Wednesday, June 12, 2013

नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश में रास्ता आसान नही

अंबरीश कुमार लखनऊ ,१२ जून ।नरेंद्र मोदी और आडवाणी के विवाद के बाद सबकी नजर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश की तरफ है । उत्तर प्रदेश ही वह राज्य है जहां नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है । आज जैसे ही नरेंद्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह लखनऊ पहुंचे उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई । भाजपा बम बम दिखी और पार्टी के एक धड़े का मानना है कि नरेंद्र मोदी के आने से भाजपा उत्तर प्रदेश में मुकाबले में आ सकती है हालाँकि पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ से लेकर अयोध्या के विनय कटियार तक जैसे नेता नरेंद्र मोदी का जयकारा लगाने वाले नहीं है । आडवाणी समर्थक खेमा मोदी के साथ नही आने वाला । भाजपा के एक नेता ने कहा -उत्तर प्रदेश में यह पार्टी फादर और गाड फादर के बीच झूल रही है और यहां लीडर कम चियर लीडर्स ज्यादा है । नेता तो भारी भारी पहले भी थे और बाहर से और भारी नेता आ रहे है पर कार्यकर्त्ता किन औजारों से प्रदेश के बड़े क्षत्रपों से लड़ेगा यह उन्हें नहीं पता है ।यह मायावती और मुलायम जैसे बड़े क्षत्रपों का प्रदेश है जो एक बड़े वोट बैंक के साथ खड़े है जिनसे अत्याधुनिक संचार साधनों से आप नहीं लड़ सकते ,यंहा सोशल मीडिया से चुनावी जंग नहीं जीती जा सकती जंहा ज्यादातर जिलों के गांवों में पन्द्रह घंटे बिजली ही नहीं रहती । इस बीच समाजवादी पार्टी ने साफ़ किया कि उत्तर प्रदेश में किसी मोदी की दाल नहीं गलने जा रही ।यहां सांप्रदायिक ताकतों की कलई खुल चुकी है और वह तीसरे चौथे नंबर की पार्टी है ।सांप्रदायिक ताकतों की पहले ही कलई खुल चुकी है और फिर से उन्हें मजबूत करना आसान नहीं है ।समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने आज यहां कहा कि सांप्रदायिकता के बल पर उत्तर प्रदेश में किसी के मंसूबे सफल नहीं होनेवाले हैं। प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है जो धर्मनिरपेक्षता से गहरे जुड़ी है। गुजरात में मुस्लिमों का कत्लेआम करनेवालों को प्रदेश की जनता जरा भी भाव देनेवाली नहीं है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का सिर्फ आधार ही नही खिसका बल्कि शीर्ष नेताओं की कलह के चलते पार्टी संगठन का भठ्ठा बैठ बैठ चुका है ।पिछले विधान सभा चुनाव में पार्टी ने एक छोड़ सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारा था जिसमे अढतालीस उम्मीदवार जीते थे अगडी जातियों के तीस उम्मीदवार थे तो बारह पिछड़े और तीन दलित ।इससे इनकी सोशल इंजीनियरिंग को समझा जा सकता है । बाबूसिंह कुशवाहा के बावजूद इन्हें पिछडों की राजनीति में कोई खास फायदा नहीं हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी के संसदीय सीट रही लखनऊ में बड़ी मुश्किल से कलराज मिश्र की सीट के चलते इज्जत बची थी । पिछली लोकसभा में पार्टी की दस सीटें थी जिसे बहुत ज्यादा बढ़ाना आसान नहीं ।ऐसे में नरेंद्र मोदी भाजपा के लिए जनाधार बढा सके यह बहुत आसान नहीं दिखता । यहां भाजपा खेमों में बंटी है तो अंचलों में भी बंटी है ।पूर्वांचल में सिर्फ और सिर्फ योगी आदित्यनाथ है और वहां पहुँचते पहुँचते भाजपा हिंदू युवा वाहिनी में तब्दील हो जाती है जिसके सर्वेसर्वा योगी है । टिकट उनकी मर्जी से नहीं दिया गया तो उस उम्मीदवार की हार वे सुनश्चित कर देते है ।इसी तरह कुछ और नेता भी अपने गढ़ में किसी की चलने नहीं देते ।यह सब चुनौतियां नरेंद्र मोदी के सामने है तो उन्हें लेकर भाजपा को कुछ फायदा भी मिल सकता है । धार्मिक आधार पर जिस भी जगह गोलबंदी हुई वह मोदी के आने के बाद और तेज होगी यह तय है । ऎसी जगहों पर भाजपा को फायदा मिल जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए ।भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा -मोदी के आने से पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढा है और लोकसभा चुनाव में हमें बड़ा फायदा होने जा रहा है । वैसे भी अमित शाह ने आज कहा कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर ही जाता है ।साफ़ है उन्हें भी उत्तर प्रदेश से बहुत उम्मीद है । अमित शाह की इस टिपण्णी से नरेंद्र मोदी के मंसूबों को भी समझा जा सकता है । jansatta

