हुई है उसी पर रिवर फ्रंट बना और इसका एक हिस्सा निजी क्षेत्र के हवाले भी हुआ । इस तरह नदी का एक हिस्सा किस तरह विकास की भेंट चढ़ गया यह सोचने वाला है । अब गोमती हो हिंडन हो या फिर यमुना हो जिस भी नदी पर रिवर फ्रंट बनेगा वह नदी को छोटा कर ही बनेगा । नदी और नहर में जो फर्क होता है उसे तो समझना चाहिए । नदी पानी देती है और खुद ही पानी लेती भी है । कहीं भूजल से अपने को रिचार्ज करती है तो कहीं बरसात के पानी से । जबकि नहर अपने को स्वतः रिचार्ज नहीं कर सकती । दूसरे हर नदी की प्रकृति अलग होती है । गोमती का मुकाबला चम्बल से नहीं हो सकता और न ही टेम्स और हडसन से । टेम्स और हडसन को किस तरह पुनर्जीवित किया गया है यह लोग नहीं जानते । फिर अगर शहर से बहने वाली नदी पर रिवर फ्रंट प्राकृतिक रूप से भी बनाया जा सकता है । चीन के शंघाई में ह्वांगपू रिवर फ्रंट /पार्क इसका नया उदाहरण है जहां नदी के किनारे बिना सरिया सीमेंट की दीवार बनाए प्राकृतिक ढंग से रिवर फ्रंट बनाया गया ।ऐसी व्यवस्था की गई जिससे नदी का पानी साफ़ रहे और उसके पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचे । अपने देश में ज्यदातर नदियां जो शहर से गुजरती है वे बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी है ।अब उनके दोनों किनारे सड़क माल और बाजार बनाकर हम उसे पूरी तरह ख़त्म कर देंगे ।साभार -दैनिक हिंदुस्तान फोटो -शंघाई ह्यूटन पार्क का दो दृश्य .ऐसा भी रिवर फ्रंट हो सकता है

Saturday, January 2, 2016

अपनी जमीन ही नसीब हुई अरविंद उप्रेती को

अंबरीश कुमार अरविंद उप्रेती के जाने की खबर से सन्न रह गया हूं .भीतर से डरा दिया दिया उनके की जाने की खबर ने .वे तो साथ के थे .हम प्याला हम निवाला थे .कुछ महीने पहले दो दिन साथ थे तो लंबी चर्चा हुई थी घर परिवार गाँव को लेकर . उनका अपने पौड़ी स्थित गांव से बहुत लगाव थे .वे वही से आए और अपनी वही जमीन उन्हें नसीब हुई . खबर पच्चीस साल से ज्यादा का संबंध रहा .वे एक अच्छे संपादक थे .बिना किसी अहंकार के बहुत कुछ सिखाया भी .वे कोई साहित्यकार या कवि नहीं थे शांत किस्म के बहुत ही इंट्रोवर्ड किस्म का व्यक्तित्व था .कई तरह की परेशानियों से गुजर रहे थे पर किसी से कुछ कहते नहीं .जब भी दिल्ली आता कोई और हो न हो अरविंद साथ रहते .जब रायपुर में इंडियन एक्सप्रेस ज्वाइन करने जा रहा था तो साथ गए भी बस्तर तक .रम्मू भय्या से मिलवाने के लिये आए थे जिनके साथ वे जबलपुर में काम कर चुके थे .खाने पीने का शौक रहा .पिछली बार दो दिन देहरादून से मंसूरी तक साथ थे .देहरादून स्टेशन आ गए थे लेने और फिर छोड़ने भी आए .दो पराठे और सब्जी बंधवा कर लाये .मंसूरी में मै कार्यशाला में थे तो वे नीचे उतर कर गाँव की तरफ चले गए .कुछ समय पहले बहन गुजर गई थी इसलिए उससे संबंधित दस्तावेज आदि जमा कराने के लिये देहरादून में रहते .बेटे की नौकरी को लेकर परेशान रहते .पर पहाड़ के गांव से मोह था इसलिए कहते जनसत्ता एपार्टमेंट का फ़्लैट बेच कर अब गाँव में रहूँगा .बेटी जाब में आ चुकी थे इसलिए वे उसकी तरफ से निश्चिंत भी रहते .मुझे समझ नहीं आता वे अकेले कैसे देहरादून और पौढ़ी में रहते .पूछता तो बेफिक्र होकर कहते ,कौन दिल्ली में है ही .रिटायर होने के बाद का अकेलापन भी कई बार तोड़ता है .वे जनसत्ता एपार्टमेंट में रहते पर बहुत कम लोगों से संबंध रहा .मै आता तो उनके घर जाता .दो तीन साल पहले घर पर दावत दी तो उनको टोका भी खानपान को लेकर .खाने में फैट जरुरत से ज्यादा था .कोई परहेज नहीं .बाद में सुगर की भी समस्या हो गई पर खानपान अनियमित ही रहता .देहरादून में में कैसे खाना होता है यह पूछने पर बताया था कि नास्ता वे करते नहीं सीधे दाल चावल आदि बना लेते है .यह फिर रात में बाहर से खाना लाकर खाते है .