अंबरीश कुमार
करीब तेइस साल बाद उसी काटेज के आगे बैठा था जहां बैठकर सह जीवन की शुरुआत हुई थी । महाबलीपुरम में तमिलनाडु पर्यटन के इस रिसार्ट में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है ।वैसा ही जंगलों में घूमते हुए जाने का अहसास इस बार भी हुआ जो पहली बार हुआ था ।सागर की लहरे जब पैर को भीगा कर लौटी तो मुठ्ठी भर रेत बटोर ली । कुछ सीपियाँ भी आ गई जिन्हें घर ले आया हूँ ।इस समुन्द्र ने तब इतना डरा दिया था कि कोई उम्मीद भी नहीं बची थी । वर्ष १९९० में विवाह के सिर्फ दो दिन बाद से ही दक्षिण में करीब पखवाड़े भर घूमने का कार्यक्रम था और सीधे चेन्नई (जो तब मद्रास था ) पहुंचे थे । सीधे गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट । देर से पहुंचे थे और बरसात थम नहीं रही थी ।जाना था महाबलीपुरम पर शोभाकांत जी और उनकी पत्नी ने इस बरसात में जाने की इजाजत नहीं दी ,कहा सुबह गाड़ी से भिजवा देंगे ।प्रदीप कुमार ने बताया कि बहुत बड़ा तूफ़ान आ रहा है इसलिए कार्यक्रम रद्द करे और यही रुके । तूफान कि भविष्यवाणी यह थी कि मद्रास शहर का बड़ा इलाका डूब सकता है । पर साथ में यह भी जानकारी दी कि इस तरह की भविष्यवाणी हर साल होती है पर मद्रास तो बच जाता है नेल्लोर में लोग तबाह हो जाते है । खैर प्रदीप ने चौथी मंजिल पर बना अपना कमरा खाली कर दिया और रात खाने के बाद हम लोग आँगन के रस्ते ऊपर चढ़े तो तूफ़ान का अहसास हुआ । तेज आंधी बरसात के चलते सीढी चढ़ते ही भीग चुके थे ।खैर कुछ देर बाद ही लाईट चली गई और आंधी के जोर से खिड़की के पल्ले खुल गए और बरसात से बिस्तर भी भीगने लगा । कुछ देर इन्तजार किया पर कभी एक खिडकी खुल जाती तो कभी दूसरी।और तेज हवा के साथ बरसात के थपेड़े बर्दाश्त से बाहर हो रहे थे ।रात के साढ़े बारह बज चुके थे और तूफ़ान की गति बढती जा रही थी ।अंतत तय हुआ यहाँ रुकना सुरक्षित नहीं है और फिरे नीचे उतरे तो तूफ़ान क्या होता है इसका अहसास हुआ । नीचे सभी लोग जगे ही हुए थे और फिर हाल में सोना हुआ ।सुबह भी मौसम वैसा ही था इसलिए दोपहर बाद जाने का कार्यक्रम बना और रिसार्ट के प्रबंधक को शाम तक पहुँचने की सूचना दे दी गई ।शोभाकांत जी ने वही फियट भेजी जो पहले जयप्रकाश नारायण के साथ थी । समुन्द्र के किनारे किनारे का रास्ता बरसात में देखते बनता था ।नारियल के घने जंगल हवा में लहराते नजर आ रहे थे ।तब तटीय इलाकों पर अतिक्रमण नहीं हुआ था इसलिए लगातार समुंद्र दिख रहा था और उंची लहरे भी । तमिलनाडु पर्यटन विभाग के रिसार्ट तक पहुँचते पहुंचे मौसम और खराब हो चुका था ।कैशुरिना के जंगलों के बीच से एक घुमावदार रास्ता रिसेप्शन के सामने खत्म हो जाता था जहाँ एक तरफ रेस्तरां था तो सामने श्रंखला में बने काटेज । मैनेजर हैरान था क्योकि अकेले हम ही ऐसे सैलानी थे जो आज पहुंचे थे बाकि सभी ने अपने कार्यक्रम तूफ़ान के चलते निरस्त कर दिए थे बहुत से कर्मचारी भी चले गए थे । मैनेजर ने हिदायत दी की अपने काटेज से बाहर बिलकुल ना जाए और समुन्द्र की और तो किसी कीमत पर नहीं । खाने का आर्डर अभी दे दे जो काटेज में सर्व कर दिया जाएगा । नाश्ता तो तब मिलेगा जब सुबह तक बच पाएंगे क्योकि तूफ़ान आधी रात के बाद महाबलीपुरम के तट तक पहुंचेगा । इस बात ने और डरा दिया ।तबतक कार भी जा चुकी थी और कोई चारा नहीं था ।खैर नीचे के काटेज में पहुंचे तो बेडरूम के सामने की दीवार कांच की थी और उसपर लगा पर्दा हटाते ही लगा मानो लहरें कमरे के भीतर तक आ जाएँगी । लगातार बरसात से ठंड बढ़ चुकी थी और पंखा चलाने की भी जरुरत नहीं थी ।आंध्र हो चुका था और कुछ मोमबती दी गई थी इस खौफनाक रात का मुकाबला करने के लिए जहां सामने सी आती उंची उंची लहरे डरा रही थी ।समुन्द्र के पास बहुत बार रुका हूँ पर इतनी उंची लहरे कभी नहीं । सामने पल्लव साम्राज्य के दौर का मशहूर तट मंदिर लहरों औए बरसात में बहुत रहस्मय सा नजर आ रहा था ।नारियल के पेड़ों के झुण्ड तक लहरा रहे थे और सामने कैशुरिना के जिन दो पेड़ों पर आराम करने वाला झूला पडा था वह हवा के झोंके से ऊपर नीचे हो रहा था ।चारो ओर से आ रही तूफानी हवा की आवाज और कमरे के बाहर तक आतीं लहरे । खाना खाते खाते रात के दस बज चुके थे और बैरे के मुताबिक करीब साढ़े बारह बजे तक तूफ़ान के इस तट पर आने की आशंका थी ।मन अशांत था और तब मोबाइल भी नहीं होते थे और फोन लाइन भी शाम को खराब हो गई थी ।