Tuesday, June 11, 2013

वे कांग्रेस से भी लड़े थे


वे कांग्रेस से भी लड़े थे अंबरीश कुमार विद्याचरण शुक्ल से अपनी पहली मुलाकात सन २००० में रायपुर में उनके घर पर ही हुई जब मै इंडियन एक्सप्रेस की जिम्मेदारी निभा रहा था और जनसत्ता लांच नही किया था ।एक प्रेस कांफ्रेंस में मुझे बुलाया गया जहां हर पत्रकार ने वीसी शुक्ल के पैर छूकर आशीर्वाद लिए। अपवाद मै था और कुछ हैरान भी क्योकि वीसी शुक्ल के बारे में मै सिर्फ उनके आपातकाल के व्यवहार के किस्से कहानियों से ही जानता था ।इसलिए जहां सभी पत्रकार उन्हें विद्या भैया कह कर संबोधित कर रहे थे मैंने उन्हें श्री शुक्ल कहकर संबोधित किया ।छतीसगढ में वह अजित जोगी का दौर था जो दिल्ली में मीडिया से काफी करीब रहे और अपना भी उसी वजह से उनसे परिचय भी रहा । छतीसगढ आया तो इंडियन एक्सप्रेस में सबसे पहले लिखा भी सारे दावों के बावजूद मुख्यमंत्री अजित जोगी ही बनेंगे । वे बने और दिल्ली से पहुंचे पत्रकारों को अक्सर न्योता भी देते और खबर पर फोन कर बात भी करते ।यह शुरू का दौर था और लगता था कि अजित जोगी दूर तक जाएंगे।सुनील कुमार से लेकर शैलेश पाठक और चितरंजन खेतान जैसे जोशीले आइएएस अफसर भी इस धारणा को मजबूत करते थे ।पर बाद में अफसरों के चलते अजित जोगी पहले मीडिया से दूर हुए फिर आमजन से और आंदोलनों का दौर शुरू हुआ ।भाजपा के एक प्रदर्शन के दौरान शीर्ष नेताओं पर लाठीचार्ज हुआ और कई के हाथ पैर टूटे । भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार साय पैर टूटने की वजह से महीनों बिस्तर पर रहे । उसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण मिश्र की गिरफ़्तारी के मुद्दे पर भी आंदोलन हुआ तो बाद में सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाने पर जनसत्ता के दफ्तर पर भी हमला हुआ और अपना भी टकराव शुरू हुआ ।जनसत्ता की ख़बरों को देख वीसी शुक्ल ने मुझे घर बुलाया और पूछा ,इस तरह की खबरे कब तक लिखी जाएँगी ।अपना जवाब था ,जब तक यहाँ रहूँगा ।फिर लंबी बातचीत भी हुई । वे किसानो के सवाल पर आंदोलन शुरू कर चुके थे और अब कांग्रेस से लड़ रहे थे ।उस कांग्रेस से जिसके वे सबसे बड़े खलनायक माने गए । वे पंडित रविशंकर शुक्ल के वंशज थे जिनका अविभाजित मध्य प्रदेश में कितना असर आज भी है यह छतीसगढ के बाहर का कोई व्यक्ति नही जान सकता । आज भी मध्य प्रदेश या छतीसगढ के गांव गांव में किसी राजनितिक का नाम लोग जानते है तो वे रविशंकर शुक्ल ही है । बहरहाल वीसी शुक्ल ने उस दौर में खेत खलिहानो में उतर कर आंदोलन किया और शायद धमतरी के संवाददाता की खबर थी जिसपर मैंने तब हेडिंग लगाई थी ' नंगे पैर खेतों में उतरे वीसी ।' वे कांग्रेस से लड़ रहे थे और उस उम्र में जिस अंदाज से लड़ रहे थे वह देखने वाला था ।कांग्रेस अगर छतीसगढ में हारी तो उसकी बड़ी वजह वीसी का वह आंदोलन भी था जिसने कांग्रेस के वोट को बाँट दिया ।वीसी शुक्ल ने कांग्रेस के समान्तर एक पार्टी कड़ी कर दी थी जो खुद भले न जीत पाई पर कांग्रेस को जरुर निपटा दिया जिस कांग्रेस का नेतृत्व दलित आदिवासियों में मशहूर जोगी जैसे नेता कर रहे थे ।सत्ता से जोगी क्या हटे तबसे वे विपक्ष में ही है । इसलिए वीसी शुक्ल की पहचान सिर्फ आपातकाल से ही नही होती । वे एक लड़ाकू राजनितिक रहे और अंत तक लड़े । यूं ही नही समूचा छतीसगढ उन्हें विद्या भइया कहता था ।