एक्सप्रेस यूनियन में चुनाव हुआ हिंसा हुई वे अपनी हिफाजत में सबसे आगे रहे .अपनी प्रतिबद्धता कभी नहीं बदली और न जीवन शैली .शुक्रवार शुरू किया तो अरविंद से कहा कि वे एपार्टमेंट में ही रहते है तो संपादकीय विभाग का काम संभाले .वेतन भी ठीक ठाक देने की पेशकश हुई .उप्रेती का जवाब था ,छोडो यार बहुत हो गई नौकरी अब मौज करनी है .बेटे की नौकरी के लिये जरुर कहते .एक अंग्रेजी अख़बार में बात भी हुई पर उसे रास न आया .यह चिंता उन्हें जरुर परेशान करती .पर किसी से कोई व्यथा नहीं बताते .याद है कैम्पटी फाल के डाक बंगले में रुके तो वे ही गए खाने आदि का इंतजाम करने .फिर देर तक बैठे और शमशाद बेगम और सुरय्या आदि के गाने सुनते रहे .वे बीच बीच में बाहर जाते झरने की तरफ .बोले यह जगह बहुत अच्छी है यहां दोबारा आऊंगा .पिछली बार एपार्टमेंट स्थित मेरे फ़्लैट में आए और देर तक बैठे .उनसे कहा था ,भाई ये गुटका छोड़ दे .कुछ चेकअप आदि भी करा लिया करे पर वे बेफिक्र थे .कहा -जबतक रहेंगे ठीक से रहेंगे जब चले जाएंगे तो फिर क्या चिंता रहेगी .अभी मंगलेश जी का फोन आया बताया कि परसों ही मुलाकात हुई थी .फिर शंभुनाथ शुक्ल का फोन आया बोले आपके फेसबुक से फोटो ली तो मेरा जवाब था ,अरविंद उप्रेती की तो शायद कोई फोटो मिले भी नहीं .उनका कोई मेल अकाउंट नहीं था फेसबुक तो बहुत आगे की बात है .बीते तीस अगस्त को मैंने उनकी बहुत सी फोटो ली थी कुछ लोक कवि बल्ली सिंह चीमा के साथ तो कुछ अलग .कुछ फोटो ब्लाग पर दे रहा हूं

Wednesday, December 16, 2015

प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार

प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस परिवार अंबरीश कुमार इसे संयोग ही कहेंगे कि चार नवंबर 2009 यानी निधन से ठीक एक दिन पहले प्रभाष जी ने लखनऊ में एक्सप्रेस की सहयोगी मौलश्री की तरफ घूमकर हाथ आसमान की तरफ उठाते हुए कहा -मेरा तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार ही घर बनेगा.इंडियन एक्सप्रेस से उनका संबंध कैसा था इसी से पता चल जाता है. प्रभाष जोशी करीब 3० घंटे पहले चार नवम्बर की शाम लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों के बीच थे. करीब ढाई घंटे साथ रहे.एक्सप्रेस समूह से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बताया.रामनाथ गोयनका और अपने संबंधों के बारे में बताया. यह भी बताया कि संपादकीय मामले में दखल देने पर किस तरह उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल से किनारा कर लिया था. देवीलाल जिनसे वे हर दो चार दिन बाद मिलते थे , उन्हें पोस्टकार्ड लिख कर कहा था -देवीलाल जी हरियाणा की सरकार आप चलायें जनसत्ता हमें चलाने दें.ऐसे कई किस्से उन्होंने एक्सप्रेस के पत्रकारों के साथ साझा किये.यह उनकी अंतिम बैठक साबित हुई जिसमे एक्सप्रेस ,फाइनेंशियल और जनसत्ता के पत्रकार शामिल थे. पिछले दिनों एक पुस्तक के सिलसिले में सारा दिन एक्सप्रेस की लाइब्रेरी में गुजरा अस्सी के दशक में जो लिखा उसमें बहुत कुछ मिला तो काफी कुछ छूट भी गया.पर अस्सी के अंतिम दौर और नब्बे की शुरुआत में जनसत्ता में जो लिखा गया फिर देख कर इतिहास में लौटा .राजेंद्र माथुर ,रघुवीर सहाय ,शरद जोशी से लेकर नूतन का जाना और राजनैतिक घटनाक्रम पर प्रभाष जोशी का लिखा फिर पढ़ा .कुछ हैडिंग देखे .प्रभाष जोशी ने दलबदल पर लिखा ' चूहे के हाथ चिंदी है ' फिर एक हैडिंग -चौबीस कहारों की पालकी ,जय कन्हैया लाल की ' और एक की हेडिंग थी -नंगे खड़े बाजार में .यह भाषा , यह शैली प्रभाष जोशी को अमर कर गई . एक ही दिन बाद पांच नवंबर की देर रात दिल्ली से अरुण त्रिपाठी का फोन आया -प्रभाष जी नहीं रहे. मुझे लगा चक्कर आ जायेगा और गिर पडूंगा .