खैर कब नींद आई पता नहीं चला ,उठा तो कमरे में रौशनी थी हालाँकि सूरज नहीं निकला था ।चाय के लिए बैरे को बुलाया तो पता चला तूफ़ान लेट हो गया है अब दस बारह घंटे बाद आएगा ।बहुत समय था और कई विकल्प भी जिसमे पांडिचेरी की तरफ जाना भी क्योकि वहाँ अरविन्दों आश्रम में भी दो दिन बात काटेज बुक कराया हुआ था । दर भी काफी हद तक निकल चुका था और बरसात थमते ही तट पर आ गए पर लहरों से दूर ही थे ।आसपास घुमे और बरसात के माहौल का आनंद भी उठाया और दक्षिण भारतीय व्यंजनों का भी । कुछ घंटों बाद ही खबर मिली की संभावित तूफ़ान आन्ध्र प्रदेश के नेल्लोर की तरफ चला गया है और पांडिचेरी से लेकर मद्रास के समुन्द्र तट पर अब कोई खतरा नहीं था ।
इस खबर के बाद महाबलीपुरम के इस रिसार्ट में ही ठहरने का फैसला किया और फिर इस समुंद्र तट और लहरों दोनों से नया सम्बन्ध बना ।उस यादों को सहेजने के लिए ही मुठ्ठी भर रेत लेकर लौटा हूँ जो सविता को दिया शंख सीपियों के साथ रखने के लिए ।
Wednesday, August 7, 2013
महाबलीपुरम के समुंद्र तट की मुठ्ठी भर रेत
अंबरीश कुमार
करीब तेइस साल बाद उसी काटेज के आगे बैठा था जहां बैठकर सह जीवन की शुरुआत हुई थी । महाबलीपुरम में तमिलनाडु पर्यटन के इस रिसार्ट में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया है ।वैसा ही जंगलों में घूमते हुए जाने का अहसास इस बार भी हुआ जो पहली बार हुआ था ।सागर की लहरे जब पैर को भीगा कर लौटी तो मुठ्ठी भर रेत बटोर ली । कुछ सीपियाँ भी आ गई जिन्हें घर ले आया हूँ ।इस समुन्द्र ने तब इतना डरा दिया था कि कोई उम्मीद भी नहीं बची थी । वर्ष १९९० में विवाह के सिर्फ दो दिन बाद से ही दक्षिण में करीब पखवाड़े भर घूमने का कार्यक्रम था और सीधे चेन्नई (जो तब मद्रास था ) पहुंचे थे । सीधे गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट । देर से पहुंचे थे और बरसात थम नहीं रही थी ।जाना था महाबलीपुरम पर शोभाकांत जी और उनकी पत्नी ने इस बरसात में जाने की इजाजत नहीं दी ,कहा सुबह गाड़ी से भिजवा देंगे ।प्रदीप कुमार ने बताया कि बहुत बड़ा तूफ़ान आ रहा है इसलिए कार्यक्रम रद्द करे और यही रुके । तूफान कि भविष्यवाणी यह थी कि मद्रास शहर का बड़ा इलाका डूब सकता है । पर साथ में यह भी जानकारी दी कि इस तरह की भविष्यवाणी हर साल होती है पर मद्रास तो बच जाता है नेल्लोर में लोग तबाह हो जाते है । खैर प्रदीप ने चौथी मंजिल पर बना अपना कमरा खाली कर दिया और रात खाने के बाद हम लोग आँगन के रस्ते ऊपर चढ़े तो तूफ़ान का अहसास हुआ । तेज आंधी बरसात के चलते सीढी चढ़ते ही भीग चुके थे ।खैर कुछ देर बाद ही लाईट चली गई और आंधी के जोर से खिड़की के पल्ले खुल गए और बरसात से बिस्तर भी भीगने लगा । कुछ देर इन्तजार किया पर कभी एक खिडकी खुल जाती तो कभी दूसरी।और तेज हवा के साथ बरसात के थपेड़े बर्दाश्त से बाहर हो रहे थे ।रात के साढ़े बारह बज चुके थे और तूफ़ान की गति बढती जा रही थी ।अंतत तय हुआ यहाँ रुकना सुरक्षित नहीं है और फिरे नीचे उतरे तो तूफ़ान क्या होता है इसका अहसास हुआ । नीचे सभी लोग जगे ही हुए थे और फिर हाल में सोना हुआ ।सुबह भी मौसम वैसा ही था इसलिए दोपहर बाद जाने का कार्यक्रम बना और रिसार्ट के प्रबंधक को शाम तक पहुँचने की सूचना दे दी गई ।शोभाकांत जी ने वही फियट भेजी जो पहले जयप्रकाश नारायण के साथ थी । समुन्द्र के किनारे किनारे का रास्ता बरसात में देखते बनता था ।नारियल के घने जंगल हवा में लहराते नजर आ रहे थे ।तब तटीय इलाकों पर अतिक्रमण नहीं हुआ था इसलिए लगातार समुंद्र दिख रहा था और उंची लहरे भी । तमिलनाडु पर्यटन विभाग के रिसार्ट तक पहुँचते पहुंचे मौसम और खराब हो चुका था ।कैशुरिना के जंगलों के बीच से एक घुमावदार रास्ता रिसेप्शन के सामने खत्म हो जाता था जहाँ एक तरफ रेस्तरां था तो सामने श्रंखला में बने काटेज । मैनेजर हैरान था क्योकि अकेले हम ही ऐसे सैलानी थे जो आज पहुंचे थे बाकि सभी ने अपने कार्यक्रम तूफ़ान के चलते निरस्त कर दिए थे बहुत से कर्मचारी भी चले गए थे । मैनेजर ने हिदायत दी की अपने काटेज से बाहर बिलकुल ना जाए और समुन्द्र की और तो किसी कीमत पर नहीं । खाने का आर्डर अभी दे दे जो काटेज में सर्व कर दिया जाएगा । नाश्ता तो तब मिलेगा जब सुबह तक बच पाएंगे क्योकि तूफ़ान आधी रात के बाद महाबलीपुरम के तट तक पहुंचेगा । इस बात ने और डरा दिया ।तबतक कार भी जा चुकी थी और कोई चारा नहीं था ।खैर नीचे के काटेज में पहुंचे तो बेडरूम के सामने की दीवार कांच की थी और उसपर लगा पर्दा हटाते ही लगा मानो लहरें कमरे के भीतर तक आ जाएँगी । लगातार बरसात से ठंड बढ़ चुकी थी और पंखा चलाने की भी जरुरत नहीं थी ।आंध्र हो चुका था और कुछ मोमबती दी गई थी इस खौफनाक रात का मुकाबला करने के लिए जहां सामने सी आती उंची उंची लहरे डरा रही थी ।समुन्द्र के पास बहुत बार रुका हूँ पर इतनी उंची लहरे कभी नहीं । सामने पल्लव साम्राज्य के दौर का मशहूर तट मंदिर लहरों औए बरसात में बहुत रहस्मय सा नजर आ रहा था ।नारियल के पेड़ों के झुण्ड तक लहरा रहे थे और सामने कैशुरिना के जिन दो पेड़ों पर आराम करने वाला झूला पडा था वह हवा के झोंके से ऊपर नीचे हो रहा था ।चारो ओर से आ रही तूफानी हवा की आवाज और कमरे के बाहर तक आतीं लहरे । खाना खाते खाते रात के दस बज चुके थे और बैरे के मुताबिक करीब साढ़े बारह बजे तक तूफ़ान के इस तट पर आने की आशंका थी ।मन अशांत था और तब मोबाइल भी नहीं होते थे और फोन लाइन भी शाम को खराब हो गई थी ।