Sunday, June 2, 2013

बादलों का लैंडस्केप

अंबरीश कुमार मौसम के चलते कई दिन बाद कैमरा लेकर निकला । बादल भी कई तरह के लैंडस्केप बना देते है । यही देख रहा था । सिंधिया स्टेट के बगीचे के पीछे की पहाड़ियों पर खेलते हुए बादल देखने के लिए खड़ा हो गया ।आसपास कई तरह के पक्षी मंडरा रहे थे जिनमे सबसे ज्यादा संख्या गौरेया की थी ।जो पक्षी मैदानी इलाको में अमूमन नहीं दिखते वे सभी यहाँ नजर आ जाते है ।पक्षियों के बारे में जानने के लिए एक छोटी सी पुस्तक भी ले आया हूँ ।उसी में पढ़ा एक खास प्रजाति का उल्लू जिस जगह आसन जमा लेता है वही वह जम जाता है अंतिम समय तक ।समझ नहीं आया ।आस्पताल के सामने अखरोट के सूखे पेड़ पर एक उल्लू नजर आया था पर दुबारा नहीं दिखा । अचानक गहरे नीले रंग की करीब डेढ़ फुट पंख वाली एक बड़ी चिड़िया सामने नजर आई और कैमरे को फोकस करता तब तक किसी जहाज की तरह लैंड करती हुई नीचे की पहाड़ी की तरफ जा चुकी थी । मौसम में ठंढ थी इसलिए जैकेट पहना था पर फिर भी राहत नही मिल रही थी । सामने की पगडंडियों से उतारते बच्चे दिखाई पड़े जो फल पैक करने वाले गत्ते लेकर उतर रहे थे । पहाड़ी फल पकने लगे है और तल्ला में तो पहले से पाक जाते है क्योकि वह घाटी में है और तापमान कुछ ज्यादा रहता है । बागवानो की कमाई इसी सीजन में होती है और रात भर पैकिंग और ट्रकों पर फलों की पेटियां चढाने का काम होता है ।यह वही तल्ला है जहां के कौवों पर निर्मल वर्मा ने कहानी लिखी तो अभिनेता दिलीप कुमार ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर हीरों नही बनता तो रामगढ़ में सेब के बगीचों से पक्षी भगाता रहता । पर मौसम में हुए बदलाव के चलते और मुनाफे ने सेब को तल्ला से बेदखल कर दिया अब वह आडू ज्यादा होता है और अच्छी प्रजाती खड़ी देशो को निर्यात हो जाति है जिसकी कीमत सेब से ज्यादा मिलती है और बची हुई आडू की छोटी प्रजाती लखनऊ दिल्ली के बाजार में चली जाती है । कई और फल जिनपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है उनमे एक नाशपाती की प्रजाती बब्बूगोसा है जो करीब चार सौ ग्राम का एक होता है ।करीब तीन साल पहले यहां से दिल्ली गया तो दर्जन भर बब्बूगोसा ले गया था और एक आलोक तोमर को दिया तो दूसरा कृष्ण मोहन सिंह को ।दोनों नाराज कि क्या एक फल दिया जाता है ,बहरहाल जब उसका स्वाद लिया तो हैरान रह गए ।गजब की मिठास और सेब से किसी मायने में कम नहीं । पर यह मैदानी इलाकों में कम मिलता है । यहां बहुत कम खाई जाने वाली कौव्वा नाशपाती ही दिल्ली लखनऊ के बाजार में चालीस पचास रूपये किलो मिलती है जो यहां से बोरों में जाती है और यहां के लोग उसे कौवों के लिए छोड़ देते थे इसलिए नाम भी ऐसा पड़ा । प्लम और खुबानी जब पेड़ पर पकने लगती है तो उसे संभाला नहीं जा सकता और तोड़ने से पहले ही ज्यादातर फल जमीन गिर जाते है ।यह अपने राइटर्स काटेज के पीछे के हिस्सों में हर साल होता है जंहा काले प्लम का पुराना पेड़ खड़ा हुआ है ।