चार नवम्बर को वे लखनऊ में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे. मुझे कार्यक्रम में न देख उन्होंने मेरे सहयोगी तारा पाटकर से कहा -अंबरीश कुमार कहां हैं.यह पता चलने पर की तबियत ठीक नहीं है उन्होंने पाटकर से कहा दफ्तर जाकर मेरी बात कराओ .मेरे दफ्तर पहुंचने पर उनका फोन आया .प्रभाष जी ने पूछा -क्या बात है ,मेरा जवाब था -तबियत ठीक नहीं है .एलर्जी की वजह से साँस फूल रही है.प्रभाष जी का जवाब था -पंडित मैं खुद वहां आ रहा हूँ और वही से एअरपोर्ट चला जाऊंगा . चार नवंबर 2009 की शाम थी. मैं लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता के दफ्तर में पहली मंजिल पर किसी खबर को भेज रहा था तभी राममिलन ने आकर कहा ,साहब कोई प्रभाष जोशी जी सीढ़ी चढ़कर ऊपर आ रहे है .मै खड़ा हुआ और उससे कहा पहले क्यों नहीं बताया उन्हें ऊपर आने से रोकना चाहिये था हम लोग नीचे ही जाकर मिलते .तबतक प्रभाष जी सामने थे .रोबदार आवाज में बोले , क्यों पंडित क्या हो गया तबियत को .उन्हें बैठाया और तबतक इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंशियल एक्सप्रेस के ज्यादातर पत्रकार उनके आसपास आ चुके थे .अचानक बहुत सारी घटनायें याद आ गईं करीब डेढ़ घंटा वे साथ रहे और रामनाथ गोयनका ,आपातकाल और इंदिरा गांधी आदि के बारे में बात कर पुरानी याद ताजा कर रहे थे. तभी इंडियन एक्सप्रेस के लखनऊ संस्करण के संपादक वीरेंदर कुमार भी आ गए जो उनके करीब ३५ साल पराने सहयोगी रहे है .प्रभाष जी तब चंडीगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे .एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट ,संजय सिंह ,मौलश्री सेठ ,दीपा आदि भी मौजूद थीं . प्रभाष जी से इस अंतिम मुलाकात के साथ यह भी याद आया कि मेरी प्रभाष जी से पहली मुलाकात कितनी कठिन रही और वह इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के कहने के बावजूद नहीं हो पाई थी। वर्ष 1987 की बात है जब इंडियन एक्सप्रेस समूह के तत्कालीन चेयरमैन रामनाथ गोयनका से मुलाकात हुई नई दिल्ली के सुंदर नगर स्थित एक्सप्रेस के उस गेस्ट हाउस में जो उनका दिल्ली में ठिकाना था .गोयनका को लोग आरएनजी कहते थे और मुझे भेजा था चेन्नई में जयप्रकाश नारायण के सहयोगी शोभाकांत दास ने .तब बंगलूर के एक अख़बार में थे और आमतौर पर हर दूसरे रविवार चेन्नई चला जाता था शोभाकांत जी के घर . उनके पुत्र प्रदीप कुमार से हम उम्र होने के नाते बनती थी साथ ही वे जेपी की बनाई छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के तमिलनाडु के संयोजक भी थे .बिहार से आकर दक्षिण के तबके मद्रास में बसे इस परिवार से अपना संबंध भी अस्सी के दशक के शुरुआती दौर का है .छात्र युवा संघर्ष वाहिनी से जुड़ा होने के नाते मद्रास के गुडवान्चरी स्थित प्रभावती देवी ट्रस्ट के आश्रम में वाहिनी के एक शिविर में बुलाया गया था .तभी से इस परिवार से संबंध बना .मद्रास सेंट्रल के ठीक बगल में 59 गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट पहुंचा था और बगल में ठहरने का इंतजाम था .बहुत ही अलग अनुभव था . उनका जड़ी बूटियों का बड़ा कारोबार स्थापित हो चुका था . शोभाकांत दास खुद तेरह साल की उम्र में वे आजादी की लड़ाई से जुड गए थे और जवान होते- होते आंदोलन और जेल के बहुत से अनुभव से गुजर चुके थे . हजारीबाग जेल में जेपी को क्रांतिकारियों का पत्र पहुंचाते और उनका संदेश बाहर लेकर आते थे .बाद में सरगुजा जेल में खुद रहना पड़ा जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी के नाम उन्होंने गुडवंचारी में आश्रम बनवाया जिसके ट्रस्ट में तमिलनाडु के सभी महत्वपूर्ण लोग शामिल थे और आसपास के तीस गांवों में इसका काम फैला हुआ था.तब बिहार के सभी वरिष्ठ नेता जो मद्रास आते थे शोभाकांत जी के ही मेहमान होते थे .