खैर कब नींद आई पता नहीं चला ,उठा तो कमरे में रौशनी थी हालाँकि सूरज नहीं निकला था ।चाय के लिए बैरे को बुलाया तो पता चला तूफ़ान लेट हो गया है अब दस बारह घंटे बाद आएगा ।बहुत समय था और कई विकल्प भी जिसमे पांडिचेरी की तरफ जाना भी क्योकि वहाँ अरविन्दों आश्रम में भी दो दिन बात काटेज बुक कराया हुआ था । दर भी काफी हद तक निकल चुका था और बरसात थमते ही तट पर आ गए पर लहरों से दूर ही थे ।आसपास घुमे और बरसात के माहौल का आनंद भी उठाया और दक्षिण भारतीय व्यंजनों का भी । कुछ घंटों बाद ही खबर मिली की संभावित तूफ़ान आन्ध्र प्रदेश के नेल्लोर की तरफ चला गया है और पांडिचेरी से लेकर मद्रास के समुन्द्र तट पर अब कोई खतरा नहीं था ।
इस खबर के बाद महाबलीपुरम के इस रिसार्ट में ही ठहरने का फैसला किया और फिर इस समुंद्र तट और लहरों दोनों से नया सम्बन्ध बना ।उस यादों को सहेजने के लिए ही मुठ्ठी भर रेत लेकर लौटा हूँ जो सविता को दिया शंख सीपियों के साथ रखने के लिए ।
Tuesday, August 6, 2013
दुर्गा शक्ति के कंधे पर बंदूक रखकर होती राजनीति
लखनऊ , अगस्त ।उत्तर प्रदेश के कुछ नेता अखिलेश सरकार की साख पर बट्टा लगाने पर आमादा है ।किस तरह छोटे से मुद्दे को सत्ता के अहंकार में राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाता है इसकी प्रेरणा नरेंद्र सिंह भाटी से लेनी चाहिए जिसने प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर मुलायम की प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने का प्रयास किया है ।एक आइएएस का निलंबन सिर्फ जिले के एक नेता के अहंकार के चलते हुआ ।मामला यहाँ ज्यादा तूल नहीं पकड़ता अगर भाटी इसका ढिढोरा पीटने के सत्ता में साथ अपनी हनक का बेवजह प्रदर्शन नहीं करते और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को गुमराह न करते । फिर जिस तरह आईएएस एसोसिएशन इस मामले में कूदा और भाजपा ने मुद्दा बनाया वह तो गौर करने वाला था ही कांग्रेस ने किस तरह पलटी मारी वह हैरान करने वाली घटना है ।पर यह ध्यान रखना चाहिए अफसरों के कंधे पर बंदूक रख कर राजनीति नहीं होती ।अफसर तो अफसर है वह फिर उसी व्यवस्था का अंग बन जाएगा ।
उस उत्तर प्रदेश में जहां पूर्व मुख्यमंत्री मायावती एक जिले का दौरा करते हुए निर्माण कार्य का जायजा लेने के लिए एक खडंजे को ठोकर मारती है और खडंजा के हटते ही बोली -कलक्टर अब तू भी इस जिले से गया और तबादला हो जाता है ।जहां एक आईएएस अफसर बसपा के शीर्ष नेता का जूता उतरता हो और मुख्य सचिव स्तर का अफसर पार्टी मुख्यालय में जाकर मुलायम सिंह के कसीदे कढता हो उस प्रदेश में आला अफसरों पर भी सवाल उठना चाहिए ।क्या वजह थी जो भ्रष्टतम अफसर का चुनाव यहाँ शुरू हुआ । नीरा यादव ,एपी सिंह ,विजय शंकर पांडे जैसे अफसरों ने राजनीति को ज्यादा भ्रष्ट किया या राजनीति ने इन्हें यह बताना बड़ा मुश्किल है । समाजवादी पार्टी की सरकार में कोई एक राजनैतिक प्रबंधक नहीं है वर्ना कँवल भारती जैसे दलित चिन्तक की गिरफ्तारी जैसा मूर्खतापूर्ण कदम नही उठाया जाता ।यह शर्मनाक घटना है ।
पर जिस तरह दुर्गा शक्ति नागपाल के सवाल पर राष्ट्रीय दबाव बनाया जा रहा है वह भी उचित नहीं है । दुर्गा शक्ति कोई नेता नहीं है वे अफसर है और देर सबेर उन्हें इस व्यवस्था में रहते हुए ही लड़ना है ।उससे फिर पर कोशिश यह हो रही है कि वे सबकुछ छोड़ चुनाव लड़ लें ।हर आदमी को एक अदद अन्ना की लगातार तलाश रहती है ।इसलिए उन्हें भी उसी रस्ते पर ले जाने लका प्रयास हो रहा है जिसपर अन्ना हजारे जाकर लौट चुके है और अब उनकी सभाओं में कोई ऐतिहासिक भीड़ भी नहीं उमडती । दुर्गा शक्ति को भी उसी तरह पेश करने वका प्रयास हो रहा है । वे ईमानदार है तो इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी ईमानदार नहीं है ।उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी सहित कई बड़े उदाहरण है ।इस मुद्दे को राजनैतिक मुद्दा बनाया गया यह साफ़ है । कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व दुर्गा शक्ति के खिलाफ आंदोलन करता है और राष्ट्रीय नेतृत्व पक्ष में खड़ा हो जाता है । इसके बाद इसे जाति और परिवार की राजनीति से जोड़कर मुसलिम तुष्टिकरण का भी मुद्दा बना दिया जा रहा है ।ऐसे में मुलायम सिंह ने भी इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है । उत्तर प्रदेश की राजनीति ध्रुवीकरण पर चलती है और अगर विपक्ष इसका प्रयास करेगा तो सत्ता पक्ष भी वोट की ही राजनीति करता है और वह भी करेगा । ध्यान रखना चाहिए जैसे ही दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन खत्म होगा विपक्ष को फिर दूसरे मुद्दे की तलाश करनी होगी ।जनादेश