Friday, May 31, 2013

बरसात में भीगा पहाड

अंबरीश कुमार रामगढ़ में तीन चार दिन से जमकर बारिश हो रही है । सामने का दृश्य किसी चित्रकला सा लगता है ।देवदार के पेड़ों के पीछे खडी पहाड़ियां धुंध और बदल से घिरी हुई है और काफी कुछ नीलगिरी की पहाड़ियों जैसी दिखती है ।हालाँकि इनका नीलापन ज्यादा स्याह है जबकि ऊटी में पहाड गहरे नीले नजर आते है शायह इसीलिए वे नीलगिरी की पहाड़ियां कहलाती है ।बरसात में पहाड अद्भुत नजर आता है । रात में तीन की छत पर ओले गिरने की वजह से नीद खुली तो देखा अच्छी खासी बरसात हो रही है और तेज हवा से प्लम का पेड़ लहर रहा है । कल तो जो ओले पड़े उससे सेब के पेड़ के नीचे लगी स्ट्राबेरी के पौधे ही दब गए ।क्यारियों में बर्फ ही बर्फ ।वृन्दावन आर्चिड की तरफ जाने वाले रास्ते में सेब के बगीचे के बाद एक पेड़ खुबानी का पड़ता है जो सबसे पहले पक जाता है। कल बस स्टेशन से जब अखबार लेकर लौट रहा था तो देखा स्कूली लड़कियां एक पुराने घर की तीन की छत पर चढ कर खुबानी तोड़ रही है ।मन हुआ मै भी कुछ खुबानी मांग लू ।अपने यहां खुबानी के तीन पेड़ थे पर एक एक कर सभी सूख गए अब प्लम है ,आडू ,बादाम के साथ सेब की तीन वेरायटी के पेड़ बचे हुए है पर खुबानी का कोई पेड़ नहीं है और पहाड़ी फलों में सेब नाशपाती के बाद यही फल अपने को भाता है ।आडू तो अधपके कलमी आम जैसा लगता है ।वैसे भी सुर्ख होते आडू अब बंदरों के हवाले है जो सुबह अपने घर के रास्ते से निकालते समय इनका स्वाद लेते है तो शाम को लौटते हुए भी । अब शाम को एक बार दूर तक घूमना होता है तो दिन में एक बार बाजार जाना भी । बाजार भी क्या भट्ट ,जोशी की चार पांच दुकाने और दो तीन ढाबे । शुरुआत बकरे और मुर्गे की दुकान से होती है जो भवाली से आने वाले रास्ते में मोड पर है तो अंत पीडब्लूडी के गेस्ट हाउस के पास मछली वाले के पास हो जाता है । अपना टाइगर बहादुर के जाने के बाद यही पुलिस चौकी में रहने लगा है । शाम को मिलता है बिस्कुट खाता है और दुम हिलाते हुए महादेवी सृजन पीठ के आगे शाह जी के बगीचे तक छोड़ने भी आता है पर फिर लौट जाता है । यह आमतौर पर रोज की दिनचर्या है । ब्राडबैंड लग जाने से आकाश और अंबर का ज्यादा समय लैपटाप पर जाता है ,आकाश तो कैमरा लेकर निकल भी आते है अंबर को कोई दिलचस्पी नहीं है पैदल घूमने में । टहलने जाते है तो कई मित्रों के घर और बगीचे भी पड़ते है । इनमे आलोक तोमर भी शामिल है जिनकी इच्छा थी यहां लिखने पढ़ने की पर पूरी नहीं हो पाई । राजेंद्र तिवारी से लेकर सिद्धार्थ कलहंस के भी यहां छोटे छोटे बगीचे है और वे भी आने वाले है । हिमालय पर होने वाली वर्कशाप में । सोनी और हिमांशु भी आ रहे है ।राजेंद्र चौधरी से बात हुई तो बताया सात को पहुँच जाएंगे । कल अल्पना वाजपेयी का फोन आया ,अपने संगठन की तेज तर्रार नेता रही है और बाद में लखनऊ विश्विद्यालय छात्रसंघ की पहली महिला उपाध्यक्ष भी बनी । बहरहाल बरसात में पहाड ज्यादा खूबसूरत नजर आ रहा है और घंटों खिडकी के सामने या बालकनी में बैठकर पढ़ने का मौका भी मिल रहा है । घाट घाट का पानी पुस्तक की भूमिका लिखनी है पर राकेश मंजुल ने एक दिन रुकने को कहा है ।

Sunday, May 12, 2013

राजनीति में राम को किनारे लगाया परशुराम ने !