एम करूणानिधि समेत तमिलनाडु के शीर्ष राजनीतिक भी उनके मित्र ही थे . रामनाथ गोयनका का घर उनके घर के बगल में ही था और उनसे उनके पारिवारिक संबंध थे. शोभाकांत जी चाहते थे कि मद्रास से हिंदी की पाक्षिक पत्रिका शुरू करूं .पर अपना मन बना नहीं .फिर उन्होंने कहा अगर दक्षिण में काम करने की इच्छा नहीं है तो रामनाथ जी के अख़बार से जुड़ना चाहिए जो बहुत अच्छा अख़बार है .मैंने जवाब दिया कि इतनी दूर से दिल्ली जाऊं और वहा कोई पहचाने नहीं तो फिर बैरंग लौटना पड़ेगा .शोभाकांत जी ने कहा कि रामनाथ गोयनका महीने कम से कम एक हफ्ते दिल्ली रहते है .उनसे मै बात करता हूं वे जैसा बतायेंगे फिर वैसा करना .खैर दिल्ली पहुंचा पर इतने बड़े व्यक्तित्व से अकेले मिलने में कुछ झिझक हुई तो पुराने साथी आलोक जोशी जो अब सीएनबीसी आवाज के कार्यकारी संपादक है उन्हें साथ ले गया .सुंदर नगर के गेस्ट हाउस में जब मैनेजर के जरिए सूचना भिजवाई तो खुद गोयनका बाहर निकले .पास आये और गले में हाथ डालकर कमरे में ले गये .बैठाया और बोले ,``देखो एक्सप्रेस में कितना बेसी स्टाफ हो गया है .दो मैनेजर हो गये है .कुछ देर बात करने के बाद आरएनजी ने कहा -ऐसा करो प्रभाष जोशी से जाकर मिल लो .जनसत्ता में सभी का इम्तहान होता है ,तुम्हारा भी होगा .’’ दूसरे दिन बहादुर शाह जफ़र मार्ग स्थित इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग में जनसत्ता के दफ्तर गया . प्रभाष जोशी के सचिव राम बाबू से मैंने कहा - रामनाथ गोयनका जी ने भेजा है प्रभाष जी से मिलना चाहता हूं .राम बाबू ने इंटरकाम पर प्रभाष जोशी से बात की ,बताया कि रामनाथ गोयनका ने किसी को भेजा है . फिर जवाब दिया - प्रभाष जी के पास तीन महीने तक मिलने का कोई समय नही है इसके बाद संपर्क करे .खैर यह घटना याद आई और यह भी कि तीन महीने बाद प्रभाष जी का पत्र मिला .परीक्षा हुई आठ घंटे की .इंटरव्यू हुआ और मै इंडियन एक्सप्रेस परिवार का हिस्सा बना . उनके साथ तकरीबन बीस साल का जुड़ाव रहा. उनसे बहुत कुछ सीखा. भाषा, साहस, ईमानदारी और पत्रकार होने के साथ राजनीतिक कार्यकर्ता होने का जज्बा. उन्होंने मेरे जैसे कितने ही लोगों में यह जज्बा पैदा किया और कितनों को बड़े काम करने लायक बनाया. वे सब उनके ऋणी हैं. उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व निभाया और यही वजह है कि पत्रकारों को लोकतंत्र का पहरुआ कहा भी जाता है. वही प्रभाष जोशी चार नवंबर 2009 को सामने थे. हमें लगता था अभी फिर मिलेंगे और बहुत कुछ सीखेंगे और उनके नेतृत्व में कुछ नया सामाजिक काम भी करेंगे. वे हिंद स्वराज पर अभियान भी चला रहे थे. उस दिन वे करीब ढाई घंटे साथ रहे और जब एअरपोर्ट के लिए रवाना होने से पहले पैर छूने के लिए झुका तो बोले कंधे पर हाथ रखकर बोले, सेहत का ध्यान रखो पंडित बहुत कुछ करना है. लेकिन किसे पता था कि यह आखिरी मुलाकात होगी. और दूसरे ही दिन देर रात वे हम सबको छोड़ चल दिए. शायद ऊपर इंडियन एक्सप्रेस परिवार को अपना घर बनाने. शुक्रवार

Saturday, December 5, 2015

राम की अग्नि परीक्षा

प्रभाष जोशी राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसकों ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रघुकुल की रीत पर अयोध्या में कालिखपोत दी.हिंदू आस्था और जीवन परंपरा में विश्वास करने वाले लोगों का मन आजदुख से भरा और सिर से झुका हुआ है. अयोध्या में जो लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं और बाबरी मस्जिद के विवादितढांचे को ढहाना हिंदू भावनाओं का विस्फोट बता रहे हैं – वे भले ही अपने को साधु-साध्वी, संत– महात्मा और हिंदू हितों का रक्षक कहते हों उनमें और इंदिरा गांधी की हत्या की खबर पर ब्रिटेन में तलवार निकाल कर खुशी से नाचने वाले लोगों की मानसिकता में कोई फर्क नहीं है. एक निरस्त्र महिला की अपने अंगरक्षकों द्वारा हत्या पर विजय नृत्य जितना राक्षसी है उससे कम निंदनीय, लज्जाजनक और विधर्मी एक धर्मस्थल को ध्वस्त करना नहीं है. वह धर्मस्थल बाबरी मस्जिद भी था और रामलला का मंदिर भी. ऐसे ढांचे को विश्वासघात से गिरा कर जो लोग समझते हैं कि वे राम का मंदिर बनाएंगे वे राम को मानते, जानते और समझते नहीं हैं. राम के रघुकुल की रीत है- प्राण जाए पर वचन न जाई. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सुप्रीम कोर्ट, संसद और राष्ट्र की जनता को वचन दिया था कि विवादित ढांचे को हाथ नहीं लगाया जाएगा. लेकिन कल अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट, संसद और देश को धोखा दिया गया. कहना कि यह हिंदू भावनाओं का विस्फोट है झूठ बोलना है.जिस तरह से ढांचे को ढहाया गया वह किसी भावना के अचानक फूट पड़ने का नहीं सोच-समझ कर रचे गए षड्यंत्र का सबूत है.भाजपा के ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता भी वहां मौजूद थे.वे साधु- महात्मा भी वहां थे जिन्हें मार्गदर्शक मंडल कहा जाता है.विहिप, भाजपा और संघ को अपने अनुशासित कारसेवकों और स्वयंसेवकों पर बड़ा गर्व है.लेकिन वे सब देखते रहे और ढांचे को ढहा दिया गया.ढांचा ढहाते समय रामलला की मूर्तियां ले जाना और फिर ला कर रख देना भी प्रमाण है कि जो हुआ वह योजना के अनुसार हुआ है.भाजपा की सरकार के प्रशासन और पुलिस का भी कुछ न करना कल्याण सिंह सरकार का इस षड्यंत्र में शामिल होना है. कल्याण सिंह ने पहले इस्तीफा दिया और फिर भारत सरकार ने उन्हें डिसमिस कर के उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया है. भाजपा की एक सरकार ने बता दिया है कि वह अपना जनादेश किस तरह पूरा करती है.उसमें न सैद्धांतिक निष्ठा थी, न सवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी को वहन करने की शक्ति.वह जिस मौत मारी गई उसी के योग्य थी.क्योंकि वह उग्रवादियों के हाथों का खिलौना हो गई थी और षड्यंत्रकारियों ने उसका इस्तेमाल ढांचा ढहाए जाने तक किया.वे डेढ़ साल से कल्याण सिंह की सरकार को मंदिर बनाने की बाधाएं दूर करने का साधन बनाए हुए थे. अपने संवैधानिक, संसदीय और नैतिक कर्त्तव्य से समझते –बूझते हुए पलायन करने वाली सरकार के लिए कोई आंसू नहीं बहाएगा लेकिन जनता फिर से ऐसी सरकार बनने देगी? भारत सरकार ने राष्ट्रपति शासन जरूर लगाया है लेकिन इतने महीनों से वह उत्तर प्रदेश सरकार और भाजपा को जिम्मेदार बनाने की राजनैतिक खेल में लगी हुई थी. अब ऐसी हालत उसके सामने है कि अयोध्या में दो–तीन लाख लोग इकट्ठे हैं. पुलिस और अर्धसैनिक बलों को वहां पहुंचने में अनेक बाधाएं हैं. जो टकराव वह टालना चाहती है अब उसमें वह गले–गले पहुंच गई है.ढांचे की रक्षा, संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान उसकी भी उतनी ही जिम्मेदारी थी जितनी उत्तर प्रदेश सरकार की.क्या उसने एक प्रदेश की निर्वाचित सरकार पर विश्वास कर के गलती नहीं की?क्या उसे संविधान की रक्षा के लिए गैर सवैधानिक कदम उठाने चाहिए थे?इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे लेकिन इतिहास में वह कोई कारगर सरकार नहीं मानी जाएगी. कोई नहीं जानता कि भारत सरकार अब अयोध्या में कितना कुछ कर सकेगी लेकिन देश का जनमत उसे बख्शेगा नहीं. सही है कि सभी राजनैतिकों और राजनैतिक पार्टियों ने अयोध्या के मामले को उलझाया है. सभी ने उसका राजनैतिक उपयोग किया है और कल जो हुआ है उसमें इस राजनीति का भी हाथ है.लेकिन राम मंदिर निर्माण का आंदोलन विश्व हिंदू परिषद चला रही थी.यह संस्था संघ की बनाई हुई है.कल से शुरू होने वाली कार सेवा का भार संघ ने लिया था.