Friday, August 2, 2013
दक्षिण के गाँधीवादी संत शोभाकांत दास
अंबरीश कुमार
चेन्नई ,३ अगस्त । शुक्रवार की शाम चेन्नई के गोपालपुरम में जयप्रकाश नारायण के साथी शोभाकांत दास जी के यहाँ जब पहुंचा तो वे चरखा से सूत / धागा तैयार कर रहे थे । करीब तीस साल से अपना शोभाकांत जी से संबंध है जिसकी शुरुआत अस्सी के दशक में तबके मद्रास से एक अखबार निकालने को लेकर हुई थी और तब मै लखनऊ से पहली बार वाहिनी की साथी किरण और विजय के साथ मद्रास सेंट्रल के ठीक बगल में ५९ गोविन्दप्पा नायकन स्ट्रीट पहुंचा था और बगल में ठहरने का इंतजाम था ।बहुत ही अलग अनुभव था । उनका जड़ी बूटियों का बड़ा कारोबार स्थापित हो चूका था ।शोभाकांत जी के पुत्र तब तमिलनाडु छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के संयोजक भी थे और उनसे मित्रता हो गई क्योकि वे अपनी उम्र के आसपास के ही थे ।पत्रिका की योजना बनने से पहले ही विजय बिहार चले गए । हफ्ते भर बाद शोभाकांत जी का निर्देश हुआ कि मै पत्रिका शुरू करने से पहले तमिलनाडु को समझू ।उन्होंने अपने दफ्तर को कहा कि पांडिचेरी में अरविंदो आश्रम के गेस्ट हाउस में हम लोगों के रहने और आने जाने का इंतजाम कर दिया जाए और खर्च के लिए नकद भी दे दिया जाए। उस दौर में बिहार से रोजाना बहुत से लोग उनके यहाँ आते थे और सबका खाना भी साथ नीचे बैठकर ही होता था । शोभाकांत जी की पत्नी मैथिल बोलती थी और उनका आतिथ्य कभी भूल नहीं सकता ।अमूमन इडली वडा साम्भर आदि का नाश्ता तो पास के होटल से आ जाता था पर दोपहर और रात का खाना वे खुद बनाकर खिलाक्ती थी चाहे कितने ही लोग न हो ।खाना उत्तर भारतीय होता था बिहार का उसपर प्रभाव भी दिखता था ।तब बिहार के सभी वरिष्ठ नेता जो मद्रास आते थे शोभाकांत जी के ही मेहमान होते थे ।एम् करूणानिधि समेत तमिलनाडु के शीर्ष राजनीतिक भी उनके मित्र ही थे । जयप्रकाश नारायण को शोभाकांत जी ने जो बादामी रंग की फियट दी थी बाद में उससे हमने भी कई यात्रा की ।पास में ही उनके मित्र और मीडिया के सबसे बड़े और कद्दावर व्यक्तित्व श्री रामनाथ गोयनका का घर था ।
कल बाद में दिल्ली से साथ आए वर्ल्ड सोशल फोरम के विजय प्रताप ,भुवन पाठक और मुदगल जी से शोभाकांत जी की रात के भोजन पर मुलाक़ात हुई तो उन्होंने विजयप्रताप से उलाहना देने के अंदाज में कहा -अंबरीश जी को तो मद्रास से अखबार निकालने के लिए बुलाया था पर जब इनका मन उत्तर भारत छोड़ने का नहीं हुआ तो रामनाथ गोयनका के पास भेज दिया ।तबसे आजतक वह अखबार नही निकल पाया ।खैर विजयप्रताप से गाँधी , जेपी ,सुभाष चंद्र बोस से लेकर धर्मपाल और राजीव गाँधी तक के कई संस्मरण उन्होंने सुनाए । तेरह साल की उम्र में वे आजादी की लड़ाई से जुड गए थे और जवान होते होते आंदोलन और जेल के बहुत से अनुभव हो चुके थे । हजारीबाग जेल में जेपी को क्रांतिकारियों का पत्र पहुंचाते और उनका सन्देश बाहर लेकर आते ।बाद में सरगुजा जेल में खुद रहना पड़ा
जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी के नाम उन्होंने गुडवंचारी में आश्रम बनवाया जिसके ट्रस्ट में तमिलनाडु के सभी महत्वपूर्ण लोग शामिल थे और आसपास के तीस गांवों में इसका काम फैला हुआ था । बिहार से बहुत से लोग मद्रास के वेलूर अस्पताल में इलाज करने आते तो वे शोभाकांत जी के घर या बादे में राजेंद्र भवन में रुकते जो उन्होंने मद्रास शहर के बीच बनवाया हुआ है ।कई साल पहले वाहिनी के सम्मलेन में ही शोभाकांत जी ने जनादेश वेबसाईट की शुरुआत की थी और मुलाक़ात होने पर उसकी भी चर्चा की । अनुपम मिश्र की पुस्तक आज भी खरे है तालाब देख कर बोले -तमिल में इसे छपवा देता हूँ अगर वे इजाजत दे दे ।जयप्रकाश नारायण की कई पुतकों को वे तमिल भाषा में प्रकाशित करवा चुके है ।बाद में तय हुआ पर्यावरण और परम्परागत चिकत्सा पद्धति पर तमिलनाडु में पहल की जाए और इसकी पहली बैठक बुलाने की जिम्मेदारी प्रदीप कुमार ने स्वीकार कर ली साथ ही तमिल में लोगों से संवाद की भी ।सुबह जल्दी उठा तो यह सब लिखने बैठ गया जो अभी जारी रहेगा क्योकि समुंद्र तट पर घूमने के लिए ही जल्दी उठा हूँ ।
Friday, July 26, 2013
मोदी के आने से पहले ही उत्तर प्रदेश में भाजपा को बहुमत !