अंबरीश कुमार लखनऊ, 12 मई।करीब दशक भर पहले तक उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में भगवान राम थे तो अब परशुराम है । आज उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह परशुराम जयंती बनाई वह सोशल इंजीनियरिंग की बदलती राजनीति का आगाज है । दलित और पिछड़े तबके की राजनीति करने वाली दोनों पार्टियां परशुराम जयंती के बहाने ब्राह्मण को अपनी अपनी तरफ खींचने में जुटी । एक कार्यक्रम समाजवादी पार्टी के मुख्यालय में हुआ जिसमे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और विधान सभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय शमिल हुए । मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने वह फरसा प्रतीकात्मक धंस से हाथ में लिए जो परशुराम का हथियार माना जाता है । समाजवादी पार्टी के मंच पर साधू सन्यासी और बाबा सभी नजर आ रहे । अयोध्या ,मथुरा और काशी जैसा नजारा दिख रहा थे । बसपा ने पूर्वांचल के महाराजगंज में परशुराम जयंती पर बड़ा कार्यक्रम किया । सपा और बसपा दोनों का मुख्य जनाधार अलग अलग पिछड़े और दलित रहे है । दोनों दल एक दौर में अगड़ी जातियों के मुकाबले दलित और पिछडों की लामबंदी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । कांसीराम जब बसपा का जनाधार बना रहे थे तो दलितों को गोलबंद करने के लिए आक्रामक राजनैतिक तौर तरीकों का इस्तेमाल किया ।अब शायद उन नारों को इनके नेता याद नहीं रखना चाहते है जो अस्सी के दशक में गूंजे थे । इनमे तिलक ,तराजू और तलवार ,इनको मारो जूते चार सबसे ज्यादा चर्चित हुआ था ।यह वह दौर भी था जब अगड़ी जातियों का राजनीति पर वर्चस्व था और आरक्षण विरोधी आंदोलन चला था ।बाद में अगड़ी जातियां और कुछ हद तक पिछड़ी जातियों भी मंदिर आंदोलन के साथ जुडी पर मंडल के बाद दलित ,मुस्लिम और पिछडों की गोलबंदी ने उत्तर प्रदेश की जो राजनीति बदली उसके चलते सत्ता के शीर्ष से अगड़ी जातियां बेदखल हो गई और तबसे कोई अगड़ा मुख्यमंत्री नही बन पाया ।आज वही दलित पिछड़ा ताकते ब्राह्मणों को जोड़ने में जुट गई है । ब्राह्मण प्रतीक तलाशे जा रहे है । आज समाजवादी पार्टी के मुख्यालय में जो माहौल था उससे यह भ्रम हो रहा था कि अयोध्या मथुरा या काशी के किसी मंदिर परिसर में आ गए है । शंख ,घंटा घड़ियाल के साथ मंत्रोचार गूंज रहे थे और अयोध्या ,मथुरा से लेकर काशी तक से साधू संत भी दिख रहे थे ।मंच पर भी फलाहारी बाबा से लेकर शाकाहारी बाबा तक थे ।खांटी समाजवादी जनेश्वर मिश्र से लेकर ब्रज भूषण तिवारी ब्राह्मण नेता के रूप में भी याद किए जा रहे थे । समाजवादी पार्टी के युवा नेता सुनील यादव ने कहा -मौजूदा राजनैतिक माहौल में जनाधार बढ़ाने के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर चलना जरुरी है और इस तरह के कार्यक्रम इसी कवायद का हिस्सा भी है ।