बजरंग दल और शिवसेना के लोग क्या कर सकते हैं इसे संघ परिवार जानता था. लेकिन उनने लोगों की भावनाओं को भड़काया और उन्हें बड़ी संख्या में अयोध्या में जमा किया. राजनैतिक पार्टियों के खेल तो सब जानते हैं लेकिन संघ, हिंदू समाज को हिंदू संस्कृति के अनुसार संगठित करने का दावा करने वाला संगठन है और विश्व हिंदू परिषद मंदिर और वह भी राम का मंदिर बनाने निकली संस्था है. आप कांग्रेस और भाजपा को राजनैतिक पार्टियों की तरह कोस सकते हैं. लेकिन संघ परिवार को क्या कहेंगे जिसने धर्म और समाज के लिए लज्जा का यह काला दिन आने दिया? देश का बृहत्तर हिंदू समाज अयोध्या में जो हुआ उस पर शर्मिंदा है और देश कौ कैसे बचाना यह उसी की उदार और सहिष्णु परंपरा में स्थापित है.वह पूछेगा कि राम का मंदिर वचन तोड़ कर, धोखाधड़ी और बदले की नींव पर बनाओगे? और जो कहेगा कि हां, उससे वह पूछेगा, कि यह हिंदू धर्म है? कोई नहीं कह सकता कि कार सेवा के नाम पर ढांचा इसलिए ध्वस्त हुआ कि अचानक भड़की भावनाओं को रोका नहीं जा सकता था. मुलायम सिंह की तरह अयोध्या जाने पर किसी ने पाबंदी नहीं लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने कार सेवा की इजाजत दी थी. जिस इलाहाबाद हाईकोर्ट पर फैसले को टांगे रखने का आरोप है वह पांच दिन बाद अधिग्रहीत भूमि पर निर्णय देने वाला था. तब तक कार सेवा ठीक से चल सके इसकी कोशिशों में केंद्र सरकार ने सहयोगी रूख अपनाया था. उत्तर प्रदेश की सरकार ने पुलिस की तैनातगी इतनी कम कर दी थी कि उसे देख कर किसी के भड़कने की संभावना नहीं थी. कार सेवा में जिन रोड़ों की बातें भाजपा-विहिप आदि करते रहे हैं वे सभी हटे हुए थे. और ऐसा भी नहीं कि 'गुलामी' के तथाकथित प्रतीक उस ढांचे को कारसेवकों और उनके नेताओं ने पहली बार देखा हो कि वे एकदम भड़क उठे. वह ढांचा वहां साढ़े चार सौ साल से खड़ा था और उसमें कोई तिरयालीस साल से रामलला विराजमान थे और वहां पूजा-अर्चना की कोई मनाही नहीं थी.फिर उसे गिराने और इस तरह गिराने की अनिवार्यता क्या थी? यह भी नहीं कहा जा सकता कि वहां केंद्र ने टकराव मोल लिया हो. लोगों को भड़काया हो. भाजपा और संघ के ही नहीं विहिप और बजरंग दल जैसे उग्रवादी संगठनों ने भी कहा था कि केंद्र करेगा तो ही टकराव होगा. लेकिन केंद्र कल दिल्ली में सात घंटे तक हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और तथाकथित कारसेवकों ने अपने नेताओं की उपस्थिति में उग्र-से-उग्र काम कर डाला. कोई नहीं कह सकता कि उन्हें उत्तेजित किया गया.कोई नहीं कह सकता कि यह भावनाओं का अचानक विस्फोट था. यह जबरदस्ती और सोच-समझ कर किया गया अपकर्म है. इसमें जो धोखाधड़ी है वह हमारे लोकतंत्र और पंथनिरपेक्ष संविधान को दी गई चुनौती नहीं है. यह पूरे हिंदू समाज की विश्वसनीयता, वचनबद्धता और उत्तरदायित्व को नुकसान पहुंचाया गया है. संघ परिवार को फैशनेबल धर्मनिरपेक्षता की चिंता न भी हो तो कम-से-कम उस समाज की परंपरा, वचनबद्धता और विश्वसनीयता की फिक्र तो करनी चाहिए जिसे वह विश्व का सबसे उन्नत और संस्कृत समाज मानता है. इसके बाद हम सिख आतंकवादियों के धर्म की आड़ में चलते खालिस्तान और कश्मीर के मुसलमान आतंकवादियों की आजादी के जिहाद का क्या जवाब देंगे?ताकत भी दिखाने के धर्मनिष्ठ, पारंपरिक, सवैधानिक और संसदीय रास्ते हिंदू समाज के लिए खुले हुए थे फिर क्यों उसे इस मध्ययुगीन बर्बरता में डाला गया?जो मानते हैं कि ढांचा ध्वस्त कर के वे हिंदुत्व की नींव रख रहे हैं जल्द ही देखेंगे कि हिंदू समाज उन्हें कहां पहुंचाता है.