अंबरीश कुमार
पिछ्ले महीने ही उत्तर प्रदेश में एक उप चुनाव हुआ था । इलाहाबाद के हंडिया में । हंडिया विधान सभा के इस उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को तीन हजार आठ सौ नौ वोट मिल तो कांग्रेस को दो हजार आठ सौ अस्सी वोट । एक को पौने दो फीसद तो दूसरे को पौने तीन फीसद । पर यह चुनाव समाजवादी पार्टी ने छब्बीस हजार से ज्यादा वोट से जीता था । दोनों राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा की जमानत जब्त हो गई थी ।यह इसलिए याद रखना चाहिए कि एक सर्वे रपट में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को करीब आधी सीट मिलने का आकलन किया गया है । लोकसभा आधी सीट का सीधा अर्थ विधान सभा में बहुमत के पास पहुंचना होता है । यह किसी चमत्कार से कम नहीं है खासकर उस पार्टी के लिए जिसका प्रदेश अध्यक्ष भी पिछले विधान सभा चुनाव में बुरी तरह हारा हो । इस आकलन के बारे में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से बात की तो वे ठहाका मार कर हँसने लगे । बोले ,जब पार्टी का खुद का अंदरूनी आकलन ज्यादा से ज्यादा बीस सीट का हो तो यह सर्वे हैरान करने वाला तो लगेगा ही । उत्तर प्रदेश के राजनैतिक हलकों में इस सर्वे के साथ भाजपा की राजनैतिक ताकत को लेकर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है । इसकी मुख्य वजह यह है कि भाजपा को अभी भी तीसरे चौथे नंबर की पार्टी माना जा रहा है और न तो प्रदेश में हिंदुत्व की कोई लहर नजर आ रही है और न ही पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग में कोई बदलाव आया है । ऐसे में भाजपा का अचानक नंबर एक पर आ जाना सभी को चौंकता है । उत्तर प्रदेश का चुनाव जातियों के गठजोड़ पर ही होना है जबतक कि कोई बड़ा परिवर्तन न हो जाए। मंदिर आंदोलन के बाद प्रदेश में मजहबी ध्रुवीकरण का फिर वैसा माहौल नहीं बना जिससे भाजपा को बहुत फायदा हो । अपवाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल संसदीय क्षेत्रों को बताया जा रहा जिसे लेकर पिछले दो महीने से चर्चा हो रही है । कहा जा रहा है इस बार लोकसभा चुनाव में इस अंचल में भाजपा या हिंदू उम्मीदवार ज्यादा संख्या में जीतेंगे । यही एक ऐसा तर्क है जिसके आधार पर भाजपा के बढ़त की बात कही जा रही है । पर बहुत सी सीटों पर तो पहल्र से ही गैर मुस्लिम सांसद है । मसलन पिछले लोकसभा चुनाव में बिजनौर से संजय चौहान ,अमरोहा से देवेन्द्र नागपाल ,रामपुर से जयाप्रदा ,आंवला से मेनका गाँधी ,बरेली से प्रवीन सिंह ऐरन पीलीभीत से वरुण गाँधी ,अलीगढ से राजकुमारी चौहान ,हाथरस से सारिका बघेल ,बुलंदशहर से कमलेश वाल्मीकि ,मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल ,सहारनपुर से जगदीश सिंह राणा ,फिरोजाबाद से राजबब्बर आदि चुनाव जीत चुके है । यह उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक बानगी है जिसके बारे में बताया जा रहा है आगामी लोकसभा चुनाव में इस अंचल से बड़ी संख्या में गैर मुस्लिम सांसद जीतेंगे क्योकि मजहबी ध्रुवीकरण तेज हो रहा है ।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार बनने के बाद शुरुआती दौर में ही कई जगह दंगे फसाद हुए और सरकार की साख पर बट्टा भी लगा । पर यह भी साफ हुआ कि दंगे फसाद के पीछे कट्टरपंथी ताकते भी है जिनका मकसद लोकसभा चुनाव से पहले कई इलाकों में मजहबी ध्रुवीकरण तेज कराना रहा है । पर फिलहाल कट्टरपंथी ताकतों के मंसूबो पर अंकुश लग चुका है इसलिए इस आधार पर भाजपा को बहुत फायदा होने की स्थिति नजर नहीं आती है । पार्टी की राजनैतिक ताकत का आकलन चुनाव नतीजों से भी होता है जिसपर एक नजर डालना चाहिए । पिछले विधान सभा चुनाव में भाजपा ने अगड़ी जातियों के १९५ उम्मीदवार खड़े किए थे जिसमे कुल तीस जीते तो पिछडी जाति के १०५ उम्मीदवारों में बारह जीते । कुल चार सौ में एक कम यानी ३९९ उम्मीदवारों में ४८ उम्मीदवार जीते थे । तबसे अब तक उत्तर प्रदेश भाजपा की राजनैतिक ताकत में कोई बड़ा इजाफा हुआ हो यह नजर नहीं आता । यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को लेकर ताजा सर्वे को लोग हैरानी से देख रहे है । वरिष्ठ भाकपा नेता अशोक मिश्र के मुताबिक भाजपा अगर तीसरे नंबर से दूसरे नंबर पर भी पहुँच जाए तो यह बड़ा चमत्कार होगा नंबर एक की बात तो छोड़ ही दे ।
Tuesday, July 9, 2013
मोदी के नाम पर फिर से उग्र हिंदुत्व की राह पर भाजपा
अंबरीश कुमार
लखनऊ ,8 जुलाई ।उत्तर प्रदेश में भाजपा फिर उग्र हिंदुत्व की राह पर जा रही है । इस बार यह कवायद नरेंद्र मोदी के चेहरे के पीछे से होगी ।यह बात मोदी के सिपहसालार अमित शाह की भाषा से साफ़ हो गई है ।फिर वही जुमले ' जिस हिंदू का खून न खौला खून नही वह पानी है , उछलने लगे है ।अमित शाह ने कल पूर्वांचल के गोरखपुर में पार्टी के जिला अध्यक्षों की बैठक में कहा - जब समाजवादी पार्टी द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने की बात की जाती है, गो तरस्करी हो रही है। बांग्ला देशी घुसपैठियों पर कोई नियत्रण नही है। क्या यह सब देखकर सुनकर भाजपा के कार्यकर्ता का खून नही खौलता ? खून खौलने वाली इस तरह की भाषा इससे पहले नब्बे के दशक में मंदिर आंदोलन के दौर सुनी गई थी ।अब नरेंद्र मोदी ने प्रदेश की कमान अप्रत्यक्ष ढंग से संभाल ली है तो उनकर राजनैतिक हथकंडे भी सामने आने लगे है ।यह उसकी बानगी है ।