हांलाकि समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से यह पूछने पर कि समाजवाद से परशुराम का क्या रिश्ता रहा ,जवाब मिला -परशुराम अन्याय के खिलाफ खड़े हुए थे इससे बड़ा क्या संबंध हो सकता है । सपा सरकार ने परशुराम जयंती पर अवकाश घोषित किया था और अब पार्टी ने उनकी जयंती पर भव्य आयोजन है। उन्होंने यह भी कहा कि ब्राह्मण ऐसा प्रबुद्ध समाज है जिसने देश को दिशा दी है। हम उन्हें जाति व वोट का आधार नहीं मानते हैं। भगवान श्री परशुराम जयंती समारोह में विधान सभा अध्यक्ष श्री माता प्रसाद पाण्डेय, वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव और राजेन्द्र चौधरी सहित राज्यमंत्रीगण पवन पाण्डेय, मनोज पाण्डेय, विजय मिश्रा, अभिषेक मिश्रा, राष्ट्रीय महासचिव डा अशोक बाजपेयी, प्रदेश सचिव एसआरएस यादव, धराचार्य , खाली अखाड़ा, श्री फलाहारी जी महाराज, राजगोपाल मंदिर, श्री जनमे जय शरण, श्री नागेन्द्र जी आचार्य, श्री आनन्द किशोर गोस्वामी, प्रमुख आचार्य श्री बांके बिहारी मंदिर वृन्दावन, 1008 योगेश्वर स्वामी वीरेन्द्र गिरि महाराज, विधायकगण श्री शिवाकान्त ओझा, रमेश दुबे, ओमप्रकाश उर्फ बाबा दुबे, संतोष पाण्डेय नंदिता शुक्ला, पूर्व विधायक श्री जयशंकर पाण्डेय, राजेश दीक्षित, सनातन पाण्डेय, रवीन्द्र पाण्डेय, चरनजीत पाण्डेय, सूर्यकान्त पाण्डेय, दीपक मिश्रा, पी0डी0 तिवारी, सुशील दीक्षित, धर्मानन्द तिवारी, माला द्विवेदी, सुरभि शुक्ला आदि ने भी शामिल थे। समारोह की अध्यक्षता श्री माता प्रसाद पाण्डेय एवं संचालन श्री पवन पाण्डेय ने किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि आज देश के सामने गम्भीर चुनौतियां हैं। बेकारी, महंगाई, भ्रष्टाचार सीमाओं की सुरक्षा जैसे गम्भीर समस्याओं का सामना देश कर रहा है। तमाम तरह की विषमताओं एवं अन्याय-अत्याचार के विरूद्व समाजवादियों ने हमेषा संघर्ष किया है। प्रमोशन आरक्षण का मुद्दा उठाकर श्री मुलायम सिंह यादव ने केन्द्र सरकार, लोकसभा और देश का ध्यान आकृष्ट किया है। नेता जी ने इस प्रशासनिक एवं सामाजिक अन्याय के बारे में चेताया कि इससे भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा जिससे प्रशासनिक व्यवस्था तहस-नहस हो जायेगी। इन तमाम समस्याओं के लिये केन्द्र सरकार की नीतियां जिम्मेदार है। उन्होंने आगे कहा कि चीन का खतरा टला नहीं है। केन्द्र सरकार ने देश के साथ यह बड़ा धोखा किया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सभी साधू संतो एवं प्रबुद्व नागरिको का अभिनन्दन करते हुये कहा कि उनके सहयोग और शुभकामना से चुनौतियों का सामना करने में समाजवादी सरकार पूरी तौर पर सफल होगी। उन्होने संस्कृत के प्रधानाचार्यो एवं अध्यापको की समस्याओं का समाधान जल्दी ही करने का आश्वासन देते हुये कहा कि वह मानते है कि संस्कृत को बचाने का अर्थ भारतीय संस्कृति को बचाना है। जबकि विधान सभा अध्यक्ष श्री माता प्रसाद पाण्डेय ने कहा कि ब्राह्मणो का सम्मान समाजवादी पार्टी में ही सुरक्षित है। नौजवानों ने हमेशा परिवर्तन को दिशा दी है। लोकसभा के चुनाव में दिल्ली में नेता जी को ताकत देने के लिये संकल्प के साथ एकजुट होकर अभी से लग जाय। वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि बसपा के षासन काल में दलित एक्ट में हुये उत्पीड़न को समाप्त करने के लिये फर्जी मुकदमे वापस होगें। उन्होने कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार में ब्राह्मण समाज के सम्मान को कोई आंच नहीं आने दी जाएगी ।