बदले की भावना से कांपने वाले प्रतिक्रियावादी कायरों के अलावा किसी हिंदू हृदय ने इस विध्वंस का समर्थन किया है? देश, केंद्र सरकार और हिंदू समाज के सामने आजाद भारत का सबसे बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा है. अगले कुछ दिनों में उन्हें अग्नि परीक्षा में से गुजरना है. संविधान और संसदीय परंपरा उनके साथ है और उन्हें एकता और अखंडता की ही रक्षा नहीं उन परंपराओं का भी निर्वाह करना है जो हजारों सालों से इस देश को धारण किए हुए हैं और जिनके नष्ट हो जाने से न भारत भारत रहेगा, न हिंदू समाज हिंदू. इस संकट में वे भगवान राम से भी प्रेरणा ले सकते हैं जिन्होंने ऐसे संकट में विवेक के साथ मर्यादा की स्थापना और रक्षा की है. छह दिसम्बर 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद लिखा गया और 7 दिसम्बर को जनसत्ता में छपा प्रभाष जोशी का यह लेख सहिष्णुता और असहिष्णुता पर मचे मौजूदा घमासान के इस दौर में बेहद प्रासंगिक है. यह न सिर्फ हिंदुत्ववादी ताकतों के असली चरित्र को उजागर करता है बल्कि प्रभाष जोशी की निर्भीक और धर्मनिरपेक्ष पत्रकारिता का प्रमाण भी है.यह उन लोगों के लिए आइना भी है जो उनके नाम पर भोजन और भजन की पत्रकारिता करते हैं.प्रभाष जी ने 17 नवम्बर 1983 को जिस जनसत्ता को शुरू किया वह अपने समय से आगे का अखबार था और इस साल उसने 32 वर्ष पूरे कर लिये.संयोग से पांच नवम्बर प्रभाष जी कि पुण्यतिथि भी थी. इस मौके पर हम उनका पुण्य स्मरण करते हुए कुछ सामग्री प्रस्तुत कर रहे है

Thursday, December 3, 2015

रियो टिंटो पर मेहरबान है शिवराज सिंह सरकार

धीरज चतुर्वेदी छतरपुर . उच्च न्यायालय ने छतरपुर जिले के बकस्वाहा में हीरा कंपनी रियोटिंटो के पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है. पहल संस्था की याचिका पर उच्च न्यायालय ने इसे पर्यावरण और जीव जंतुओं के लिए नुकसानदायक बताया. हीरा कंपनी रियोटिंटो को मई 2006 में बकस्वाहा के जंगलों को काटकर हीरा ढूंढने का लाइसेंस दिया था. ये जंगल करीब 2329 हेक्टेंयर में फैला हुआ है. बुंदेलखंड से जुड़ा ये पूरा इलाका सूखे की मार झेलता रहता है. पर यहां जंगलों की कोख में बेशकीमती हीरे के मिलने के आसार हैं. ऐसे में गरीबी की मार झेल रहे इस क्षेत्र पर सरकार की नजर यहां के बेशकीमती हीरे पर गड़ गयी है. इसलिए इस जंगल को उजाड़ने की भी तैयारी हो रही है. मध्य प्रदेश में आने वाले बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर के लोगों को विकास का सपना दिखाकर अब तबाह करने का खाका तैयार कर चुकी है. इसका जिम्मा सरकार ने रियोटिंटो कंपनी को दिया है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कंपनी के प्रोसेसिंग प्लांट का उद्घाटन भी कर गये हैं. कंपनी के साथ मुख्यमंत्री भी बुंदेलखंड के अति पिछडे़ छतरपुर जिले के बक्सवाहा इलाके में विकास की गंगा बहा देने का सपना भी दिखा गये हैं. लेकि‍न उस तबाही की अनदेखी हो रही है. जो दशकों तक गरीबी, भुखमरी और बंजर के रूप में इस क्षेत्र को झेलनी पडे़गी. मुख्यमंत्री की आंखे हीरे की चमक से चौंधिया गयी हैं. तभी तो माइनिंग लीज के लिए हीरा कंपनी 954 हेक्टेयर जमीन के लिए आवेदन देती है और उसे करीब 1200 हेक्टेयर जमीन देने की तैयारी पूरी कर ली गयी है. मध्यप्रदेश सरकार इस कदर मेहरबान है कि रियोटिंटो के कारनामों पर रोक लगाने वाले छतरपुर के दो कलेक्टरों के तबादले किये जा चुके हैं. अब प्रशासनिक अधिकारी न चाहते हुए भी इस बदनाम हीरा कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में काम करते दिख रहे हैं. गौरतलब है कि पहले यह कंपनी अपने कार्यों को लेकर संदिग्ध रही है. वहीं दूसरी तरफ कई लोगों की आवाजें दबा दी जा रही हैं. जो सड़कों पर उतरकर जंगलों की कटाई और दूसरे खतरों से आगाह कर रहे हैं. छतरपुर जिले के बकस्वाहा के जंगलों में ऑस्ट्रेलिया की ब्लैक लिस्टे ड कंपनी की मौजूदगी बीते कुछ सालों से विवादों को जन्मम दे रही है. वन भूमि में अवैध उत्खनन को लेकर 5 साल पहले कलेक्टर उमाकांत उमराव ने कार्रवाई करते हुए कंपनी के