भाजपा के चुनाव अभियान के प्रभारी नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के ज्यादातर जिलों की राजनैतिक नब्ज पकडना शुरू कर दिया है ।उनके सिपहसालार और उत्तर प्रदेश के प्रभारी अमित शाह अबतक मेरठ ,लखनऊ ,अयोध्या और गोरखपुर का दौरा कर बैठकों का सिलसिला शुरू कर चुके है ।उनके साथ सह प्रभारी रामेश्वर चौरसिया और सतेन्द्र कुशवाहा पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ बुंदेलखंड के हालात का जायजा ले रहे है ।ये सिर्फ हालात का जायजा ही नही ले रहे बल्कि हर समस्या का समाधान भी बताएँगे ।पार्टी कार्यकर्त्ता मोदी और उनकी इस टीम को लेकर उत्साहित भी है ।भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -अमित शाह की कार्य शैली से कार्यकर्ताओं का उत्साह बढा है ।वे बगैर लाग लपेट के अपनी बात रखते है । जिलों जिलों में प्रदेश स्तर के एक एक नेता को प्रभारी बना कर भेजा गया है ।मै खुद अबतक पांच बार आंबेडकर नगर जा चुका हूँ ऐसे में जिलों के नेता गांव गांव तक तो पहुँच ही चुके है ।
पूर्वांचल में भाजपा को काफी उम्मीद है । यह अंचल पहले से ही योगी आदित्यनाथ के हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है।अब नरेंद्र मोदी के आ जाने के बाद यहाँ के हालात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ।यह तय है कि हिन्दुत्ववादी ताकते चुनाव से पहले ही माहौल बनाकर ध्रुवीकरण का प्रयास करेंगी ।यह अमित शाह की भाषा से साफ़ हो गया है ।
पूर्वांचल के गोरखपुर में अमित शाह ने जिला अध्यक्षों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास किया और कहा -भारतीय जनता पार्टी इस तरह की पार्टी है जो बिना प्रत्याशी के बावजूद भी चुनाव अभियान की शुरूआत कर सकती है। हम पार्टी की रीति नीति को मण्डल, शहर, गांव में क्या प्रत्याशी के माध्यम से ही जाएंगे। क्या हम एक व्यक्ति के आधार पर चुनाव लड़ेंगे। पहले से मन से निकाल कर उखाड़ कर फेक दीजिए कि भाजपा को प्रत्याशी जिताएगा । भाजपा का कार्यकर्ता भाजपा को हिन्दुत्व व विचारधारा के साथ पार्टी को जिताएगा। पार्टी चलाने का दायित्व विधायक, सांसद का नही है। बल्कि दायित्व जिलाध्यक्ष का है। शाह ने कहा कि आप सभी अपने अपने जिलों में पार्टी का चेहरा है। बूथ की रचना यह सोच कर नही करना है कि हमें 2014 का लोकसभा का चुनाव लड़ना है। बल्कि बूथ की रचना अगले 20 वर्षो के लिए मजबूत ढाचे पर भाजपा को खड़ा करने के लिए बनाना है। चुनाव में बूथ की अहम भूमिका होती है। चुनाव जीतते है तो बूथ प्रबन्धन से और हारते है तो भी बूथ की वजह से । शाह ने कहा कि जब समाजवादी पार्टी द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने की बात की जाती है, गो तरस्करी हो रही है। बंगलादेशी घूसपैठीयों पर कोई नियत्रण नही है। क्या यह सब देखकर सुनकर भाजपा के कार्यकर्ता का खून नही खौलता ? इन सबको रोकने की जिम्मेदारी हमारी है। कांग्रेस और सपा पिछड़ो के हितों की बात करती है। और संविधान द्वारा 50 प्रतिशत आरक्षण की सुविधा पिछड़ो और दलितो को दी गयी है। यदि कांग्रेस और सपा मुस्लिमो को आरक्षण देने की बात करती है। तो वह पिछड़ो व दलितो के ही हक को मारने का काम कर रही है। यह बात पिछड़ो और दलितो को समझाना होगा। भाजपा ही पिछड़ो व दलितो के हित व अधिकार की बात करती है।
गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी व सदर सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि हम सब अपने पराक्रम को विस्मृत कर देते है। इसी नाते हम पीछे है। हमारा पराक्रम हिन्दू राष्ट्रवाद के आधार पर होगा। हम लोग यदि जाति के पीछे अगड़े पीछड़े के चक्कर में फसे तो नतीजा अच्छा नही होगा। हमारे पास सबसे बड़ा वोट बैंक है। उस दायरा को अगर हम तोड़ने का काम करते है तो हमारा नुकसान होगा। इसलिए हमें हिन्दूत्व व विकास के आधार पर जनता के बीच में जाना चाहिए।
रामलीला में तब्दील होती राजनीति
अंबरीश कुमार
लखनऊ, 9 जुलाई। बाबा साहब आम्बेडकर के कदमो पर चलने वाले कांसीराम ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था से संघर्ष करने और दलितों को सामाजिक राजनैतिक ताकत देने के लिए जिस बहुजन समाज पार्टी को बनाया था उसकी लगातार हो रही रैली में शंख घंटा और घड़ियाल के साथ मंत्रोचार के बीच फरसा लेकर खड़े परशुराम का स्तुतिगान हो रहा है । पिछले एक महीने में प्रदेश में जगह जगह हुए बसपा के ब्राह्मण भाईचारा सम्मलेन में यह सब हुआ और आगे भी होगा । यह स्थिति डा राम मनोहर लोहिया के विचारों को मानने वाली समाजवादी पार्टी की भी है । ब्राह्मणों के लिए सपा और बसपा उत्तर प्रदेश में समूची राजनीति को रामलीला में बदलती नजर आ रही है । यह सब राजनैतिक पार्टी के मंच पर बहुत नाटकीय भी लगता है । बसपा ने रविवार की रैली के लिए चित्रकूट से जो भगवा वस्त्रधारी बुलाए थे उनमे हरेक को आने जाने की सुविधा के साथ भोजन और पांच सौ रुपए दिए गए । वे ब्राह्मण के रूप में पेश किये गए । इसी तरह समाजवादी पार्टी ने जब ब्राह्मण सम्मलेन किया तो अयोध्या मथुरा काशी के पंडित मंच पर विराजमान थे तो पीछे बैनर पर फरसा लिए परशुराम । खांटी समाजवादी जनेश्वर मिश्र ब्राह्मण के रूप में याद किए जा रहे था ।
नारे भी नए नए गढे गए । हाथी नही गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है या फिर ब्राह्मण शंख बजाएगा ,हाथी दिल्ली जाएगा । करीब चौदह फीसद ब्राह्मण वोट बैंक के लिए जिस तरह की राजनैतिक प्रतिद्वंदिता सपा और बसपा में चल रही है वह आम्बेडकर और लोहिया के विचारों को ध्वस्त करने जैसी है । हाशिए के समाज के लिए जिन लोगों ने सामाजिक राजनैतिक लड़ाई लड़ी वे विचारों के संदर्भ में खुद हाशिए पर जाते दिख रहे है भले उनके नाम की मूर्ति और पार्क बढते जाए ।