Saturday, May 4, 2013

उत्तर प्रदेश में भाजपा की नैया पार लगा पाएंगे वरुण गांधी

उत्तर प्रदेश में भाजपा की नैया पार लगा पाएंगे वरुण गांधी सविता वर्मा लखनऊ 4 मई । भाजपा इंदिरा गांधी के पौत्र और संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी को उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगे कर नौजवानों को जोड़ने की कवायद में जुट गई है । पर यह कवायद कितनी कामयाब होगी यह अभी कहा नही जा सकता । आज वरुण गांधी ने लखनऊ में केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर हमला बोल इसकी शुरुआत भी कर दी। वरुण गांधी पर भडकाऊ भाषण देने का आरोप लग चुका है और प्रदेश में भाजपा जिस तरह की राजनीति के जरिए आगे बढ़ना चाहती है उसके लिहाज से वरुण गांधी उनके नए नायक है । वे पीलीभीत में अपनी माँ मेनका गांधी की सीट से जीते थे और तराई का वह अंचल सिख बहुल है जो मेनका को जीता चुका था । अब वे पिता संजय गांधी की कर्मभूमि से चुनाव लड़ने जा रहे है । सुल्तानपुर में वे उस पार्टी के उम्मीदवार होंगे जिनसे इंदिरा गांधी लगातार लड़ती रही । अब उनके पड़ोस में एक तरफ भाई राहुल गांधी होंगे तो दूसरी तरफ बहन प्रियंका गांधी । पर वरुण ने आज चुनाव की तैयारी शुरू कर दी । उन्होंने लखनऊ में राहुल और अखिलेश दोनों पर निशाना साधा । महासचिव वरूण गांधी ने आज यहां कहा कि केन्द्र सरकार के हाथों में देश का सम्मान सुरक्षित नही है। केन्द्र की लचर नीति के कारण सरबजीत की जान नही बचाई जा सकी। वरुण गांधी आज राजधानी लखनऊ स्थित पं दीन दयाल उपाध्याय स्मृतिका पर पार्टी की तरफ से आयोजित धरने सम्बोधित कर रहे थे। उन्होने कहा देश के इतिहास में यूपीए की सरकार ऐसी पहली सरकार है जिसको 70-75 प्रतिशत का समय अपनी सरकार को सत्ता मे बने रहने व ” मैं चोर नही हूँ मै चोर नही हूँ ” साबित करने में लगाना पड़ रहा है। गरीबों, युवाओं और किसानों को ठगा गया है। पांच वर्ष में कर्ज माफी के नाम पर गरीब लोगों से झूठ बोला गया, गद्दारी की गई है। केवल 18 प्रतिशत लोगों की ही कर्ज माफी हुई है। वरुण सिर्फ केंद्र तक ही सिमित नहीं रहे बल्कि अखिलेश सरकार पर भी हल्ला बोला । वरुण गांधी ने कहा - प्रदेश में चारो तरफ अराजकता व आतंक का महौल है। गोरखपुर में सीरियल बम बलास्ट करने वाले आतंकियों पर चल रहे मुकदमों को वापस लेनी वाली सपा सरकार को टांडा के देशभक्त रामबाबू की सुध नही रही। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में फंसे सपा सरकार का कोई भी प्रतिनिधि जघन्य हत्या का शिकार हुए रामबाबू गुप्ता के परिजनों से मिलने के लिए नही गया। उन्होंने सवाल किया कि आखिर उत्तर प्रदेश में ये क्या हो रहा है? राज्य में बेताहाश बढ़ते अपराध महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार व अत्याचार बढ़ते दंगो के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? उन्होंने कहा कि मुलायम माया की पार्टी परिवारवाद में फंसी निजी सम्पति की तरह है। सपा-बसपा देशहित में राजनीति नही करते। वरुण गांधी के इस तेवर से उनकी भावी राजनीति को आसानी से समझा जा सकता है । वे भाजपा के उस वोट बैंक को लाने लेन का प्रयास करेंगे जो जातियों में बंटकर वापस चला गया था । यही भाजपा की भी चुनौती है और वरुण गांधी की भी । जबतक अंध राष्ट्रभक्त और उग्र हिंदुत्व वाली भावना जोर नहीं पकडेगी भाजपा का पुराना जनाधार वापस भी नहीं आ पाएगा । वरुण एक तरफ समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे है तो दूसरी तरफ कांग्रेस मुसलमानों की अनदेखी का । यह विरोधाभास काफी रोचक भी है । वरुण मुसलमानों के नाम पर हिंदुत्व का एजंडा सामने रख रहे है तो कांग्रेस इस मुस्लिम वोटों में सेंध लगाना चाहती है जिसके चलते पिछली लोकसभा में वह करीब एक चौथाई सीट जीत गई थी पर कल्याण सिंह के समाजवादी पार्टी से जाने के बाद विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाता फिर सपा में लौटे और कांग्रेस फिर पुरानी दशा में पहुँच गई । अब कांग्रेस की लगातार कोशिश इस वोटों में सेंध लगाने की है तो भाजपा वरुण गांधी के जरिए जातियों की वह गोलबंदी तोडना चाहती है जिसके चलते हिंदू वोट बाँट जाते है ।वरुण गांधी ने इसी वोटबैंक को अपना लक्ष्य बनाया है । पर उत्तर प्रदेश की मौजूदा स्थिति में जातियों कि गोलबंदी तोड़ पाना बहुत मुश्किल काम है । वे मुस्लिम को लेकर अगर सपा पर निशाना साधेंगे तो भाजपा का वोट बढे न बढे सपा का मुस्लिम जनाधार मजबूत ही होगा । जनादेश