उत्खनन पर रोक लगा दी थी. रियोटिंटो की प्रदेश सरकार में घुसपैठ का ही नतीजा था कि कलेक्टर का तत्काल तबादला कर दिया गया. इन चर्चाओं को बल मि‍लने के कई कारण हैं. जि‍नमें से एक कलेक्टर ई रमेश कुमार के जिले का प्रभार संभालते ही रियोटिंटो को दोबारा उत्खनन की अनुमति देना भी है. दूसरा अक्टूबर 2009 को कंपनी के हीरा प्रोसेसिंग प्लांट का खुद मुख्यमंत्री ने आकर उद्घाटन कर दिया. रियोटिंटो पर प्रदेश सरकार की मेहरबानी दिखाती है कि सरकार क्षेत्र विकास की आड़ में बुंदेलखंड की धरोहर को लूटने का काम कर रही है. इस खेल में सरकार के उच्च स्तर की सहभागिता से भी इंकार नहीं किया जा सकता. वन विभाग छतरपुर से हासिल जानकारी के मुताबिक साल 2000 में हीरा खोजने के लि‍ए केंद्र सरकार ने रियोटिंटो को अनुमति दी थी. साल 2009 में इस अनुमति को फिर बढा़ दिया गया. यह वैधता साल 2011 में समाप्त हो चुकी है. रियोटिंटो ने हीरा खोजने के दौरान ही जमीन में कई फुट तक ड्रिलिंग करके जलस्तर को रसातल में पहुंचा दिया है. जिससे जंगलों का सूखना शुरू हो गया है. वहीं संरक्षित वन प्रजातियों सहित जीव-जंतु भी समाप्त होने लगे हैं. पिछली लोकसभा में खजुराहो से भाजपा के सांसद जितेंद्र सिंह बुंदेला ने इस मामले को संसद में उठाया था. लेकि‍न मामला आगे न बढ़ता देख सांसद ने पहले ही चुप्पीर साध ली. केंद्र सरकार ने इस शर्त के साथ अनुमति दी है कि आंवटित भूमि‍ के जो पेड़ काटे जायेंगे उसके बदले में राजस्व की उतनी ही भूमि पर वृक्षारोपण करना होगा. रियोटिंटो ने छतरपुर कलेक्टर और चीफ कंजरवेटर को इस शर्त को पूरा कराने के आधार पर आवेदन दिया है. जो फिलहाल जांच के लिए लंबित है. इस पूरे मामले में जिन जंगलों को काटने की अनुमति दी जा रही है. वह सघन जंगली क्षेत्र हैं. महुआ, अचरवा, शीशम, सागौन जैसे बेशकीमती वन धरोहर से यह इलाका घि‍रा हुआ है. सवाल यह उठता है कि कोई भी पेड़ लगाते ही फल देने लायक नहीं होता. रियोटिंटो के राजस्व भूमि पर वृक्षारोपण के बीस सालों बाद ही पेड़ तैयार होंगे. इस दौरान क्षेत्र के 48 गांवों के हजारों आदिवासी और अन्य जातियों के लोगों का जीवन प्रभावि‍त होगा. जि‍सकी परवाह किसी को नहीं है. एक पहलू यह भी है कि रियोटिंटो को 1200 हेक्टेबयर वन भूमि आंवटित की जा रही है. जो खनन के बाद बंजर हो जायेगी. जिससे क्षेत्रवासियों की निर्भरता ही समाप्त हो जायेगी¬. वैसे भी सरकार के प्रोजेक्ट के तहत रियोटिंटो को 2014 से अगले 30 सालों तक खनन की अनुमति प्रदान की जा रही है. कंपनी का दावा है कि वह अगले तीन सालों में क्षेत्र विकास के लि‍ए कार्य करेगी. साल 2017 से खनन शुरू कर साल 2028 तक पूरा कर लेगी. इस दौरान रियोटिंटो धरती को छलनी कर हीरे का उत्खनन करेगा. लीज समाप्ती के बाद बंजर ईलाके को त्रास भोगने के लिए छोड़ दिया जायेगा. आरोप यह भी हैं कि सर्वे के दौरान रियोटिंटो ने कई कैरट हीरे निकालकर प्रदेश सरकार को गुमराह किया है. नियमानुसार तो सर्वे के दौरान निकलने वाले हीरे की रॅायल्टी जमा होनी चाहिए थी. पर इस पूरे मामले के तार सरकार से जुडे़ लेागो से हैं. यही कारण है कि‍ प्रशासन भी खामोश बैठा है. बताया जाता है कि कलेक्टर उमाकांत उमराव की तरह ही एक और कलेक्टर राजेश बहुगुणा का तबादला भी रियोटिंटो के इशारे पर कि‍या गया था. राजेश बहुगुणा ने रियोटिंटो की फाइलों पर रोक लगा दी थी. गौरतलब है कि‍ प्रदेश सरकार का आईएएस अधिकारियों पर दबाब रहता है. इस सच को खुद भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी कहा था कि अधिकारियों पर दबाव की राजनीति रहती है. ऐसे में रियोटिंटो पर मेहरबानी के कारण बकस्वाहा इलाके को तबाह करने की दांस्ता लिखी जा रही है. जिसके दूरगामी परिणाम इलाके को भोगने होंगे. शुक्रवार में धीरज चतुर्वेदी की रपट