राजनैतिक विश्लेषक वीरेंद्र नाथ भट्ट ने कहा -जिन्हें ब्राह्मणवाद से लड़ना था वे खुद ब्राह्मण को राजनीति के केंद्र में बहुत भौंडे ढंग से ला रही है । अयोध्या में चले जाए इस तरह भगवा वस्त्रधारी मिल जाएंगे जिन्हें कोई भी पार्टी ब्राह्मण बनाकर पेश कर दे जैसे चित्रकूट से पांच पांच सौ रुपए देकर लाए लोगों को ब्राह्मण बना दिया गया । अवसरवादी राजनीति की यह पराकाष्ठा है । रोचक तो यह है कि अयोध्या में ज्यादातर साधू संत पिछड़ी जाति के है । पर राजनैतिक लोगो का यह दिमाग बन गया है कि शंख ,घंटा घड़ियाल लेकर किसी को भी ब्राह्मण बना दो लोग भरोसा कर लेंगे ।
दूसरी तरफ इंडियन पीपुल्स फ्रंट के संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा -यह कर्मकांड कोई ब्राह्मण नहीं कर रहा बल्कि सपा और बसपा कर रही है जिसका कोई असर समाज पर नहीं पड़ने वाला । पौराणिक किवदंतियों में भी परशुराम मात्रहंता माने गए है उन्हें सामने रखकर यह पार्टियां क्या दिखाना चाहती है । एक तरफ आम्बेडकर के नाम पर चलने वाली पार्टी है तो दूसरी तरफ लोहिया के विचारों पर । ये दोनों दल इतना बड़ा प्रतिगामी कदम ब्राह्मण के नाम पर उठा रहे है जिसका साहस भाजपा और कांग्रेस जैसे दल नही कर पाए जो ब्राह्मणों के वोट की राजनीति करते रहे है । अब बसपा में लोग मनु की मूर्ति लेकर चल रहे है । कम से कम इन लोगों को जाति के बारे में लोहिया के विचार तो पढ़ ही लेने चाहिए ।
Saturday, June 29, 2013
सुमेर सिंह के किले में
किले के डाक बंगले में एक रात
छह दिन पहले सुमेर सिंह के किले में करीब दोपहर पहुंचे थे और दूसरे दिन दस बजे तक रहे ।तब लिख नही पाया । कल से लगातार हो रही बारिश के बीच आज समय मिला तो लिखने बैठा हूँ । प्राचीन महल जो होटल में तब्दील हो चुके है उनमे कई बार रुकना हुआ पर वह अन्तः होटल की तरह ही महसूस हुआ । इस किले में डाक बंगले जैसा अनुभव हुआ जो कभी बैतूल के डाक बंगले में हुआ था या फिर छतीसगढ के उद्यंती वन्य जीव अभ्यारण्य के तौरंगा के डाक बंगले में हुआ था जो अटल बिहारी वाजपेयी का पसंदीदा डाक बंगला रहा है । यह किला इटावा में यमुना के किनारे एक छोटी सी पहाड़ी पर बना है जिसका रास्ता पहाड़ों की तरह घुमावदार है और चढाई भी ठीकठाक है । किले को कुछ समय पहले ही एक आलीशान अतिथिगृह में बदला गया है और यह जंगलात विभाग के अधीन है पर नियंत्रण कलेक्टर करता है । जिस दिन इटावा पहुंचा उस दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी वही थे पर उनके कार्यक्रम में जाना भी नहीं था इसलिए पत्रकार दिनेश शाक्य जो पर्यावरण पर जमकर लिखते है वे सीधे इस किले में ले गए । उत्तर प्रदेश में अल जंगल और जमीन के सवाल पर जिलों में कुछ ही पत्रकार लिखते है इनमे
आदि शामिल है । यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योकि मीडिया का एक हिस्सा कलेक्टर के इर्द गिर्द की ख़बरों पर ज्यादा फोकस करता है। खैर यह सब संपादक पर ज्यादा निर्भर करता है कि वह अपने संवाददाता से क्या लिखवाना चाहता है और उसकी खबर को कैसा ट्रीटमेंट देता है । बहरहाल मुद्दा किला है इसलिए वही लौटता हूँ ।
किले का भव्य और भारी भरकम दरवाजा नया बना है पर पुरानी डिजाइन है जिसके दोनों तरफ द्वारपाल की प्रतिमा लगी है । गाडी जाने के लिए पूरा दरवाजा खुला अंदर खूबसूरत सा बगीचा नजर आया जो ठीक पोर्टिको के सामने था । भीतर से भी नजारा एक भव्य किले जैसा ही था । सीढियाँ चढ कर भीतर गए तो यह किसी चमचमाते होटल जैसा नजर आया पर सन्नाटा छाया था । कुछ दूर चलने के बाद बुर्ज पर जाती सीधी से ऊपर पहुंचे तो लंबा कारीडोर नजर आया और सामने ही चार नंबर का सूट था जिसमे रुकना था । भीतर जाते ही सामने बैठक नजर आई जिसमे आलीशान सोफा और मेज नाश्ते के साथ सजी हुई थी । इसी से एक गैलरी भीतर जाती थी जिसमे बड़ा सा बेड रूम , ड्रेसिंग रूम और फिर बाथरूम आदि था । बेडरूम से लगी बालकनी से उफनती हुई यमुना दिख रही थी । सविता आराम करने गई तो हम दिनेश और उनके सहयोगियों के साथ इस किले के बारे में बात करने लगे । जंगलात विभाग के एक अफसर भी आ गए जो चंबल नदी के बारे में बताने लगे । कुछ देर बाद सभी चले गए और तय हुआ कि चार बजे पचनदा की तरफ चला जाएगा । कुछ देर बाद ही बिजली चली गई तो मैंने दिनेश से कहा कि अब कार्यक्रम में फेरबदल करते हुए जल्दी चलते है तो उन्होंने शहर के एक होटल में बुला लिया ताकि खबर वहां से भेज कर चला जाए । गरमी कुछ ज्यादा ही थी इसलिए होटल में लिखने का काम कर लिया और फिर पचनदा की और चले । चंबल के किनारे पहुंचे तो पत्रकार राधे कृष्ण और फोटोग्राफर दीक्षित जी भी साथ था । बीहड़ से गुजरती चंबल नदी की खूबसूरती देखते बनती थी । जंगलात विभाग के वाच टावर से नजारा देखा और फोटो भी खींची । आगे बढे तो करीब घंटे भर बाद एक छोटे कसबे में आगे की गाडी रुकी और दिनेश उतर कर आए और कहा - भाई साहब यहां साबुत मुंग के मुंगोड़े बहुत अच्छे बनते है । हमने कहा चाय के साथ ख्य जा सकता है । पता चला आगरा और इटावा से लोग इसे खाने आते है । दिनभर में पचास किलों मूंग के पकौड़े बनाकर वह चला जाता है । बहुत ही स्वादिष्ट पकौड़े जिसमे साबुत लहसुन और हींग का स्वाद भारी था ।