विदर्भ में न बदल जाए बुंदेलखंड

विदर्भ में न बदल जाए बुंदेलखंड अंबरीश कुमार /हरिश्चंद हमीरपुर/झाँसी , मई ।बुंदेलखंड अब विदर्भ की तरह के पानी के संकट को न्योता देता नजर आ रहा रहा है । इसकी मुख्य वजह तालाब के बाद नदियों की दुर्दशा है । इसके लिए राजनैतिक दल जिम्मेदार है जो उन नेताओं और ठेकेदारों को प्राकृतिक संसाधनों को लूट की छूट दिए हुए है । नतीजा सामने है ।बुंदेलखंड में नदियां सूख रही है ।महोबा में ऐतिहासिक चंद्रावल नदी सूख गई है तो चंदेलकालीन तालाब का पानी तलहटी तक पहुँच चुका है । केंद्र सरकार ने चंदेलकालीन तालाबों में पानी लाने के लिए दो सौ करोड रुपए दिए पर कागज में तो पानी बहने लगा ताल तालाब और सूख गए । बेतवा ,पहुज ,केन ,उर्मिल ,बाणगंगा और धसान जैसी कई छोटी बड़ी नदियां संकट में है ।पहले तो छोटी नदियों का पानी गरमी में सूखता था पर अब बड़ी नदियों का पानी भी सूख रहा है । उरई में कोटरा ,सिकरी व्यास ,मोहाना ,गोडा सिमरिया जैसे बेतवा नदी के घाट पर डुबकी मारने लायक पानी मिलना मुश्किल हो रहा है । यह बानगी है बुंदेलखंड में पानी के आने वाले संकट की । पानी के लिए गांव गांव में विवाद शुरू हो चुका है । यह संकट गांव कस्बो से आगे बढ़ता हुआ जंगल तक पहुँच चुका है ।कुछ दिन पहले कुलपहाड़ में पानी तलाशती एक गर्भवती हिरणी को जंगल में कुत्तों ने मार डाला । जंगली जानवर भी पानी के संकट से जूझ रहे है । यह संकट और बढ़ने जा रहा है क्योकि पारा चढ़ते ही ताल तालाब और नदियों का पानी और घट जाएगा । बुंदेलखंड में बड़ी नदियों के किनारे रहने वाले कभी इस तरह का पानी का संकट नही झेलते थे जैसा हाल के कुछ सालों से झेल रहे है । इसकी एक वजह यह भी थी कि नदी के किनारे कैचमेंट एरिया में बरसात का पानी भर जाता था और वह आसपास की जमीन को भी नम रखता था । साथ ही पहाड और जंगल में पानी के स्रोत भी ताल तालाब और नदियों के जल स्तर को बनाए रखते थे ।पर्यावरण से खिलवाड की छूट मिलते ही सबसे पहले पेड़ काटे गए फिर पहाड खोदे गए और अब नदियों की तलहटी खोदी जा रही है ।जब तलहटी खोद दी जाएगी तो पानी ठहरेगा कहा । अवैध खुदाई करने वाले लोगों में ज्यादातर सांसद विधायक नेता और पूर्व सांसद विधायक है । इनका चरित्र भी सत्ता के साथ बदलता है ।मसलन सिंह ,पंडित ,ठाकुर ,बुधौलिया और गोस्वामी कंस्ट्रक्शन या ट्रांसपोर्ट के नाम वाले ट्रक दिखते थे अब यादव ट्रांसपोर्ट या कंस्ट्रक्शन ज्यादा दिखता है ।पर इससे भ्रमित नहीं होना चाहिए क्योकि यह सब मुखौटे है और धंधा करने वाला सिर्फ चोला बदलता है कमान उसके हाथ में होती है । एक एक नदी से पांच सौ हजार ट्रक बालू / मौरंग रोज निकालेंगे तो पानी कहा जाएगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है । महोबा से निकलने वाली चंद्रावल नदी का नाम वहां की राजकुमारी के नाम पर है जिसे चंदेलों ने ग्यारहवीं सदी में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान से युद्ध कर छुडवाया था ।कहा जाता है कि यह युद्ध करहरा गांव के पास हुआ था और बाद में इस नदी का नाम चंद्रावल रखा गया ।यह नदी आसपास के गांवों के लिए वरदान थी । चंद्रावल नदी अब सूख चुकी है और उर्मिल बांध में भी पानी बहुत कम है । जबकि सोलह चंदेलकालीन तालाबों में पानी लाने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पहल की है। तालाबों की भी बहुत दुर्दशा हुई है । मसलन चंदेलकालीन मदन सागर तालाब करीब साढ़े छह किलोमीटर का है पर उसका कैचमेंट एरिया बाईस किलोमीटर का है जिसका पानी इस तालाब में आता था । अब इस कैचमेंट एरिया में लोगों ने मकान बना लिए तो सरकार ने सड़क और पुल बनाकर पानी आने का रास्ता ही बंद कर दिया । पर्यावरण विशेषग्य केके जैन ने कहा -यही इस समस्या की जड़ है ठीक उसी तरह जैसे नदियों की तलहटी खोद कर उन्हें बांझ बनाया जा रहा है । सरकार ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया तो फिर विदर्भ जैसे हालत बुंदेलखंड में पैदा हो जाएंगे ।