बहरहाल पचनदा तक गए और लौटे तो रात हो चुकी थी और हम कमरे में पहुंचे तो बाकी लोग रिसेप्शन । पूछा तो बताया कि खाना बनवा रहे है । नहाने के बाद हम यमुना को देखने सामने की बालकनी में आए फिर गरमी की वजह से ड्राइंग रूम में ही बैठ गए । भीतर का एसी ठीक से काम नहीं कर रहा था इसलिए कुछ देर बाद नीचे के कमरे में शिफ्ट हो गए । कुछ देर बाद खाना हो गया तो सभी लोग चले गए । यह बताया कि सुमेर सिंह का दूसरा महल जो कुछ दूरी पर है वह उनके सामंती शौक का गवाह भी रहा है और वे नृत्य के भी बहुत शौकीन रहे थे । और जैसा कि हर महल और किले की कहानियां प्रचलित होती है इनके बारे में भी थी । कहा जाता है गांव वालों को आज भी महल के पास घुंघरू की आवाज सुने देती है । पर किले में सन्नाटा था गैलरी के अंतिम छोर तक पहुँचने में भी आठ दस मिनट लग गया ।बाहर अंधेरी रात थी और मुख्य द्वार के पास बेला के फूलों की खुशबू फैली हुई थी ।पता चला किले में सिर्फ एक कुक और दो चौकीदार रहते है । वे कही दिख नहीं रहे थे ।गरमी और उमस के बीच फिर लंबी गैलरी पार कर हम कमरे में पहुंचे तो ग्यारह बज चुके थे ।कही कोई आवाज नहीं ।बाकी सारे कमरे बंद थे ।अजीब सा रहस्मय माहौल था । बालकनी से बाहर भी बहुत दूर रौशनी दिखी आसपास न कोई आबादी न कोई आवाज । ठीक उसी तरह जैसे तौरंगा के डाक बंगले में पहले अंतिम पुलिस चौकी के प्रभारी ने वहाँ रात गुजरने पर चेतावनी दी फिर डाक बंगले के चौकीदार ने समझाया कि रात में दरवाजा मत खोलिएगा यहाँ बाघ से लेकर भालू तक आते है । पर यहाँ बाघ भालू तो कुछ नही था पर फिर भी अजीब सा डरावना माहौल जरुर था ।यह पता चलने के बाद कि इस किले के बहुत प्राचीन कुएं में किसी को मार कर डाला जा चूका है,डर जरुर लग रहा था । किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज पर नींद खुली तो देखा रसोइया चाय और बिस्कुट के साथ खड़ा है । आसमान में बदल छाए हुए थे और हम बालकनी में यमुना का घुमावदार मोड देखते हुए चाय का स्वाद ले रहे थे ।
अंबरीश कुमार
आदि शामिल है । यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योकि मीडिया का एक हिस्सा कलेक्टर के इर्द गिर्द की ख़बरों पर ज्यादा फोकस करता है। खैर यह सब संपादक पर ज्यादा निर्भर करता है कि वह अपने संवाददाता से क्या लिखवाना चाहता है और उसकी खबर को कैसा ट्रीटमेंट देता है । बहरहाल मुद्दा किला है इसलिए वही लौटता हूँ ।
किले का भव्य और भारी भरकम दरवाजा नया बना है पर पुरानी डिजाइन है जिसके दोनों तरफ द्वारपाल की प्रतिमा लगी है । गाडी जाने के लिए पूरा दरवाजा खुला अंदर खूबसूरत सा बगीचा नजर आया जो ठीक पोर्टिको के सामने था । भीतर से भी नजारा एक भव्य किले जैसा ही था । सीढियाँ चढ कर भीतर गए तो यह किसी चमचमाते होटल जैसा नजर आया पर सन्नाटा छाया था । कुछ दूर चलने के बाद बुर्ज पर जाती सीधी से ऊपर पहुंचे तो लंबा कारीडोर नजर आया और सामने ही चार नंबर का सूट था जिसमे रुकना था । भीतर जाते ही सामने बैठक नजर आई जिसमे आलीशान सोफा और मेज नाश्ते के साथ सजी हुई थी । इसी से एक गैलरी भीतर जाती थी जिसमे बड़ा सा बेड रूम , ड्रेसिंग रूम और फिर बाथरूम आदि था । बेडरूम से लगी बालकनी से उफनती हुई यमुना दिख रही थी । सविता आराम करने गई तो हम दिनेश और उनके सहयोगियों के साथ इस किले के बारे में बात करने लगे । जंगलात विभाग के एक अफसर भी आ गए जो चंबल नदी के बारे में बताने लगे । कुछ देर बाद सभी चले गए और तय हुआ कि चार बजे पचनदा की तरफ चला जाएगा । कुछ देर बाद ही बिजली चली गई तो मैंने दिनेश से कहा कि अब कार्यक्रम में फेरबदल करते हुए जल्दी चलते है तो उन्होंने शहर के एक होटल में बुला लिया ताकि खबर वहां से भेज कर चला जाए । गरमी कुछ ज्यादा ही थी इसलिए होटल में लिखने का काम कर लिया और फिर पचनदा की और चले । चंबल के किनारे पहुंचे तो पत्रकार राधे कृष्ण और फोटोग्राफर दीक्षित जी भी साथ था । बीहड़ से गुजरती चंबल नदी की खूबसूरती देखते बनती थी । जंगलात विभाग के वाच टावर से नजारा देखा और फोटो भी खींची । आगे बढे तो करीब घंटे भर बाद एक छोटे कसबे में आगे की गाडी रुकी और दिनेश उतर कर आए और कहा - भाई साहब यहां साबुत मुंग के मुंगोड़े बहुत अच्छे बनते है । हमने कहा चाय के साथ ख्य जा सकता है । पता चला आगरा और इटावा से लोग इसे खाने आते है । दिनभर में पचास किलों मूंग के पकौड़े बनाकर वह चला जाता है । बहुत ही स्वादिष्ट पकौड़े जिसमे साबुत लहसुन और हींग का स्वाद भारी था ।
बहरहाल पचनदा तक गए और लौटे तो रात हो चुकी थी और हम कमरे में पहुंचे तो बाकी लोग रिसेप्शन । पूछा तो बताया कि खाना बनवा रहे है । नहाने के बाद हम यमुना को देखने सामने की बालकनी में आए फिर गरमी की वजह से ड्राइंग रूम में ही बैठ गए । भीतर का एसी ठीक से काम नहीं कर रहा था इसलिए कुछ देर बाद नीचे के कमरे में शिफ्ट हो गए । कुछ देर बाद खाना हो गया तो सभी लोग चले गए । यह बताया कि सुमेर सिंह का दूसरा महल जो कुछ दूरी पर है वह उनके सामंती शौक का गवाह भी रहा है और वे नृत्य के भी बहुत शौकीन रहे थे । और जैसा कि हर महल और किले की कहानियां प्रचलित होती है इनके बारे में भी थी । कहा जाता है गांव वालों को आज भी महल के पास घुंघरू की आवाज सुने देती है । पर किले में सन्नाटा था गैलरी के अंतिम छोर तक पहुँचने में भी आठ दस मिनट लग गया ।बाहर अंधेरी रात थी और मुख्य द्वार के पास बेला के फूलों की खुशबू फैली हुई थी ।पता चला किले में सिर्फ एक कुक और दो चौकीदार रहते है । वे कही दिख नहीं रहे थे ।गरमी और उमस के बीच फिर लंबी गैलरी पार कर हम कमरे में पहुंचे तो ग्यारह बज चुके थे ।कही कोई आवाज नहीं ।बाकी सारे कमरे बंद थे ।अजीब सा रहस्मय माहौल था । बालकनी से बाहर भी बहुत दूर रौशनी दिखी आसपास न कोई आबादी न कोई आवाज । ठीक उसी तरह जैसे तौरंगा के डाक बंगले में पहले अंतिम पुलिस चौकी के प्रभारी ने वहाँ रात गुजरने पर चेतावनी दी फिर डाक बंगले के चौकीदार ने समझाया कि रात में दरवाजा मत खोलिएगा यहाँ बाघ से लेकर भालू तक आते है । पर यहाँ बाघ भालू तो कुछ नही था पर फिर भी अजीब सा डरावना माहौल जरुर था ।यह पता चलने के बाद कि इस किले के बहुत प्राचीन कुएं में किसी को मार कर डाला जा चूका है,डर जरुर लग रहा था । किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज पर नींद खुली तो देखा रसोइया चाय और बिस्कुट के साथ खड़ा है । आसमान में बदल छाए हुए थे और हम बालकनी में यमुना का घुमावदार मोड देखते हुए चाय का स्वाद ले रहे थे ।
अंबरीश कुमार
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